क्या नाम कि कुछ समझ में नहीं आता कि डेरी और डेरी फार्म में क्या सम्बन्ध! डेरी तो कहते हैं उस छोटी-सी सादी सजिल्द पोथी को, जिस पर रोज-रोज का वृत्तान्त लिखा करते हैं और जो प्रायः सभी महान पुरुष लिखा करते है और डेरी फार्म उस स्थान को कहते हैं जहाँ गायें-भैंसे पाली जाती […]
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होली का उपहार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
मैकूलाल अमरकान्त के घर शतरंज खेलने आये तो देखा, वह कहीं बाहर जाने की तैयारी कर रहे हैं । पूछा – कहीं बाहर की तैयारी कर रहे हो क्या भाई? फुरसत हो, तो आओ, आज दो-चार बाजियाँ हो जाये । अमरकान्त ने संदूक में आईना-कंघी रखते हुए कहा – नहीं भाई, आज तो बिलकुल फुरसत […]
आहुति – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
आनन्द ने गद्देदार कुर्सी पर बैठकर सिगार जलाते हुए कहा – आज विशम्भर ने कैसी हिमाकत की! इफहान करीब है और आप आज वालंटियर बन बैठे । कहीं पकड़े गये, तो इफहान से हाथ धोयेंगे । मेरा तो ख्याल है कि वजीफा भी बन्द हो जायेगा । सामने दूसरे बेंच पर रूपमणि बैठी एक अखबार […]
दो बहनें – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
दोनों बहने दो साल के बाद एक तीसरे नातेदार के घर मिली और खूब रो-धोकर खुश हुई तो बड़ी बहन रूपकुमारी ने देखा कि छोटी बहन रामदुलारी सिर से पाँव तक गहनों से लदी हुई है, कुछ उसका रंग खुल गया है, स्वभाव में कुछ गरिमा आ गई है और बातचीत करने में ज्यादा चतुर […]
तथ्य – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
वह भेद अमृत के मन में हमेशा ज्यों का त्यों बना रहा और कभी न खुला । न तो अमृत की नजरों से, न उसकी बातों से और न रंग-ढंग से ही पूर्णिमा को कभी इस बात का नाम को भी भ्रम हुआ कि साधारण पड़ोसियों का जिस तरह बर्ताव होना चाहिए और लड़कपन की […]
परीक्षा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
जब रियासत देवगढ़ के दीवान सरदार सुजानसिंह बूढ़े हुए तो परमात्मा की याद आयी। जाकर महाराज से विनय की कि दीनबंधु! दास ने श्रीमान की सेवा चालीस साल तक की, अब मेरी अवस्था भी ढल गयी, राज-काज संभालने की शक्ति नहीं रही। कहीं भूल-चूक हो जाये तो बुढ़ापे में दाग लगे। सारी जिन्दगी की नेकनामी […]
जीवन सार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं गड्ढे तो हैं, पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का स्थान नहीं है । जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौकीन हैं उन्हें तो यहाँ निराशा ही होगी । मेरा जन्म संवत् 1867 में हुआ । पिता डाकखाने में क्लर्क थे, माता मरीज । […]
बूढ़ी काकी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढ़ी काकी में जिह्वास्वाद के सिवा और कोई चेष्टा शेष न थी और अपने कष्टों की ओर आकर्षित करने का, रोने के अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही। समस्त इन्द्रियां, नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे! पृथ्वी पर पड़ी रहती। और घर वाले कोई बात उनकी […]
कश्मीरी सेब – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
कल शाम को चौक में दो-चार जरूरी चीजें खरीदने गया था । पंजाबी मेवाफरोशों की दुकानें रास्ते ही में पड़ती हैं । एक दुकान पर बहुत अच्छे रंगदार, गुलाबी सेब सजे हुए नजर आये । जी ललचा उठा । आजकल शिक्षित समाज में विटामिन और प्रोटीन के शब्दों में विचार करने की प्रवृत्ति हो गई […]
सच्चाई का उपहार – मुंशी प्रेमचंद की कहानी
तहसीली मदरसा बरांव के प्रधानाध्यापक मुंशी भवानीसहाय को बागवानी का कुछ व्यसन था। क्यारियों में भांति-भांति के फूल और पत्तियां लगा रखी थी। दरवाजों पर लताएं चढ़ा दी थी। इससे मदरसे की शोभा अधिक हो गयी थी। वह मिडिल कक्षा के लड़कों से भी अपने बगीचे को सींचने और साफ करने में मदद लिया करते […]
