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रंगों का साझापन/समाज विज्ञान-21 श्रेष्ठ नारीमन की कहानियां पंजाब: Skin Discrimination Story
Rango Ka SaJhapan

भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

Skin Discrimination Story: “देख लो नरिंदर, मैं एक पेंटिंग बन गई हूं, पेंटिंग…। ये रंग अब मिक्स हो गए हैं। मेरे हाथ ब्रुश बन गए हैं…देखो…कैसे मेरी देह पेंटिंग बन रही है, मैं पूजा नहीं हूं, नरिंदर मैं तो एक पेंटिंग हूं।” मैं चीख उठी। वह वक्त चीखने का ही था। नरिंदर और किरन को निकट बैठे देख, मैं उठ खड़ी हुई थी। मेरी पेंटिंग में नरिंदर कमियां निकालने लगा। वह मुझे टॉर्चर कर रहा था। मैं सहन ना कर पाई और उठ कर पूजा-कमरे में आ कर गणेश के आगे समाधि लगा कर बैठ गई। मैं शांत होना चाहती हूं। मैं अपने मन का उबाल शांत कर देना चाहती हूं। परन्तु तभी ही नरिंदर नाग पूजा-घर के आगे आ कर बोलने लगा, “पूजा तेरा यह पाखंड मैं सहन नहीं कर सकता। यह सब ड्रामा है। यही ड्रामा तुम पेंटिंग में कर रही हो। रंगों का नाश और अपनी बुद्धि का दिवालियापन, बहुत बढ़िया ढंग है भई। मिथक चरित्रों की बैसाखियां बना कर पेंटिंग में अपना नाम बनाओ, कुर्सियों पर बैठे लोगों से ईनाम पाओ, ओहदे लो, बौद्धिक दिवालियापन है।”

मैं बेसुरति अवस्था में ही पूजा से उठ खड़ी हुई। नरिंदर नाग ने जैसे मेरे सीने में डंक मारा हो। मन विचलित होने लगा, आर्ट कमरे में आ कर सारे रंग मेज पर गिरा दिए। अपने हाथों से मुंह पर रंग लगाने लगी। कपड़ों में भी लगाने लगी। मेरी देह, मेरी कलाइयां, कपड़े., सब कुछ कैनवस बन गए और हाथ ब्रुश बन गए। मैं खुद एक पेटिंग बन गई थी। आपने कभी देखी है, चलती-फिरती पेंटिंग? भला वह भी कोई पेटिंग हुई जो सारी उम्र दीवार पर ही लटकी रहे। पेंटिंग वह होती है, जो बातें करे। आपके साथ चले। मैं पूजा नहीं रही। मुझे मालूम नहीं, नरिंदर ने मुझे कैसे काबू किया। कैसे मेरा मुंह साफ किया। कैसे मेरे कपड़े बदले थे। मैं तब तक होश खो बैठी थी। भला कोई कलाकार भी बेसुरति होता है। यह पहला दिन था, जब हमारे बीच में रंगों की रेखा खिच गई थी। फिर मैं बाद में बेसुरति से सुरति में आई थी। बस मुझे बताया जाता था, मैं बेसरति में क्या करती थी। तब भी नर्स के ‘सॉरी’ कहने पर मैं बेसुरति हो गई थी। हां तब….।

***

पहले-पहल बात रंगों से ही आरंभ हुई थी। रंगों ने ही हमारे बीच संबंध पैदा किया था। रंगों के कंबीनेशन ने हमारी जिन्दगी में रंग भर दिए थे। रंगों के साथ खेलते, रंगों से पेट भरते और रंगों में ही हम खो गए थे। वह समय भी ऐसा था कि सपने भी रंगों के ही आते थे।

विरसा विहार में पेंटिंग की प्रदर्शनी लगी हुई थी और मैं अपनी तैयार की पेंटिंग के पास खड़ी थी। उसी समय मुझे पीछे से एक आवाज सुनाई दी, “पूजा जी! आप ने अपनी इस पेंटिंग में भारतीय संस्कृति में पूजा विधि का एक कल्चर रंगों द्वारा प्रस्तुत कर दिया है। देखिए, यह तुलसी का पौधा, गमले में हिन्दू संस्कृति के चिन्ह, संस्कारी नारी का बिंब, ढंका हुआ सिर और आस-पास भक्ति में रंगा आभा-मंडल, अत्यन्त सूक्ष्म आर्ट वर्क द्वारा आप ने एक पूजा-विधि के माध्यम से ही संपूर्ण संस्कृति पेंटिंग में उतार दी। इसमें जैसे आपने पूरा महाकाव्य ही चित्रित कर दिया हो।” मैंने पीछे मुड़ कर देखा, प्रो. नरिंदर नाग मेरी पेंटिंग की ओर देखते हुए प्रवचन करने में मगन था। मैं अंदर ही अंदर खुश हो रही थी। नाग साहिब मुझसे काफी सीनियर आर्टिस्ट थे और फाइन आर्ट के प्रोफेसर थे। मैं तो अभी एकदम नई थी और यह मेरी पहली पेंटिंग किसी एग्जीबिशन में लगी थी। एप्लाईड आर्ट की डिग्री मैंने अभी ही पूरी की थी।

मैंने उनकी ओर मुड़ कर कहा, “सर! बहुत अच्छा लगा, आपके मुंह से पेंटिंग के बारे में सुन कर। वास्तव में ये पेंटिंग मेरी पूजा-पेंटिंग सीरिज की एक पेंटिंग है। मैंने अलग-अलग पूजा विधियों और उन्हें करने की परंपराओं व पूजा में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री और चिन्हों को अपनी सीरिज में प्रस्तुत किया है।”

नरिंदर ने मेरी बात सुन कर पेंटिंग से नजर हटा कर मेरे चेहरे पर टिका दी और हाथ जोड़ कर पूजा की मुद्रा में कहने लगा, “वाह पूजा जी! आपकी पूजा सीरिज भी देखने वाली होगी। सीरिज बनाने से पहले काफी होमवर्क और स्रोतों के बारे में जानकारी एकत्रित की होगी। सीरिज पर काम करना तपस्या करने समान है।”

‘सर। पेंटिंग है ही तपस्या। घंटों तक सिटिंग देनी पड़ती है। वास्तव में मैं अपने पारिवारिक माहौल से ही आइडिया लेती हूं। मैं बचपन से ले कर अब तक अपनी मां को, अपने पिता को, दादी-दादा, बहन-भाइयों को धार्मिक कार्य करते, सामग्री एकत्रित करते और पूजा-पाठ करते देखते आई हूं। मेरे सब-कांशयस माइंड में ये सारी बातें जमा है।” मुझे अच्छा लग रहा था, नरिंदर सर से पेंटिंग के बारे में बातें करते हुए।

नरिंदर सर ने अपना सारा ध्यान मुझ पर केन्द्रित कर लिया था। हॉल में पेंटिंग की प्रदर्शनी देखने लोग आ-जा रहे थे। किसी-किसी पेंटिंग के पास दो-चार दर्शक खड़े हो जाते, आपस में बातें करते। सर, सभी से लापरवाह हो गए थे। पेंटिंग के बारे में बातें करते हुए शायद उन्हें भी अच्छा लग रहा था। उन्होंने मेरी ओर अंगुली करते हुए सवाल किया, “आप…थे…?” उनके सवाल का अधूरा वाक्य मैं समझ गई थी।

“जी, मैं हिन्दू परिवार से हूं। ब्राह्मण खत्री परिवार से।” तब मुझे लगा, मुझे इस प्रकार ओपन नहीं होना चाहिए था। शायद नरिंदर सर का सवाल कुछ और हो।

“नहीं…नहीं, मैं पूछना चाह रहा था कि अब आप क्या कर रहे हो, पीएचडी वगैरह।” मुझे लगा, नरिंदर सर ने अचानक अपना प्रश्न पलट दिया था और मुझ पर रंग बिखेर कर मुझे झूठा साबित कर दिया था। मैंने बनावटी मुस्कुराहट से कहा, “सर! मैं एक कान्वेंट स्कूल में आर्ट टीचर हूं। एप्लाई आर्ट की डिग्री के बाद, आगे कुछ करने को मन नहीं किया। हां सर, जब कभी मौका मिले, मेरी पेंटिंग देखने जरूर आइएगा। पेंटिंग में इंपरुवमैंट के चांस तो बने ही रहते हैं। प्लीज अपना सैल नंबर मुझे दे दें।” मैं अपना फोन निकाल कर उनका फोन नंबर फीड करने के लिए, उनकी ओर देखने लगी। मैंने उनका नंबर सेव कर, उन्हें फोन कर अपना नंबर भेज दिया और कहा, “सर, यह मेरा नंबर है, प्लीज फीड कर लीजिएगा।”

सर ने कुछ और पेंटिंग्स पर सरसरी नजर डाली और चले गए। यह हमारी पहली मुलाकात थी। तब मुझे लगा, आर्ट के क्षेत्र में मुझे बहुत पहले आ जाना चाहिए था। इससे आप अन्य सीनियर आर्टिस्टों से मिलते हैं, डॉयलाग करते हैं और कुछ नया सीखते हैं। तब मुझे लगा, जैसे यह पेंटिंग मेरी ही बनाई हुई है। वह प्रदर्शनी का आखिरी दिन था। दो-तीन सप्ताह बीत गए। इस दौरान सर का कोई मैसेज या फोन नहीं आया। कभी-कभी मेरा मन करता, मैं नरिंदर सर को अपने घर बुला कर उन्हें अपनी पेंटिग्स दिखाऊं और वह मुझे गाईड करें। फिर मैं झिझक गई। चाय पीते हुए मैंने वाट्सअप पर मैसेज भेजा, “सर, मैं पूजा, क्या हाल है आपका।”

सर का मैसेज पन्द्रह मिनट बाद मिला, “अरे पूजा, असल में मैं तुम्हारा नंबर फीड करना भूल गया था। अब तुम्हारा मैसेज आया, अच्छा हुआ। मैं अभी तुम्हारा नंबर फीड कर लेता ह।” फिर कछ दिन बीत गए।

एक दिन मैंने सर को कॉफी पर बुला लिया, “नरिंदर सर, आज शाम को आप मेरे घर पर कॉपी पिएं। देखें, इन्कार मत कीजिएगा। इसी बहाने मेरी पेंटिंग्स भी देख लेंगे।”

“चलो ठीक है। कॉफी आपके घर रही।” सर ने कॉलेज से फ्री होकर आने की सहमति दे दी।

मैंने अपने पेंटिंग वाले कमरे में पूजा-सीरिज की सारी पेंटिंग्स डिस्पले कर दी। टेबल पर ड्राई फ्रूट रख दिया। घर में नरिंदर सर के आने के बारे में सूचित कर दिया कि वह फाईन आर्ट्स कॉलेज के प्रोफेसर हैं। मुझे सर की मौजूदगी में डिस्टर्ब ना किया जाए।

सर आएं।

“सर, आप पेंटिंग देखें। मैं तब तक आपके लिए कॉफी लाती हूं।” मैं उन्हें अपने कमरे में बिठा कर कॉफी लाने चली गई। मेरी मां और बहन ने उनका अभिवादन किया और अपने काम में जा लगी। कॉफी तैयार करते हुए, मैंने खुद को परीक्षा में बैठे महसूस किया। कॉफी लेकर कमरे में पहुंचने पर देखा, सर, मेरी पेंटिंग्स को बहुत गौर से देख रहे थे। मैंने कॉफी थमाई और खुद भी उन के सामने बैठ गई। ड्राई फ्रूट मुंह में डालते हुए उनके मुंह से निकला, “वाह भई! बहुत खूब!”

