pandit moteraam kee daayaree munshi premchand ki story
pandit moteraam kee daayaree munshi premchand ki story

क्या नाम कि कुछ समझ में नहीं आता कि डेरी और डेरी फार्म में क्या सम्बन्ध! डेरी तो कहते हैं उस छोटी-सी सादी सजिल्द पोथी को, जिस पर रोज-रोज का वृत्तान्त लिखा करते हैं और जो प्रायः सभी महान पुरुष लिखा करते है और डेरी फार्म उस स्थान को कहते हैं जहाँ गायें-भैंसे पाली जाती हैं और उनका दूध, मक्खन, घी तैयार किया जाता है । ऐसा मालूम होता है, डेरी फार्म इसलिए नाम पड़ा कि जैसे डेरी में नित्य-प्रति का समाचार लिखा जाता है, उसी तरह वहाँ नित्य-प्रति दूध-मक्खन बनता है । जो कुछ हो, मैंने अब डेरी लिखने का निश्चय कर लिया है । कई साल पहले एक बार पुस्तकवाले ने मुझे एक डेरी भेंट की थी । तब मैंने उस पर एक महीने तक अपना हाल लिखा; लेकिन मुझे उसमें लिखने को कुछ सूझता ही न था । रात को सोने के पहले घंटों बैठा सोचता – क्या लिखूँ लिखने लायक कोई बात भी हो? यह लिखना कि प्रातःकाल उठा, मुँह-हाथ धोया, स्नान किया, तिलक-चन्दन लगाया, पूजन किया, यजमानों से मिला, कहीं साइत बाँचने गया; फिर लौटकर भोजन किया और सोया । तीसरे पहर फिर उठा, भंग छानी, फिर स्नान किया, फिर तिलक लगाया और कथा बाँचने चला गया: लौटकर फिर भोजन किया और सो गया । यह सब लिखना मुझे अच्छा न लगता था । इसलिए उस डेरी पर मैंने धोबी के कपड़ों और आमदनी-खर्च लिखकर उसे पूरा किया । जब से वह डेरी समाप्त हुई, तब से खर्च-आमदनी का हिसाब लिखना छोड़ दिया और धोबी के कपड़ों का हिसाब पंडिताइन के जिम्मे डाल दिया ।

लेकिन अब से फिर डेरी लिखना आरम्भ कर रहा हूँ इसका क्या कारण है? मैंने सुना है कि इससे आयु बढ़ती है, और चारों पदार्थ हाथ आ जाते हैं । इसलिए अब मैं फिर भगवान् का नाम लेकर और गणेशजी के सामने शीश झुकाकर डेरी लिखना आरम्भ करता हूँ । ओम शांतिः शांतिः शांतिः ।

क्या नाम कि आजकल साम्यवाद और समष्टिवाद की बड़ी चर्चा सुन रहा हूँ । साम्यवाद का अर्थ यह है कि सभी मनुष्य बराबर हों । तो मैं अपने साम्यवादी विद्वानों से जो इस विषय के आचार्य हैं, जैसे – श्री सपूर्णानन्द, आचार्य नरेन्द्रदेव जी और आचार्य श्रीप्रकाश जी से पूछना चाहता हूँ कि सब मनुष्य कैसे बराबर हो सकते हैं? आचार्य नरेन्द्रदेव जी मुझे क्षमा करें या न करें, मगर उनके जैसे तीन आचार्य मेरे पेट में समा सकते हैं, फिर यह कैसा साम्यवाद? इसका मतलब तो यही हो सकता है कि या मैं बामन रूप धारण कर लूंगा या वह विराट् रूप धारण कर लें ।

अच्छा अब दूसरी बात लीजिए । धन तो आप सबका बराबर कर देना चाहते हैं; लेकिन कृपा करके यह बतलाइए कि आप सबके पेट कैसे बराबर कर देंगे? आचार्य नरेन्द्रदेव जी एक-दो फुलके और एक आध घूंट दूध पीकर रह सकते हैं; मगर मुझे तो पूजा करने के बाद, मध्यान्ह, तीसरे पहर और रात को चार बार तर माल चकाचक चाहिए, जिसमें लड्डू हलवा, मलाई, बादाम, कलाकन्द आदि का प्राधान्य हो । अगर आपका साम्यवाद इसकी गारण्टी करे कि वह मुझे इच्छापूर्ण भोजन देगा तो मैं उस पर विचार कर सकता हूँ और अगर आप चाहते हों कि मैं भी दो फुलके और तोले भर दूध और दो तोले भाजी खाकर रहूँ तो ऐसे साम्यवाद को मेरा दूर ही से प्रणाम है । मैं धन नहीं मांगता, लेकिन भोजन आँतफाड़ चाहता हूँ अगर इस तरह की गारण्टी दी गई, तो वचन देता हूँ कि मैं और मेरे अनेक मित्र साम्यवादी बनने को तैयार हो जायेंगे ।

लेकिन एक भोजन ही से तो काम नहीं चलता । कपड़ा ही ले लीजिए । आपको एक कुरता और एक टोपी चाहिए । कुरते में एक गज से अधिक खद्दर न लगेगा । मैं लम्बी अँगरखी पहनता हूँ जिसमें सात गज से कम कपड़ा नहीं लगता । मैंने दर्जी के सामने बैठकर खुद कटवाया है और इसका विश्वास दिलाता हूँ कि इसके कम में मेरी अँगरखी नहीं बन सकती । फिर बारह गज का साफा, 5 गज की चादर ऊपर से । साम्यवाद इसकी गारण्टी ले सकता है? धन लेकर मुझे क्या करना है, लेकिन भोजन और वस्त्र तो चाहिए ही ।

आप कहेंगे, काम सबके बराबर करना पड़ेगा । मैं इसे स्वीकार करता हूँ अगर कोई सज्जन घड़ी भर पूजा करें, तो मैं दो घड़ी कर दूँगा; वह घड़ी भर स्नान करें तो मैं दो घड़ी पानी में रह सकता हूँ वह एक घड़ी शास्त्रार्थ करें तो मैं भोजन-पूजन आदि को छोड़कर दिन भर शास्त्रार्थ कर सकता हूँ । इसमें मैं किसी से पीछे हटने वाला नहीं ।

एक बात और । स्थान की मुझे परवाह नहीं; झोपड़ी भी हो तो मैं अपना निबाह कर सकता हूँ । लेकिन रेल-यात्रा करते समय अगर मुझे सबके बराबर जगह मिली, तो उस पटरी पर बैठने वालों को छोड़कर भागना पड़ेगा, क्योंकि मैं एक पूरी पटरी से कम में समा ही नहीं सकता । दूसरी बात यह है, कि मैं सन्नाटा मारकर नहीं सो सकता । निद्रा में एक विचित्र प्रकार का खर्राटा लेता हूँ । कभी कोई सज्जन मेरे समीप सोते हैं; तो उन्हें रात को उठकर भागना पड़ता है । इसलिए अपने हित के लिए नहीं दूसरों के हित के लिए मैं यह चाहूंगा कि मुझे एक पूरी कोठरी सोने को मिले । अगर साम्यवाद इसमें मीन-मेख निकाले तो मैं उनकी ओर आँख उठाकर भी न देखूँगा ।

इतना लिख चुका था कि पण्डिताइन आकर खड़ी हो गई और पूछने लगी – आज सवेरे-सवेरे यह क्या लिखने बैठ गये । सेठजी के लड़के की कुण्डली क्यों नहीं बना डालते? व्यर्थ शास्त्रार्थ करके अपना मूड क्यों दुखवाते हो?

