चांदनी रात, समीर के सुखद झोंके, सुरम्य उद्यान। कुंवर अमरनाथ अपनी विस्तीर्ण छत पर लेटे हुए मनोरमा से कह रहे थे तुम घबराओं नहीं, मैं जल्द आऊंगा। मनोरमा ने उसकी ओर कातर नेत्रों से देखकर कहा- ‘मुझे भी क्यों नहीं लेते चलते?’ अमरनाथ- ‘तुम्हें वहां कष्ट होगा, मैं कभी यहां रहूंगा, कभी वहां, सारे दिन […]
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दो भाई – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
प्रातःकाल सूर्य की सुहावनी सुनहरी धूप में कलावती दोनों बेटों को जांघों पर बैठा दूध और रोटी खिलाती। केदार बड़ा था, माधव छोटा। दोनों मुंह में कौर लिये, कई पग उछल-कूद कर फिर जांघों पर आ बैठते और अपनी तोतली बोली में इस प्रार्थना की रट लगाते थे, जिसमें एक पुराने सहृदय कवि ने किसी […]
रामलीला – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
इधर एक मुद्दत से रामलीला देखने नहीं गया। बंदरों के भद्दे चेहरे लगाये, आधी टांगों का पजामा और काले रंग का ऊंचा कुरता पहने आदमियों को दौड़ते, हू-हू करते देखकर अब हंसी आती है; मजा नहीं आता। काशी की लीला जगद्विख्यात है। सुना है, लोग दूर-दूर से देखने आते है। मैं भी बड़े शौक से […]
चमत्कार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
बी.ए. पास करने के बाद चन्द्रप्रकाश को एक ट्यूशन करने के सिवा और कुछ न सूझा। उनकी माता पहले ही मर चुकी थीं, इसी साल पिता का भी देहान्त हो गया। चन्द्र प्रकाश जीवन के जो मधुर स्वप्न देखा करता था, वे सब धूल में मिल गये। पिता ऊंचे ओहदे पर थे, उनकी कोशिश से […]
अधिकार-चिन्ता – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
टॉमी यों देखने में तो बहुत तगड़ा था। भौंकता तो सुनने वाले के कानों के परदे फट जाते। डील-डौल भी ऐसा कि अंधेरी रात में उस पर गधे का भ्रम हो जाता। लेकिन उसकी श्वानोचित वीरता किसी संग्रामक्षेत्र में प्रमाणित न होती थी। दो-चार दफे जब बाजार के लेंड़ियों ने उसे चुनौती दी, तो वह […]
मोटेरामजी शास्त्री – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
पंडित मोटेराम जी शास्त्री को कौन नहीं जानता? आप अधिकारियों का रुख देखकर काम करते हैं। स्वदेशी आंदोलन के दिनों में आपने उस आंदोलन का खूब विरोध किया था। स्वराज्य आंदोलन के दिनों में भी आपने अधिकारियों से राजभक्ति का प्रमाण-पत्र प्राप्त किया था। मगर जब इतनी उछल-कूद पर भी उनकी तकदीर की मीठी नींद […]
लेखक – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
सुबह-सुबह महाशय प्रवीण ने बीस बार उबाली हुई चाय का प्याला तैयार किया और बिना शक्कर और दूध के पी गए। यही उनका नाश्ता था। महीनों से मीठी, दूध से बनी चाय न मिली थी। दूध और शक्कर उनके लिए जीवन के आवश्यक वस्तुओं में न थे। घर में गए जरूर कि पत्नी को जगाकर […]
पंच परमेश्वर – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
जुम्मन शेख और अलगू चौधरी में गाढ़ी मित्रता थी। साझे में खेती होती थी। कुल लेन-देन में भी साझा था। एक को दूसरे पर अटल विश्वास था। जुम्मन जब हज करने गए थे, तब अपना घर अलगू को सौंप गए थे और अलगू जब कभी बाहर जाते तो जुम्मन पर अपना घर छोड़ देते थे। […]
यह भी नशा, वह भी नशा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
होली के दिन राय साहब पण्डित घसीटेलाल की बारहदरी में भंग छन रही थी कि सहसा मालूम हुआ, जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं । बुल साहब बहुत ही मिलनसार आदमी थे और अभी हाल ही में विलायत से आये थे । भारतीय रीति-नीति के जिज्ञासु थे, बहुधा मेले-ठेलों में जाते थे । शायद इस […]
प्रेम की होली – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
गंगी का सत्रहवीं साल था, पर वह तीन साल से विधवा थी, और जानती थी कि मैं विधवा हूँ । मेरे लिए संसार के सुखों के द्वार बन्द हैं । फिर वह क्यों रोये और कलपे ? मेले से सभी तो मिठाई के दोने और फूलों के हार लेकर नहीं लौटते? कितनों ही का तो […]