मुझे समझ में नहीं आया कि ये शब्द पेंटिंग्स के लिए थे या कॉफी के लिए। मैंने सोचा विद्वान लोग इसी प्रकार बोलते होंगे। छिपे शब्दों और लुके अर्थों में। मैंने मुस्कुरा कर पूछा, “सर, कॉफी या पेंटिंग्स…।”

सर हंस दिए, “फिलहाल कॉफी।”

इस दौरान हम छोटी-छोटी बातें करते रहे। कभी मैं कुछ पूछती… अधिकतर नरिंदर सर ही पूछते रहे। साथ ही मेरी पेंटिंग्स की ओर भी निगाह डालते रहे। मुझे ध्यान आया, प्रदर्शनी में लगी सर की पेंटिंग के बारे में बात करनी चाहिए।

“सर, प्रदर्शनी में लगी आपकी ‘ट्रेजडी’ शीर्षक वाली पेंटिंग के बारे में बात करना भूल गई थी।” उसी दौरान मैं अपने मोबाईल पर उस पेंटिंग की तस्वीर निकाल कर देखने लगी। “सर, आपने बहुत ड्रार्क कलर इस्तेमाल किए हैं। मिसाल के लिए काला, लाल, कहीं भूरा-सा, टाईटल ‘ट्रेजडी’ देकर आप ने इस पेंटिंग को अर्थमय बना दिया। कुछ चेहरे या कह लें….संपूर्ण मानव शरीर, जिन के पैर नंगे हैं, वे किस ओर जा रहे हैं, अंधेरे से रोशनी की ओर, पैरों में जंजीर है, बदन पर नाममात्र कपड़े हैं। बेतरतीब बाल, कुछ झुके हुए शरीर। एक की गर्दन में रस्सी में बंधा बर्तन लटकता हुआ। वे जिस रास्ते पर जा रहे हैं, उस रास्ते के एक कोने में कछ मानव शरीर पिंजर से हैं, यहां ब्लैक कलर है, ऊपर रेड कलर है, कोने में एक ओर आधा मानव आकार है, जिसके हाथ की केवल एक अंगुली दिखाई देती है, जो उन अधनंगे लोगों की ओर है। किसी का थोड़ा-सा उभरा हुआ पेट है, पैरों में पहनी खड़ाओं पर वाईट कलर में काली लकीरें हैं। उनके आस-पास लाल और काले कलर से ब्रुश मारा गया है। मैं लगातार पेंटिंग की ओर देखते हुए बोलती रही। पेंटिंग का यह सब्जैक्ट है, जो मुझे दिखाई दिया।” मेरी बात सुन कर उन्होंने कॉफी के दो-चार चूंट भरे।

मेरी ओर देखते हुए कहने लगे, “पूजा! मुझे लगता है, ऐसा ही है, तुमने मेरी पेंटिंग की ना केवल फोटो मोबाईल में खींची बल्कि इसके बारे में बोलने का अभ्यास भी किया है।” सर मुस्कुरा दिए। नरिंदर सर मेरी बात का जवाब नहीं देते। मैं उनकी बात सुन कर हंस दी। लगा, उनके पास शिव जी की तरह तीसरा नेत्र है, जिससे वह सब कुछ जान लेते हैं। इस दौरान सर ने मुझ से कई छोटे-छोटे सवाल किए। मिसाल के लिए, तुम ऑयन कलर का अधिक इस्तेमाल क्यों करती हो, रंगों का चुनाव कैसे करना, पेंटिंग का सब्जैक्ट के आधार पर कलर का चुनाव कैसे करती हो? सब्जैक्ट की क्या अहमियत होती है, आदि…?

मैं अपनी समझ अनुसार सारे प्रश्नों के उत्तर देती रही। उन्होंने मेरी इस बात पर प्रशंसा की कि मैं आर्ट के क्षेत्र में अपना अलग, रंगों का व सब्जेक्ट के स्तर पर अलग बिंब बना रही हूँ। अब तक मैं अपने ही स्तर पर कार्य कर रही थी। बातों में व्यस्त होने के बावजूद मैं चाह रही थी कि सर मेरी ‘पूजा सीरिज’ के बारे में बात करें। जिस सीरिज में मैंने पन्द्रह पेंटिंग्स बनाई थी। सर जाने लगे तो मैंने कहा, “सर, आप ने इस ‘पूजा’ के बारे में कुछ बताया नहीं?”

“कौन-सी पूजा? वो पूजा या यह पूजा…। पूजा! फिर कभी।” सर ने दूसरी बार धुंधला सा जवाब देकर मुझे चक्कर में डाल दिया।

“प्लीज सर अभी बताएं! आप मुझसे सीनियर हैं। मुझे लग रहा है, आपकी नजर में इस सीरिज में काफी गडबड है।” मैंने अत्यन्त गर्व से उनसे कहा। मैं उनके बराबर खडी थी। वह बैठ गए। मैं भी उनके बराबर में बैठ गई। सर ‘पजा सीरिज’ की ओर देखते हए अपना ‘प्रवचन’ करने लगे.

“पूजा, मैंने तुम्हारी इस सीरिज को बहुत ध्यान से देखा है। जब से आया हूं, एक-एक पेंटिंग की डीटेल पकड़ रहा हूं और इसके उन संयुक्त सूत्रों को देख रहा हूं, जो इन्हें सीरिज में कन्वर्ट कर रहे हैं। इसका मुख्य आधार पूजा है, जो हिन्दू संस्कृति, हिन्दू परिवारों और रिलीजन की महिमा का मुख्य आधार है। मैंने देखा, यह सारा घटनाक्रम, यह चिंतन, तुम्हारी मानसिकता में अत्यन्त स्वाभाविकता से आया। बिना किसी विशेष प्रयोजन के, जब व्यक्ति स्थिर और शांत होता है तो रंग शांत हो जाते हैं। रंग हल्के हो जाते हैं, वे अपने भार से मुक्त हो जाते है। इसलिए हल्के रंगों का कन्सेपट इतनी सुगमता से आया। इन पेंटिंग्स में घरेलू औरतों के चेहरे हैं, शांत और निष्पक्ष। यह बात मैं बाद में करूंगा कि इन्होंने इस रूप में किस को ढाला और इन का समाज विज्ञान कैसे पूजा वाला बना। यह एक अलग सब्जेक्ट है। इन पेंटिंग्स में तम ने भगवा रंग इस्तेमाल किया, अन्य रंग भी फीके और सरल हैं, मुझे वे रंग कुछ उदास भी लगे। पीला कलर, लाईट कलर है। पीपल के पत्ते भी ड्रार्क ग्रीन नहीं, उनमें भी येलो कलर की लेयर है। वह भगवा कलर हो गया। एक तो तुम ने पीपल को भगवा बना दिया। बुद्ध काल की पेंटिंग में भी पीपल बहुत आता है, वहां अन्य कलर होते हैं। मुझे मालूम है, तुम इस मामले में जागरूक नहीं हो। आखिर तुम भी उस संस्कृति में जन्मी-पली हो, जिसमें बाकी औरतें रहती हैं। जब सब्जेक्ट आपको आत्मसात् कर लेता है, तभी आर्ट निकलता है। कलाकार भले अचेत होता है, परन्तु वह चेतन भी होता है। मैं कह सकता हूं, तुमने कलर का चुनाव जागरूक ढंग से किया है। एक तो पीपल का ट्री हर पेंटिंग में ट्रैवल करता है। फिर पूजा सामग्री, शिवलिंग, पूजासन है, कलर की सैलीब्रिटी है, एक जश्न है, उत्सव है, परन्तु…??” कहते हुए सर रुक गए।

“परन्तु क्या सर?” मैंने पूछा।

सर बोलने लगे, “मेरे मन में यह सवाल आ रहा है कि पूजा के इस ‘पूजा’ के पीछे क्या-क्या सामाजिक कन्सर्न है, उसका क्या मनोविज्ञान है। वह क्या कहना चाहती है। इसके पीछे क्या दृष्टिकोण कार्यशील है। आप पेंटिंग द्वारा दर्शकों से सवाल भी कर सकते हैं? यह ठीक है। इसके पीछे पारिवारिक संस्कार हैं। आपने जिस परिवार में जन्म लिया, वहां पूजा-पाठ के संस्कार विशेषकर औरतों के लिए बहुत आवश्यक व अहम् हैं। यह मेरा क्रिटीस्जिम नहीं है। पेंटिंग के आरंभिक काल में इस किस्म की पेंटिंग्स तैयार करना और वे भी सीरिज रूप में बहुत बड़ी उपलब्धि है। तुम्हें शाबाश!” नरिंदर सर ने उठते हुए अपना हाथ मेरी पीठ पर रखते हुए मुझे थोड़ा-सा अपने साथ लगा लिया। मैं खुश थी। मैं पेंटिंग्स के रूप में जो काम कर रही थी, वे केवल रंगों की बर्बादी नहीं थी।

***

दूसरी मुलाकात में हम आपस में फोन और मैसेज करने लगे। हमारे मध्य पेंटिंग्स की बातें होती। पूछने पर भी सर कभी अपने निजी जीवन के बारे में कम ही बताते। अक्सर टाल जाते या कोई अन्य बात छेड़ देते थे। मुझे इतना ही मालूम हुआ कि वह शहर में किराए पर रहते हैं। उनका अधिकतर समय कॉलेज के आर्ट रूम में ही बीतता था। उनका गांव काफी दूर था, जहां वह कुछ छुट्टियां लेकर ही जाते थे। परिवार में मां-बाप और भाई-बहन थे। स्कूल से जल्दी फ्री हो जाने पर हम कॉलेज कैंटीन में मिलते या शहर में किसी फूड कॉर्नर में बैठ कर बातें करते।

नरिंदर सर के पास एक ही कमरा था। वही उनका बेडरूम, आर्टरूम और किचन था। साथ में वाशरूम था। आर्ट में रुचि और भी बढ़ गई। अब हम दूसरे शहरों में भी चित्र-प्रदर्शनियां देखने जाने लगे। उन दिनों सर के पास मोटरसाईकिल था। मोटरसाईकिल पर सर के पीछे बैठने पर मुझे अजीब सी फीलिंग होती। एक बार जाते हुए, सामने से गाय आ जाने पर उन्होंने जोर से ब्रेक लगाये तब मैंने उन्हें कस कर पकड़ लिया और कोई चारा भी नहीं था। सर कहने लगे, “यह जाहिल लोग गायों को सड़कों पर पता नहीं क्यों छोड़ देते हैं। पहले दूध पीते हैं, पेड़े देते हैं, पूजा करते हैं, जब दूध देना बंद कर देती है तो बाहर निकाल देते हैं। इनका इस्तेमाल अन्य ढंग से क्यों नहीं किया जाता।” सर की बात सुन मैं हैरान हो गई। हम गऊ माता की पूजा करते हैं। इसलिए मैंने कहा, “सर, आप गऊ माता के लिए ऐसा क्यों कह रहे हैं?”