मैं स्त्रियों का अपमान नहीं करता । उन्हें घर की देवी समझता हूँ । वे घर की लक्ष्मी है; लेकिन थर-गृहस्थी के सिवा उनसे किसी और बात में सलाह नहीं लेता । घर की लक्ष्मी को घर तक ही रखना चाहता हूँ । राजनीति, समाज, धर्म आदि के विषय से उन्हें क्या मतलब! स्त्रियों को सिर चढ़ाने की इन मुट्ठी, भर पढ़े-लिखे बाबुओं को जो सनक सवार हुई, मैं इसे पसन्द नहीं करता । पण्डिताइन भी एक दिन आधी बाँह की जम्पर पहने हुए निकलीं जिससे आधी छाती दिखाई दे रही थी, तो मैंने उसी दम वह जम्पर उतरवा कर छोड़ा । वह बहुत बिगड़ी; लेकिन मैंने भी रौद्ररूप दिखाया; आखिरकार जब मैं डंडा लेने दौड़ा, तो उन्होंने धीरे से जम्पर उतार दिया और मुँह फुला बैठी । मैंने कहा – चाहे मुँह फुलाओं, चाहे गाल फुलाओं, चाहे सारी देह फुलाकर कुप्पा हो जाओ, लेकिन इस भेष में मैं तुम्हें घर से निकलने न दूँगा । खैर, जब उन्होंने आकर मुझे डाँट बताई; तो मैंने कह दिया, ‘तुम यह बातें नहीं समझ सकतीं, जाकर अपना काम देखो ।’

पण्डिताइन बोली – तुमने चार अक्षर पड़ लिया तो बड़े समझदार हो गये? अभी एक जून चूल्हा न जलाऊँ, तो सारी समझदारी निकल जाये ।

कितना बेतुका जवाब था । मारो घुटना; फूटे आँख! लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं हुआ! उनसे मैं ऐसे जवाब सुनने का अभ्यस्त हो गया हूँ । मैंने जरा कड़ाई के साथ कहा – तुम्हारे मतलब की कोई बात नहीं है देवी नहीं तो मैं तुम्हें सुना देता ।

‘कोई कविताई करते होगे । यही तो तुम्हें रोग है ।’

‘कविता करने का रोग मुझे कब था? बे-बात की बात करती हो । मैं कविताई से इतनी दूर हूँ जितना पूरब पश्चिम से । यह वेश-भूषा, यह डीलडौल कवियों का है? तुम क्या जानो, कवि किसे कहते है? कवि वह है, जिसकी सूरत से कविता बरसती हो । बस, मैं कविताई नहीं कर रहा हूँ एक सामाजिक प्रश्न पर कुछ शंकाएँ उपस्थित करने का सौभाग्य-सिंदूर प्राप्त कर रहा हूँ ।

पण्डित के पाण्डित्यपूर्ण कथन से वह कुछ रोब में आ गई । लेकिन मैं थोड़ा-सा बुद्धू भी हूँ उसी वक्त मुझे हँसी आ गई । बस, पण्डिताइन लौट पड़ी और मेरे हाथ से लेख छीनकर बोली – मैं समझ गई, किसी को प्रेम-पत्र लिख रहे हो ।

तब नहीं तो अब बनी । मैं गंगा जल लेकर शपथ खा सकता हूँ कि मैंने आज तक न जाना, प्रेम किस चिड़िया का नाम है । मेरी प्रेमिका तर माल है । दूसरा प्रेम मेरी समझ में ही नहीं आता; लेकिन पण्डिताइन को न जाने क्यों मुझ पर सन्देह होता रहता है । प्रेमियों की दशा देखकर तो मुझे उन पर हँसी आती है; जब देखो, रो रहे हैं । ठण्डी सीसे खींच रहे हैं । न कुछ खाते हैं, न पीते हैं, खासे लकदक बने हुए है, फूँक दो तो उड़ जायें । इस तरह का प्रेम करके तो मैं तीसरे दिन संसार से विदा हो जाऊँ । लेकिन इस सन्देह का निवारण करना अब लाजिम हो गया ।

मैंने थोड़े से शब्दों में पण्डिताइन को साम्यवाद का तत्त्व समझाने की चेष्टा की । जब मैं अपना कथन समाप्त कर चुका, तो वह आंखें मटकाकर बोली – ऐ नौज, तुम्हारा साम्यवाद कुछ घास तो नहीं खा गये हो । जिसके बालवंश न हों, वे साम्यवाद की बात सोचें । मुझे तो भगवान ने पाँच-पाँच पुत्र दिए हैं, और छठवाँ आनेवाला है । मैं साम्यवाद के फेरे में क्यों पड़ूँ? ‘मेरे बराबर हो पड़ोसन, गोदा-रोटी खाय ।’ अच्छा साम्यवाद है । मेरे लाल जीते जी रहेंगे, तो माँग खायेंगे ।

वह और भी न जाने क्या-क्या अनाप-शनाप बकती रही; लेकिन उनकी बातों से मेरे मन में एक शंका उत्पन्न हो गई । साम्यवाद में कहीं सन्तान-निग्रह का बन्धन तो नहीं है? क्योंकि इस तरह का कोई सम्बन्ध हुआ तो फिर मेरा उससे कोई सम्पर्क न रहेगा । मैं इस विषय में किसी से समझौता न करूँगा । पीछे से थुक्का-फजीहत करना मुझे पसन्द नहीं । आचार्य मुझे स्पष्ट बतला दें, कि मुझे गृहस्थाश्रम का त्याग तो न करना पड़ेगा मैं इसकी स्वाधीनता चाहता हूँ कि जितनी सन्तानें आवें उनका स्वागत करूँ; क्योंकि मैं जानता हूँ जन्म देनेवाले भगवान हैं और पालन करने वाले भी भगवान हैं । मैं तो निमित्त-मात्र हूँ ।

