jeevan saar munshi premchand ki story
jeevan saar munshi premchand ki story

मेरा जीवन सपाट, समतल मैदान है, जिसमें कहीं-कहीं गड्ढे तो हैं, पर टीलों, पर्वतों, घने जंगलों, गहरी घाटियों और खंडहरों का स्थान नहीं है । जो सज्जन पहाड़ों की सैर के शौकीन हैं उन्हें तो यहाँ निराशा ही होगी । मेरा जन्म संवत् 1867 में हुआ । पिता डाकखाने में क्लर्क थे, माता मरीज । एक बड़ी बहन भी थी । उस समय पिताजी शायद 20 रुपये पाते थे । 40 रुपये तक पहुँचते-पहुँचते उनकी मृत्यु हो गई । यों वह बड़े विचारशील, जीवन-पथ पर आँखें खोलकर चलने वाले आदमी थे; लेकिन आखिरी दिनों में एक ठोकर खा ही गये और खुद तो गिरे ही थे, उसी धक्के में मुझे भी गिरा दिया । पन्द्रह साल की अवस्था में उन्होंने मेरा विवाह कर दिया और विवाह करने के साल भर बाद ही परलोक सिधारे । उस समय मैं नवें दर्जे में पड़ता था । घर में मेरी स्त्री थी, विमाता थी, उनके दो बालक थे, और आमदनी एक पैसे की नहीं । घर में जो कुछ लेई-पूँजी थी, वह पिताजी की छः महीने की बीमारी और क्रिया-कर्म में खर्च हो चुकी थी और मुझे अरमान था, वकील बनने का और एम.ए. पास करने का । नौकरी उस जमाने में भी इतनी दुष्प्राप्य थी, जितनी अब है । दौड़-भूप करके शायद दस-बारह की कोई जगह पा जाता; पर यहाँ तो आगे पढ़ने की धुन थी – पाँव में लोहे की नहीं, अष्टधातु की बेड़ियाँ थी और मैं चढ़ना चाहता था पहाड़ पर ।

पाँव में जूते न थे । देह पर साबित कपड़े न थे । महँगी अलग, रुपये 10 सेर के जौ थे । स्कूल से साढ़े तीन बजे छुट्टी मिलती थी । काशी के क्वींस कॉलेज में पड़ता था । हेडमास्टर ने फीस माफ कर दी थी । इम्तहान सिर पर था और मैं बाँस फाटक पर एक लड़के को पढ़ाने जाता था । जाड़ों के दिन थे । चार बजे पहुँचता था । पढ़ाकर छः बजे छुट्टी पाता । वहाँ से मेरा घर देहात में पाँच मील पर था । तेज चलने पर भी आठ बजे से पहले घर न पहुँच सकता । और प्रातःकाल आठ ही बजे फिर से चलना पड़ता था, कभी वक्त पर स्कूल न पहुँचता । रात को भोजन करके कुप्पी के सामने पढ़ने बैठता और न जाने कब सो जाता । फिर भी हिम्मत बाँधे था ।

मैट्रिकुलेशन तो किसी तरह पास हो गया, पर आया सेकंड डिवीजन और क्वींस कॉलेज में भरती होने की आशा न रही । फीस केवल अव्वल दरजे वाले की ही मुआफ हो सकती थी । संयोग से उसी साल हिन्दू कॉलेज खुल गया । मैंने इस नये कॉलेज में पढ़ने का निश्चय किया । प्रिंसिपल थे मि. रिचर्डसन । उनके मकान पर गया । वह पूरे हिन्दुस्तानी वेश में थे । कुरता और धोती पहने फर्श पर बैठे कुछ लिख रहे थे । मगर मिज़ाज को तब्दील करना इतना आसान न था । मेरी प्रार्थना सुनकर – आधी ही कहने पाया था – बोले कि घर में कॉलेज की बातचीत नहीं करता, कॉलेज में आओ । खैर, कॉलेज में गया । मुलाकात तो हुई, पर निराशाजनक । फीस मुआफ न हो सकती थी । अब क्या करूँ? अगर प्रतिष्ठित सिफारिशें ला सकता तो शायद मेरी प्रार्थना पर कुछ विचार होता; लेकिन देहाती युवक को शहर में जानता ही कौन था!

