स्पून फीडिंग-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Courage Story
Spoon Feeding

Courage Story: “मैं स्वर्णा हूँ…”
पँचसितारा होटल जैसी सुविधाओं से युक्त हस्पताल के बिस्तर पर एकाकी लेटे हुए अपने कर्मों का ख़ुद से ही हिसाब कर रही हूँ।
आज भी विवेक मेरे पति के शब्द मेरे कानों में प्रतिध्वनि बनकर गूँजते है,”तुम्हारे कर्म ही तुम्हें जीने नहीं देंगे”।
मैं दर्दनिवारक दवाओं की सुरक्षा में होते हुए भी उनसे भाग नहीं पाती,जब बेटी कनक की तरफ़ देखती हूँ तो पश्चाताप से भर जाती हूँ…
मेरे गलत निर्णय उसे भी जीवन के चौराहे पर घसीट लाये ।
नाम की तरह सम्पन्न ,आत्ममुग्ध ,पर इस दुनिया मे नितान्त अकेली सोने जैसा ही मेरा भाग्य है मेरे नसीब में भी अंधेरी कोठरी रहीं ।
जिन्हें कभी नियति ने चुना तो कभी मैंने खुद से भी……
कहते हैं मरता हुआ मनुष्य झूठ बोले तो उसकी मुक्ति नहीं होती, मैंने भी कुछ ऐसा ही किया , मैं  ईश्वर से  अपना दण्ड भी  स्वयँ लेना चाहती हूँ…
धनी घर में जन्म लिया मैनें और उसके साथ सभी अवगुण भी आत्मसात कर लिए।
सबसे नज़र मिलाकर बात करनेवाली बस अपनी बिटिया कनक की आँखों में अपने लिए घृणा सहने का साहस नहीं जुटा पा रही…
घर में जन्मी एकमात्र सन्तान को मेरे पिताजी ने शिक्षा दीक्षा दिलाने में कोई कसर बाकी  न रखी और मैंने भी उन्हें निराश न किया।
उनकी ही तरह विख्यात ज्योतिषाचार्य भी बनी बचपन से ही मैंने सीखना शुरू किया तो विराम ही न लिया।