2

क्या नाम है कि मैं पण्डित मोटेराम वल्द पण्डित छोटेराम स्वर्गवासी, साकिन विश्वनाथपुरी जो शंकर भगवान के तिरसूल पर बसी है, आज बम्बई में दनदना रहा हूँ । एक यजमान सेठजी ने तार भेजा – हम बड़े संकट में हैं, तुरन्त आओ । तार के साथ डबल तीसरे दर्जे का किराया भी । इसलिए हमने चटपट बम्बई को प्रस्थान कर दिया! अपने यजमान पर संकट पड़े, तो हम कैसे रुक सकते थे! सेठजी एक बार काशी आये थे । वहाँ मैं भी निमंत्रण में गया था । वहीं मेरी उनकी जान-पहचान हुई बात करने में मैं पक्का फिकैत हूँ । बस यही समझ लो कि मुझे निमंत्रण भर दे दो, फिर मैं अपनी बातों से ज्ञान घोलता हूँ वेदों-शास्त्रों की ऐसी व्याख्या करता हूँ कि क्या मजाल जो यजमान उल्लू न हो जाये । योगासन, हस्तरेखा, सन्तानशास्त्र, वशीकरण आदि सभी विद्याएँ, जिन पर सेठ-महाजनों का पक्का विश्वास है, मेरी जिह्वा पर हैं । अगर पूछो कि क्यों पण्डित मोटेरामजी शास्त्री, आपने इन विद्याओं को पढ़ा भी है? तो मैं डंके की चोट कहता हूँ मैंने कभी नहीं पढ़ा । इन विद्याओं का क्या रोना, हमने कुछ नहीं पढ़ा, पूरे लंठ है, निरक्षर महान, लेकिन फिर भी किसी बड़े से बड़े पुस्तक चाटू, शास्रघोंटू, पण्डित को सामना करा दो, चपेट न दूँ तो मोटेराम नहीं । जी हाँ, चपेट दूँ, ऐसा चपेटूँ ऐसा रगेदूँ कि पण्डित जी को भागने का रास्ता न मिले! पाठक कहेंगे; यह असम्भव है । भला एक मूर्ख आदमी महान् पण्डित जी को कैसे रगेदेगा मैं कहता हूँ प्रियवर! पुस्तक चाटने से कोई विद्वान नहीं हो जाता । जो विद्वान आज गोबर और गोमूत्र को पवित्र समझता है, जो देवपूजा को मुक्ति का साधन समझता है, वह विद्वान कैसे हो सकता है? मैं खुद यजमानों से यह सब कृत्य कराता हूँ । निःसन्देह जानता हूँ हलवा और कलाकन्द किसी आत्मा के पेट में नहीं, मेरे पेट में जाता है, फिर भी यजमानों को छूता हूँ तो इसलिए कि मेरी यह जीविका है । जीविका नहीं छोड़ी जाती, और इसलिए यजमान खुद बेवकूफ बनना चाहता है, पाँच पैसे का गऊदान करके भवसागर पार उतरना चाहता है, तो मुझे क्या कुत्ते ने काटा है जो कहूँ कि यह सब मिथ्या है । सरासर मिथ्या है । आती हुई लक्ष्मी को कौन दुतकारता है लेकिन पण्डितों के बीच में दूसरी बात हो जाती है । वहाँ मुझे अपनी जीविका का डर नहीं रहता और मैं भिगो-भिगोकर लगाता हूँ कभी दाहिने, कभी बायें, चौंधिया देता हूँ साँस नहीं लेने देता । बस पण्डितों के पास इसके सिवा और जवाब नहीं रहता कि तुम नास्तिक हो ।

मगर मैं अपने विषय से बहककर कहाँ जा पहुँचा । जब मैं बम्बई चलने को तैयार हुआ, तो पण्डिताइन रोने लगीं । कहने लगी, बताओ कै दिन में आओगे । दो-तीन दिन में जरूर से लौट आना । मैं तो उस वक्त बता दूँ कि दो दिन तो पहुँचने में लग जायेंगे, तो फिर वह मेरा पिण्ड न छोड़ती । इसलिए बड़े प्रेम भरे शब्दों में कहा – प्रिये, मेरा जी तुम्हीं में लगा रहेगा । खाऊँगा तो तुम्हारे कर कमलो की गुदगुदी रोटियाँ और पतली दाल याद आयेगी । पानी पिऊंगा तो तुम्हारे पपड़ियाये हुए अधरों का ध्यान बना रहेगा । सोते-जागते, उठते-बैठते, बस तुम्हारे ही पास मन मँडराता रहेगा । इससे उन्हें कुछ ढांढस हुआ । लेकिन क्या नाम कि स्त्री का हृदय कुछ अटपटा होता है । एकाएक बोल उठी – मुझे तुम्हारे ऊपर विश्वास नहीं आता । कौन जाने, तुम वहाँ कैसे हो जाओ । कहीं तुम कुछ गड़बड़ न कर बैठो । मैंने तुरन्त समझाया – प्राणप्रिये, मुझे तुम्हारे प्रेम में पगे लगभग 45 साल हुए । क्या तुम समझती हो कि इतने दिनों में जो रंग जमा है, वह दो-चार दिन में फीका पड़ जायेगा? कहीं तुम्हारा ख्याल है? बोली – क्या जाने भाई, तुम मर्दों का हाल कौन जाने? यहाँ तो ऐसी मीठी-मीठी बातें करते हो, वहाँ जाकर क्या जाने क्या कर बैठो? मैं वहाँ थोड़ी बैठी रहूँगी कि तुम्हारी देखभाल करती रहूँ । मैं तो एक ही सरियत पर जाने दूँगी कि तुम गंगाजल हाथ में लेकर कहो कि वहाँ कुछ गड़बड़-सड़बड़ न करूँगा । मैं मन में हँसा और गंगाजल लेकर कसम खाई । तब जाके पण्डिताइन का चित्त शान्त हुआ ।