रोज घर से चलता कि कहीं से सिफारिश लाऊं, पर बाहर मील की मंजिल मारकर शाम को घर लौट आता । किससे कहूँ? कोई अपना पुछंतर न था ।

कई दिनों के बाद एक सिफारिश मिली । एक ठाकुर इन्द्रनारायण सिंह हिन्दू कॉलेज की प्रबन्धकारिणी सभा में थे । उनसे जाकर रोया । उन्हें मुझ पर दया आ गई । सिफारिश चिट्ठी दे दी । उस समय मेरे आनन्द की सीमा न रही । खुश होता हुआ घर आया । दूसरे दिन प्रिंसिपल से मिलने का इरादा था; लेकिन घर पहुँचते ही मुझे ज्वर आ गया और दो सप्ताह से पहले न हिला । नीम का काढ़ा पीते-पीते नाक में दम आ गया । एक दिन द्वार पर बैठा था कि मेरे पुरोहितजी आ गये । मेरी दशा देखकर समाचार पूछा और तुरन्त खेतों में जाकर एक जड़ खोद लाये और उसे धोकर सात दाने काली मिर्च के साथ पिसवाकर मुझे पिला दिया । उसने जादू का असर किया । ज्वर चढ़ने में घंटे ही भर की देर थी । इस औषध ने, मानो जाकर उसका गला ही दबा दिया । मैंने पण्डितजी से बार-बार उस जड़ी का नाम पूछा पर उन्होंने न बताया । कहा – नाम बता देने से उसका असर जाता रहेगा ।

एक महीने बाद मैं फिर मि. रिचर्डसन से मिला और सिफारिशी चिट्ठी दिखाई । प्रिंसिपल ने मेरी तरफ तीव्र नेत्रों से देखकर पूछा – इतने दिनों कहां थे?

‘बीमार हो गया था ।’

‘क्या बीमारी थी?’

मैं इस प्रश्न के लिए तैयार न था । अगर ज्वर बताता हूँ तो शायद साहब मुझे झूठा समझें । ज्वर मेरी समझ में हल्की-सी चीज थी, जिसके लिए इतनी लम्बी गैरहाजिरी अनावश्यक थी । कोई ऐसी बीमारी बतानी चाहिए, जो अपनी कष्टसाध्यता के कारण दया को भी उभारे । उस वक्त मुझे और किसी बीमारी का नाम याद न आया । ठाकुर इन्द्रनारायण सिंह से जब मैं सिफारिश के लिए मिला था, तो उन्होंने अपने दिल की धड़कन की बीमारी की चर्चा की थी । वह शब्द मुझे याद आ गया ।

मैंने कहा – पैलपिटेशन ऑफ हार्ट सर।

साहब ने विस्मित होकर मेरी ओर देखा और कहा – अब तुम बिलकुल अच्छे हो?

‘जी हाँ ।’

‘अच्छा, प्रवेश-पत्र भरकर लाओ ।’

मैंने समझा बेड़ा पार हुआ । फार्म लिया, खानापुरी की और पेश कर दिया । साहब उस समय कोई क्लास ले रहे थे । तीन बजे फार्म वापस मिला । उस पर लिखा था – इसकी योग्यता की जाँच की जाय ।