नरिंदर सर चुप रहे। वह इस बात को और बढ़ाना नहीं चाह रहे थे। मैंने भी यही ठीक समझा।

ऐसा तनाव हम दोनों में अक्सर आ जाता, जब हमारे विचार आपस में टकरा जाते। लेकिन हम जल्दी ही बात का ट्रैक बदल लेते थे। मैं दूसरे रास्ते चल देती और वह दूसरे। अब हम दिन में दो-तीन बार बात कर लेते। मुझे मालूम हो गया था कि वह कब व्यस्त होते हैं और कब फ्री। उन्हें भी मेरे बारे में काफी जानकारी हो गई थी।

एक दिन मैं अचानक सर के कमरे में जा पहुंची। वह खाना खाने की तैयारी कर रहे थे। जाते समय मैं बर्फी का डिब्बा ले गई थी। वह मुझे देख हैरान हुए और साथ मिठाई देख कर?

“लीजिए गुरु जी! आज से मैं आपकी शार्गिद!” मैं सीरियस हो गई।

सर ने मेरे हाथ से डिब्बा ले, माथे से लगाया और उठ कर मुझे बाहों में ले लिया। उस समय मेरे मन में इन्द्रधनुषी तरंगें उठने लगीं। जी चाहा, समय रुक जाए और रंगों की ये रेखाएं और भी गहरी हो जाएं। फिर हम दोनों ने खाना खाया और मैं उनकी पेंटिंग्स को गौर से देखती रही। सर की पेंटिंग्स को देखते हुए मेरे अंदर बहुत सारे सवाल उठ खड़े हुए। उनमें इतने गहरे रंग क्यों, काला और लाल रंग उनका फेवरट कलर था। उनकी पेंटिंग्स में बहुत भयानक दृश्य देखने को मिलते। अत्यन्त गरीब लोग, दबे-कुचले हुए। चेहरों पर अजीब-सा डर और दहशत और रहम की अपील। कुछ ऐसे चेहरे जो बहुत जालिम, हट्टे-कट्टे, इन गरीबों को शोषित करने वाले और उनके पहनावे मंदिरों व अपने घरों जैसे होते। मेरे मन में सर के प्रति सवाल पैदा होने लगे। सवाल इतने धुंधले थे कि उनकी कड़ी से कड़ी नहीं जुड रही थी। मैंने चाय बनाई। चाय पीते हुए मैंने पूछा, “सर, आप अपने नाम के साथ ‘नाग’ क्यों लिखते हैं?” मेरी बात सुन कर वह हंस दिए। मुझे समझ में नहीं आया।

“पूजा, हमारे पुरखे नागों में से हैं, हम नागवंशी कहलाते हैं। नागों की पूजा करते हैं। इस धरती के असली मालिक।” वह संक्षेप में उत्तर देते। उनकी बात उस समय मेरे पल्ले नहीं पड़ी।

“सर, आप की पेंटिंग्स अधिक समझ में नहीं आती। बस यही पता लगता है कि ये गरीब लोग हैं, रुखे, भूखे-कमजोर भी हैं।”

“पूजा, मेरी पेंटिंग्स आसानी से तुम्हारी समझ में नहीं आ सकती क्योंकि तुम शहर की उच्च श्रेणी व वर्ग में पैदा हुई हो। तुम्हें भारतीय समाज के सामाजिक और आर्थिक विभाजन के बारे में अधिक समझ नहीं हो सकती। ये पेंटिंग देख रही हो, रेहड़ी पर बैठे लोग नीची जाति के हैं, सोकोल्ड दलित, जिन के तन पर कोई कपड़ा नहीं, भूखी हड्डियां के पिंजर बने हुए हैं और बांहें उठा कर पुकार रहे हैं। एक पिंजर रेहड़ी को पकड़े रोशनी की ओर लिजा रहा है। उनके आस-पास लाल कलर है, यह आदमी जरा तगड़ा और हौसले वाला है, दर एक रोशनी की किरन है। मेरी पेंटिंग में भारतीय जाति प्रथा का विभाजन गहराई से देखने को मिलेगा।”

मैं खामोश होकर सर की बातें सुन रही थी, जो कि मेरे लिए नई बातें थी। हमारे घरों में तो मंदिरों के पजारी पजनीय माने जाते हैं। उनका कहना है कि ये ऊंच-नीच ऊपर से ही लिखे होते हैं. सभी कर्मों का खेल है। अच्छे कर्म करने वाला उच्च कुल में जन्म लेता है। बुरे कर्म करने वाला नर्क का कीडा बन जाता है। सर. मेरे मन में घर किए बैठे इन विचारों को अपनी बातों द्वारा खुरच रहे थे। मुझे वह उस्ताद आर्टिस्ट लगते, जिन्हें हर प्रकार की पेंटिंग के बारे में भरपूर जानकारी थी।

“सर, आप को मेरा यूं बिना बताए आना बुरा तो नहीं लगा। मेरे आस-पास कोई पेंटिंग करने वाला नहीं। स्कूल में सभी टीचर्स हाई-फाई, ब्यूटी प्रोडक्ट, मंहगी कारों और होटलों में होती पार्टी की बातें करते हैं। केवल आप ही।” मैंने उठते हुए कहा।

“तुम्हें बिना बताए नहीं आना चाहिए था, चलो फिर भी बुरा नहीं लगा। पहले सर कहती थी, अब उस्ताद कहने लगोगी। पूजा हम कलाकार हैं भई।” नरिंदर सर उस दिन अपनेपन से बात करने लगे।

मैं हंस दी, मुझे अच्छा लगता है उस्ताद सर कहना। आपने पेंटिंग के बारे में जो बुक दी थी, उसे पढ रही हूं।”

“वॉन गाग की बुक, हां वह तो बहुत ही कमाल का आर्टिस्ट हुआ है। जनूनी और कला से भरपूर, उसे दीन-दुनिया की कोई खबर नहीं थी। सारी उम्र उसे किसी ने पूछा नहीं। जब मरा तो उसकी पेंटिंग्स लाखों में बिकी।”

“यदि बड़े कलाकार ऐसे होते हैं तो फिर हम कहां से बन पाएंगे।”

“तुम अमृता शेरगिल बन जाना।” सर ने कहा।

“ना ना बाबा! मैं तो संस्कारी लड़की हूं। मरना है, इतना बोल्ड बन कर। मैं पूजा ही ठीक हूं।” मैंने तुरन्त कहा।

मेरे बाहर जाने से पहले, उन्होंने मुझे अपने साथ थोड़ा-सा लिपटा लिया। सर का स्पर्श मेरे भीतर कई रंग मिक्स कर जाता था।

मैंने ‘ओके’ कहते हुए समय देखा और एक्टिवा स्टार्ट कर, घर की ओर चल दी। मेरा मन कर रहा था कि घर में जा कर रंगों से खेलूं, ब्रुश पकड़ कर कैनवस पर चलाऊं। कभी लाल रंग, कभी काले रंग या गेरूआ रंग से कैनवस पर आदम कद आदमी के नक्श चित्रित करूं।

***

नरिंदर से सर, फिर उस्ताद बना कर, मैंने मन अंदर गहरे और हल्के रंगों को फैला दिया। नरिंदर मुझे अच्छा लगने लगा। उसका सांवला रंग और घने काले बाल एक पेंटिंग समान लगते थे। जब कभी उनका फोन आता, मैं उनसे खुलने लगती, वह लाल रंग-सा हंस देते। हम कितनी देर तक रंगों की बातें करते रहते। मैं कैनवस के आगे रंग घोल कर बैठ जाती और व्हटसअप पर सर को वीडियो कॉल कर लेती। तब मैं पजा-सीरीज की आखिरी पेंटिंग्स बना रही थी। पन्द्रह पेंटिंग्स बना कर इस सीरीज को खत्म करना था। उस दिन रंग घुले थे और मेरे मन में समाधिस्थ कृष्ण आ बैठा। राधा और गोपियां उसकी पूजा कर रही थीं। साथ में नरिंदर से बातें करते हुए पेंटिंग की, रंग और समाधि की पूजा की। अचानक पेंटिंग से नरिंदर के नक्श उभरने लगे। घने बाल, सांवला रंग, समाधिस्थ…लगा, उसके सामने मैं बैठी हूं, पूजा में लीन…पूजा! फोन बंद हो गया। मैं उस रात पूजा-भाव से सारी रात पेंटिंग बनाती रही, जैसे पेंटिंग ना बना कर समाधिस्थ हो गई। यह सीरीज की आखिरी पेंटिंग थी। पेंटिंग करते हुए मेरा हाथ उस समय कांप गया, जब मम्मा जन्म-अष्टमी के दिन घर में बने मंदिर में कृष्ण की पूजा करने लगे।

“अरे दिन चढ आया। मैं अभी भी समाधि में थी।” मेरी आंखें नींद से भरी हुई थीं। नरिंदर के रंगों को आंखों में समेंट कर मैं गहरी नींद में सो गई। आखिरी पेंटिंग मैंने तीन दिन लगा कर पूरी कर ली। मोबाईल में फोटो खींच कर मैं नरिंदर के कमरे में चली गई। उस समय वह पीएचडी के दो स्टूडेंट्स को पुरातन भित्ति चित्र के बारे में बता रहे थे। मैं हैरान थी, उन्हें कितना ज्ञान था। उनके जाने के बाद सर ने मुझसे पूछा, “कैसी हो पूजा?”