चलने को तो चला; लेकिन मेरा हृदय भी काँपता था । प्रयाग तक मेरा मन ठिकाने रहा; लेकिन तब फिर भी बम्बई का कहीं पता न चला, तो मुझे रोना आ गया । भगवान! यह तो कालापानी है । दिनभर चला, बम्बई नदारद । रात-भर चला, बम्बई नदारद । समझ गया कि काशी में मरना न बदा था । मजे से गंगास्नान करता था, विश्वनाथ के दर्शनों का पुन्न लूटता था और धेली बारह आने कहीं न कहीं से पीट ही लाता था और यहाँ गाड़ी में बैठे न जाने किस लोक में चले जा रहे हैं । इतनी दूर तो चन्द्रमा भी न होंगे । मुझे भ्रम हो गया कि यात्री और रेल कर्मचारी सब मुझे धोखा दे रहे हैं । बम्बई जरूर पीछे छूट गई । बारे, कोई दस बजे बम्बई का नाम सुना । जान आई । देखा, तो यजमान सेठजी मेरा स्वागत करने के लिए खड़े थे । उन्होंने पालागन किया; मगर असीस कौन देता है, यहाँ तो चोला भसम हो रहा था । मैंने ब्रह्मतेज से गरजकर कहा – तुमने मुझे लिखा क्यों नहीं कि बम्बई लंका के पास है? अभी तक जल नहीं ग्रहण किया । प्राण छटपटा के निकलने जा रहा था; बारे मैंने योगबल से रोक लिया । मैं झूठ बोल रहा था । मैं रास्ते भर फलाहारी खाता रहा और रेल से उतरकर पानी पीता चला आ रहा था; लेकिन ऐसे यजमानों के सामने अपने नेम का डंका बजा देना फलदायक होता है । सेठजी ने दौड़कर मेरी अधारी कंधे पर रखी और लगे घिघियाने – महाराज, क्षमा किया जाये, मैं क्या जानता था कि महाराज को बम्बई… ।

मैंने फिर डाँटा – महाराज को बम्बई से क्या सम्बन्ध? अपने लोग तीर्थस्थानों में रहते हैं कि राक्षसों के देश में? यहाँ वह रहे, जो धन का लोभी हो । हम ब्राह्मणों को अपना धर्म प्यारा है ।

इस डाँट से सेठजी की नानी मर गई । बाहर आये तो मोटर खड़ी थी । बैठकर यजमान के घर चले । वाह रे बम्बई वहाँ तो आदमी पागल हो जाये । सड़कें न जाने क्यों इतनी चौड़ी बनाई हैं । हमारी चौखंभेवाली कितनी गुलजार गली है कि वाह! यहाँ की सड़कें हैं कि बालेमियाँ का मैदान है । मगर बम्बई का हाल फिर लिखेंगे । इस वक्त तो सेठजी के संकट की कथा कहनी है, जिसके लिए हम इतनी दूर से पुलाये गये हैं । संकट यह कि सेठजी के पौ-बारह हो जायें । मामला गहरा है, कोई डेढ़ लाख का । मैंने यह वृत्तान्त सुनकर ऐसा गम्भीर मुँह बनाया, मानो सब कुछ मेरे हाथ में है । फिर बोला – सेठजी, आप जो है सो मेरे यजमान हैं और मुझे जो कुछ विद्या आती है, उसमें कुछ उठा न रखूंगा । और यह आप जानते हैं कि मुझे किसी बात से ममता नहीं रही । ब्राह्मण को धन से क्या प्रयोजन? धन चाहता तो अब तक लाखों बटोर लेता । कितने यजमान मेरे अनुष्ठानों से करोड़पति हो गये, लखपतियों की तो गिनती ही नहीं । मैं वही ब्राह्मण का ब्राह्मण बना हूँ । तो बात क्या है, हम ममता को पास नहीं आने देते । साढ़े सात सौ कोस से ही ललकारते हैं, खबरदार जो इधर मुँह किया! हाँ बात इतनी है कि अनुष्ठानों में पैसे खर्च होते हैं । अगर यही अनुष्ठान विधिपूर्वक करूँ तो डेढ़-दो सौ से कम न खर्च होंगे । यह समझ लीजिए ।

लेकिन मैं इस 65 साल की अवस्था में भी पोंगा ही रहा । मैंने डेढ़-दो सौ अपनी समझ में बहुत कहे थे । इससे ऊँचे जाने की मुझे हिम्मत ही न पड़ी । कभी इतना बड़ा शिकार तो फँसा नहीं था । उसके दाँव-घात क्या समझता? सेठजी का मुँह लटक गया । उन्होंने दस-बारह हजार का अनुमान किया था । डेढ़-दो सौ सुनकर मेरी सारी प्रतिष्ठा उनके हृदय पट से निकल भागी । क्या स्वर्ण संयोग दिया था भगवान् विश्वनाथ ने लेकिन तकदीर खोटी है तो उनका क्या बस? दस हजार कह देता तो जन्मभर के लिए अयाच्य हो जाता । बोलते-बोलते बोला क्या? डेढ़ दो सौ! धत् तेरे पोंगापन का सत्यानाश हो! अब तो यही जी चाहता है कि जाकर समुद्र में कूद पडूँ । उसी दिन एक दूसरे घोंघानाथ शास्त्री के नाम तार गया । अब यह पूरा आकर इन सेठजी को मूँड़ेगा । 20 हजार से कम न लेगा; लेकिन अब पछताने से क्या होता है! फिर भी मैंने सोचा, बला से मैं नहीं पा रहा हूँ । कोई दूसरा क्यों ले जावे? मेरा क्या? यह धर्म नहीं है कि अपने यजमान की इन लुटेरों से रक्षा करूँ? बोला, मैंने केवल सामग्री का मूल्य दिया । दक्षिणा मैं लेता नहीं । एक हजार रुपये विप्रो की दीक्षा भी समझ लीजिए ।

सेठ बोले – उससे कोई मतलब नहीं, वह तो यहाँ से अलग दिया जायेगा । आपकी सामग्री तो कुल (200) की होगी?

मैंने कहा – बस, इससे अधिक नहीं । हाँ, ऐसे लोगों को भी जानता हूँ जो इसी अनुष्ठान के लिए 10 हजार, 15 हजार तक ले लेंगे । लगेगा तो ढाई-तीन सौ, शेष अपने पेट में ठूँस लेंगे । इसलिए ऐसे धूर्तों से सचेत रहिएगा ।

लेकिन सेठ के कण्ठ तले यह बात न फंसी । बोला – यह आप क्या कहते हो शास्त्रीजी? गुड जितना डालो उतना ही मीठा पकवान होगा । आपका अनुष्ठान (200) का है । आप कीजिए । लेकिन बिना बड़े अनुष्ठान के मेरा काम न चलेगा ।

अब भी मुझे अपना उल्लू फाँसने का मौका था । कह सकता था, सेठजी, आपका काम तो छोटे अनुष्ठान से ही निकल सकता है, लेकिन आपकी इच्छा है तो मैं महा-महा मृत्युंजय-पाठ और ब्रह्म-प्रवीक्षक क्रिया भी कर सकता हूँ । हाँ, उसमें कोई साढ़े तेरह हजार का खर्च है; मगर यह तो अब सूझ रही है । उस वक्त अक्ल पर पत्थर पड़ गया था । मेरी भी विचित्र खोपड़ी है । जब सूझती है, अवसर निकल जाने पर । हाँ, मैंने यह निश्चय कर लिया कि पंडित घोघानाथ को बिना दस-पाँच घिस्से दिये न छोडूँगा । या तो बेटा से आधा रखा दूंगा या फिर यही बम्बई के मैदान में हमारी उनकी ठनेगी । वह विद्वान होंगे । यहाँ सारी जवानी अखाड़े में कटी है । भुरकुस निकाल दूँगा ।

