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गृहलक्ष्मी की कहानियां - समाधान
Stories of Grihalaxmi

गृहलक्ष्मी की कहानियां – फोन आया। उनके स्वर में दर्द की कराह थी। ”अलका,मेरे घुटनों में बेतहाशा दर्द हो रहा है।” आखरी शब्द कहते कहते उनका गला रूध गया।  ऐसा पहली बार हुआ जब मैंने प्रतिमा मौसी को सुबकते हुए पाया। चलना फिरना उनका पहले से ही न के बराबर था। भारी बदन होने के कारण उनकी तकलीफ कुछ  ज्यादा ही थी। डाक्टर का कहना था कि उनका घुटना खराब हो चुका है। ऑपरेशन ही विकल्प है। ऑपेरशन के नाम से ही उन्हे डर लगता। क्या पता ऑपरेशन के बाद भी घुटना ठीक न हो? फिर जो थोडा बहुत उठना बैठना है वह भी खत्म हो जाए तब तो वह कहीं की नहीं रहेगी।

”मौसी, आप परेशान मत होइए सब ठीक हो जाएगा। श्रवण को फोन किया?” 

”हां कर दिया है। सुबह की फ्लाइट से आ जाएगा।” सुनकर मुझे तसल्ली हुई। श्रवण प्रतिमा मौसी का इकलौता लडका था।  शादी के बारह साल बाद श्रवण का जन्म हुआ। किसी ने कहा छठ मैया का व्रत करो गोद अवश्य भरेगी। उन्हे यह व्रत निराशा के बीच आशा की एक किरण सी लगी। सो एक बार जो ठाना तो पूरी निष्ठा के साथ निराजल अबतक रहती रही। पिछले साल ही उन्होने यह व्रत छोड़ा। वह भी तब जब शरीर ने जवाब दे दिया। छठ माई से माफी मांगी ,”मां, मेरे बेटे की रक्षा करना।” वे चाहती थी कि उनकी बहू अपूर्वा इस व्रत को जारी रखे। दबे स्वर में उन्हेाने अपनी इच्छा जाहिर भी की मगर अपूर्वा ने हंस कर टाल दिया। आधुनिक परिवेश में पली बढी अपूर्वा को यह सब ढकोसला लगता। 

श्रवण शुरू से ही प्रतिभाशाली था। मौसी के लाड प्यार ने उसे बिगाडा नहीं। मौसी का  लाड-प्यार अनुशासित था। उन्होंने श्रवण को कभी इतनी छूट नहीं दी कि वह गलत लोगो का साथ पकड़े। स्कूल से घर, घर से स्कूल।  पढ़ाई को लेकर वे इतनी सख्त थी कि पढाई की लापरवाही पर दोचार झापड़ लगाने में भी न  हिचकती। प्यार दुलार एक सीमा तक। मगर पढाई से कोई समझौता नहीं। इसी का नतीजा था कि श्रवण एक नामी कंपनी में इजींनियर बन गया। उनके संस्कारों में