यह नई समस्या उपस्थित हुई । मेरा दिल बैठ गया । अंग्रेजी के सिवा और किसी विषय में पास होने की मुझे आशा न थी और बीजगणित और रेखागणित से तो रूह काँपती थी । जो कुछ याद था, वह भी भूल-भाल गया था; लेकिन दूसरा उपाय ही क्या था? भाग्य का भरोसा करके क्लास में गया और अपना फार्म दिखाया । प्रोफेसर साहब बंगाली थे, अंग्रेजी पढ़ा रहे थे । वाशिंगटन इर्विंग का रिपिवान विंकिल था । मैं पीछे की कतार में जाकर बैठ गया और दो-ही-चार मिनट में मुझे ज्ञात हो गया कि प्रोफेसर साहब अपने विषय के ज्ञाता हैं । प्रथा समाप्त होने पर उन्होंने आज के पाठ पर मुझसे कई प्रश्न किये और फार्म पर ‘संतोषजनक’ लिख दिया ।

दूसरा घंटा बीजगणित का था । इसके प्रोफेसर भी बंगाली थे । मैंने अपना फार्म दिखाया । नई संस्थाओं में प्रायः वही छात्र आते हैं, जिन्हें कहीं जगह नहीं मिलती । यहाँ भी यही हाल था । क्लासों में अयोग्य छात्र भरे हुए थे । पहले रेले में जो आया, वह भरती हो गया । भूख में साग-पात सभी रुचिकर होता है । अब पेट भर गया था । छात्र चुन-चुनकर लिये जाते थे । इन प्रोफेसर साहब ने गणित में मेरी परीक्षा ली और मैं फेल हो गया । फार्म पर गणित के खाने में ‘असंतोषजनक’ लिख दिया ।

मैं इतना हताश हुआ कि फार्म लेकर प्रिंसिपल के पास न गया । सीधा घर चला आया । गणित मेरे लिए गौरीशंकर की चोटी थी । कभी उस पर न चढ़ सका । इंटरमीडिएट में दो बार गणित में फेल हुआ और निराश होकर इम्तहान देना छोड़ दिया । दस-बारह साल के बाद जब गणित की परीक्षा में अख्तियारी हो गई तब मैंने दूसरे विषय लेकर उसे आसानी से पास कर लिया । उस समय तक युनिवर्सिटी के इस नियम ने, कितने युवकों की आकांक्षाओं का खून किया, कौन कह सकता है! खैर! मैं निराश होकर घर तो लौट आया; लेकिन पढ़ने लालसा अभी तक बनी हुई थी । घर बैठकर क्या करता? किसी तरह गणित को सुधारूँ और कॉलेज में भरती हो जाऊँ, यही धुन थी । इसके लिए शहर में रहना जरूरी था । संयोग से एक वकील साहब के लड़के को पढ़ाने का काम मिल गया । पाँच रुपये वेतन ठहरा । मैंने दो रुपये में अपना गुजारा करके तीन रुपये घर पर देने का निश्चय किया । वकील साहब के अस्तबल के ऊपर एक छोटी-सी कच्ची कोठरी थी । उसी में रहने की आज्ञा ले ली । एक टाट का टुकड़ा बिछा दिया । बाजार से एक छोटा-सा लैम्प लाया और शहर में रहने लगा । घर से कुछ बरतन भी लाया । एक वक्त खिचड़ी पका लेता और बरतन धो-माँजकर लाइब्रेरी चला जाता । गणित तो बहाना था, उपन्यास आदि पढ़ा करता । पण्डित रतननाथ दर का ‘फसाना-ए-आजाद’ उन्हीं दिनों पड़ा । ‘चन्द्रकान्ता-सन्तति’ भी पड़ी । बंकिम बाबू के उर्दू अनुवाद, जितने पुस्तकालय में मिले, सब पड़ डाले । जिन वकील साहब के लड़कों को पढ़ाता था, उनके साले मेरे साथ मैट्रिकुलेशन में पढ़ते थे । उन्हीं की सिफारिश से मुझे यह पद मिला था । उनसे दोस्ती थी, इसलिए जब जरूरत होती, पैसे उधार ले लिया करता था । वेतन मिलने पर हिसाब हो जाता था । कभी दो रुपये हाथ आते, कभी तीन । जिस दिन वेतन के दो-तीन रुपये मिलते, मेरा संयम हाथ से निकल जाता । प्यासी तृष्णा हलवाई की दुकान की ओर खींच ले जाती । दो-तीन आने पैसे खाकर ही उठता । उसी दिन घर जाता और ढाई-तीन रुपये दे आता । दूसरे दिन से फिर उधार लेना शुरू कर देता; लेकिन कभी-कभी उधार माँगने में भी संकोच होता और दिन का दिन निराहार व्रत रखना पड़ जाता!