अपनी इस पिछिल-सूझता पर पछता रहा था कि डाकिया एक तिकोना सा बैरंग लिफाफा लाकर मुझे दे गया । समझ गया, पण्डिताइन की कृपा है । आज यह पत्र हाथ में लेकर मुझे सचमुच उनकी याद आ गई । बेचारी ने मेरे साथ 45 साल काट दिये, और मैं बराबर उसे बातों में टालता रहा । आँखें सजल हो गई । पत्र खोला । लिखा था – स्वस्ति श्री सर्व उपमा योग… सो तुम जाय के बम्बई में बैठि हौ, कान में तेल डारिकै । हमका रोज सपना दिखात है । डरन के मारे नींद नहीं आवति है । कतों तुम कुछ गडूबीड् न करि बैठो, यही चिन्ता में हमारा परान सूखा जात है । तुम कहिहौ हम 65 साल के होए गएन, अब का जन्म भर गड़बड़े करत रहिबे । मुला सुनित हे, बैदन सब अइस-अइस बिरवा निकारेन हैं कि आहिका खायके मनई बौराय जात है । एक बैद झाँसी माँ है, एक और कतों है । तुम्हारा हाथ जोरित है, तुम कौनो औखद न खायो । तुम गंगाजल उठाय के जौन परन किह्यौ आहिका निबाह करै का परी । हम तुमका साँड़ न बनै देब ।

लीजिए साहब, अब मैं साँड़ हो गया । कमर सीधी होती नहीं, डेढ़ सेर मलाई भी नहीं पचाये पचती, और वहाँ पण्डिताइन मुझे साँड़ बना रही हैं । सो यहाँ भी अपनी ही भूल है । मैं पण्डिताइन के सामने अपनी जवाँमरदी और पुरुषार्थ की डीग मारा करता हूँ । वह गऊ क्या जाने, यह लबाड़िया है । मैं जो कुछ कहता हूँ उसे ब्रह्मवाक्य समझ बैठती है और उसका यह फल है । इस यात्रा में संभवतः मेरी दृष्टि कुछ सूक्ष्म हो रही है ।

3

क्या नाम कि जब मैंने देखा कि अब तो मुझसे भूल हो ही गई और बहुत खींचतान करने पर भी दो सौ से बेशी न मिलेंगे, तो मैंने सोचा, लाओ और कुछ न सही तो इसके सौ-पचास रुपये भोजनों में ही बिगाड़ दो । यह भी क्या समझेगा कि किसी से पाला पड़ा था । बस, मैंने शंकर भगवान् का सुमिरन किया और विनती की – हे उमापति, अब तुम्हीं मेरी रक्षा करो, मैं तो अब प्राणों से हाथ धोकर भोजन पर जुटता हूँ । नाश्ता आया तो मैंने कह दिया – मुझे आपके महाराज के हाथ की बनी चीजों में कोई स्वाद नहीं आता, मुझे तो आप सामग्री दे दीजिए, मैं अपना भोजन आप पका दूंगा । भंडारी ने कहा – जैसी आपकी इच्छा, जो आज्ञा हो वह हाजिर करूँ । मैंने नाश्ते का नुस्खा बताया – सवा सेर ताजा मक्खन, आध सेर बादाम, आध सेर पिश्ते, आधा तोला केसर सेर भर सूजी और सेर भर शक्कर । भंडारी मेरा मुँह ताकने लगा । मैंने कहा – मुँह क्या ताकते हो, क्या बाँधकर ले जाने को माँगता हूँ? जाकर चटपट लाओ । बस मैंने थोड़ी भंग का गोला चढ़ाया और विश्वनाथ का नाम लेकर हलवा बनाने बैठ गया । शंकर की दया से ऐसा स्वादिष्ट पदार्थ बना कि क्या कहूँ । पालथी मारके जो बैठा, तो आधा घंटे में साफ । मक्खी के लिए भी न बचा । भंडारी के होश उड़ गये । दोपहर को मैंने फिर पूरियाँ पकाई । आधोआध मोयन देकर । रात को कुछ खाने की इच्छा न होने पर भी मैंने सवा सेर मलाई बढ़ा ली ।

लेकिन अब यह जवानी तो है नहीं कि ईंट-पत्थर जो पेट में पहुँच जाय, वह सब भस्म । तीसरे ही दिन मुझे उदर-विकार के लक्षण दिखे । मैंने सोचा – यहाँ किसी से कहता हूँ तो सब यही कहेंगे कि ब्राह्मण की जात, खाने के पीछे प्राण दे रहा है । इसलिए मुहल्ले ही में एक डॉक्टर के पास कोई पाचक-बटी लेने चला गया । बड़ा भारी मकान, मोटर, फोन । मैंने अपना परिचय दिया तो डाक्टर ने मुझे गौर से देखा और बोले – काशी से आता है?

मैंने कहा – हाँ साहब, विश्वनाथजी आपको प्रसन्न रखें, यहाँ कुछ भोजन प्रकृति के अनुकूल न मिलने के कारण पाचन भूषित हो गया है । कोई औषधि प्रदान कीजिए ।

डॉक्टर मुझे एक अलग कमरे में ले गया और एक मेज़ पर लेटाकर मेरा पेट टटोलने लगा । फिर सीने की परीक्षा की, पीठ ठोंकी, आँखें देखी, जीभ निकलवाकर परीक्षा ली । इस तरह कोई आध घंटे तक मेरी दलेल करने के बाद बोला – वेल पंडितजी, आपको कुछ टी.बी. का आसार मालूम देता है । आपको उसका दवाई करना होगा । हम टी.बी. का इसपिसलिस्ट हैं । आपको अच्छा करने सकता है; पर आपको अभी एक दूसरा डॉक्टर के पास अपने खून का मुलाहजा कराना होगा । बिना खून देखे हम कुछ नहीं कर सकता । हम आपको चिट्ठी देता है । आप डॉक्टर सूबेदार के पास जाये । वह चौपाटी में रहता है । हम चिट्ठी देता है । आपके ब्लड का मुलाहजा करके हमको लिखेगा ।

मेरे होश फाखता हो गये । पंडिताइन की याद आई । भगवान, क्या बम्बई में मेरी मिट्टी की दुर्दशा करोगे । आया था कि कुछ कमाकर जाऊँगा; सो यहाँ जान पर बीता चाहती है । अभी काशी से चला हूँ तो कोई बात न थी । खासा साठा-पाठा बना हुआ था कि बम्बई का पानी खराब है, और कुछ नहीं । दुबे बिजयानन्द ने कहा था, बम्बई का पानी खराब है, जरा संभलकर रहना । लेकिन यह क्या जानता था कि दस-पाँच दिन में ही सिल धरे लेता है; लेकिन अब पछताये क्या होता है? चलो, लहू भी दिखा लो, और फिर डर किस बात का है । मर ही तो जायेंगे । यहाँ अमर कौन है । जरा कच्ची गिरस्ती है; यही चिन्ता है । अगर जानता कि अन्त इतना निकट है तो पिछले दो लड़के क्यों होते और तीसरा गर्भ क्यों रहता । लेकिन हरि की इच्छा । तुलसीजी ने कहा भी तो है –

सुत बनतादि जानि स्वारथरत न करु नेह सबही ते,

अतुंहँ तोहि तजेंगे पामर, तू न तले अबही ते ।

मैं यहाँ से चला तो दिल बहुत छोटा हो गया था; लेकिन डॉक्टर साहब ने तुरन्त टोका – हमारा फीस 32 रु. हुआ सेठजी के पास बिल भेज देगा न?