जवाब में मैंने मोबाईल की स्क्रीन सर के सामने कर दी। देखा, सर के चेहरे का रंग बदल गया। मूड गंभीर हो गया। वह जान गए कि कृष्ण के चेहरे में सर का प्रभाव झलक रहा है। रीयल नहीं केवल धुंधला-सा प्रभाव। कहने लगे, “अच्छी है पेंटिंग…। लेकिन लगता है कि तुम्हारे मन में काफी उथल-पुथल थी, रंग, सब्जेक्ट और आब्जेक्ट को लेकर। इस पेंटिंग को देख कर ऐसा ही लगता है।”

मैंने सर का हाथ अपने हाथों में ले लिया। गहरे लाल रंग में ब्रुश भिगो कर उन्होंने मेरे मन के कैनवस पर मारा था और कमाल की पेंटिंग की शुरूआत हो गई थी।

“सर, जब मैं यह पेंटिंग बना रही थी, तब आप मेरे सामने आ खड़े हुए। मेरे सामने से हल्के कलर उठा कर परे कर दिए और गहरे कलर सामने रख दिए। मैंने कृष्ण को चित्रित किया, काले घुघराले बालों में, समाधि में लीन, आप में से कृष्ण को निकाला और गोपी बन फूल-पत्तियां और पूजा-सामग्री ले पूजा करने लगी, आपकी पूजा। पेंटिंग करना भला आदमी के अपने वश में होता है? कलाकार के मन का वेग, पता नहीं, उसे कहां ले जाता है। बस..। मैं और कुछ नहीं कह पाऊंगी, मेरी पेंटिंग ही बोलेगी।” और मैं नरिंदर के रंगों में घल गई। कमरे में रंग थे. ब्रश. कैनवस था और दो कलाकार थे। रंगों से खेलने वाले। मुझे लग रहा था जैसे मैं रंगों की ट्रे में पूरी तरह से घुल-मिल गई हूं। मेरा तन-मन मल्टी कलर बन गया। सचमुच कलाकार पागल हो जाते हैं।

नरिंदर ने मुझे कंधे से पकड़ा और ब्रुश से मेरे माथे पर लाल रंग का टीका लगा दिया।

“पागल…!” नरिंदर ने बस इतना ही कहा। लगा, जैसे नरिंदर ने गेरूए रंग की मेरी छाती पर ब्रुश से रेखा खींच दी हो।

“आप बस…आप…।” मैं कुछ और कह नहीं पाई। मेरा ब्रुश रूक गया। अब मैंने उस्ताद के भगवे कलर पर लकीर चला दी। पूजा-सीरीज को समाप्त कर, मैंने कोरी कैनवस ला कर कमरे में टांग दिया।

फिर हमारे दरम्यान पेंटिंग की कोई बात नहीं हुई। नरिंदर था, मैं थी और नया रिश्ता था। कभी-कभी नरिंदर गंभीर हो जाता। उम्र में नरिंदर मुझसे आठ-दस साल बड़ा था। मैंने उस्ताद की उम्र का रंग ब्लैक कलर में घोल कर शैंक पर गिरा दिया। मन की कैनवस पर मुहब्बत लिख कर मैं उसमें अपने मनपसंद कलर भरने लगी। चाय पीकर, अपनी झोली में अनेक रंगों का खजाना लिए, मैं घर की ओर चल दी। नरिंदर के पास जाते समय मैं मां से कह कर जाती कि मैं उस्ताद सर के पास जा रही हूं।

अगली मुलाकातों में फोन कॉल और मैसेज में अपनी मुहब्बत के रंग भरने लगे। गीता मंदिर के प्रधान से कह कर डैड ने ‘पूजा-सीरीज’ की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी का आयोजन कर लिया। मैं बहुत खुश थी कि गीता मंदिर में रामनवमी पर बहुत सारे दर्शक आएंगे और पेंटिंग्स देखेंगे। मैंने नरिंदर के आगे कार्ड व बर्फी का डिब्बा रख कर उन्हें अपनी प्रदर्शनी के लिए आमंत्रित किया। कार्ड देख कर उसके चेहरे पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आई। उसने कहा, “अच्छा है। तुम्हारे आर्ट की कद्र होगी। बधाई!” मैंने डिब्बा खोल कर आर्ट कॉलेज के बाकी प्राध्यापकों का मुंह मीठा करवाया। उन्हें उद्घाटन के लिए कह कर जाते समय मुझे महसूस हुआ, नरिंदर को इस बात से प्रसन्नता नहीं हुई थी।

उद्घाटन से पहले की शाम मैंने उन्हें फिर से याद करवाया, “आपको जरूर आना है नरिंदर सर! मेरे आर्टवर्क में आपका महत्त्वपूर्ण योगदान है। दिल्ली से आचार्य जी आ रहे हैं। वह उद्घाटन करेंगे। गीता मंदिर के पुजारी भी आएंगे, पहले पूजा-पाठ होगा। आप पूजा के लिए अवश्य पधारें।”

“मैं आऊंगा अवश्य लेकिन पूजा तुम्हारा आर्ट तो हरेक के लिए है, जो कला की कद्र करते हैं. वहां एक ही सोच के लोग आएंगे।” नरिंदर ने कहा।

“सर, मैं समझी नहीं। प्लीज जरूर आना।” मैंने दुबारा जोर दिया।

काफी दिन के बाद हम मिले। नरिंदर मुझे सोढ़ी ढाबे पर लंच के लिए ले गया। दोपहर का समय था। भख चमक रही थी। नरिंदर बैंगन के भरते के साथ मुंह में ग्रास डालने ही लगा कि मेरे मुंह से निकला, “नरिंदर, मुझे लगता है, मैं प्रेग्नेंट हो गई हूं। पिछले हफ्ते से दिल खराब-सा हो रहा है।”

नरिंदर का हाथ वहीं रुक गया, “क्या कह रही हो पूजा?” उसका अपना चेहरा बैंगन-सा लटक गया। अब हमारे मध्य पेंटिंग, आर्ट और रंगों की बजाए ‘अब क्या होगा?’ की बातें अधिक होने लगीं।

एक-एक करके पूरा एक सप्ताह बीत गया। मैं ब्रुश उठाती और रख देती। मेरे सामने पड़ा कैनवस जैसे हंसता रहा। दिमाग सुन्न-सा हो गया। मन में रंग नहीं घुल रहे थे। एक दिन स्कूल से आई, कॉफी बना कर कैनवस के आगे बैठ गई। इतने में मां आ गई, कहने लगी, “पूजा क्या बात है? तुम्हारी पेंटिंग रुक क्यों गई है। पूजा सीरीज ने तेरा दिमाग खाली कर दिया है। तुम कलाकार हो, अब कुछ नया बनाओ।”

लीजिए! कॉफी पीते हुए मैंने एक नई पेंटिंग आरंभ कर दी। मैंने निर्णय कर लिया था कि अब रंगों संग ही जिन्दगी व्यतीत करनी है।

मोबाईल उठा कर मैसेज किया, “नरिंदर, मैं सोचती हूं, हम शादी कर लें। बस मैं बच्चा गिराना नहीं चाहती। अब मैरिज के अलावा और कोई समाधान नहीं है।”

नरिंदर का मैसेज दूसरे दिन आया, “यह इतना सरल काम नहीं है, पूजा। देखो पूजा, मेरे पुरखे तुम्हारे पैरों से निकले हैं, जैसाकि तुम्हारे पुजारी बताते हैं। तुम खत्री ब्राह्मण की बेटी हो। उच्च कुल से। तुम्हारे परिवार वाले नहीं मानेंगे। हम बिना वजह फंस जाएंगे।”

तब मुझे यह कोई इतनी बड़ी बात नहीं लगी थी। परन्तु जब मैंने मम्मी से बात की तो घर में तूफान आ गया। डैड समझाने लगे, “तुम उच्च कुल की कन्या हो। नरिंदर पिछड़ी जाति का है। ठीक है, उसे रिजर्व में से नौकरी मिल गई है। अच्छा कलाकार है, तुम्हारा उस्ताद है। घर आता-जाता है मगर इससे अधिक कुछ मत सोचना। बिरादरी में मेरी नाक मत कटवाना पूजा।”

घर में काफी हंगामा बरपा रहा। खुले पड़े रंग सूख गए। कैनवस पर बाल्यावस्था की कृष्ण की पेंटिंग वैसे ही अधूरी पड़ी रही। परन्तु हम दोनों ने मजबूती से ब्रुश थाम लिए और गहरे लाल रंग में भिगो कर जिन्दगी की कैनवस पर विवाह का चित्र अंकित कर दिया। हमारी जिन्दगी में रंग घुलने लगे। मैं अपना आर्ट और निजी सामान लेकर नरिंदर के पास आ गई। हम दो बैडरूम सेट में रहने लगे। हमारी पारिवारिक और आर्ट की जिन्दगी साथ-साथ चलने लगी। उधर मम्मी ने पूजा में अधिक समय लगाना शुरू कर दिया और डैड ने गीता मंदिर जाना शुरू कर दिया।

नरिंदर का एक चित्रकार के तौर पर नाम बनने लगा। वह अपने परखों. अपने समाज के पीड़ित लोगों का जिक्र करते हुए अक्सर उदास हो जाता। सदियों से पिस रहे नीची जाति के लोगों के बारे में सुन कर मैं खामोश हो जाती। दिल्ली, मुंबई या पंजाब की यूनिवर्सिटी में दलित विमर्श, साहित्य, कला व पेंटिंग के बारे में होने वाली कॉफ्रेंस में नरिंदर को अवश्य बुलाया जाता। कहीं वह सैशन की अध्यक्षता करता, कहीं पेपर पढ़ता या पैनल डिस्कशन में हिस्सा लेता। इसी दौरान मेरी पीएचडी भी हो गई। मैं एक कॉलेज में आर्ट की लैक्चरार नियुक्त हो गई। हमारा बच्चा भी चार वर्ष का हो गया था।

नरिंदर अक्सर मुझसे कहता, “पूजा, तुम अपने सब्जेक्ट पर ध्यान केन्द्रित करो। तुम्हारे पास तुम्हारे रिलीजन संबंधी बहुत वोकेबुलरी है। यह आर्ट तुम्हारे भीतर से उपजा है। मैं सोचता हूं, तुम कोई सीरीज शुरू करो। पेंटिंग बनाओ, मेरा आर्ट अपना है, तुम्हारा अपना। मैं नहीं कहूंगा, तुम यह बनाओ या वो ना बनाओ। तुम्हारे अपने रंग हैं, अपना ब्रुश, अपना कैनवस। मेरे रंग अपने हैं, गहरे, भयानक, धधकते अंगारे।” नरिंदर ने मेरे चेहरे पर अपने प्यारे ब्रश से अनेक गहरे रंगों की रेखाएं खींच दीं।

एक दिन कॉलेज से आकर मैंने चाय बनाई। चूंट भरते हुए बोली, “नरिंदर, मैं पिछले सप्ताह से सोच रही हूं, गणेश पर आर्ट-वर्क करूं। बचपन से ही भगवान् गणेश की पूजा-अर्चना करती रही और उन पर मेरी आस्था है। हमारे परिवारों में गणेश को अक्लमंदी का, समझदारी व बुद्धि का देवता माना गया है। घर में गणेश की मूर्ति रखना शुभ शगुन माना गया है। यह सारे रुके हुए कार्य, किसी भी विघ्न का नाश करने वाला है। हमारे घरों में जब भी कोई नया काम आरंभ हो, तब गणेश की मूर्ति की पूजा होती है। मेरे मस्तक में गणेश के बहुत रूप मौजूद हैं।”