इस तरह चार-पाँच महीने बीते । इस बीच एक बजाज से दो-ढाई रुपये के कपड़े ले लिये थे । रोज उधर से निकलता था । उसे मुझ पर विश्वास हो गया था । जब महीने-दो महीने निकल गये और मैं रुपये न चुका सका, तो मैंने उधर से निकलना ही छोड़ दिया । चक्कर देकर निकल जाता । तीन साल के बाद उसके रुपये अदा कर सका । उसी जमाने में शहर का एक बेलदार मुझसे कुछ हिन्दी पढ़ने आया करता था । वकील साहब के पिछवाड़े उसका मकान था । ‘जान लो भैया’ उसका सखुनत किया था । हम लोग उसे ‘जान लो भैया’ ही कहा करते थे । एक बार मैंने उससे भी आठ आने पैसे उधार लिये थे । वह पैसे उसने मुझसे मेरे घर गाँव में जाकर पाँच साल बाद वसूल किये । मेरी अब भी पढ़ने की इच्छा थी; लेकिन दिन-दिन निराश होता जाता था । जी चाहता था, कहीं नौकरी कर लूं । पर नौकरी कैसे मिलती है और कहाँ मिलती है, यह न जानता था ।

जाड़ों के दिन थे । पास एक कौड़ी न थी । दो दिन एक-एक पैसे का चबेना खाकर काटे थे । मेरे महाजन ने उधार देने से इंकार कर दिया था, या संकोचवश मैं उससे माँग न सका था । चिराग जल चुके थे । मैं एक बुकसेलर की दुकान पर एक किताब बेचने गया था । चक्रवती गणित की कुंजी थी । दो साल हुए, खरीदी थी । अब तक उसे बड़े जतन से रखे हुए था; पर आज चारों ओर से निराश होकर मैंने उसे बेचने का निश्चय किया । किताब दो रुपये की थी; लेकिन एक पर सौदा ठीक हुआ । मैं रुपया लेकर दुकान से उतरा ही था कि एक बड़ी-बड़ी मूंछों वाले सौम्य पुरुष ने, जो उस दुकान पर बैठे थे, मुझसे पूछा – तुम कहीं पढ़ते हो?

मैंने कहा – पढ़ता तो कहीं नहीं हूँ पर आशा करता हूँ कि कहीं नाम लिखा दूंगा ।

‘मैट्रिकुलेशन पास हो?’

‘जी हाँ ।’

‘नौकरी करने की इच्छा तो नहीं है?’

वह सज्जन एक छोटे से स्कूल में हेडमास्टर थे । उन्हें एक सहायक अध्यापक की जरूरत थी । अठारह रुपये वेतन था । मैंने स्वीकार कर लिया । अठारह रुपये उस समय मेरी निराशा-व्यथित कल्पना की ऊँची से ऊँची उड़ान से भी ऊपर थे । मैं दूसरे दिन हेडमास्टर साहब से मिलने का वादा करके चला, तो पाँव जमीन पर न पड़ते थे । वह सन् 1899 की बात है । परिस्थितियों का सामना करने को तैयार था और गणित में अटक न जाता, तो अवश्य आगे जाता; पर सबसे कठिन परिस्थिति से यूनिवर्सिटी की मनोविज्ञान-शून्यता थी, जो उस समय और उसके कई साल बाद तक उस डाकू का सा व्यवहार करती थी, जो छोटे-बड़े सभी को एक ही खाट पर सुलाता है ।