अगर अब तक यमराज न आये थे, तो अब आ गये, 32 रु फीस! जो उमर में कभी नहीं दी! बैद, डॉक्टर को अमीर लोग पैसा देते है । हम शंकर के उपासक तो केवल आशीर्वाद से काम निकालते हैं । काशी में जब कभी काम पड़ता था, डॉक्टर चौधरी, डॉक्टर बनर्जी, डॉ. सेठ आदि जिसके पास चला गया, दवाई ले आया, ऊपर से रुपये-आठ आने विदाई झटक लाया और यहाँ जरा सी परीक्षा ली तो 32 रु. फीस । आँखों तले अँधेरा छा गया; लेकिन फिर सोचा, अब तो मर ही रहे हो, रुपये पैसे के माया-मोह में क्यों पड़े हो । 32 रु. खर्च हुए तो हुए, मालूम तो हो गया कि तपेदिक हो गया है । नहीं यों ही एक दिन चल देते, किसी को पता न चलता । दवा-दारु करने की नौबत ही न आती । भला, दवा करने का अवसर मिल गया । और आदमी कमाता ही किस लिए है । लेकिन यह पूछ लेना आवश्यक मालूम हुआ कि डॉ. सूबेदार को तो कुछ न देना पड़ेगा? अतएव मैंने इस विषय का प्रश्न किया ।

डॉक्टर साहब जोर से हँसे । बोले – तुम काशी का विद्वान लोग बड़ा मजाक करता है । काशी के एक पंडित को दक्षना देने से सब पंडित तो नहीं परसन हो जाएगा । बोलो?

हमने कलेजा थामकर पूछा – तो उनकी क्या फीस होगी?

‘उसका फीस केवल 10 रु है ।’

मैंने मन से कहा – चलो मन, यह 10 रु की गम खाओ । बम्बई में जो कमाना है, वह सब देकर भी प्राण बचे तो समझना चाहिए, नया जीवन पाया । नहीं यार बैठे-बैठे टें हो जायेंगे, कोई रोनेवाला भी न मिलेगा । उस वक्त ऐसा वैराग्य सवार हुआ कि सब छोड़-छाड़कर निकल भागूं, कबीर का वह पद याद आया जिसे पढ़कर मैं कभी-कभी हँसा करता था । धूर्तताई में जीवन कट गया । अब इस काया की क्या दुर्दशा होगी भगवान –

दिवाने मन भजन बिना दुख पैहो ।

पहिला जनम भूत का पैहो, सात जनम पछतैहो;

कीरा पर के पानी पैहो, प्यासन ही मरि जैहो ।

दूजा जनम सुवा का पैहो, बाग बसेरा लैहो;

टूटे पंख बाज मँडराने अधफड़ प्रात गँवैहो,

बाजीगर के बानर होइहौ, लकड़िन नाच नचैहो;

उँच-नीच के हाथ पसरिहौ, माँगे भीख न पैहो ।

तेलिन के दर बैला होईहौ, आँखिन ढाँप ढपैहो;

कोस पचास घरै माँ चलिहौ, बाहर होन न पैहो

पाँचवाँ जनम ऊँट का पैहो, बिन तोले बोझ लदैहो;

बैठो जो उठन न पैहो, धुरच-धुरच मारि जैहो ।

धोबी घाट के गदहा होइहौ, कटी घास न पैहो;

लादी लादि आपु चढ़ बैठे लैके घाट पहुँचैहो ।

आखिर यहां कहना पड़ा कि हाँ सेठजी के पास बिल भेज देना । फिर वहाँ का पता पूछता हुआ डॉक्टर सूबेदार के पास पहुँचा । कोई दस बज गये थे, पेट में मीठा-मीठा दर्द होने लगा था; लेकिन सोचा, इस झमेले से निबट लो, फिर विश्वनाथजी की जैसी इच्छा होगी, वह तो होगा ही ।

डॉ. सूबेदार युवक से लगते, कोट-पैण्ट से लैस । मैंने पत्र जो दिया, आपने ले जाकर भीतर के कमरे में लेटा दिया और ऐसे जोर से मेरी बाँह में सुई चुभो दिया कि मैं ऐंठेकर रह गया । बाँह में से रक्त निकल पड़ा । उसने एक शीशे की नलकी में ले लिया और मेरी बाँह में कुछ पोतकर एक तीसरी कोठरी में जाकर न जाने क्या करता रहा । फिर आकर बोला – वेल पंडितजी, आपके ब्लड में टी. बी. का जर्म दिखाई देता है । आपको किसी पहाड़ पर जाना होगा, और वहाँ आराम से रहना होगा । आपको पढ़ना-लिखना बन्द करना होगा, लेकिन अभी हम कुछ ठीक-ठीक नहीं कह सकता, आप डॉ. घोड़ेपुरकर के पास जाओ, वह आपका यूरीन देखेगा । उसका रिपोर्ट लेकर तब हम अपना रिपोर्ट देगा । तब आप डॉक्टर लम्पट के पास जायेगा । फिर वह जो कुछ कहेगा, वह आपको करना होगा ।

मेरे बदन में आग लग गई । जी में तो आया, मारूँ गोली इन डॉक्टरों को और चलकर दो पैसे की हड़ मँगवाकर उसकी फंकी फाँक लूं । मरना ही बदा है, तो सारी दुनिया के डॉक्टर भी तो नहीं जिला सकते; लेकिन जान का लोभ बड़ा बलवान होता है । उनकी चिट्ठी लेकर पता पूछता हुआ चला डॉक्टर घोड़ेपुरकर के पास । इसने मुझसे एक चोंगे में लघुशंका करवाई और बड़ी देर तक न जाने क्या करता रहा । फिर मुझे रिपोर्ट लिखकर दी और कहा – डॉ. सूबेदार के पास जाइए । सूबेदार के पास फिर पहुँचा, तो तीन बज गये थे । आपने अपनी रिपोर्ट दी, तो आया डॉ. लम्पट के पास । डॉक्टर लम्पट ने दोनों रिपोर्टों को बड़े आन से देखा और बोले – मेरा अनुमान ठीक था पण्डितजी, आपको टी. बी. हो गया है ।

मैंने सजल-नेत्र होकर पूछा – तो मैं मर जाऊँगा?

