dand by munshi premchand
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संध्या का समय था। कचहरी उठ गई थी। अहलकार और चपरासी जेबें खनखनाते घर जा रहे थे। मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे-पैसे मिल जायें। कचहरी के बरामदों में सांड़ों ने वकीलों की जगह ले ली थी। पेड़ों के नीचे मुहर्रिरों की जगह कुत्ते बैठे नजर आते थे। इसी समय एक बूढ़ा आदमी, फटे-पुराने कपड़े पहने, लाठी टेकता हुआ, जज साहब के बँगले पर पहुँचा और सायबान में खड़ा हो गया। जज साहब का नाम था मिस्टर जी. सिन्हा। अरदली ने दूर ही से ललकारा- कौन सायबान में खड़ा है? क्या चाहता है?

बूढ़ा- गरीब ब्राह्मण हूँ भैया, साहब से भेंट होगी?

अरदली- साहब तुम जैसों से नहीं मिला करते?

बूढ़े ने लाठी पर अकड़कर कहा- क्यों आई, हम सड़े हैं या डाकू-चोर हैं, कि हमारे मुँह में कुछ लगा हुआ है?

अरदली- भीख माँगकर मुकदमा लड़ने आये होगे?

बूढ़ा- तो कोई पाप किया है? अगर घर बेचकर मुकदमा नहीं लड़ते, तो कुछ बुरा करते हैं? यहाँ तो मुकदमा लड़ते-लड़ते उम्र बीत गई, लेकिन घर का पैसा नहीं खर्च किया। मियाँ की जूती, मियाँ के सिर करते हैं। दस भले-मानसों से माँगकर एक को दे दिया। चलो छुट्टी हुई। गाँव-भर नाम से काँपता है। किसी ने जरा भी टिर-पिर की और मैंने अदालत में दावा दायर किया।

अरदली- किसी बड़े आदमी से पाला नहीं पड़ा अभी?

बूढ़ा- अजी, कितने ही बड़ों को बड़े घर भिजवा दिया, तुम हो किस फेर में। हाईकोर्ट तक जाता हूँ सीधा। कोई मेरे मुँह क्या आएगा बेचारा। गाँठ से तो कौड़ी जाती नहीं, फिर डर क्यों? जिसकी जिस चीज पर दाँत लगाए, अपना करके छोड़ा। सीधे न दिया तो अदालत में घसीट लाये और रगेद-रगेद कर मारा, अपना क्या बिगड़ता है। तो साहब से इत्तला करते हो कि मैं ही पुकारूं?

अरदली ने देखा, यह आदमी यों जाने वाला नहीं, तो जाकर साहब से उसकी इत्तला की। साहब ने हुलिया पूछा और खुश होकर कहा- फौरन बुला लो।

अरदली- हुजूर, बिलकुल फटे हाल है।

साहब- गुदड़ी ही में लाल होते हैं। जाकर भेज दो।

मिस्टर सिन्हा अधेड़ आदमी थे, बहुत ही शान्त, बहुत ही विचारशील। बातें बहुत कम करते थे। कठोरता और असभ्यता, जो शासन का अंग समझी जाती है, उनको छू भी नहीं गई थी। न्याय और दया के देवता मालूम होते थे। निगाह ऐसी बारीक पायी थी कि सूरत देखते ही आदमी पहचान जाते थे। डील-डौल देवों का-सा था और रंग आबनूस का-सा। आराम-कुर्सी पर लेटे हुए पेचवान पी रहे थे। बूढ़े ने जाकर सलाम किया।

सिन्हा- तुम हो जगत पांडे ? आओ बैठो। तुम्हारा मुकदमा तो बहुत ही कमजोर है। भले आदमी, जाल भी न करते बना?

जगत- ऐसा न कहें हुजूर, गरीब आदमी हूँ मर जाऊंगा।

सिन्हा-किसी वकील-मुख्तार से सलाह भी न ले ली?

जगत- अब तो सरकार की सरन में आया हूँ।

सिन्हा- सरकार क्या मिसिल बदल देंगे या नया कानून गढ़ेगे? तुम गच्चा खा गए। मैं कभी कानून के बाहर नहीं जाता। जानते हो न, अपील से कभी मेरी तजबीज रद्द नहीं होती?

