लाला उजागरलाल शहर के सहयोगी समाज के नेता थे। उन्हें अंग्रेजों की आयी शुभकामनाओं पर पूर्ण विश्वास था। अंग्रेजी राज्य की तामीली, माली और मुल्की तरक्की के राग गाते रहते थे। अपनी सभ्यताओं में असहयोगियों को खूब फटकार करते थे। अंग्रेजों में इधर उनका आदर-सम्मान विशेष रूप से होने लगा। कई बड़े-बड़े ठेके के, जो पहले अंग्रेज ठेकेदारों को ही मिला करते थे, उन्हें दे दिये गए थे। सहयोग ने उनके मान और धन को खूब बढ़ाया था, अतएव मुँह से चाहे वह असहयोग की निन्दा करें, पर मन में उसकी उन्नति चाहते थे। उन्हें यकीन था कि असहयोग एक हवा है, जब तक चलती रहे, उसमें अपने गीले कपड़े सुखा लें। वह असहयोगियों के कृत्यों का खूब बढ़ा-चढ़ाकर बयान किया करते थे और अधिकारियों के कृत्यों इन गढ़ी हुई बातों पर विश्वास करते देखकर दिल में उन पर खूब हंसते थे। ज्यों-ज्यों सम्मान बढ़ता था, उनका आत्माभिमान भी बढ़ता था। यह अब पहले की भांति भीरू न थे। गाड़ी पर बैठे और जरा साँस आना बंद हुआ तो इस घटना की विवेचना करने लगे। अवश्य नूरअली ने धोखा दिया, उसकी असहयोगियों से भी मिली भगत है। यह लोग होली खेलते, तो इनका इतना क्रोधोन्मत होना इसके सिवा और क्या बतलाता है कि हमें यह लोग कुत्तों से बेहतर नहीं समझते । इनको अपने प्रभुत्व का कितना घमंड है! यह मेरे पीछे हंटर लेकर दौड़े! अब विदित हुआ कि यह जो मेरा थोड़ा-बहुत सम्मान करते थे, वह केवल धोखा था। मन में वह हमें अब भी नीच और कमीना समझते हैं। लाल-रंग कोई बाण नहीं था। हम बड़े दिनों में गिरजे जाते हैं, इन्हें डालियाँ देते हैं। यह हमारा त्यौहार नहीं है। पर यह जरा-सा रंग छोड़ देने पर इतना बिगड़ उठा! हां! इतना अपमान! मुझे उनके सामने ताल ठोकर खड़ा हो जाना चाहिए था। भागना कायरता है। इसी से यह सब शेर हो जाते हैं। कोई सन्देह नहीं कि यह सब हमें मिलाकर असहयोगियों को दबाना चाहते हैं। इनकी यह विनयशीलता और सज्जनता केवल अपना मतलब गांठने के लिए है। इनकी निरंकुशता, इनका गर्व वही है, जरा भी अन्तर नहीं।
सेठजी के हृदयगत भावों ने उग्र रूप धारण किया। मेरी यह अधोगति! अपने अपमान की याद रह-रहकर उनके चित्त को विह्वल कर रही थी। यह मेरे सहयोग का फल है। मैं इसी योग्य हूँ। मैं उनकी सौहार्द्रपूर्ण बातें सुन-सुनकर फूला न समाता था। मेरी मंद बुद्धि को इतना भी न सूझता था कि स्वाधीन और पराधीन में कोई मेल नहीं हो सकता। मैं असहयोगियों की उदासीनता पर हँसता था। अब मालूम हुआ कि वे हास्यास्पद नहीं हैं, मैं स्वयं निन्दनीय हूँ।
वह अपने घर न जाकर सीधे कांग्रेस कमेटी के कार्यालय की ओर लपके। यहाँ पहुँचे तो एक विराट सभा देखी। कमेटी ने शहर के छूत-अछूत, छोटे-बड़े, सबको होली का आनन्द मनाने के लिए निमंत्रित किया था। हिंदू-मुसलमान साथ-साथ बैठे हुए प्रेम से होली खेल रहे थे। फल-भोज का भी प्रबंध किया गया था। इस समय व्याख्यान हो रहा था। सेठजी गाड़ी से तो उतरे, पर सभा-स्थल में जाते संकोच होता था। ठिठकते हुए धीरे से जाकर एक ओर खड़े हो गए। उन्हें देखकर लोग चौंक पड़े। सब-के-सब विस्मित होकर उनकी ओर ताकने लगे। यह खुशामदियों के आचार्य आज यहाँ कैसे आ पड़े? इन्हें तो किसी सहयोगी सभा में राज-भक्ति का प्रस्ताव पास करना चाहिए था। शायद भेद लेने आये हैं कि लोग क्या कर रहे हैं। उन्हें चिढ़ाने के लिए लोगों ने कहा-कांग्रेस की जय!
उजागरलाल ने उच्च स्वर में कहा-असहयोग की जय!
फिर ध्वनि हुई-खुशामदियों की जय!
सेठजी ने उच्च स्वर से कहा जी-हुजूरों की क्षय!
यह कहकर यह समस्त उपस्थित जनों को विस्मय में डालते हुए मंच पर जा पहुँचे और गम्भीर भाव से बोले सज्जनों, मित्रों! मैंने अब तक आपसे असहयोग किया था, उसे क्षमा कीजिए। मैं सच्चे दिल से आपसे क्षमा माँगता हूँ। मुझे घर का भेदी, जासूस या विभीषण न समझिए। आज मेरी आंखों के सामने से परदा हट गया। आज इस पवित्र प्रेममयी होली के दिन मैं आपसे प्रेमालिंगन करने आया हूँ। अपनी विशाल उदारता का आचरण कीजिए। आपसे द्रोह करने का आज मुझे दंड मिल गया। जिलाधीश ने आज मेरा घोर अपमान किया। मैं वहाँ से हंटरों की मार खाकर आपकी शरण आया हूँ। मैं देश का द्रोही था, जाति का शत्रु था। मैंने अपने स्वार्थ के वश, अपने अविश्वास के वश देश का बड़ा अहित किया, खूब कांटे बोए। उनका स्मरण करके ऐसा जी चाहता है कि हृदय के टुकड़े-टुकड़े कर दूँ। (एक आवाज)-हाँ अवश्य कर दीजिए, आपसे न बने तो मैं तैयार हूँ। ( प्रधान की आवाज)- यह कटु वाक्यों का अवसर नहीं है। नहीं, आपको यह कष्ट उठाने की जरूरत नहीं, मैं स्वयं यह काम भली-भांति कर सकता हूँ पर अभी मुझे बहुत कुछ प्रायश्चित्त करना है, जाने कितने पापों की पूर्ति करनी है। आशा करता हूँ कि जीवन के बचे हुए दिन इसी प्रायश्चित्त करने में, यही मुँह की कालिमा धोने में कांटू। आपसे केवल इतनी ही प्रार्थना है कि मुझे आत्मसुधार का अवसर दीजिए, मुझ पर विश्वास कीजिए और मुझे अपना दीन सेवक समझिए। मैं आज से अपना तन, मन, धन, सब आप पर अर्पण करता हूँ।
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