‘नहीं, नहीं, हम आपको मरने नहीं देगा । आपको पहाड़ पर रहना होगा । अच्छा भोजन करने से आप बच सकता है । आपको अण्डों का सेवन करना होगा ।’

मैंने कानों पर हाथ रखकर कहा – क्या कहा, अण्डों का? मैं अण्डे हाथ से नहीं छू सकता, खाने की कौन कहे!

‘ओह! यह सब आरथोडॉक्सी यहाँ नहीं चलेगा । तुमको अण्डे खाना होगा ।

‘अण्डे मैं किसी तरह नहीं खा सकता ।’

‘तुम मर जायेगा’

‘कोई चिन्ता नहीं ।’

‘हम दवाई देता है, इसे तो पी सकता है?’

‘न! अब न कोई दवा खाऊँगा; न किसी डॉक्टर के पास जाऊँगा ।’

यह कहकर मैं सेठजी की कोठी पर लौट आया । दिन-भर जो कुछ भोजन न किया था, तो भूख चमचमा उठी थी । बूटी छानी, शौच गया और फिर खूब डटकर भोजन किया ।

सहसा सेठजी घबड़ाये हुए आये और पंडितजी से बोले – क्या आपका मुलाहजा किया था लम्पट साहब ने? आपको टी. बी. बताते हैं!

मैंने कहा – वह आपके घर आने का पुरस्कार है, और क्या!

‘आप आज ही काशी चले जाइए ।’

‘मैं बिना अनुष्ठान पूरा किये नहीं जा सकता ।’

‘नहीं, नहीं, कोई दरकार नहीं, आप इसी नौ बजे की गाड़ी से चले जाएँ ।’

मैंने उस की घबराहट देखी तो समझ गया, वह ब्रह्महत्या से डर रहा है । बस फिर क्या था । मेरी लह गई ।

मैंने कहा – बिना अनुष्ठान पूरा किये लौट जाने से मेरे प्राणों का भय है । इसका उपचार करने में कम से कम एक हजार का खर्च हैं । मैं वह कहाँ से लाऊँगा । फिर मरने से क्या डरना! यही मर जाऊँगा, तो क्या चिंता!

सेठजी काँपते हुए बोले – नहीं पण्डितजी, आपका जो कुछ खर्च पड़े, वह लीजिए और आज ही चल दीजिए ।

बस मुनीम बुलाये गये और फिर सौ-सौ के दस नोट मेरे चरणों पर रख दिये । मैंने विश्वनाथजी को धन्यवाद दिया, नोट गाँठ में किये और टी. बी. को ऐसा भूला कि वह भी मुझे भूल गया ।

4

क्या नाम कि मैं जहाँ जाता हूँ वहीं कुछ न कुछ लोग मेरे पीछे पड़ जाते हैं, और आ-आकर मुझे दिक करते हैं । बम्बई में भी भले आदमियों से गला नहीं छूटा । यह तो होता नहीं कि आकर एक मोहर मेरे चरणों पर रखें और तब अपनी कथा सुनायें । बस आकर लगते हैं अपनी कथा सुनाने चाहते हैं कि मैं सेंत-सेंत में उन्हें अनुष्ठान बता दूँ । यहाँ उल्लू नहीं हैं। सुनने को सुन लेते हैं, लेकिन अनुष्ठान बताने के लिए पचासों बार दौड़ाते हैं, ऐसा पदाते हैं, कि वह भाग खड़ा होता है । जब कोई डॉक्टर सेंत-मेंत में किसी रोगी को नहीं देखता, कोई वकील सेत में कोई मिसिल नहीं छूता तो में क्यों सेंत में अपनी विद्या लुटता फिरूँ वह विद्या क्या है, यह मैं जानता हूं उसी तरह जैसे वकील और डॉक्टर अपनी विद्या को जानते हैं; लेकिन भाई, एक-दूसरे का पर्दा क्यों खोलो । संसार उसका है, जो उसे बेवकूफ बनाये, जिसे यह कला नहीं आती, वह कौड़ी का तीन है ।

कल भंग-बूटी से निपटकर मलाई पर हाथ साफ कर रहा था कि एक सज्जन आकर बैठ गये । कोट, पैंट, कॉलर, बूट, हैट, खासे साहब बहादुर थे । चेहरा लटका हुआ, मानो पत्नी मर गई हो । बोले – आपका नाम पंडित मोटेराम शास्त्री है?

मैंने कहा – हाँ, मेरा ही नाम है । कहिए, आपकी क्या सेवा करूँ?

साहब बहादुर ने जेब से रुमाल निकाला और सिर का पसीना पोंछते हुए कहा – मैं बड़े संकट में पड़ गया हूँ महाशय! कुछ अक्ल काम नहीं करती । अब आप ही बेड़ा पार लगाइए, तो लगे ।

मेरे हृदय में गुदगुदी हुई । यह तो कोई शिकार मालूम होता है । बोला – भगवान की दया से सारी बाधाएँ दूर हो जायेगी, कुछ चिन्ता मत कीजिए ।

‘क्या कहूँ महोदय, कहते संकोच हो रहा है ।’

‘संकोच की कोई बात नहीं, सन्तान तो मेरी मुट्ठी में है । कहिए तो बालकों से आपका दर भर दूँ । बस एक अनुष्ठान…’

‘जी नहीं, बालकों से तो मुझे प्रेम नहीं । मैं सन्तान विरोधी हूँ ।’

‘अच्छा, तो क्या धन की इच्छा है?’

‘धन की इच्छा किसे न होगी; लेकिन इस वक्त मैं इस हेतु से आपकी सेवा में नहीं आया था ।’

‘तो कहो ना? पौष्टिक अनुष्ठानों की भी मेरे पास कमी नहीं । चूर्ण, अवलेह, गोली, भस्म, आसव, क्वाथ, किसी चीज के सेवन करने की आवश्यकता नहीं, बस पाँच बार उस मंत्र का जाप करके सो जाइए, फिर उसकी करामात देखिए ।’

‘मैं इस समय एक दूसरे ही काम से सेवा में आया था ।’

‘मुझे कुछ निराशा होने लगी । हत्थे पर चढ़नेवाला नहीं जान पड़ता । फिर भी मैंने दिलासा दिया – जो इच्छा हो वह निस्संकोच कहो ।

उसने पूछा – आप उसमें अपना अपमान तो न समझेंगे?