जगत- बड़ा धरम होगा सरकार! (सिन्हा के पैरों पर गिन्नयों की एक पोटली रखकर) बड़ा दुखी हूँ सरकार।

सिन्हा- (मुस्कराकर) यहाँ भी अपनी चालबाजी से नहीं चूकते? निकालो अभी और। ओस से प्यास नहीं बुझती। भला, दहाई तो पूरी करो।

जगत- बहुत तंग हूँ दीनबंधु।

सिन्हा- डालो, डालो कमर में हाथ। भला, कुछ मेरे नाम की लाज तो रखो। जगत-लुट जाऊंगा सरकार!

सिन्हा- लुटे तुम्हारे दुश्मन, जो इलाका बेचकर लड़ते हैं। तुम्हारे यजमानों का भगवान भला करें, तुम्हें किस बात की कमी है।

मिस्टर सिन्हा इस मामले में जरा भी रियायत न करते थे। जगत ने देखा कि यहाँ काइयाँपन से काम न चलेगा, तो चुपके से पाँच गिन्नियाँ और निकाली। लेकिन उन्हें मिस्टर सिन्हा के पैरों पर रखते समय उसकी आँखों से आंसू निकल आया। यह उसकी बरसों की कमाई थी। बरसों पेट काटकर, तन जलाकर, मन बाँधकर, झूठी गवाहियाँ देकर उसने यह थाती संचय कर पायी थीं। उसका हाथों से निकलना प्राण निकलने से कम दुखदायी न था।

जगत पांडे के चले जाने के बाद, करीब 9 बजे रात को, जज साहब के बंगले पर एक ताँगा आकर रुका और उस पर से पंडित सत्यदेव उतरे, जो राजा साहब शिवपुर के मुख्तार थे।

मिस्टर सिन्हा ने मुस्कराकर कहा- आप शायद अपने इलाके में गरीबों को न रहने देंगे। इतना जुल्म!

सत्यदेव- गरीब परवर, यह कहिए कि गरीबों के मारे अब इलाके में हमारा रहना मुश्किल हो रहा है। आप जानते हैं, सीधी उँगली घी नहीं निकलता। जमींदार को कुछ-न-कुछ सख्ती करनी ही पड़ती है, मगर अब यह हाल है कि हमने जरा चूं भी कीं तो उन्हीं गरीबों की त्यौरियाँ बदल जाती हैं। सब मुफ्त में जमीन जोतना चाहते हैं। लगान मांगिए तो फौजदारी का दावा करने को तैयार। अब इसी जगत पांडे को देखिए। गंगा की कसम है हुजूर, सरासर झूठा दावा है। हुजूर से कोई बात छिपी तो रह नहीं सकती। अगर जगत पांडे यह मुकदमा जीत गया, हमें बोरियां-बंधना छोड़कर भागना पड़ेगा। अब हुजूर ही बसाएं तो बस सकते हैं। राजा साहब ने हुजूर को सलाम कर कहा है और अर्ज की है कि इस मामले में जगत पांडे की ऐसी खबर लें कि वह भी याद करे।

मिस्टर सिन्हा ने भवें सिकोड़ कर कहा- कानून मेरे घर तो नहीं बनता?

सत्यदेव- हुजूर के हाथ में सब कुछ है।

यह कहकर गिन्नियों की एक गड्डी निकालकर मेज़ पर रख दी। मिस्टर सिन्हा ने गड्डी को आंखों से देखकर कहा- इन्हें मेरी तरफ से राजा साहब की नजर कर दीजिएगा। आखिर आप कोई वकील तो करेंगे ही। उसे क्या दीजिएगा?

सत्यदेव- यह तो हुजूर के हाथ में है। जितनी ही पेशियाँ होंगी, उतना ही खर्च भी बढ़ेगा।

सिन्हा- मैं चाहूं, तो महीनों लटका सकता हूँ।

सत्यदेव- हां, इससे कौन इनकार कर सकता है।

सिन्हा-पाँच पेशियाँ भी हुई, तो आपके कम-से-कम एक हजार उड़ जाएंगे, आप यहाँ उसका आधा पूरा कर दीजिए, तो एक ही पेशी में बारा-न्यारा हो जाये। आधी रकम बच जाये।

सत्यदेव ने 10 गिन्नियाँ और निकालकर मेज़ पर रख दीं और घमंड के साथ बोले- कुछ हो तो राजा साहब से कह दूं, आप इत्मीनान रखें, साहब की कृपादृष्टि हो गई है।

