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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

आज मैं अपने बचपन की सहेली गीता की बेटी की शादी करके अपने घर लौट रही हूँ। ट्रेन की गति के साथ-साथ पुराने दिनों की यादें मेरे मानस-पटल पर चलचित्र की भांति आ रहीं हैं। आज मैं स्वयं को अत्यंत प्रसन्न और हल्का महसूस कर रही हूँ।

गीता एक आधुनिक विचारों वाले परिवार में पली, पांच बहिनों में सबसे छोटी, सबकी लाडली और होशियार, स्वभाव से हंसमुख और मिलनसार लडकी थी। हम दोनों ने एक ही कॉलेज से एक जैसे विषय लेकर ग्रेजुएशन किया था, इसलिए हमारी मित्रता बहुत प्रगाढ़ हो गई थी। हम मन की सारी बातें साझा किया करते थे।

जल्दी ही उसकी शादी राजस्थान के एक छोटे से गांव में कर दी गई। उसकी ससुराल के लोग अत्यंत अंधविश्वासी और पुराणखंडी विचारों वाले थे। उसका पति शहर में रहकर पढ़ा था। वह शहर में ही नौकरी करता था।

गीता की जिठानी ने भी तीन पुत्रियों को जन्म दिया, इसलिए उसकी सास और दादीसास आए दिन उन्हें (जिठानी को) ताने देती रहती थीं। गीता अपनी जिठानी की और उनकी बेटियों की बेकद्री देख-देखकर दुखी होती रहती और अंदर ही अंदर घुटती रहती थी।

उसकी दादीसास अक्सर अपने जमाने में बहुओं के साथ हुए दुर्व्यवहार की चर्चा किसी न किसी बहाने करती रहती थीं कि “हमारे जमाने में बहुओं की उम्र सात-आठ साल हुआ करती थी। वो ही घर का खाना बनाती व बर्तन साफ करती थीं। जरा-सी भी गलती होती तो चिमटे की मार और गालियों की बौछार होती। चाहे जाड़ों की ठिठुरती रातें हों पर ससुर नौ बजे ही खाना खाते और सासें दस बजे। जब तक वो खाना न खा लें, बहुएं रसोई से बाहर नहीं निकल सकतीं थीं। अगर रसोई में बैठे बैठे झपकी लग गई तो जमीन आसमान एक कर दिया जाता।”

ऐसे वातावरण में गीता जैसे-तैसे समय व्यतीत कर रही थी। जब पति शहर से आते तो उसका मन खुशियों से भर जाता था। एक दिन उसे मालूम हुआ कि वह गर्भ से है। अब वह बहुत चिंतित रहने लगी। गर्भजनित कष्टों को चुपचाप सहती रही, पर उसने यह बात किसी को भी नहीं बताई यहां तक कि अपने पति को भी। एक दिन उसने फोन पर मुझे बताया कि वह माँ बनने वाली है।

वह यह बात किसी को भी नहीं बताना चाहती थी कि उसके गर्भ में क्या है, जब तक इस बात का पता न चले। उसने ये खबर अपने पति को भी न लगने दी। फिर वह एक दिन मेरे घर आई हम दोनों क्लीनिक गए।

वहां डाक्टर ने सोनोग्राफी करने के बाद बताया कि उसके गर्भ में कन्या भ्रूण ही है। यह जानकार वह बहुत परेशान हुई। बहुत समझाने पर भी वह न मानी। आखिर उसने गर्भपात करवा ही लिया। कुछ दिन रहकर वह ससुराल चली गई। अब उसके पति का स्थानांतरण गांव से बहुत दूर दूसरे शहर में हो गया। वह अपने पति के साथ शहर में रहने लगी। ससुराल से दूर कुछ दिन उसे बहत अच्छा लगा। परन्त थोडे दिनों बाद ही वह बेचैन सी रहने लगी मानो उसके शरीर में घुन लग गया हो। शादी के छह सात साल बाद भी उसके कोई संतान नहीं हुई। तब उसके पति ने उसे डॉक्टर को दिखलाया। डाक्टर ने बताया कि वह कभी मां नहीं बन सकती। अब वह और अधिक घुटन महसूस करने लगी। क्योंकि वह पहले ही भ्रूण हत्या का पाप कर चुकी थी। अब तो वह बांझ भी हो गई थी। पति और परिवार वालों की सहमति से उसने सुंदर और स्वस्थ पुत्र को गोद ले लिया। कुछ दिन उसके लालन-पालन करने में बहुत अच्छे गुजरे। किन्तु फिर वह अंदर ही अंदर घुटन महसूस करने लगी। अब वह बीमार भी रहने लगी। अक्सर उसे एक स्वप्न आता था, जो उसके बचपन में पढ़ी एक कहानी से मिलता-जुलता था कि वह एक ऐसे दल-दल में गिर पड़ी है, जहाँ से लाख कोशिशों के बाद भी नहीं निकल पा रही। उसके हाथों और पैरों में काई उग आई है। काई के जाल ने मानो उसके शरीर को बान्ध दिया हो।

वह मझसे निराशा भरी बातें फोन पर किया करती थी उसने अपने पति और परिवार वालों को बिना बताए जो पाप किया था, वह उसे जीने नहीं देता। जबकि उसका पति हर तरह उसका साथ देता था। वह उसके लिए सब कुछ करने के लिए तैयार रहता था। इस तरह कुछ और समय बीता।

एक दिन फिर उसका फोन आया। उसकी आवाज में काफी दम थी। ऐसा लगा मानो पहले वाली गीता बोल रही हो उनसे बताया कि उसने अपने पाप का प्रायश्चित कर लिया है। उसने एक अनाथालय से सुंदर स्वस्थ बीस दिन की कन्या को भी गोद ले लिया है। उसका नाम उसने सृजना रखा है। आज उसका परिवार पूरा हो गया है। उसने सृजना का लालन-पालन अच्छे संस्कारों के साथ किया। उसे पढाया-लिखाया। सजना अपनी मेहनत और मां के आशीर्वाद से होशियार गायनिक बन गई। आज उसी सृजना की शादी करके मैं अपने घर लौट रही हूँ। सृजना की शादी करके गीता ने मानो कन्या भ्रूण हत्या का कलंक मिटा दिया हो। मुझे याद है कि विदा के पूर्व गीता सृजना को समझा रही थी, कि वह अपने हाथों कभी भी भ्रूण हत्या नहीं करेगी और न ही होने देगी।

इस प्रकार मैं विचारों में खोई कब अपनी मंजिल तक पहुँच गई। कुछ पता ही नहीं चला। स्टेशन पर प्लेटफॉर्म आ गया और मैं अपने घर की ओर चल पड़ी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’