2

मैंने पहले-पहल 1907 में गप्पें लिखनी शुरू की । डॉक्टर रवीन्द्रनाथ की कई गल्पें मैंने अंग्रेजी में पड़ी थी और उनका उर्दू अनुवाद उर्दू पत्रिकाओं में छपवाया था । उपन्यास तो मैंने 1901 ही से लिखना शुरू किया । मेरा एक उपन्यास 1902 में निकला और दूसरा 1904 में; लेकिन गप्प 1907 से पहले मैंने एक भी न लिखी । मेरी पहली कहानी का नाम था, ‘संसार का सबसे अनमोल रत्न’ । वह 1909 में ‘जमाना’ में छपी । उसके बाद मैंने चार-पाँच कहानियाँ और लिखी। पांच कहानियों का संग्रह ‘सोजे वतन’ के नाम से 1902 में छपा । उस समय बंग-भंग का आंदोलन हो रहा था । कांग्रेस के गर्म दल की सृष्टि हो चुकी थी । इन पाँचों कहानियों में स्वदेश-प्रेम की महिमा गायी गई थी ।

उस वक्त मैं शिक्षा-विभाग में सब-डिप्टी इंस्पेक्टर था और हमीरपुर के जिले में तैनात था । पुस्तक को छपे छः महीने हो चुके थे । एक दिन मैं रात को अपनी रावटी में बैठा हुआ था कि मेरे नाम जिलाधीश का परवाना पहुँचा, कि मुझसे तुरन्त मिलो । जाड़ों के दिन थे । साहब दौरे पर थे । मैंने बैलगाड़ी जुतवाई और रातों-रात 30-40 मील तय करके दूसरे दिन साहब से मिला । साहब के सामने ‘सोजेवतन’ की एक प्रति रखी हुई थी । मेरा माथा ठनका । उस वक्त मैं ‘नवाबराय’ के नाम से लिखा करता था । मुझे इसका कुछ-कुछ पता मिल चुका था कि खुफिया पुलिस इस किताब के लेखक की खोज में है । समझ गया, उन लोगों ने खोज निकाला और इसी की जवाबदेही करने के लिए मुझे बुलाया गया है ।

साहब ने मुझसे पूछा – यह पुस्तक तुमने लिखी है?

मैंने स्वीकार किया ।

साहब ने मुझसे एक-एक कहानी का आशय पूछा – और अन्त में बिगड़कर बोले – तुम्हारी कहानियों में ‘सिडीशन’ भरा हुआ है । अपने भाग्य को बखानों कि अंग्रेजी अमलदारी में हो । मुगलों का राज्य होता, तो तुम्हारे दोनों हाथ काट लिये जाते । तुम्हारी कहानियाँ एकांगी हैं, तुमने अंग्रेजी सरकार की तौहीन की है, आदि । फैसला यह हुआ कि मैं ‘सोजे वतन’ की सारी प्रतियाँ सरकार के हवाले कर दूँ और साहब की अनुमति के बिना कभी कुछ न लिखूँ । मैंने समझा, चलो सस्ता छूटे । एक हजार प्रतियाँ छपी थी । अभी मुश्किल से 300 बिकी थी । शेष 700 प्रतियाँ मैंने ‘जमाना कार्यालय’ से मँगवाकर साहब की सेवा में अर्पण कर दी ।