मिस्टर सिन्हा ने तीव्र स्वर में कहा- जी नहीं, यह कहने की जरूरत नहीं। मैं किसी शर्त पर यह रकम नहीं ले रहा हूं। मैं करूँगा वही, जो कानून की मंशा होगी। कानून के खिलाफ जौ भर नहीं जा सकता। यही मेरा उसूल है। आप लोग मेरी खातिर करते हैं, यह आपकी शराफत है। मैं उसे अपना दुश्मन समझता हूं, जो मेरा ईमान खरीदना चाहे। मैं कुछ लेता हूँ, सच्चाई का इनाम समझकर लेता हूं।

जगत पांडे को पूरा विश्वास था कि मेरी जीत होगी, लेकिन तजवीज़ सुनी तो होश उड़ गए। दावा खारिज हो गया। उस पर खर्च की खपत अलग। मेरे साथ यह चाल! अगर लाला साहब को इसका मजा न चखा दिया तो ब्राह्मण नहीं। हैं किस फेर में? सारा रोब भुला दूंगा। यहाँ गाढ़ी कमाई के रुपये हैं। कौन पचा सकता है? हाड़ फोड़-फोड़कर निकालेंगे। द्वार पर सिर पटक-पटक कर मर जाऊंगा।

उसी दिन संध्या को जगत पांडे ने मिस्टर सिन्हा के बंगले के सामने आसन जमा दिया। वहाँ बरगद का एक घना वृक्ष था। मुकदमे वाले वहीं सत्तू चबेना खाते और दोपहर उसी की छाँह में काटते थे। जगत पांडे उनसे मिस्टर सिन्हा की दिल खोलकर जिन्दा करता। न कुछ खाता न पीता, बस लोगों को अपनी राम कहानी सुनाया करता। जो सुनता, वह जज साहब को चार खोटी-खरी कहता- आदमी नहीं पिशाच है। इसे तो ऐसी जगह मारे, जहाँ पानी न मिले। रुपये के रुपये लिये, ऊपर से खर्चे समेत डिग्री कर दी। यही करना था तो रुपये काहे को निगले थे? यह है हमारे भाई -बंदों का हाल। यह अपने कहलाते हैं। इनसे तो अंग्रेज ही अच्छे। इस तरह की आलोचनाएँ दिन-भर हुआ करतीं। जगत पांडे के आस-पास आठों पहर जमघट लगा रहता था।

इस तरह चार दिन बीत गये और मिस्टर सिन्हा के कानों में भी बात पहुँची। अन्य रिश्वती कर्मचारियों की तरह वह भी हेकड़ आदमी थे। ऐसे निर्द्वन्द्व रहते, मानों उनमें यह बुराई छू तक नहीं गई है। जब वह कानून से जौ-भर भी न टलते थे, तो उन पर रिश्वत का सन्देह हो ही क्यों कर सकता था, और कोई करता भी तो उसकी मानता कौन? ऐसे चतुर खिलाड़ी के विरुद्ध कोई जाने की कार्रवाई कैसे होती? मिस्टर सिन्हा अपने अफसरों से भी खुशामद का व्यवहार न करते। इससे हुक्काम भी उनका बहुत आदर करते थे। मगर जगत पांडे ने वह मंत्र मारा था, जिसका उनके पास कोई उत्तर न था। ऐसे बाँगड़ आदमी से आज तक उन्हें साबिका न पड़ा था। अपने नौकरों से पूछते- बूढ़ा क्या कर रहा है! नौकर लोग अपनापन जताने के लिए झूठ के पुल बांध देते- हुजूर कहता था, भूत बनकर लगूंगा, मेरी वेदी बने तो सही, जिस दिन मरूंगा,उस दिन एक-एक के सौ जगत पांडे होंगे।

मिस्टर सिन्हा पक्के नास्तिक थे, लेकिन ये बातें सुन-सुनकर सशंक हो जाते, और उनकी पत्नी तो थर-थर काँपने लगतीं। वह नौकरों से बार-बार कहतीं, उससे जाकर पूछो, क्या चाहता है। जितने रुपये चाहे ले ले, हमसे जो माँगे वह देंगे, बस यहाँ से चला जाये। लेकिन मिस्टर सिन्हा आदमियों को इशारे से मना कर देते थे। उन्हें अभी तक आशा थी कि भूख-प्यास से व्याकुल होकर बूढ़ा चला जायेगा। इससे अधिक यह भय था कि मैं जरा भी नरम पड़ा और नौकरों ने मुझे उल्लू बनाया।