Hindi Kahaniya: दिल्ली के रईसी इलाके में एक बड़ी आलीशान कोठी के बाहर एक महंगी गाड़ी खड़ी थी। कोठी से दिनेश बाहर निकलता है और गाड़ी में बैठकर ड्राइवर से कहता है,” फैक्ट्री चलो।” दिनेश की कपड़ों की फैक्ट्री है। वह अलग-अलग डिज़ाइनर से कपड़ा डिज़ाइन कराता है और उन डिजाइंस के थान बनवाकर मार्केट में बेचता यूं तो सब ठीक है पर है। वैसे तो दिनेश की कंपनी के कईं डिज़ाइन प्रचलित हैं लेकिन उनमें सबसे ज्यादा जो लोग पसंद करते हैं वह हिंदुस्तान की अलग-अलग राज्यों के पारंपरिक डिजाइन के प्रिंट हैं।
यूं तो सब ठीक है पर एक चीज उसके मन को हमेशा बेचैन करती है और वह है उसकी कंपनी का पारंपरिक डिज़ाइन जो एक ब्रांड बन चुका है। वह डिज़ाइन उसको जाने पहचाने से लगते हैं लेकिन पूरे तरीके से वह समझ नहीं पा रहा कि कौन है वह डिज़ाइनर जो उसको वह डिज़ाइन भेजता है।
इस डिज़ाइनर ने ना तो कभी अपने नाम की ना पैसे की बात की। दिनेश यही सोचता कि वह डिजाइनर आखिर गुमनाम क्यों है।
एक दिन दिनेश ने फ़ैसला किया कि किसी भी तरह पता लगाना होगा कि वह गुमनाम शुभचिंतक डिज़ाइनर कौन है उसका।
दिनेश ऑफिस के नौकर को अपने केबिन में बुलाता है और पोस्ट ऑफिस भेजते हुए कहता है,” तुम यह पैकेट लेकर जाओ और वहां से पता करो कि यह कोरियर कौन भेजता है। उसका नाम, फोन नंबर, पता जो भी मिले लेकर आना।”
नौकर पोस्ट ऑफिस जाता है तो वहां से उसे बहुत कम जानकारी मिल पाती है। कोरियर भेजने वाले का केवल इतना पता मिलता है:
श्रीमती गुप्ता, प्रीत विहार, दिल्ली
वह जानकारी लेकर नौकर दिनेश के पास जाता है। उतना सा पता मिलने पर भी दिनेश चौंक जाता है। वह चुपचाप पता ले लेता है और मैनेजर को ऑफिस संभालने के लिए कहकर प्रीत विहार की तरफ निकल जाता है।
बिना किसी पुख्ता पता होने के बावजूद दिनेश एक घर के सामने जाकर रुकता है और दरवाज़ा खटखटाता है। दो मिनट के बाद दरवाज़ा एक औरत खोलती है। आम सी शक्ल सूरत और कपड़ों में वह औरत दिनेश को देखकर चौंक जाती है। अंदर जाकर वो उस औरत से पूछता है,”बिंदिया, तुम यह सब क्यों कर रही हो?” बिंदिया मुस्कुरा कर बस इतना कहती है,” आपको मेरा नाम याद है बस इतना काफी है। रही बात मेरे करने की, तो जितना वक्त मेरे पास बचा है मैं आपके लिए, आपकी तरक्की के लिए करती रहूंगी। आने वाले कईं महीने का काम भी तैयार करके रख रही हूं। एक लड़की को यही काम सिखा भी रही हूं।” दिनेश की आंखों में शर्मिंदगी के आंसू आ जाते हैं। वह चुपचाप वहां से चला जाता है। उसके बाद एक दो बार बिंदिया के पास गया भी।
उसने इस बारे में किसी से कुछ नहीं बताया लेकिन उसका ड्राइवर बहुत पुराना था और एक तरीके से घर का सदस्य था। उसे अंदेशा हुआ के साहब का उस दूसरी औरत के साथ कुछ गलत रिश्ता है। उसे दिनेश की पत्नी शोभा और बच्चों की चिंता हुई। एक दिन मौका देखकर उसने शोभा को दिनेश और बिंदिया के बारे में बता दिया।
शोभा को विश्वास नहीं हुआ और ड्राइवर को वहां से जाने के लिए कहती है। बहुत देर तक परेशान रहने के बाद वह सोचती है कि सच क्या है दिनेश से ही पूछा जाए। वह दिनेश का ऑफिस से आने का इंतजार करती है।
शाम को जब दिनेश आता है तो शोभा खाना लगाती है और रोज़ की तरह दोनों साथ में खाना खाते हैं। जब नौकर चला जाता है तब शोभा सीधे-सीधे पूछती है,”बिंदिया कौन है?”