नरिंदर ने बिस्कुट खाते हुए कहा, “पूजा, तुम्हारा यह आइडिया बहुत अच्छा है। तुम इस पर बढ़िया काम कर सकती हो। तुम्हारे संस्कारों में गणेश मौजूद हैं। भले मेरी इस सब्जेक्ट पर कोई श्रद्धा नहीं, मतभेद भी हैं। इस प्रकार के सब्जेक्ट से अधिक विषय वर्ण व्यवस्था में शूद्र लोगों पर होने वाले अत्याचारों के सब्जेक्ट हैं। मगर तुम इस सीरीज को बनाओ। सब्जेक्ट में भले मतभेद हैं परन्तु हममें रंगों का साझापन है। रंग तो सभी के होते हैं, इसका प्रयोग कोई भी कर सकता है।”

“गणेश को मैं हल्के पीले रंग में चित्रित करना चाहती हूं। हल्के पीले रंग में मद्धिम लाल रंग मिक्स कर, हल्का संतरी रंग का टच देना चाहती हूं। मेरे माइंड में गणेश का हाथ के मुख वाला, हाथी दांत व बड़े पेट के आकार को लेकर पेंटिंग के ग्राफ बन रहे हैं। नरिंदर, तुम्हारे भीतर रंगों से खेलने वाला जो आर्टिस्ट है, मैं उसे ही मुहब्बत करती हूं। तुम मेरे सर भी हो, उस्ताद भी और समझदार चित्रकार भी।”

नरिंदर गुलाब के फूल-सा खिल गया। आसमान पर इन्द्रधनुषी रंग बिखरने लगे। घरवाले मुझसे दो साल तक नाराज रहे। फिर वह मुझसे मिलने-जुलने लगे।

मैंने गणेश के अलग-अलग रूपों को लेकर सात पेंटिंग्स बनाई। प्रत्येक पेंटिंग में गणेश का बढ़ा हुआ पेट, हाथी की सूंड वाला मुख, हाथी दांत, तीन हाथ, एक में शंख, दूसरे में चक्र, तीसरे में गदा और चौथे में कमल। लगभग प्रत्येक पेंटिंग में थे। उनकी गति रंगों के स्वभावानुसार प्रयोग और आसनों में भिन्नता थी। ऑयल कलर में गणेश को कलर किया। गणेश के मुख को लेकर मिथकों को मैंने बैक ग्राऊंड में चित्रित किया। ब्रह्मा ने मां पार्वती से कहा, वह जिस जानदार प्राणी को देखे, उसी का सिर गणेश पर लगा दिया जाए क्योंकि शनि की दृष्टि ने गणेश का सिर राख कर दिया था और पार्वती की नजर हाथी पर पड़ी और…।

दूसरी पेंटिंग में मैंने गणेश से जुड़े एक और प्रसंग को बैक ग्राउंड में पेंट किया। एक स्थान पर पार्वती गणेश को पहरे पर बिठा कर नहाने गई। गणेश ने शिवजी को दरवाजे से अंदर नहीं जाने दिया। गुस्से में आकर शिवजी ने गणेश का सिर उतार दिया। पार्वती को शांत करने के लिए शिवजी किसी अन्य का सिर लेने गए और उन्हें हाथी का सिर मिला, जिसे उन्होंने गणेश के सिर पर लगा दिया। सप्ताह के सातों दिनों को लेकर मैंने गणेश सीरीज तैयार की।

गीता मंदिर प्रबंधक कमेटी के अन्तर्गत चल रहे ‘जी. एम. महाविद्यालय’ नामक कॉलेज में मुझे सहायक प्रोफेसर की नौकरी मिल गई। कॉलेज के प्रिंसिपल और मैंनेजमेंट कमेटी से पापा ने बात की थी। मैंने अपनी दो पेंटिंग्स कॉलेज को गिफ्ट कर दी।

कॉलेज के प्रिंसिपल ने सरकारी आर्ट एकेडमी के सचिव से कह कर पंजाब में पांच स्थानों पर मेरी पेंटिंग्स की प्रदर्शनियों का प्रबंध करवा दिया। पहली प्रदर्शनी स्टेट की राजधानी में दस दिन तक चली। शिक्षामंत्री विष्ण दत्त वर्मा ने उसका उदघाटन किया। सभी समाचारपत्रों में मेरे आर्ट की कवरेज की गई। नरिंदर मेरे साथ था। वह भी बहत खश था कि एक कलाकार के नाते मेरी पहचान बनी है। गणेश सीरीज, पूजा सीरीज और अन्य कुछ पेंटिंग्स प्रदर्शनी में रखी गईं। कुल तीस पेंटिंगस थीं। राजधानी की एक मंदिर कमेटी के अध्यक्ष ने मुझे दस देवियों की पेंटिंग्स तैयार करने को कह दिया। वे आधी पेमेंट एडवांस दे रहे थे। मैंने नरिंदर से सलाह करके स्वीकृति दे दी। इस प्रकार अलग-अलग स्थानों पर मेरी पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी। एक कलाकार के तौर पर पूरे राज्य में मेरी पहचान बन गई। अलग-अलग कॉलेजों व यूनिवर्सिटी में मुझे आर्ट पर लैक्चर देने के लिए आमंत्रित किया जाने लगा। हिन्दू कल्चर, संस्कृति, धर्म, आस्था, पूजा विधियां और देवी-देवताओं को लेकर बनाई गई मेरी पेंटिंग्स के कारण मेरी एक अलग पहचान कायम हो गई।

इस दौरान मैं नरिंदर की पेंटिंग को समझने लगी थी। उसकी पेटिंग्स एकदम अलग किस्म की होती। विचारधारा के तौर पर वह एकदम भिन्न था। कभी-कभी हिन्दू धर्म के दबाव को लेकर, जाति विभाजन और दलित लोगों के साथ होने वाले भेदभावों को लेकर वह प्रश्न खड़े करता। उसके भीतर एक लावा था, जिन्हें वह अपनी पेंटिंग्स के माध्यम से प्रदर्शित करता था। मैं उस परिवार में पली-बढ़ी थी, जहां नित्य ही कर्मकांड होते थे। जिन संस्कारों की नरिंदर निंदा करता, उसकी पेंटिंग्स के सब्जेक्ट इन पर प्रश्न चिन्ह लगाते थे। सोचती, नरिंदर मुझसे बड़ा था, समझदार भी, फिर वह मुझसे और मैं उससे कैसे जुड़ गए थे। हमने विरोधी विचारों के बावजूद विवाह किया और हमारा एक बच्चा भी था। उसका नाम सूरज था। सूरज के कारण ही मेरी मां का प्यार जाग उठा था। घर की छत तले हम दंपति के तौर पर रहते थे।

बात उन दिनों की है. जब नरिंदर ने एक ऐसी पेंटिंग बनाई। जिसमें दो भयानक चेहरे थे, बाल बिखरे हुए, दाढ़ी बढ़ी हुई, एक स्त्री और दूसरा मर्द, एकदम निर्वस्त्र। उनके चेहरे के भावहीन रंग, गले में रस्सी से मिट्टी के कुज्जे थे, उनके मध्य एक ब्राह्मण को चित्रित किया। माथे पर तिलक, सिर पर चुटिया, चमकीले गेरूए रंग, एक अंगुली से दक्षिण की ओर इशारा करता हुआ। इस चित्र में भी उसने गहरा काला या डार्क ब्राउन कलर प्रयोग किए। यह पेंटिंग चार वर्णों को पेश कर रही थी। एक पेंटिंग में औंधे पड़े कुज्जे के आकार में ब्राह्मण का चेहरा था, नीचे धड़ था। उसके साथ एक दलित बैठा था, जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी। इस पेंटिंग में नरिंदर ने भयानक इफैक्ट इस्तेमाल किए और कलर द्वारा प्रभाव दिए।

मैंने नरिंदर के आगे चाय रखी। वह कोई पेपर लिख रहा था। मैंने कहा, “नरिंदर! आपकी पेंटिंग बहुत सोचने पर मजबूर करती है। आपने चिह्नों द्वारा. रंगों के द्वारा चेहरे के हावभाव और सब्जेक्ट के चनाव द्वारा बहत सारे प्रश्न खड़े कर दिए हैं। मैं अब दीवार के साथ खड़ी की पेंटिंग्स की ओर देख रही हूं, जो शूद्र लोगों पर हमारे पुरखों की ओर किए गए दमन की बात करती है, जैसा आपने बताया मन के जाले साफ करने वाली पेंटिंग्स हैं।”

उसने अंगडाई लेते हुए कहा, “पूजा, मैं बहुत गरीब परिवार में पैदा हुआ। मेरा बाप मरे हुए पशु उठाता था। बाप ने बहुत काम किया परन्तु उसे हरदम पैसे की तंगी बनी रही। हमें रोटी के अलावा कुछ और नहीं सूझता था। बचपन में जातिगत भेदभाव को मैंने खुद भोगा है। मेरी ड्राईंग अच्छी होने पर, अध्यापक मुझे स्कूल की दीवारों पर माटो लिखने, नक्शे व तस्वीरें बनाने के लिए कहते। स्कूली शिक्षा समाप्त होने पर ड्राईंग टीचर ने मुझे आर्ट कॉलेज में पढ़ने को कहा। मैंने मेहनत की। वजीफा मिलने लगा। पेंटिंग करना बहुत मंहगा शौक था। पैसे केवल खाना खाने के लिए ही मिलते थे।”

“नरिंदर, आप अपने सब्जेट के प्रति बहुत क्लीयर हैं।”

“आपको क्लीयर होना पड़ता है, तभी आप कुछ ठोस व नया कर सकते हैं। पीएचडी करते ही मैंने निर्णय ले लिया था कि मुझे शूद्र, दलितों और हाशिए पर धकेले गए समाज की ऐतिहासिक पेंटिंग्स बनानी हैं। एक ऐसा इतिहास, जो ट्रेवल करे, उन लोगों के लिए जिन्हें समाज ने अपने से तोड़ कर परे फेंक दिया था। मेरे सामने दलितों का वह इतिहास था, जिसमें प्रत्येक शुद्र स्त्री-पुरुष को अधिकारों से वंचित किया गया था। मेरे सामने मनु स्मृति, वेद-पुराण थे, गीता का दर्शन था, शंभूक ऋषि, एकलव्य था, मैं इन सभी को अपनी पेंटिंग में ले कर आया। पूजा तुम्हारी पेंटिंग आस्था से उपजी है। भक्ति से पैदा हुई है, तुम जिन की पूजा करती हो, मैं अपनी पेटिंग्स में प्रश्न खडे करता है। मेरी पेंटिंग्स इन सारी विचारधारा को नकारती है।”

“नरिंदर, आप अपने नाम के साथ नाग क्यों लगाते हैं। इसके पीछे भी कोई कारण है?” मैंने पूछा।

नरिंदर हंस दिए, “पूजा, मेरी आरंभिक पेंटिंग्स में एक नाग ट्रेवल करता है। किसी न किसी रूप में। हमारा इतिहास बताता है कि यह धरती नाग लोगों की है। ये आर्य नहीं थे। आर्य विदेशी थे। यह भारत की धरती नागों की है। इन दोनों में बहुत युद्ध हुए। नाग कमजोर थे, उन्हें खत्म कर दिया गया। कहा जाता है कि अगस्त्य ऋषि ने नाग का एक जोड़ा बचा लिया। हम उसी नाग जोड़े की औलाद हैं। यह धरती हमारी थी परन्तु हमें ही प्रत्येक अधिकार से वंचित कर दिया गया। अब भी राष्ट्रवादी सत्ताधारी लोग धर्म व राजनीति द्वारा हमें डराते हैं। यहां तक कि हम अब मरे हए जानवर भी उठाने से डरने लगे हैं। हमें यह काम करते हुए मौत दिखाई देती है। जंगलों में से आदिवासी कबीलों को भगा दिया गया। उनसे उनकी जमीन छीनी जा रही है। खैर छोड़ो इन बातों को, मैंने इनके साथ-साथ लोगों के अन्य प्रसंगों पर भी पेंटिंग बनाई। मेरी इन पेंटिंग्स में नाग गहरे कलर में आते रहे। इन पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगी थी। मेरे साथियों ने मुझे नाग कहना शुरू कर दिया। मैंने भी इसे स्वीकार कर लिया, नरिंदर नाग….।

मैं और नरिंदर जब इस प्रकार की बातें करते, तब समय का ध्यान ना रहता। नरिंदर ने कभी अपने कलर मेरी पेंटिंग में प्रयोग करने का यत्न नहीं किया। इस दौरान मुझे बहुत सारी पेंटिंग्स बनाने के ऑर्डर मिलने लगे। मैं अपना काम करती, नरिंदर अपना। सूरज कभी नानी, कभी दादी के पास रहता। वह अपनी मर्जी से आर्ट करता। वह अक्सर कहता, मैं ऑर्डर पर चित्र नहीं बना सकता। मैं अपने विशेष उद्देश्य के लिए आर्ट करता हूं।

मेरी अपनी कम्यूनिटी में मेरे काफी संपर्क बन गए। पिछले साल आर्ट एकेडमी द्वारा मुझे पांच लाख का पुरस्कार दिए जाने की घोषणा सुन, मैं खुद को बड़ी आर्टिस्ट समझने लग गई। नरिंदर ने मुझे बधाई दी परन्तु साथ ही कहा, उसकी पेंटिंग को कभी सरकारी पुरस्कार नहीं मिल सकता क्योंकि उसके चित्र सत्ता के खिलाफ हैं। सत्ताधारी लोग समझते हैं, मैं उनके धर्म व देवताओं के विरुद्ध प्रश्न खड़े करता हूं। यह हमारी परंपराओं के खिलाफ रंगों का प्रयोग करता है। पूजा, सत्ता तथा आर्ट के ओहदेदारों को तुम्हारे कलर व आइडिए सूट करते हैं। वे यही चाहते हैं कि उनके रिलीजन का प्रचार हो। जब कलाकार को ऐसे आर्ट के लिए मान्यता मिलने लगती है तो वह अपने आर्ट के प्रति और भी प्रतिबद्ध हो जाता है।”

मैं उसके सामने क्या कह सकती थी। उसका अपना मजबूत स्टैंड था। वातावरण को बदलने के लिए मैंने उसके मुंह में बर्फी का टुकड़ा डाल दिया। प्यार का रंग हमारे आसपास घुलने लगा।

***

सूरज बड़ा होने लगा। उसका चेहरा नरिंदर पर था। आर्ट एकेडमी का पांच लाख का पुरस्कार मिलने के बाद अचानक मेरी अधिक आवभगत होने लगी। आर्ट की दुनिया में मेरा नाम फैलने लगा। केन्द्रीय आर्ट अकादमी के चनाव में मझे एग्जैक्टिव कमेटी में ले लिया गया। आर्ट अकादमी सारे राज्य में आर्ट संबंधी कई आयोजन करती थी। नरिंदर इस चनाव से खश नहीं था। उसका कहना था. “अब तम आर्ट की जगाडबंदी में फंस गई हो। ऐसे विभाग राजनीति का अखाड़ा होते हैं। मीटिंग्स में जाने पर अब तुम टी.ए. डी.ए लोगी। सत्ता का आनंद लोगी।” नरिंदर पता नहीं, किन रंगों में खोया बोल रहा था।

मैंने अपने रंगों पर गर्व करते हुए कहा, “यार नरिंदर, मैं कलाकार हूं। मेरे आर्ट को कितनी मान्यता प्राप्त है। मेरी पेंटिंग्स कितनी मंहगी बिकती है। अकादमी ने मेरी चार पेंटिंग्स को चार लाख में खरीदा है। ठीक है, तुम्हारा आर्ट मीनिंग फुल है, सो कोल्ड दलितों की बात करता है। आपको कितने समय से पेंटिंग कर रहे हैं, किसी विभाग ने आपको पांच हजार का भी पुरस्कार नहीं दिया। कौन खरीदता है आपकी पेंटिंग्स? केवल रंग भर देने से तो पेंटिंग नहीं बन जाती। मैंने देखा है, स्टोर में पड़ी आपकी पेंटिंग्स कैसे धूल खा रही हैं।” पहली बार था कि नरिंदर के आर्ट पर किन्तु किया था, मैं स्वयं को नरिंदर से बड़ी आर्टिस्ट समझने लगी थी।

नरिंदर का चेहरा गुस्से से लाल होने लगा। मुझे लगा, नरिंदर के अंदर से काला नाग निकलेगा और मेरे माथे पर डंक मार कर मुझे बेहोश कर देगा। मगर वह मुझ से बहस किए बिना अपने कमरे में चला गया। उस दिन पहली बार हमारे रंगों का समाज-विज्ञान अस्थिर हो गया था।

***

कुछ ही दिनों में हमारे रिश्ते में रंगों की रेखाएं खिंचने लगीं। रंगों का साझापन बिखरने लगा। पति-पत्नी के बीच पेंटिंग आ गई, सब्जेक्ट आ गए, रंग आ गए थे, रंगों की राजनीति आ गई थी। रंगों का समाज-विज्ञान कभी-कभी लगता, नरिंदर का भीतरी नाग तड़पने लगा था। रंगों ने हम में दूरी ला दी। उस दिन मैंने आर्ट अकादमी की मीटिंग से आ कर नरिंदर से कहा, “अकादमी अलग-अलग स्थानों पर आर्ट वर्कशाप लगा रही है। बतौर लेक्चर देने के लिए आपका चुनाव किया गया है। रहने के लिए होटल के कमरे और अच्छे पैसे मिलेंगे। मान्यता का कोई मूल्य नहीं।” परन्तु नरिंदर ने दो टूक जवाब दिया, “नहीं पूजा, मैं बिलकुल नहीं जाऊंगा। मैं जिस आर्ट के बारे में बात करूंगा। वो तुम्हारे प्रबंधकों को हजम नहीं होगा।”

मैं नरिंदर की सोच पर हैरान हो रही थी। “प्यारे नरिंदर! आपको अपने आर्ट को एक्सपोज करने का सुनहरी मौका मिल रहा है। सी ग्रेड आर्टिस्ट आपके पीछे घूमते हैं। मैं आपसे खुद कह रही हूं, सैक्रेटरी से मैंने विशेषतौर पर कहा है कि ‘नरिंदर जी को अवश्य मौका देना है। वह मेरा कहा नहीं टालते।”

“नहीं पूजा, जिन लोगों के लिए मैं आर्ट का काम करता हूं, उनसे ही इस आर्ट की बात करूंगा और उन्हीं में अपना आर्ट ले कर जाऊंगा। मैं पैसे या पुरस्कारों या पदों के लिए आर्ट का काम नहीं करता। जो कलाकार इन पदों, कुर्सियों, पुरस्कारों और कला विभागों में खपत होता जाता है, वह दिनों-दिन छोटा होता जाता है। उसकी रंगों पर पकड़ ढीली होती जाती है।” लगा नरिंदर मेरे चेहरे के कैनवस पर अपने समाज विज्ञान के मोटे ब्रश से ड्रार्क कलर फिराने लगा हो।

“नरिंदर, तुम्हें पता है, मैं वही हूं, जिसके आर्ट की तुम तारीफ किया करते थे। तुम ने मेरा मार्गदर्शन भी किया। यदि तुम मेरे जीवन में रंग न लेकर आते तो मैं किसी बिजनेसमैन के घर में बच्चों के डायपर बदल रही होती। आर्ट से मुझे प्रसिद्धि क्या मिली, तुम्हारे मन में जैलसी के रंग भरने लगे।”

नरिंदर अपने रंग समेट कर अपने कमरे में चला गया। यह नरिंदर को क्या हो गया है? हमारे मध्य रंगों की कैसी लकीरें आ खड़ी हुई हैं। हम अपने रंगों से, अपने आसपास की लकीरों के भीतर सिमटने लगे थे। मैंने अपनी आस्था की देवी-पेंटिंग्स को ढाल बना लिया। हम अपने-अपने रंग लेकर, ब्रुश हाथ में लेकर आपस में खीझने लगे, लड़ने लगे। हमारे मध्य सूरज कैनवस बन कर खड़ा हो जाता। कभी वह सूरज को लेकर गांव की ओर चल देता। मैं फोन करती रहती, वह अपनी मर्जी से तीन-चार दिन बाद लौटता।

***

एक दिन नरिंदर ने मुझसे कहा, “पूजा, कल दिल्ली से किरनदीप आ रही है। वह पिछले महीने दिल्ली ट्राईबल आर्ट की कांफ्रेंस में मिली थी। स्कल्प्चर पर उसका अच्छा काम है। आदिवासी कबीले और आर्ट पर उसकी अच्छी पकड़ है। वह टेराकोटा पर स्कल्प्चर मूर्तियां बनाती है। वह पंजाब से है। कल अमृतसर यूनिवर्सिटी में उसका लैक्चर था। हमारे यहां एक हफ्ता रहेगी।”

मैं और नरिंदर उसे जालंधर स्टेशन पर लेने गए। स्टेशन से बाहर वह नरिंदर से बहुत गर्मजोशी से मिली। नरिंदर का हाथ कितनी देर तक उसने थामे रखा। कटे बालों और जींस-टॉप में वह सांवले रंग में भी खूबसूरत लग रही थी। नरिंदर ने मेरी ओर इशारा करते हुए कहा, “यह है पूजा, मेरी पूजा, अच्छी चित्रकारी करती है।” हम तीनों खिलखिला दिए। किरन मुझसे भी बहुत अपनत्व से मिली। उसकी आंखें बहुत आकर्षित थीं। बात करते हुए उसकी आंखें भी बोलती प्रतीत होती थीं। मुझे उसकी पर्सनलिटी ने आकर्षित किया। गाड़ी में पिछली सीट पर बैठते हुए वह बोली, “पूजा यार! यू आर वैरी लक्की! तुम्हें कलाकार पति मिला है। नरिंदर ने तुम्हारे आर्ट-वर्क का जिक्र किया था।”

मैं हंस दी, “वो तो है ही किरन जी! इनकी बदौलत ही मैं आर्ट क्षेत्र में आ पाई। वरना किसी ब्यूरोक्रेट या बिजनेसमैन के पल्ले पड़ती तो वह मुझे घर पर नौकरानी ही बना कर रख देता। नरिंदर ने कला की पहली सीढ़ी पर स्वयं मेरा पैर रख कर कहा, पूजा इस सीढी पर चढ कर देख, आसमान में कितने रंग बिखरे पड़े हैं। आई एम प्राउड ऑफ नरिंदर!”