मैंने समझा था, बला टल गई; किन्तु अधिकारियों को इतनी आसानी से सन्तोष न हो सका । मुझे बाद में मालूम हुआ कि साहब ने इस विषय में जिले के अन्य कर्मचारियों से परामर्श किया । सुपरिण्टेण्डेण्ट पुलिस, दो डिप्टी कलेक्टर और डिप्टी इंस्पेक्टर – जिनके मैं मातहत था – मेरी तकदीर का फैसला करने बैठे । एक डिप्टी कलेक्टर साहब ने गप्पों से उद्दरण निकालकर सिद्ध किया कि इनमें आदि से अन्त तक सिडीशन के सिवा और कुछ नहीं है और सिडीशन भी साधारण नहीं; बल्कि संक्रामक । पुलिस के देवता ने कहा – ऐसे खतरनाक आदमी को जरूर सख्त सजा देनी चाहिए । डिप्टी इंस्पेक्टर साहब मुझसे बहुत स्नेह करते थे । इस भय से कि कहीं मुआमला तूल न पकड़ ले, उन्होंने यह प्रस्ताव किया कि वह मित्रभाव से मेरे राजनीतिक विचारों की थाह लें और उस कमेटी में रिपोर्ट पेश करें । उनका विचार था, कि मुझे समझा दें और रिपोर्ट में लिख दें कि लेखक केवल कलम का उग्र है और राजनीतिक आन्दोलन से उसका कोई संबंध नहीं है । कमेटी ने उनके प्रस्ताव को स्वीकार किया । हालाँकि पुलिस के देवता उस वक्त भी पैंतरे बदलते रहे।

सहसा कलेक्टर साहब ने डिप्टी इंस्पेक्टर से पूछा – आपको आशा है कि वह आपसे अपने दिल की बातें कह देगा?

‘आप मित्र बनकर उसका भेद लेना चाहते हैं । यह तो मुखबिरी है । मैं इसे कमीनापन समझता हूं।’

डिप्टी साहब अप्रतिभ होकर हकलाते हुए बोले – मैं तो हुजूर के हुक्म… साहब ने बात काटी – नहीं, यह मेरा हुक्म नहीं है । मैं ऐसा हुक्म नहीं देना चाहता । अगर पुस्तक में लेखक का सिडीशन साबित हो सके, तो खुली अदालत में मुकदमा चलाइए, नहीं धमकी देकर छोड़ दीजिए । ‘मुँह में राम बगल में छुरी’ मुझे पसन्द नहीं ।

जब यह वृत्तान्त डिप्टी इंस्पेक्टर साहब ने कई दिन पीछे खुद मुझसे कहा, तो मैंने पूछा – क्या आप सचमुच मेरी मुखबिरी करते?

वह हँसकर बोले – असम्भव । कोई लाख रुपये भी देता, तो न करता । मैं तो केवल अदालती कार्यवाही रोकना चाहता था, और वह रुक गई । मुकदमा अदालत में जाता, तो सजा हो जाना यकीनी था । यहाँ आपकी पैरवी करने वाला भी कोई न मिलता; मगर साहब है शरीफ आदमी ।

मैंने स्वीकार किया – बहुत ही शरीफ़ ।

3

मैं हमीरपुर ही में था कि मुझे पेचिश की शिकायत पैदा हो गई । गर्मी के दिनों में देहातों में कोई हरी तरकारी मिलती न थी । एक बार कई दिन तक लगातार सूखी घुँइयाँ खानी पड़ी । यों मैं घुँइयों को बिच्छू समझता हूँ और तब भी समझता था; लेकिन न जाने क्योंकर यह धारणा मन में हो गई कि अजवाइन से घुँइयाँ का बादीपन जाता रहता है । खूब अजवाइन खा लिया करता । दस-बारह दिन तक किसी तरह का कष्ट न हुआ । मैंने समझा, शायद बुन्देलखण्ड की पहाड़ी जलवायु ने मेरी दुर्बल पाचन शक्ति को तीव्र कर दिया; लेकिन एक दिन पेट में दर्द हुआ और सारे दिन मैं मछली की भाँति तड़पता रहा । फंकियाँ लगाई; मगर दर्द न कम हुआ । दूसरे दिन से पेचिश हो गई; मल के साथ आँव आने लगा; लेकिन दर्द जाता रहा ।

