दूसरे दिन सारे शहर में खबर मशहूर हो गई-जगत पांडे ने जज साहब पर जान दे दी। उसका शव उठा तो हजारों आदमी साथ थे। मिस्टर सिन्हा को खुल्लम- खुल्ला गालियाँ दी जा रही थीं।
संध्या समय मिस्टर सिन्हा कचहरी से आकर मन मारे बैठे थे कि नौकरों ने आकर कहा- सरकार, हमको छुट्टी दी जाये! हमारा हिसाब कर दीजिए। हमारी बिरादरी के लोग धमकाते हैं कि तुम जज साहब की नौकरी करोगे, तो हुक्का- पानी बंद हो जायेगा।
सिन्हा ने झल्लाकर कहा- कौन धमकाता है?
कहार- किसका नाम बताएँ सरकार? सभी तो कह रहे हैं।
रसोइया- हुजूर, मुझे तो लोग धमकाते हैं कि मंदिर में न घुसने पाओगे।
सिन्हा- एक महीने की नोटिस दिये बगैर तुम नहीं जा सकते।
साईस- हुजूर, बिरादरी से बिगाड़ करके हम लोग कहाँ जाएँगे? हमारा आज से इस्तीफा है। हिसाब जब चाहे कर दीजिएगा ।
मिस्टर सिन्हा ने बहुत धमकाया, फिर दिलासा देने लगे, लेकिन नौकरों ने एक न सुनी। आधे घण्टे के अंदर सबों ने अपना-अपना रास्ता लिया। मिस्टर सिन्हा दाँत पीसकर रह गए, लेकिन हाकिमों का काम कब रुकता है? उन्होंने उसी वक्त कोतवाल को खबर दी और कई आदमी बेगार में पकड़ आये। काम चल निकला।
उसी दिन से मिस्टर सिन्हा और हिन्दू समाज में खींच-तान शुरू हुई। धोबी ने कपड़े धोना बंद कर दिया। ग्वाले ने दूध लाने में आनाकानी की। नाई ने हजामत बनानी छोड़ी। इन विपत्तियों पर पत्नी जी का रोना-धोना और भी गजब था। इन्हें रोज भयंकर स्वप्न दिखाई देते। रात को एक कमरे से दूसरे में जाते प्राण निकलते थे। किसी का जरा सिर भी दुखता, तो नहों में जान समा जाती। सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि अपने सम्बन्धियों ने भी आना-जाना छोड़ दिया। एक दिन साले आये, मगर बिना पानी पिये चले गये। इसी तरह एक बहनोई का आगमन हुआ। उन्होंने पान तक न खाया। मिस्टर सिन्हा बड़े धैर्य से यह सारा तिरस्कार सहते जाते थे। अब तक उनकी आर्थिक हानि न हुई थी। गरज के बावले झक मारकर आते ही थे और नजर-नजराना मिलता ही था। फिर विशेष चिन्ता का कोई कारण न था।
लेकिन बिरादरी से बैर करना पानी में रहकर मगर से बैर करना है। कोई- न-कोई ऐसा अवसर अवश्य ही आ जाता है, जब हमको बिरादरी के सामने सिर झुकाना पड़ता है। मिस्टर सिन्हा को भी साल के अन्दर ही ऐसा अवसर आ पड़ा। यह उनकी पुत्री का विवाह था। यही वह समस्या है, जो बड़े-बड़े हेकड़ों का घमंड चूर-चूर कर देती है। आप किसी के आने-जाने की परवाह न करें, हुक्का-पानी, भोज- भात, मेल-जोल किसी बात की परवाह न करें, मगर लड़की का विवाह तो न टलने वाली बला है। उससे बचकर आप कहां जाएँगे।
मिस्टर सिन्हा को इस बात का दगदगा तो पहले ही था कि त्रिवेणी के विवाह में बाधाएँ पड़ेंगी, लेकिन उन्हें विश्वास था कि द्रव्य की अपार शक्ति इस मुश्किल को हल कर देगी। कुछ दिन तक उन्होंने जानबूझकर टाला कि शायद इस आँधी का जोर कुछ कम हो जाए, लेकिन जब त्रिवेणी का सोलहवाँ साल समाप्त हो गया, तो दाल-मटोल की गुंजाइश न रही। संदेशे भेजने लगे, लेकिन जहाँ संदेशिया जाता, वही जवाब मिलता- हमें मंजूर नहीं। जिन घरों में साल-भर पहले उनका सन्देशा पाकर लोग अपने भाग्य को सराहते, वहाँ से अब सूखा जवाब मिलता था- हमें मंजूर नहीं। मिस्टर सिन्हा धन का लोभ देते, जमीन नजर करने को कहते, लड़के को विलायत भेजकर ऊँची शिक्षा दिलाने का प्रस्ताव करते, किन्तु उनके सारे आयोजनों का एक ही जवाब मिलता था- हमें मंजूर नहीं।
ऊँचे घरानों का यह हाल देखकर मिस्टर सिन्हा उन घरानों में सन्देश भेजने लगे, जिनके साथ पहले बैठकर भोजन करने में भी उन्हें संकोच होता था, लेकिन यहाँ भी यही जवाब मिला- हमें मंजूर नहीं। यहाँ तक कि कई जगह वह खुद दौड़- दौड़कर गये, लोगों की मिन्नतें कीं, पर यही जवाब मिला- साहब, हमें मंजूर नहीं। शायद बहिष्कृत घरानों में उनका सन्देश स्वीकार कर लिया जाता, पर मिस्टर सिन्हा जान बूझकर मक्खी न निगलना चाहते थे। ऐसे लोगों से संबंध न करना चाहते थे, जिनका बिरादरी में कोई स्थान न था। इस तरह एक वर्ष बीत गया।
मिसेज सिन्हा चारपाई पर पड़ी कराह रही थीं, त्रिवेणी भोजन बना रही थी और मिस्टर सिन्हा पत्नी के पास चिंता में डूबे हुए थे। उनके हाथ में एक खत था, बार-बार उसे देखते और कुछ सोचने लगते थे। बड़ी देर के बाद रोहिणी ने अपनी आंखें खोलीं और बोलीं- अब न बचूँगी। पांडे मेरी जान लेकर छोड़ेगा। हाथ में कैसा कागज है?