घर पहुंच कर मैंने किरन से नहाने को कह, खुद खाना लगाने की बात कही।

“नहीं यार! मैं तो ऐसे ही ठीक हूं। ट्राईबल लोगों में रह कर नहाने की आदत कम ही है। हां थोड़ा-बहुत खा लूंगी। पहले नाईट सूट पहन लूं।”

“किरन, तुम्हारे गले में ये मोटे मनकों की माला बहुत जंच रही है। पहनावे से तुम ट्राईबल ही लग रही हो।” नरिंदर मजाक के मूड में था।

“ओ, यह तो मेरी रूटीन का हिस्सा है। वैसे मैंने यह माला छत्तीसगढ़ ट्राईबल एरिया से खरीदी थी। वहां के जंगली कबीलों की औरतें इस प्रकार की माला पहनती हैं। नरिंदर, जब मैंने उनके बीच रह कर आर्ट का काम किया तो कई-कई दिन नहाती नहीं थी। जो वे खाते, वहीं खाती थी। मेरे वो अनुभव सचमुच दुर्लभ थे।”

खाने खाते हुए प्रोग्राम बनने लगा। कल किरन को लेकर नरिंदर ने यूनिवर्सिटी जाना था, जहां उसका जंगली कबीलों पर पेपर था। मैंने कहा, “किरन! एक दिन मैं आपका लैक्चर अपने कॉलेज में करवा देती हूं। हमारे पास कुछ फंड होते हैं। मैं प्रींसीपल से बात करती हूं। दो दिनों में दूरदर्शन में इंटरव्यू रिकार्ड करवा देते हैं। आखिर तुम हमारे पास आई हो, आर्ट के लोगों को तुम्हारे बारे में पता लगना चाहिए। एक दिन तुम्हें रू-ब-रू करवा देंगे। सारे कलाकार आ जाएंगे। क्या ख्याल है।” मैंने किरन को संबोधित करते हुए कहा।

“जैसा आप को ठीक लगे, कर ले। मैं एक हफ्ता आपके पास रूकुँगी। आई एम फ्री।”

“पूजा की बात सही है। आजकल पूजा की सरकारी दरबार में खूब चलती है, जब से यह आर्ट अकादमी की मैंबर बनी है।”

“देखें नरिंदर जी, आपका स्वभाव नहीं, संस्थाओं के आगे-पीछे घूमने का। आप का जो आर्ट है, वह सरकारी संस्थाओं को हजम होने वाला नहीं। आप अपने रंगों और पेंटिंग द्वारा जड़ हो चुकी सामाजिक व्यवस्था पर चोट करते हैं। आप के पास विचारधारा का एक हथौडा है. जो व्यवस्था के सिर पर बजता है। भला. इस प्रकार के आर्ट को इस प्रकार के आर्टिस्ट कैसे पसंद करेंगे। आप मार्जिन लाईन सोकॉल्ड दलित-शूद्रों के आर्टिस्ट हैं। क्या ख्याल है।” किरन ने बालों को संवारते हुए सीधा नरिंदर से कहा।

“देखों किरन! सच्चा आर्टिस्ट वही है, जो व्यवस्था के खिलाफ नहीं खड़ा होता, शोषित पक्ष का साथ देता है। जिन्हें धकेल कर मुख्य धारा से परे कर दिया गया है। मेरी इस सब्जेक्ट पर पकड़ है, कह सकते हैं, मैं इसके प्रति काफी जागरूक हूं। रंगों की ढाल बना कर मैंने पेंटिंग द्वारा इस पर चोट की है। मुझे अपने पेंटिंग पर गर्व है। मुझे मालूम है, मेरा आर्ट भीड़ से अलग दिखाई देना चाहिए। हमें शोषित लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए। मैं नहीं कहता, मेरी प्रदर्शनियां लगवाओ। मुझे पुरस्कार दो या मुझ से अध्यक्षता करवाओ।” नरिंदर ने गंभीरता से कहा।

मैंने उनकी बातचीत में अपने विचारों के रंग मिलाने की आवश्यकता ना समझी। इन दिनों नरिंदर का सुर थोड़ा लाउड हो रहा था। उनके रंग पहले ही लाउड थे। मैं समझ रही थी, नरिंदर अब लुके-छिपे तरीके से मेरी पेंटिंग्स पर अंगुली उठाने लगे थे। किरन से मैं पहली बार मिली थी। आज उसका पहला दिन था। अब एक ही धारा के दो कलाकार मिल गए थे।

खाना खाते हुए मैंने कहा, “किरन, तुम खुले स्वभाव की हो। घर पर कम ही टिकती होगी। बाहर निकलने पर आदमी का वास्ता बहुत सारे लोगों से पड़ता है, उसका विजन बढ़ता है।”

“हां पूजा, यह तो है। मैं बहुत स्थानों पर घूम चुकी हूं। जंगलों में, झोंपड़ियों में। मेरा स्वभाव व शरीर फ्लैकसिबल है। परन्तु मेरा आर्ट एकदम सख्त, लकड़ी से, पत्थर से बुत को गढ़ लेती हूं। बुत के लिए टेराकोटा का प्रयोग भी कर लेती हूं। स्थिर व टिकाऊ।”

खाने के बाद मैंने किरन को अपना आर्ट रूम दिखाया। वह बोली, “वाह! वैरी गुड! मतलब, नरिंदर का आर्ट रूम अलग है। दोनों के कमरे अलग ही होने चाहिए, कहीं तुम्हारे चित्र आपस में लड़ ना पड़ें। वैसे भी एक साथ बैठ कर आर्टिस्ट इंडिविसुअल काम नहीं कर सकता। प्रत्येक आर्टिस्ट अपने ढंग से सोचता और काम करता है। नरिंदर, बता रहे थे, आपने गणेश पर कोई सीरीज तैयार की थी, जिसने आपकी पहचान बनाई और मान्यता दी।” बोलते हुए वह दीवारों पर लटकी पेंटिंग्स को निहारती रही।

“हां किरन, इसके पीछे नरिंदर का महत्त्वपूर्ण योगदान है। उसने मेरे सोए कलाकार को जगाया। मेरा मार्गदर्शन किया। मैं हिन्दू परिवार के संस्कारों से संबंधित हूं। उस में हिन्दू मिथ्लॉजी पड़ी है। नरिंदर ने इस आर्ट में काम करके पहचान बनाने को कहा। मिथक चरित्रों को मैंने अपना इष्ट बना लिया। इस आर्ट के क्षेत्र में मुझे स्पेस मिली। मैं अभी भी यही कहती हूं कि रंगों के साथ खेलना मुझे नरिंदर ने ही सिखाया।” मैं गणेश की पेंटिंग के सामने खड़ी हो गई।

“वैरी गुड पूजा जी! अपने सब्जेक्ट पर आपकी काफी पकड़ है। नरिंदर की पेंटिंग एकदम अलग है। आप दोनों की सोच एक-दूसरे से अलग है। भई! एक विचारधारा जड़ संस्कृति की बात करती है और दूसरी उसे तोड़ने के लिए विरोध में उत्पन्न विचारधारा की बात करती है। वाह, रंगों का क्या विज्ञान है। यही तो रंगों का समाज-विज्ञान है, रंगों का मनोविज्ञान। घर में रंगों के दो दरिया समानांतर चल रहे हैं। एक दरिया में गहरे लाल और काले रंगों का संगम और दूसरे में गेरूआ और हल्के रंग। पूजा जी, रंगों के दरिया का ये रंगदार पानी जुड़ा कैसे?” पता नहीं किरन कला की दिल से तारीफ कर रही थी या उस ने….।

मैंने अपने पेट की ओर इशारा करके कहा, “देखो किरन! हमारे आर्ट के साथ एक और बुत गढ़ा जा रहा है। इसमें नरिंदर के गहरे रंग और विचार हैं, मेरे हल्के रंग, भगवा रंग हैं। रंगों की लीला है। गणेश की आस्था के रंग हैं। यह हमारी साझी मूर्ति है। दोनों के आइडिया हैं।” मैं भी कलाकार बन गई थी।

***

उस बार किरन तीन-चार महीने बाद घर आई। बस्तर व दांतेवाड़ा के उस इलाके में रह कर आई थी, जहां के जंगली कबीलों में ईसाई प्रचारकों ने खेती की ओर प्रेरित किया। लोहे की कुल्हाड़ी और तीर देकर उन्हें अपने अनुसार ढालना शुरू कर दिया था। बच्चे उनके द्वारा खोले गए स्कूलों में पढ़ने लगे थे। नरिंदर नाग और किरन बातें करने में मशगूल थे।

“यार नरिंदर! मैं दांतेवाड़ा के गौंडा कबीले में रही। यह कबीला घने जंगलों से उठ कर जंगल के किनारे आ बैठा। उनके जीवन में तब्दीली आ गई है। औरतें अपने तन ढांपने लगी हैं। उन्होंने पहाड़ियों पर सीढ़ीदार खेत बनाने शुरू कर दिए हैं। वहां वे नींबू और संतरे बीजने लगे। यह कबीला सूअर का शिकार करता है। वही इनका मुख्य भोजन है। मुझे बताया गया, सरकार ने जंगल में हिरणों के जोडे छोडे थे. अब उनकी संख्या बहत बढ गई है। जंगली लोग उनका मांस नहीं खाते। शिकार करने के ढंग-तरीकों के चित्र उन्होंने अपने घरों की दीवारों पर बना रखे हैं। मैंने उन्हें देखा है।”

