भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
मुझे भी रिटायरमेंट चाहिए जैसे ही भावना ने यह शब्द कहे बेटे और बहू ने अवाक् होकर उन्हें देखा। बेटे दिव्य ने हंसते हुए चुटकी ली, मां आज डैडी रिटायर हो रहे हैं तो आप मजाक कर रही हैं। मजाक, हैरानी से दिव्य की ओर देखते हुए मां ने कहा, मजाक नहीं बेटा मैं सच कह रही हूं।
तुम्हारे डैडी अगर 60 के होकर रिटायर हो सकते हैं, तो मैं तो उनसे दो साल बड़ी ही हूं, मुझे तो पहले ही रिटायर हो जाना चाहिए था। भावना ने चुटकी लेते हुए कहा, फिर यकायक संयत होते हुए कहा, ये मजाक नहीं बेटा, मैं सच कह रही हूं। मां के शब्दों की दृढ़ता को देखते हुए दिव्य मां की कहीं दूर तक खोई आंखों में देर तक देख नहीं पाया। समझाने का प्रयास करते हुए उसने कहा, “कैसी बात कर रही हो मां आप कोई जॉब थोड़ी करती हो जो आप को रिटायरमेंट चाहिए” उसने ठहाका लगाते हुए माहौल को हल्का करने की कोशिश की। “जॉब तो नहीं करती लेकिन मुझे अपने लिए वक्त चाहिए बेटा।” “अरे मां आपके पास वक्त ही वक्त है।” “नहीं, वक्त ही तो नहीं है बेटा” रुआंसी हो कर भावना ने कहा, “वक्त है ही कहां मेरे सपनों को उड़ान देने के लिए, वक्त है ही कहां खुद की तलाश करने के लिए, वक्त है ही कहां बरसों से पेंडिंग पड़े अपने सारे ख्वाबों को पूरा कर पाने के लिए, नहीं है बेटा, वक्त ही नहीं है।” दिव्य और आस्था आज मां में अचानक आए इस बदलाव को देखकर स्तब्ध थे, समझ ही नहीं पा रहे थे कि आखिर उन्हें अचानक हुआ क्या है, दोनों की आंखों में कई सवाल एक साथ उभर आए।
दिव्य ने मां को पकड़ा और कहा, “अच्छा, मां एक काम करो आओ यहां बैठते हैं फिर आराम से बातें करते हैं। हां ये बताओ आपने अपनी सुबह वाली दवाई ली”? “हम्म्म, ले ली” भावना ने कहा। “तो फिर अब बताओ, हुआ क्या है।” दिव्य ने मां के कंधे पर अपना सर रखते हुए कहा, “मुझसे या आस्था से कोई गलती हुई क्या?” दिव्य ने मां से बालसुलभ लाड़ दर्शाते हुए पूछा। नहीं बच्चे, मैं कोई टिपिकल सास वाली भूमिका में नहीं हूं कि तुम्हारे आगे बहू की चुगलियां करूं, आस्था तो मेरी जान है, और उसे इस घर में आए अभी कितने दिन हुए हैं, अपनी आंखों में ढेर सारा लाड़ भरते हुए भावना ने आस्था की तरफ देखा और उठकर उसके माथे पर प्यारा सा चुंबन जड़ दिया। आस्था की आंखें श्रद्धा से नत थीं। “अच्छा मां अभी तो मैं डैडी के कॉलेज जा रहा हूं, शाम को बातें करते हैं।” “लेकिन दिव्या मैं तुम्हारे डैडी के सामने कोई बात नहीं करूंगी, मुझे पता है हमेशा की तरह ये सब उन्हें बकवास ही लगेगा” भावना ने कुछ तंग सी आवाज में कहा। “मां टेंशन मत लो, डैडी के आगे मैं ऐसी कोई बात नहीं छेडूंगा, वा! वा! इलम मेरी प्यारी सी मां”, मां को भुजपाश में कसते हुए बोला और साथ ही मां के पांव छूते हुए दिव्य तेजी से बाहर की ओर गया। “मां आपके लिए चाय बनाऊं”, आस्था ने पूछा। “नहीं बेटा अभी तुम बैठो मैं तुम्हारे लिए चाय बनाती हूं।” भावना ने स्नेह से भरकर आस्था से कहा और किचन की तरफ बढ़ी। “अच्छा आस्था बेटा तुम जॉब कब से ज्वॉइन कर रही हो, वहीं किचन से आवाज लगाते हुए भावना ने पूछा। “next month से मम्मी”, आस्था ने कहा। “शाबाश बेटा”, आस्था के हाथ में चाय का कप पकड़ाते हुए भावना ने उसके सर पर हाथ रखा।
