santushti sabse bada dhan
santushti sabse bada dhan

प्रख्यात हिंदी कवि कुंभनदास अपने संतोष के कारण भी प्रसिद्ध थे। राजा मान सिंह ने इनके संतोष के बारे में सुना तो वे उन्हें परखने भेष बदलकर पहुँचे।

उस समय कुंभनदास तिलक लगाने के लिए आईना खोज रहे थे, उन्होंने अपनी पुत्री से आईने के बारे में पूछा वह बोली, “आईना तो कल बिल्ली ने तोड़ दिया”।

कुंभनदास बड़े शांतिपूर्ण लहजे में बोले, “कोई बात नहीं बेटी, किसी पात्र में जल भर कर ले आओ”। लड़की टूटे घड़े के पात्र में पानी भर लाई। कवि ने उसी के जल की छाया में चेहरा देख कर तिलक किया। यह देख मान सिंह अचंभित रह गए।

दूसरे दिन राजा ने स्वर्णजड़ित आईना और एक हजार मुहरें कुंभनदास को देनी चाहीं।

कुंभनदास ने भेंट लेने से इनकार कर कहा, “महाराज मेरा जीविकोपार्जन तो खेती से हो जाता है। मेरे लिए यह सब बेकार है और हाँ, कृपा कर के आइंदा आप मेरे घर न आएं, अन्यथा इन बेकार की वस्तुओं से आप मेरा घर भर देंगे।”

राजा मान सिंह कवि कुंभनदास की संतुष्टि और स्वाभिमान देख कर दंग हुए और मन ही मन उन्हें प्रणाम किया।

ये कहानी ‘ अनमोल प्रेरक प्रसंग’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानियां पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएंAnmol Prerak Prasang(अनमोल प्रेरक प्रसंग)