बिंदिया का नाम सुनते ही दिनेश सकपका जाता है लेकिन उसके चेहरे पर झूठ की घबराहट नहीं होती।
दिनेश शोभा को बताता है की बिंदिया उसकी पहली पत्नी है जिसे उसने तलाक दे दिया था। शोभा को याद आता है कि दिनेश ने शादी से पहले ही उसे अपनी पहली पत्नी और तलाक के बारे में बताया था। लेकिन उसे समझ नहीं आता कि फिर से वह बिंदिया से क्यों मिलने लगा है।
वह पूछती है “तुमने तो मुझे तलाक का कारण तुम्हारी नापसंद बताया था। तो अब उससे फिर क्यों मिल रहे हो? मैंने तुम्हारी सच्चाई की आदत को पसंद करके ही हां करी थी तो अब यह धोखा क्यों दे रहे हो?”
दिनेश उसका हाथ पकड़ कर कहता है,”आज तुम्हें सब सच बताऊंगा। बिंदिया गांव की बहुत सीधी, कम पढ़ी-लिखी और पुराने रिवाजों के मानने वाली लड़की थी। मेरे और उसके पिता पुराने दोस्त थे। पिताजी ने मुझसे बिना पूछे अपने दोस्त को बिंदिया के लिए हां कर दी। परंतु पिताजी के वचन को झुठलाने की हिम्मत मुझ में नहीं थी। बिंदिया से मेरी शादी हो गई। बिल्कुल ही देहाती थी बिंदिया, मैं उसको कहीं लेकर नहीं जाता था। वह घर में रहती और मां का हाथ बंटाती। यूं तो हमारे बीच में कोई संबंध नहीं था लेकिन उसकी एक हुनर का मैं कायल था, उसकी हस्तकला की कलाकारी। बहुत सुंदर और अनोखे डिज़ाइन्स बनाती थी। जब मैंने एक बार तारीफ करी तो उसने बिना किसी लालच के सारे डिज़ाइन मुझे दे दिए और कहा कि आप ले जाइए आपके काम आएंगे। सचमुच उसके डिज़ाइंस ने धूम मचा दी और मेरा कारोबार रातों-रात तरक्की कर गया।
सात साल पहले तुमसे मुलाकात हुई तो पहली नज़र में मैंने तुमसे शादी करने का मन बना लिया था। मां पिताजी तो पहले ही चल बसे थे। मैंने बिंदिया से सब सच बताया तो उसने बस इतना पूछा,” आप खुश हैं ना उनके साथ?” मेरे हां कहने पर बिंदिया ने बिना सोचे तलाक के कागज पर हस्ताक्षर कर दिए। हम दोनों की शादी हो गई।
मैं तुमसे हमेशा कहता था ना के कोई खूबसूरत पारंपरिक डिज़ाइन भेजता है, वह बिंदिया ही है। उसने कहा था,” मैं तलाक नहीं जानती, आपको पति माना है और हमेशा आपकी पत्नी ही रहूंगी। मेरी मांग में आपका ही सिंदूर लगेगा।”
जब मैं उससे मिलने गया था तब पता चला कि वह अपनी पिताजी की जायदाद से जीवन चला रही है, और मेरे लिए मेहनत करती है। वह आज भी खुद को मेरी पत्नी मानती है। वह मरने वाली है, सांस की बीमारी के चलते उसके पास अब कुछ ही दिन बाकी हैं।
मैं उसको सिर्फ दवाई देने जाता था। उसने मेरी कंपनी के डिजाइंस के लिए आगे तक का इंतजाम कर दिया है।” कहते हुए दिनेश बहुत शर्मिंदा महसूस कर रहा था।
शोभा ने बस इतना कहा,” सो जाते हैं। कल सुबह नाश्ता करके चलना है।” “कहां?” दिनेश ने पूछा। बिना कोई जवाब दिए शोभा सोने चली गई। अगले दिन नाश्ता करके दोनों घर से निकले। शोभा ने ड्राइवर से कहा,”प्रीत विहार चलो”। दिनेश सुनकर चौंक गया पर चुप रहा।
वहां पहुंचकर दरवाज़ा खुलवाया तो दोनों को देखकर बिंदिया असमंजस में पड़ गई। शोभा ने उसका हाथ पकड़ कर सोफे पर बैठाया और कहां,”मुझे तुम्हारी बीमारी का पता है। जानती हूं वक्त बहुत कम है, इसलिए और कुछ तो नहीं दे सकती परंतु जो तुम्हारा सबसे बड़ा हक़ है आज वह तुम्हें देने आई हूं।”
यह कह कर शोभा ने पर्स से सिंदूरदानी निकाली और दिनेश के आगे करके बोली,”बिंदिया को उसका हक दे दो जो तुम आज तक नहीं दे पाए।” दिनेश चुटकी में सिंदूर लेता है और बिंदिया की मांग भर देता है। बिंदिया के चेहरे पर दिल खोलकर मुस्कान आती है और आंखों में आंसू। वह शोभा का हाथ पकड़ कर गले लगाती है और आखिरी सांस ले लेती है।
अपने आखिरी वक्त में दिनेश के प्यार भरे हाथों से सिंदूर पाकर वह सब कुछ पा चुकी थी।
