एक बार शेख फरीद किसी गाँव में रुके। उनके दर्शन के लिए सैंकड़ों लोग आए और अपनी जिज्ञासा व्यक्त करने लगे। एक भक्त ने प्रश्न किया, हमने सुना है कि जब प्रभु ईसा को सूली दी जा रही थी, तो उनके चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी। वह निश्चिंत थे, कोई भय नहीं था। यह भी सुना है कि जब मंसूर के हाथ-पैर काटे गए, आंखें फोड़ी गई, तो उसने चूं तक नहीं की।
सब कुछ उसने हंसते हुए सहन किया। मुझे तो ऐसी बातों पर बिल्कुल भरोसा नहीं होता है। शेख फरीद ने उस व्यक्ति को एक कच्चा नारियल देते हुए उसे फोड़ने के लिए कहा। उस व्यक्ति ने सोचा कि फरीद शायद जवाब दे नहीं पा रहे हैं, इसलिए उसका ध्यान दूसरी तरफ मोड़ रहे हैं। वह बोला, आपने मेरे सवाल का जवाब ही नही दिया। फरीद ने फिर कहा, फिलहाल तो नारियल फोड़ो।
पर इतना ख्याल रखना कि इसकी गरी अलग निकल न आए। उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, यह नारियल तो कच्चा है। इसकी गरी और खोल दोनों जुड़े हुए हैं, इसलिए गरी को कैसे अलग निकाल सकता हूँ? फरीद ने एक दूसरा सूखा नारियल देते हुए कहा, अब इसे फोड़कर इसकी गरी देना। उस व्यक्ति ने नारियल फोड़कर गरी निकालकर उनके सामने रख दी। तब संत ने पूछा, इसकी गरी कैसे निकल आई? उस व्यक्ति ने कहा, यह सूखी थी और खोल से अलग थी, इसलिए निकल आई।
संत ने कहा, तुम्हारे सवाल का भी यही जवाब है। आम लोगों का शरीर खोल से जुड़ा होता है, इस कारण जब उनके शरीर को चोट पहुँचती है, तो उनकी अंतरात्मा को भी चोट लगती है लेकिन ईसा और मंसूर जैसे पहुँचे हुए महात्मा अपने शरीर को खोल से अलग रखते हैं, इसलिए यातना देने पर भी उन्हें पीड़ा नहीं हुई। लेकिन तुम तो मुझे कच्चे नारियल लगते हो इसीलिए तुम्हारे मन में ये विचार उठे कि उन दोनों को यातना क्यों महसूस नहीं हुई।
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