सिन्हा- यंशोदानंद के पास से खत आया है। पाजी को यह खत लिखते हुए शर्म नहीं आयी? मैंने इसकी नौकरी लगाई, इसकी शादी करवाई और आज उसका मिज़ाज इतना बढ़ गया है कि अपने छोटे आई की शादी मेरी लड़की से करना पसंद नहीं करता। अभागे के भाग्य खुल जाते।
पत्नी- भगवान, अब ले चलो। यह दुर्दशा नहीं देखी जाती। अंगूर खाने का जी चाहता है, मँगवाए हैं कि नहीं?
सिन्हा- मैं खुद जाकर लेता आया था।
यह कहकर उन्होंने तश्तरी में अंगूर भरकर पत्नी के पास रख दिये। वह उठा-उठाकर खाने लगीं। जब तश्तरी खाली हो गई तो बोलीं- अब किसके यहाँ सन्देश भेजोगे?
सिन्हा- किसके यहाँ बताऊँ! मेरी समझ में तो अब कोई ऐसा आदमी नहीं रह गया। ऐसी बिरादरी में रहने से तो यह हजार दर्जा अच्छा है कि बिरादरी के बाहर रहूँ। मैंने एक ब्राह्मण से रिश्वत ली। इससे मुझे इनकार नहीं। लेकिन कौन रिश्वत नहीं लेता? अपने गौ पर कोई नहीं चूकता। ब्राह्मण नहीं, खुद ईश्वर ही क्यों न हों, रिश्वत खाने वाले उन्हें भी चूरा लेंगे। रिश्वत देने वाला अगर निराश होकर अपने प्राण दे देता है, तो मेरा क्या अपराध? अगर कोई मेरे फैसले से नाराज होकर जहर खा ले, तो मैं क्या कर सकता हूँ। इस पर भी मैं प्रायश्चित्त करने को तैयार हूँ। बिरादरी जो दण्ड दे, उसे स्वीकार करने को तैयार हूँ। सबसे कह चुका हूँ मुझसे जो प्रायश्चित्त चाहो, करा लो, पर कोई नहीं सुनता। दंड अपराध के अनुकूल होना चाहिए, नहीं तो यह अन्याय है। अगर किसी मुसलमान का छुआ भोजन खाने के लिए बिरादरी मुझे काले पानी भेजना चाहे, तो मैं उसे कभी न मानूँगा। फिर अपराध अगर है तो मेरा है। मेरी लड़की ने क्या अपराध किया है! मेरे अपराध के लिए लड़की को दंड देना सरासर न्याय-विरुद्ध है।
पत्नी -मगर करोगे क्या? कोई पंचायत क्यों नहीं करते?
सिन्हा- पंचायत में भी तो बिरादरी के मुखिया लोग ही होंगे, उनसे मुझे न्याय की आशा नहीं। वास्तव में इस तिरस्कार का कारण ईर्ष्या है। मुझे देखकर सब जलते हैं और इसी बहाने से मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं। मैं इन लोगों को खूब समझता हूँ।
पत्नी-मन की लालसा मन ही में रह गई। यह अरमान लिये संसार से जाना पड़ेगा। भगवान की जैसी इच्छा। तुम्हारी बातों से मुझे डर लगता है कि मेरी बच्ची की न-जाने क्या दशा होगी। मगर तुमसे मेरी अन्तिम विनय यही है कि बिरादरी के बाहर न जाना, नहीं तो परलोक में भी मेरी आत्मा को शान्ति न मिलेगी। यह शोक मेरी जान ले रहा है। हाय, मेरी बच्ची पर न-जाने क्या विपत्ति आने वाली है।
यह कहते कहते मिसेज सिन्हा की आँखों से आँसू बहने लगे। मिस्टर सिन्हा ने उनको दिलासा देते हुए कहा- इसकी चिंता मत करो प्रिय। मेरा आशय केवल यह था कि ऐसे भाव मेरे मन में आया करते हैं। तुमसे सच कहता हूँ बिरादरी के अन्याय से कलेजा छलनी हो गया है।
पत्नी- बिरादरी को बुरा मत कहो। बिरादरी का डर न हो, तो आदमी न- जाने क्या-क्या उत्पात करे। बिरादरी को बुरा न कहो। (कलेजे पर हाथ रखकर) यहाँ बड़ा दर्द हो रहा है। यंशोदानंद ने भी कोरा जवाब दे दिया। किसी करवट चैन नहीं आता। क्या करूँ भगवान।
सिन्हा- डॉक्टर को बुलाऊँ?
पत्नी- तुम्हारा जी चाहे बुला लो, लेकिन मैं बचूँगी नहीं। जरा तिब्बी को बुला लो, प्यार कर लूँ जी डूबा जाता है। मेरी बच्ची! हाय मेरी बच्ची।
□□□