सफ़लता के साथ अहंकार का विषैला अहिराज भी मेरे आँचल में ग्रन्थि की तरह पोषण पाने लगा।
सर्वगुणसम्पन्न धनी  परिवार की  एकमात्र कन्या होने के अहंकार ने कभी मेरे मन को दाम्पत्यसूत्र का मर्म समझने ही न दिया।
साधारण घर के एकमात्र पुत्र ; मेरे पति  विवेक जिनके पिता के माथे पर चार कन्याओं के विवाह का भार था।
मेरे पिता से लिया कर्ज़ चुकाने को उनकी स्वतंत्रता बन्धक हो गयी मुझसे  ब्याह उनका धर्म था अपने माता पिता के प्रति…
और  विवशता थी मेरे घर पर जँवाई  बनकर रहना, और मेरी उद्दंडता और आये दिन मेरे द्वारा किये गए अपमान को सहते जाना।
न तो मैंने स्वयँ  कभी रिश्तों का मोल समझा और न ही प्रयास किया।
नये नए दाम्पत्य सुख  के प्रारंभ में मैंने ही  उन्हें ही बराबर झुकाने  का प्रयास किया ,और समय के साथ एक बेटी की माँ भी बनी।
विडम्बना यह रही कि न तो कभी मैंने ख़ुद से  एक गिलास पानी लेकर पीने की तो कनक को क्या सिखाती।
विवेक धीरे धीरे बाहर पुरुष की भूमिका निभाने के साथ साथ गृहणी की भूमिका में मजबूरीवश आने लगे और मैंने बस आरामतलबी के अतिरिक्त कुछ न देखा।
कनक भी मेरी ही परछाईं बनती जा रही थी उतनी ही स्वभाव से  काली और आत्मकेंद्रित।
विवेक के घर में होने से से न तो मुझे अन्तर था और न ही उसे ।
कई बार उन्होंने मुझे दबी आवाज़ में कहा ,कि यह मेरी भी बेटी है उसे थोड़ा दायित्वबोध सीखने दो अपने और रिश्तों के प्रति जीवन सरल होगा।
कनक विवाहयोग्य हो गयी थी,मैंने उसकी कुण्डली देखकर यह निष्कर्ष निकाला,” कि इसके भाग्य में विवाह का सुख अल्प है ;अतः उसे अविवाहित रहने देते हैं”।
परन्तु कर्मप्रधान विवेक बोले,”तुम स्वार्थी हो अपने हठ में बेटी बिन ब्याही रखोगी…यदि कोई दूसरा होता तो तुम उपाय करवातीं या नहीं?
किसी दूसरे से बात करो ,कुछ कर्म कुछ भाग्य हम अपनी बिटिया का प्रारब्ध बदल देँगे परन्तु अपनी हथेली पर हर सुविधा की अभ्यस्त मैं भी कनक को अपने आईने में उतार चुकी थी।विवाह दो जो घरों दो दिलों का मेल था।
मेरी हठ और कनक की नासमझी से कुरुक्षेत्र बन गया,लड़कों की तरह वेशभूषा और सोच रखने वाली कनक पति आलोक से निभा ही न पाई और बिना तलाक ही मायके आ गयी।
दम्भ में मैंने भी अपनी भविष्यवाणी को सच कहकर उसे समझाने का प्रयास न किया और कनक के लिए तिज़ोरी का मुँह खोल दिया।
उस दिन विवेक बेटी का घर टूटने के कष्ट में पुरुष होकर भी फूट-फूटकर रोये और मैं कनक के साथ कमरे में नारीवाद की विजय के गर्व में डूबी रही।
सुबह मिला तो चौकीदार के हाथों से उनका एक पत्र ,जिसमें उन्होंने पराजय मानकर स्वयँ को न खोजने का आग्रह किया था मुझसे।
आने वाले कुछ वर्ष बाद जिन्दगी ने मुझसे मेरे कर्मों का हिसाब लिया और मैं कर्करोग(कैंसर)से ग्रसित हो बिस्तर पर आ गयी।
कनक अब मेरे सोने के ढ़ेर पर बैठा एकाकी प्रतीक थी मेरी विजय का ,अब मुझे घबराहट होती कि यदि मुझे कुछ हो गया तो मेरी कनक अकेली हो जाएगी।
मैँ अब फूटफूटकर कर रोती और अपने आँसू स्वयँ पोंछती आखिर अपने कर्म बांटती भी तो किससे?
कोई बात करने वाला भी नहीं उसके साथ,इच्छा करने पर धन हमें सब दे सकता है पर जीवित मनुष्य और रिश्ते नहीं।
मैंने अपना सब कुछ अपने इन्ही हाथों से तहस नहस किया था अपना और अपने साथ साथ अपनी बेटी का भी परिवार।
मेरे पास समय कम था पर मरने के लिए शान्ति न थी,साहस कर मैंने नर्स से आलोक का नम्बर मिलाकर बात करवाने को कहा।
यह मेरा भाग्य था जो नर्स ने मेरी गिरती हालत की दुहाई दे आलोक से अस्पताल आने की प्रार्थना की,उसके साथ विवेक भी आये।
मैं और कनक दोनोँ ही आश्चर्य में पड़ गए आज मैंने जिन्दगी भर के अपराधों की माफ़ी माँगकर ख़ुद को भारहीन अनुभव किया।

शर्मिंदा कनक और आलोक अब विवेक को समझा रहे थे कि इन्हें माफ़कर दीजिए।
मेरी कमज़ोरी से मुंदती आंखों के सामने मेरे वृद्ध सास -ससुर मेरे कर्मफ़ल पर हँसते दिख रहे थे ।
पापाजी मम्मी जी को क्षमा कर दीजिए आलोक ने विनम्रता से कहा ।
आलोक बेटे झूठी हठ और अहम का भुगतान पूरी ज़िंदगी करती है,विवेक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ रही थी।
साँस उखड़ रही थी पर प्राण उनकी माफ़ी में अटके थे।
आलोक के जोर देने पर विवेक ने मेरे मुँह में गंगाजल डालते हुए कहा कि कनक और आलोक के समक्ष अपनी गलती मानलो मैँने तुम्हें माफ किया।
कनक के चेहरे पर मेरे माफ़ी माँगने के बाद आई घृणा मेरे कर्मों की पश्चात्ताप स्वरूप बड़ी छोटी सज़ा थी पर आत्मा कर्मों की बेड़ियों के साथ शरीर से मुक्त हो गयी ।