“सुनो बेटा, मैं रुपा आंटी के घर जा रही हूं, दरवाजा बन्द कर लो।” “जी मम्मी”, आस्था भावना के पीछे-पीछे दरवाजा बन्द करने आई। रुपा के घर की ओर जाते हुए भावन खुद से ही संवाद करने में व्यस्त थी, उसे लगा कि आज मन में अपनी जिंदगी का फैसला लेने के लिए जो दृढ़ निश्चय उभर रहा है कहीं वह शाम को राजू के आते ही ध्वस्त न हो जाए। राजू को हर समस्या का एक ही हल आता है गुस्सा। असल में गलती शायद राजू की भी नहीं, वह है ही ऐसे परिवेश से जहां कला, शौक, जुनून जैसी बातें निरर्थक मानी जाती हैं। जहां पत्नी धर्म से अलग एक नारी का अपना स्वतंत्र वजूद भी हो सकता है, उन्हें समझ नहीं आता। जहां पढ़ी-लिखी औरत से आशय किसी स्कूल कॉलेज में लगना भर होता है। भावना को अनायास वे दिन दिमाग में कौंध गए जब म्यूजिक कॉम्पिटिशन में उसने नया-नया जाना शुरू किया था, चूंकि बच्चे अभी स्कूल में पढ़ रहे थे तो बच्चों के पास सास को बुलवाना होता था रुकने के लिए, और तमाम सम्मान, प्रशंसा और गुणगान से अभिभूत जब वह घर लौटती थी तो अक्सर सासू मां का मुंह बना मिलता था और गुस्से में कहतीं, तेरे से ज्यादा तो प्राइमरी टीचर कमा लेवें, कहा करती फिरे तू, यह सुनते ही सारा उत्साह ठंडा पड़ जाता था।
जानती तो वह भी थी कि अगर कहीं अध्यापन करती तो मासिक अच्छा खासा कमा लेती, लेकिन 9 से 5 की नौकरी के लिए उसका मन कभी माना ही नहीं। उसके भीतर तो एक कलाकार हिलोरें लेता था जिसे अपने मन की संतुष्टि के लिए काम करना था, इसी उधेड़-बुन से घिरी वह कब रुपा के दरवाजे जा खड़ी हुई, पता ही नहीं चला। रुपा अपनी गाड़ी की ओर बढ़ रही थी, “कही जा रही हो रुपा”, भावना ने पूछा। भावना की आवाज सुनकर जब रुपा मुड़ी तो उसका चेहरा दमक उठा, “कहीं नहीं मेरी जान, सोच रही थी मार्किट तक जाऊं, अब तुम आ गई हो तो नहीं जाऊंगी, ” रुपा ने ठहाका लगाते हुए कहा। दोनों हंसते हुए भीतर की ओर गई। रुपा बहुत जिंदादिल और हंसमुख थी, वे दोनों जब भी इकठ्ठे बैठतीं तो ठहाके पर ठहाके लगाती। जब भी भावना कहीं परेशान होती तो रुपा के आगे सब कुछ कह खुद को हल्का महसूस करती। “आज ये चांद-सा मुखड़ा इतना बेनूर कैसे?” रुपा ने चुटकी लेते हुए पूछा। “कुछ नहीं, बस आज एक फैसले पर अडिग हो गई हूं कि अब 60 के बाद की रिटायरमेंट के जैसे मैं भी घर की तमाम उलझनों से खुद को रिटायर करना चाहती हूं, बेटे की शादी भी हो गई, बिटिया कनु ने तो बहुत पहले ही विदेश में घर बसा लिया है, बस अब अपने कुछ सपनों को समय देना है, ताकि कल को अगर मरने के बाद ईश्वर से आमना-सामना हो तो वे यूं न कहें कि बिटिया तुम्हें इतने गुण दिए तुमने एक का भी इस्तेमाल नहीं किया”, यह कहकर भावना खिलखिला दी। रुपा भी भावना के साथ ही खिलखिलाई लेकिन रुपा जानती थी इस हंसी के पीछे का दर्द। “हम्म, तो आ गई आखिरकार मोहतरमा में हिम्मत”, रुपा ने कहा। “हम्म् आईं तो है, बस बरकरार रहे यह हिम्मत राजू के सामने भी। क्योंकि उसे ये सब बातें बकवास लगती हैं।” रुपा ने एक लंबी सी सांस लेते हुए कहा “पता है भावना, मुझे तुम्हें देखकर दर्द होता है, हमेशा एक टीस होती है। मैं कई आयोजनों में ऐसी महिलाओं को देखती हूं जिनके पास खूब पैसा है, आलीशान कोठी बंगले हैं लेकिन वे तेरे जैसे गुणों के लिए तरसती हैं, वे अब कोई भी कीमत देकर नाम कमाना चाहती हैं, लेकिन एक तरफ हमेशा तुम्हें देखा, जिसके भीतर हुनर है, क्षमता है लेकिन उसका इस्तेमाल नहीं हो रहा।” “अब करूंगी इस्तेमाल, अब जिऊंगी अपनी जिंदगी, अब करूंगी अपनी तलाश और अब पाऊंगी कोई मकाम।” ये कहकर भावना दृढ़ निश्चय के साथ उठी, और बाहर की ओर चल दी। “अब अपने निर्णय से पीछे मत हटना”, पीछे से रुपा ने जोर से कहा। “पक्का है, नहीं पलटूंगी”, भावना ने जवाब दिया और अपने घर की ओर चल दी। रुपा ने उसे जाने से नहीं रोका क्योंकि वह जानती थी कि भावना उसके पास अपने निर्णय को बताकर स्वयं को मजबूती देने आई थी।
घर लौटी तो देखा घर पर कुछ भीड़ थी। ध्यान से देखा तो पाया राजू के दोस्त रिटायरमेंट के बाद उसे घर पहुंचाने आए थे। फूल मालाओं से लदे राजू के चेहरे पर असीमित संतोष था, इतने बरस तक कुशलता पूर्वक अपनी नौकरी का दायित्व जो निभाया था। जिस नौकरी के लिए कभी घर परिवार की परवाह भी उसने नहीं की। क्योंकि जल विभाग में अधिकारी बनना उसका स्वप्न रहा था। और अपने इस स्वप्न के लिए उसने हर चीज को दरकिनार किया, घर और परिवार को भी। आज राजू की खुशी देखकर भावना सोच रही थी कि इस व्यक्ति की तमाम खुशियां और तकलीफें अक्सर ही नौकरी से जुड़ी रहीं, जब वह खुश होता तो समझ जाओ ऑफिस में अच्छा हुआ है, तनाव में होता तो बच्चे तक समझ जाते कि आज डैडी ऑफिस की टेंशन में हैं क्योंकि कभी भी राजू को घर की टेंशन तो भावना ने दी ही नहीं, भले खुद कितनी भी तनावग्रस्त रही हो लेकिन राजू को भनक नहीं लगने दी, इसीलिए तो राजू को कहता था कि तुम्हें क्या नौकरी कैसे की जाती है तुम तो पूरे दिन आराम से घर पर मौज मारती हो, ये बात गर्म सीसे की तरह भावना के कानों में पिघलती थी क्योंकि भावना को पता था कि यही आराम तो उसे भीतर ही भीतर खत्म कर रहा है।
