Rishton ka Bhavar
Rishton ka Bhavar

Hindi Kahani: रीना और राकेश ने अपने परिवार वालों की मर्ज़ी के खिलाफ जाकर शादी की थी। दोनों अपनी जिन्दगी में खुश थे, दोनों ने बहुत कोशिश की अपने-अपने परिवार वालों को मनाने की, पर दोनों के परिवार वाले मानने को तैयार ही नहीं थे,ना उनसे बात करते थे।
देखते- देखते दो साल हो गए दोनों की शादी को। सुबह से ही रीना का जी बहुत घबरा रहा था और लगातार उल्टियां भी हो रही थी। राकेश रीना को लेकर अस्पताल गया। डॉक्टर ने रीना की जाँच की और उन्हें बधाई देते हुए कहा आप दोनों माता-पिता बनने वाले है।
ये खबर सुनकर दोनों बहुत खुश हुए और उनकी आंखो में उम्मीद की एक किरन जग गई। दोनों ने अपने-अपने घर मैसेज किया हम लोग रात में आ रहें हैं एक खुश खबरी देनी हैं, बस एक बार मिल लीजियेगा हम दोनों से फिर चाहें पूरी जिन्दगी बात मत करना।
तुरन्त दोनों ने घर जाकर सामान बंधा फ्लाइट का टिकट बुक करके एयरपोर्ट के लिए निकाल गए। दोनों ने अपनी फ्लाइट डिटेल्स भी मैसेज में भेजी पर उधर से कोई जवाब नहीं आया |

राकेश ने रीना से कहा देखना हमारे घर वाले ये खुशखबरी सुनते ही हमें गले लगा लेंगे | रीना मुस्कुरा दी पर अगर एक बार फ़ोन पर बात हो जाती, दो साल हो गए उनकी आवाज़ सुने, मैसेज का भी कोई जवाब नहीं आया |

बस रीना कुछ घंटों की बात हैं फिर देखना वो हमसे बात भी करेंगे और गले भी लगाएंगे |

इधर रीना और राकेश के परिवार वाले भी बात तो करना चाह रहें थे पर उनकी नाराज़गी और गुस्सा उन्हें फ़ोन करने नहीं दे रहा था |

तभी टीवी पर न्यूज़ आई मुम्बई से दिल्ली आने वाली फ्लाइट क्रैश हो गई, एक भी यात्री नहीं बचा | रीना की माँ ने मैसेज में फ्लाइट डिटेल्स देखी इसी फ्लाइट से दोनों आ रहें थे, उन्होंने राकेश के घर फ़ोन किया वहाँ भी ये खबर सुनकर मातम छा गया दोनों परिवार साथ में एयरपोर्ट गए इस उम्मीद में की शायद बच्चे मिल जाए |

पर अब उन्होंने बहुत देर कर दी थी, उनके बच्चे जा चुके थे | काश उन्होंने बात कर ली होती एक बार पूछ लिया होता बच्चों कैसे हो |

उन्होंने सिर्फ अपने बच्चों को ही नहीं ब्लकि आने वाले नन्हें मेहमान को भी खो दिया, जिसका तो उन्हें पता भी नहीं था |

प्यार के रिश्ते अक्सर समुंदर का हिस्सा बन जाते हैं…और कुछ उलझनों के जाल में फंस कर तड़प तड़प दम तोड़ देते है।
सच माना जाए तो जिंदगी भी तो समंदर के लहरों जैसी है.
कभी उफनती कभी सिमटती सी….
और कभी कभी उस उफनने और सिमटने की धार में कौन अपना कब क्यों कहाँ किधर बह कर खो जाते हैं कुछ पता भी नहीं चलता…
आँखें दूर किनारे तक उसे ढूंढ़ती रह जाती है। इसलिए जो तुम्हारे प्रिय हैं उनके संग संग मौजों की तरह जी भर लहरा कर बलखा कर उमंगों के साथ जी भर जी लो….कौन जाने कौन कब, कहाँ सीप की तरह किधर बिखर जाएँ….