“अच्छा! कमाल है किरन! तुम्हारे पास बहुत जानकारी है। तुम इन की लाईफ पर बुत गढ़ने का काम करो। बुतकारों की दुनिया में यह एक नया काम होगा।” नरिंदर नाग ने किरन को उत्साहित किया।

“एक बात और, इस कबीले के लोग पक्षियों का शिकार भी नहीं करते। प्रचारकों ने बताया, घने जंगलों में तीर कम होने के कारण, पक्षियों के शिकार में बहुत तीर खो जाते थे इसलिए इनके पुरखों ने पक्षियों का शिकार करना वर्जित कर दिया। तीरों का इनकी मूर्तियों में, चित्रों में अहम् स्थान है। झोंपड़ियों के दरवाजों पर वे तीरों को रंगों से चित्रित करते हैं।”

“तुम ने बहुत जंगल घूम लिया। अब टिक कर आर्ट का काम करो। हां किरन, मैं तुम्हारे लिए मछली लाया हूं। बस बन रही है। पूजा तो मांस को हाथ नहीं लगाती। हम दोनों ही खाएंगे।” नरिंदर रसोई में जाते हुए कहने लगा।

“अच्छा मछली फीकी ही रखना। नमक-मसाला मत लगाना। बस्तर में रह कर मुझे फीका मांस खाने की आदत पड़ गई है।” किरन ने कहा।

दोनों मिल कर मछली खाने लगे। इन दिनों में नरिंदर किरन के आर्ट की बातें अधिक करने लगा था।

हमारे ही घर में रह कर किरन ने ‘आदिवासी चित्रकला का कलात्मक अध्ययन-संदर्भ बस्तर और दांतेवाड़ा क्षेत्र’ विषय पर अपना थीसिस पूरा किया। इसमें चित्र बनाने में नरिंदर ने पूरा सहयोग दिया। किरन का गाईड नरिंदर था। थीसिस सब्मिट करवा कर किरन भी हमारे यहां ही एक कॉलेज में आर्ट-टीचर लग गई। इस कारण वह अक्सर हमारे घर में आ जाती थी। तब से ही हम तीनों के मध्य आर्ट-वर्क का तिकोन बनने लगा। मेरा आर्ट हिन्दू मिथ और कल्चर के आसपास घूमता था। नरिंदर का दलित जाति वाला आर्ट था और किरन ने अपनी मूर्ति बनाने की कला में ट्राईबल लोगों के कल्चर को पेश करना शुरू कर दिया। टेराकोटा में वह जंगली कबीले के रहन-सहन और कामों को लेकर मूर्तियां बनाने लगी।

घर में नरिंदर जब भी बात करता, किरन की मूर्तियों की करता।

एक दिन किरन ने वृक्ष की जड़ ले कर, उसे आवश्यकतानुसार गढ़ कर जंगली शिकारी मनष्य की मर्ति बनाई। रेती से चेहरे के नक्श गढ़ने वह सबह ही बैठ जाती। मूर्ति के सिर पर तीर बंधे थे और दो टूटे तीर उसने हाथ में थाम रखे थे। दर जानवर नजर आ रहे थे। मर्ति का पेट अंदर धंसा हआ था। वह जंगली लोगों के नक्श बहत बारीकी से गढती थी। उसने एक मूर्ति टेराकोटा की तैयार की, जिसके माध्यम से पता लगा कि कैसे जंगलों से जंगली लोगों को उजाडा जा रहा है। उनके बेबस चेहरे, नंगे शरीर, हाथों में तीर या भाले।” नरिंदर लगातार बोलता रहता।

“चलो, अच्छी बात है। किरन के अनुभव उसके काम आ रहे हैं।” मैं बस हां में हां मिलाती।

मेरे आर्ट का स्थान किरन ने ले लिया था। हमारे घर में किरन का आर्ट और उसकी मूर्तियां आ घुसी थी। मुझे तब हैरानी हुई, जब नरिंदर ने किरन का बनाया बुत अपने ड्राईंग-रूम में रख दिया। फिर हद हो गई, जब लॉबी में लगी गणेश की पेंटिंग उतार कर किरन का फ्रेम में जड़ा बुत लगा दिया, जिसमें जंगली लोग जानवरों का शिकार कर रहे थे। दूसरे में आग में मांस भूनते दिखाया गया था और तीसरे में सारा परिवार खेती करने में मगन दिखाई दिया था।

यह देख कर मैं अंदर तक तड़प उठी। मैं अपने आर्ट-रूम में जा कर रोने लगी। मेरा आर्ट मेरे आर्ट-रूम में ही सिमटने लगा। तब मुझे आग लग गई, जब मैंने नरिंदर के मोबाईल पर किरन का मैसेज देखा, नरिंदर जी! आप पूजा के आर्ट में कैसे फंस गए, आप जिस आर्ट के खिलाफ खड़े हैं, जिस के प्रति आप लिखते-बोलते हैं। आपका आर्ट दबे-कुचले लोगों का आर्ट है। पूजा का आर्ट उस धर्म की ग्लोरीफिकेशन है, जिस धर्म ने उन लोगों को निचोड़ा और दबाया है। जुल्म किया। जो लोग तुम्हारे आर्ट द्वारा समाज से लड़ते हैं। नाग! तुम्हारे कथनी-करनी में जमीन-आसमान का फर्क है। मुझे समझ में नहीं आ रहा, आप पूजा के साथ कैसे रह रहे हैं?”

नरिंदर का मोबाईल टेबल पर पडा था. वह नहा रहा था। मैंने मैसेज पढ़ लिया। बाथरूम से नरिंदर के बाहर आते ही मैं आगबबूला हो गई, “यह किरन हमारे घर, हमारे बीच काली रेखाएं खींच रही है। कालजोगण जंगल से डायन आ गई, मेरे आर्ट पर मेरे परिवार और जंगली रंगों से पोंछा फिराने के लिए।”

“अरे ऐसा क्या हो गया। क्यों गुस्सा कर रही हो?” नरिंदर खीझ गया।

“तुम्हारी उस चहेती ने यह मैसेज भेजा है अभी। कलमुंही ने…।” मैं क्रोधित थी।

“तुम कौन होती हो मेरे फोन को छूने वाली?” नरिंदर ने मोबाईल मुझसे झपट लिया।

“बताने की आवश्यकता है, मैं कौन हूं। तेरे दो बच्चों की मां। देख रहा है मेरे पेट की ओर। मेरी कोख में तेरा दूसरा बच्चा पल रहा है। तेरी बीवी अपनी संस्कृति छोड़ कर तेरे आर्ट के पीछे आ गई थी। मैं वही हूं, जिसके आर्ट की तुम घंटों तारीफ किया करते थे।”

हमारे बीच बहुत बहस हुई। बेसुरति करने वाली बहस थी मेरे लिए।

किरन जब भी हमारे घर में आती, हमेशा अपने जंगली आर्ट के रंग बिखेर जाती। बुत की मिट्टी वहां फेंक जाती। मैं तब सब्र का बूंट भर कर रह जाती।

***

नरिंदर अब सचमुच नाग बन गया था। वह अक्सर मेरे सीने में डंक मारता। उसके अंदर इतना जहर कहां से आ गया था? मैं इतने समय तक ऐसे ही उसे दूध पिलाती रही। मेरा मन पूरी तरह से अस्थिर हो गया। तन भुरभुरा होने लगा, दिमाग सुन्न हो गया। ब्रश मेरे हाथों से छूट गया। घुले हुए रंग सूखने लगे। आर्ट-रूम जहर दिखाई देने लगा। अधिक डिप्रेशन में होने पर मैं कई दिन कॉलेज ना जा पाती।।

तभी नरिंदर ने मेरे माथे पर एक और डंक मारा, जब किरन और नरिंदर ने फेसबुक पर अपना एक पेज बनाया, ‘रंगों का साझापन/समाज विज्ञान’। इस पेज पर दोनों दलित आर्ट की पोस्ट डालते। अपनी पेंटिंग्स और बुत डालते। अपने आर्ट को लोक-पक्षीय कह कर उसकी प्रशंसा करते।

उनके साथ, उन जैसी सोच के बहुत सारे लोग संबंधित थे, जो उनकी बोली बोलते थे।

जब से हमारे मध्य किरन ने दांतेवाड़ा से ट्राईबल रंग ला कर बिखेरे थे, मैं डिप्रेशन में चली गई थी। अपना आर्ट-रूम मैंने पूजा-केन्द्र बना लिया। मुझे लगता, केवल पूजनीय देवी-देवता ही मेरा सहारा रह गए हैं।

किरन जब भी घर आती, मैं पूजा में बैठ जाती। उनके सामने अपने मोबाईल पर उनका फेसबुक पेज ‘रंगों का साझापन/….खोल कर चीखने लगी थी, “यह है ना तुम लोगों की रंगों का साझापन…लानत है इस पेज पर। आप लोग खुद को बहुत बड़े आर्टिस्ट समझते हैं…। ऐसे आर्ट को जानती है मेरी जूती…। ये तुम्हारे रंगों की साझ…नहीं, ये तुम्हारे प्यार की साझ है। मैं यहां अपना कमेंट लिखंगी। तुम दोनों को नंगा करूंगी। नरिंदर तु नाग का बच्चा, अपनी पत्नी के रंगों के होते हुए, पराई औरत के साथ रंगों की साझ बनाने लगा। मैं तुम दोनों को नंगा करूंगी।”

“पूजा, तम पागल हो गई हो। क्या कह रही हो? जाओ जा कर ठंडे पानी से नहा कर आओ।” नरिंदर ने मेरे हाथ से मेरा मोबाईल छीन लिया।

“पूजा यार! रिलैक्स, हमारे बीच में ऐसा कुछ नहीं है। हमारे बीच रंगों की वो साझ नहीं है, जैसा तुम समझ रही हो।” किरन मुझे पकड़ कर शांत करने लगी।

***

उस दिन तो हद हो गई, जब मैंने सारे रंग फर्श पर गिरा दिए। मेरा शरीर कैनवस बन गया। सारे रंग मैं अपने मुंह और कपडों पर थोंपने लगी। मेरे हाथ ब्रश बन गए। मैं खद एक पेंटिंग बन गई। एक चलती-फिरती पेंटिंग। मैं चीख रही थी…लोगों, देखा मैं भी एक पेंटिंग हूं। चलती-फिरती पेंटिंग। लोगों…दर्शकों…देखो, मैं भी एक पेंटिंग हूं।”

मैं फर्श पर गिर पड़ी थी। फिर पता नहीं, किसने मुझे बेड पर लिटा दिया था। कोख में बच्चा था। जब मुझे होश आया, मैं अस्पताल में थी। शरीर मिट्टी हो गया था। मेरा हाथ पेट की ओर गया, वह खाली था। मैंने इशारे से नर्स से पूछा, उसने केवल ‘सॉरी’ कहा।

मैं फिर से बेहोश हो गई थी।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’

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