“नमस्ते भाभीजी, कैसी हैं आप”? मिस्टर गुप्ता की यह आवाज सुनकर भावना वर्तमान में लौट आई, “ठीक हूं भाईसाहब, आप कैसे हैं?” “जी हम भी ठीक हैं, भाईसाहब की रिटायरमेंट की आपको भी बधाईयां भाभीजी।” “जी बेहद शुक्रिया आपका। आज एक बधाई से काम नहीं चलेगा आपको दो दो बधाईयां देनी होंगी।” “दो बधाई, दूसरी बधाई किस बात की भई, दूसरी खुशखबरी क्या है, जल्दी बताओ?” राजू ने हैरत से पूछा। “बताती हूं, बताती हूं, पहले तो आपको मेरी ओर से रिटायरमेंट की बधाई”, भावना ने राजू की ओर देखकर मुस्कराते हुए कहा। “शुक्रिया जी, अब जल्दी से दूसरी खुशखबरी तो बताओ।” राजू बच्चों की तरह जिद पर अड़ा था। “दूसरी खुशखबरी यह है कि आज मैं भी रिटायर हो रही हूं।” “तुम और रिटायर”, हंसते हुए राजू ने कहा, “तुम तो हमेशा से ही रिटायर हो भई, घर पर मौज ही तो मारती हो।” “गुप्ता जी असल में औरतों की मौज है, नौकरी की कोई टेंशन नहीं और आराम से घर की मौज लो। घर का असली सुख तो औरतें ही लेती हैं, हम बेचारे आदमियों की जिंदगी तो दिन-रात बस कमाने में ही निकल जाती है”, यह कहकर राजू ने जोर का ठहाका लगाया। इतने में भीतर से दिव्य सभी के लिए खाने पीने का सामान लेकर जैसे ही रूम में दाखिल हुआ उसने मां के चेहरे पर आए अपमान बोध को पढ़ लिया।
“मां, आराम से बाद में बात करते हैं इस सबके बारे में, मां एक बार आपको आस्था बुला रही है भीतर।” नहीं दिव्य अब मुझे भीतर नहीं जाना, अब मुझे बाहर जाना है, अब मुझे खुद के लिए भी जीना है। तुम जानते हो दिव्य जब मेरी शादी हुई थी उस समय मां-बाप ने कहा था कि जो भी करना है, जो कुछ भी बनना है, शादी के बाद कर लेना। तुम्हें तो पता ही है दिव्य उस समय जब मैं ख्वाबों के विस्तृत आकाश में उड़ रही थी, अचानक से मैंने अपने ख्वाबों की गठरी बांधी और सारे सपनों को तह किया और अलमारी मतलब दिल की अलमारी के भीतरी तहखानों में बंद कर दिया उसके बाद शादी हुई तो ससुराल में किसी को इन सपनों की सार्थकता ही नहीं लगी, मेरे हुनर का कोई अहसास ही नहीं किया किसी ने या हमेशा यह कहकर टालते रहे कि बच्चे बड़े हो जाएं तो करना और खुद मेरे भीतर की मां को भी यही लगता रहा कि मैं अपने बच्चों को उपेक्षित न करूं, लेकिन आज जब मेरे सभी दायित्व पूरे हो गए हैं तो मैं अपने लिए जीना चाहती हूं, मेरी तमाम उम्र का कुछ हिस्सा तो मेरे नाम हो। मैं खुद को महसूस करना चाहती हूं, मैं जीना चाहती हूं, सारे आवरण हटा मैं वही होना चाहती हूं जो मैं हूं, मुझे जी लेने दो आज, सच मुझे जी लेने दो… कहते कहते भावना की आंखों से रुलाई फूट पड़ी, लेकिन अपने उन आंसुओं को पोंछते हुए उसने अपना बैग उठाया और चल दी एक नए जहां की तलाश में, अपने अस्तित्व की तलाश में, जिंदगी की सार्थकता की तलाश में और उसके कानों में बहुत पहले लिखी उसकी गजल की पंक्तियां गूंज रहीं थीं
बेजुबां इस शहर की मैं ही जुबां हो जाऊंगी,
चल पड़ी तन्हा भी गर तो कारवां हो जाऊंगी।
आज कहीं दूर डूबता सूर्य भी इक नई आभा बिखेर रहा था। 60 के पार भावना को जीवन का अलग ही आधार मिल रहा था।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