अब मेरे कान खड़े हुए, उत्सुकता और बढ़ी ।

‘अपमान की बात होगी, तो अवश्य अपमान समझूँगा ।’

‘बात यह है कि कल संध्या समय मेरे माता-पिता देश से आ गये हैं ।’

‘बहुत अच्छी बात है, तुम्हें उनका आदर-सत्कार करना चाहिए ।’

‘लेकिन करूँ कैसे यह समझ में नहीं आता । कल से उन्होंने भोजन नहीं किया!’

‘भोजन नहीं किया! यह तो बड़ा अनर्थ है । कुछ उदर विकार हो गया है? मैं आयुर्वेद भी जानता हूँ ।’

‘नहीं-नहीं शास्त्रीजी, वह तो आपसे भी भारी डीलडौल के हैं ।’

‘भारी डीलडौल के लोग क्या बीमार नहीं पड़ते?’

पड़ते होंगे; पर फादर कभी बीमार नहीं पड़ते और मदर के सिर में तो कभी दर्द भी नहीं हुआ ।

‘तो वह और आप, दोनों भाग्यवान है ।’

‘समस्या यह है कि वे दोनों ही बड़े नेम से रहते है ।’

बड़े हर्ष की बात है । आप वास्तव में भाग्यशाली हैं ।’

‘लेकिन वह मेरे खानसामा के हाथ का भोजन तो नहीं कर सकते!’

‘तो एक-दो दिन तुम्हारी स्त्री ही भोजन पका लेगी तो क्या छोटी हो जायेगी? सास-ससुर की सेवा करना ही स्त्री का परम धर्म है ।’

मैं इसे नहीं स्वीकार करता, महोदय । बुरा न मानिएगा । आप सौ बरस की पुरानी बात कह रहे हैं । सास-ससुर को ऐसी जरा-जरा-सी बातों के लिए पुत्र और पुत्रवधू को संकट में न डालना चाहिए । समय बहुत आगे बढ़ गया है । अब ऐसे माता-पिता के लिए स्थान नहीं रहा ।’

‘यह आप बहुत ठीक कह रहे हैं; लेकिन जब माता-पिता दो ही चार दिन के लिए आये हैं, तो स्त्री को थोड़ा-सा कष्ट भी हो तो सह लेना चाहिए ।’ इस पर सज्जन ने कुछ भौंहें सिकोड़कर कहा – लेकिन भोजन पकाने का उन्हें बिलकुल अभ्यास नहीं है, श्रीमान! जब कभी खानसामा बैठा रहता है, तो हम लोग होटल में खा लेते हैं । एक बार घर में रुपये न थे, और होटल में नगद दाम देना पड़ता है; इसलिए स्त्री ने सोचा, कुछ पका लें, तो साहब, आटा ऐसा हो गया जैसे गाढ़ा दूध और चावल जलकर कोयला हो गया । उस पर तीन दिन श्रीमतीजी के सिर में दर्द होता रहा । हारकर हमें फाका करना पड़ा । तो साहब, फिर वह विपत्ति नहीं मोल लेना चाहता । न-जाने क्यों होटल में खाना खाते इन लोगों की नानी मरती है । मैं इसे उनकी कोरी जिद समझता हूँ । माँ-बाप हैं, क्या कहूँ । क्या आप इतनी कृपा न करेंगे कि एक-दो दिन जब तक वह लोग यहां रहें, उनका भोजन पका दें आपको कष्ट तो होगा, लेकिन आप ब्राह्मण हैं और ब्राह्मण को परोपकार के लिए अपने कष्ट की परवाह नहीं होती ।

मेरा खून खौल उठा । जी में आया, उठा के पटक दूँ लेकिन मैंने सब्र किया । क्या कदर की है आपने ब्राह्मण की! और मजा यह कि इस मूर्ख को मुझसे ऐसी बात कहते, संकोच भी न हुआ । मुझे चुप देखकर उसने कहा – क्या बुरा मान गये?

मैंने कहा – नहीं, बुरा क्या मानूँगा, लेकिन आपने इस काम के लिए किसी पानी-पाँड़े को पकड़ा होता, मुझे आप शायद नहीं जानते ।

उसने कहा – मैं आपको खूब जानता हूँ आप काशी के शास्त्री हैं । जब मैं होस्टल में था तो एक काशी के शास्त्री मेरे सहपाठी थे । वह बराबर अपना भोजन आप पकाया करते थे, और जब कभी हमारे मेस का रसोइया बीमार पड़ जाता या भाग जाता तो वह मेरा भोजन पका देते थे और आग्रह करके खिलाते थे । इसलिए मैंने आपसे यह प्रार्थना की ।

मेरे पास इसका क्या जवाब था । पुरखों ने जो कुछ किया है, उसका तावान तो देना ही पड़ेगा ।

मैंने कहा – आपकी इच्छा है तो मैं चलकर भोजन बना दूंगा । लेकिन एक शर्त है, अगर आप उसे स्वीकार करें ।

‘कहिए, कहिए, आप जो कुछ कहेंगे वह मुझे स्वीकार है । आपने आज मेरी लाज रख ली ।

‘’मैं रसोई में बैठकर बताता जाऊँगा, काम श्रीमतीजी को करना पड़ेगा ।’

‘लेकिन उनके सिर में दर्द हुआ तब?’

‘उसकी मेरे पास दवा है । सिर में चक्कर आ जाये, आँखों के सामने अँधेरा छा जाये, मैं बात की बात में अच्छा कर सकता हूँ ।’

‘और जो उन्हें गर्मी लगे?’

‘आप खड़े पंखा झलते रहिएगा ।’

‘और उन्होंने क्रोध में आकर आपको कुछ कह दिया?’

‘तो मुझे भी क्रोध आ जायेगा और क्रोध में मैं लाट साहब को भी कुछ नहीं समझता । हाँ, इतना कह देता हूँ कि इसके बाद उन्हें फिर कभी क्रोध न आयेगा ।’

‘और जो उन्होंने बहस शुरू कर दी? उनकी दलीलों का आप जवाब दे सकते है?’

‘वाह-! और मैंने उम्र-भर किया क्या है? पहले तो दलील का जवाब दलील से देता हूँ । जब इससे काम नहीं चलता तो हाथ-पाँव से भी काम ले लेता हूँ । कितने ही शास्त्रार्थों में सम्मिलित हुआ हूँ और कभी परास्त होकर नहीं आया । बड़े-बड़े महामहोपाध्यायों को गुड़-हल्दी पिलाकर छोड़ दिया ।’

सज्जन ने एक क्षण तक विचार किया और फिर आने का वादा करके चले गये । तब से अब तक सूरत नहीं दिखाई ।

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