एक महीना बीत चुका था । मैं एक कस्बे में पहुँचा, तो वहाँ के थानेदार साहब ने मुझसे थाने ही में ठहरने और भोजन करने का आग्रह किया । कई दिन से मूँग की दाल खाते और पथ्य करते-करते ऊब उठा था । सोचा, क्या हरज है, आज यही ठहरो । भोजन तो स्वादिष्ट मिलेगा! थाने ही में अड्डा जमा दिया । दारोगाजी ने जमीकन्द का सालन पकवाया, पकौड़ियों, दही-बड़े, पुलाव । मैंने एहतियात से खाया – जमीकन्द तो मैंने केवल दो फाँके खायी, लेकिन खा-पीकर जब थाने के सामने दारोगाजी के इस के बँगले में लेटा, तो दो-ढाई घंटे के बाद पेट में फिर दर्द होने लगा । सारी रात और अगले दिन-भर कराहता रहा । सोडे की बोतलें पीने के बाद कै हुई, तो जाकर चैन मिला । मुझे विश्वास हो गया, यह जमीकन्द की कारस्तानी है । घुँइयाँ से पहले मेरी कुट्टी हो चुकी थी । अब जमीकन्द से भी बैर हो गया । तब से इन दोनों चीजों की सूरत देखकर मैं काँप जाता हूँ । दर्द तो फिर जाता रहा; पर पेचिश ने अड्डा जमा लिया । पेट में चौबीसों घंटे तनाव बना रहता, व्यायाम करता, पथ्य से भोजन करता, कोई न कोई औषधि भी खाया करता; किन्तु पेचिश टलने का नाम न लेती थी और देह भी घुलती जाती थी । कई बार कानपुर आकर दवा कराई, एक बार महीने-भर प्रयाग में डाक्टरी और आयुर्वेदिक औषधियों को सेवन किया; पर कोई फायदा नहीं ।

तब मैंने तबादला कराया । चाहता था रूहेलखण्ड, पर पटका गया बस्ती जिले में और हलका वह मिला जो नेपाल की तराई है । सौभाग्य से वहीं मेरा परिचय स्व. पं. मनन द्विवेदी गगरी से हुआ, जो डोमरियागंज में तहसीलदार थे । कभी-कभी उनके साथ साहित्य-चर्चा हो जाती थी; लेकिन यहाँ आकर पेचिश और बढ़ गई । तब मैंने छः महीने की छुट्टी ली; और लखनऊ के मेडिकल कॉलेज से निराश होकर काशी के एक हकीम से इलाज कराने लगा । तीन-चार महीने बाद कुछ थोड़ा-सा फायदा तो मालूम हुआ, पर बीमारी जड़ से न गई । जब फिर बस्ती पहुँचा तो वही हालत हो गई । तब मैंने दौरे की नौकरी छोड़ दी और बस्ती हाई स्कूल में स्कूल मास्टर हो गया । फिर यहाँ से तबदील होकर गोरखपुर पहुँचा । पेचिश पूर्ववत् जारी रही । यहाँ मेरा परिचय महावीर प्रसादजी पोद्दार से हुआ जो साहित्य के मर्मज्ञ, राष्ट्र के सच्चे सेवक और बड़े ही उद्योगी पुरुष है । मैंने बस्ती से ही ‘सरस्वती’ में कई गल्प़े छपवाई थी । पोद्दारजी की प्रेरणा से मैंने फिर उपन्यास लिखा और ‘सेवासदन’ की सृष्टि हुई । वहीं मैंने प्राइवेट बी.ए. भी पास किया । ‘सेवासदन’ का जो आदर हुआ, उससे उत्साहित होकर मैंने ‘प्रेमाश्रम’ लिख डाला और गल्पे भी बराबर लिखता रहा ।

कुछ मित्रों की, विशेषकर पोद्दारजी की सलाह से मैंने जल-चिकित्सा आरम्भ की; लेकिन तीन-चार महीने के स्नान और पथ्य का मेरे दुर्भाग्य से यह परिणाम हुआ कि मेरा पेट बढ़ गया और मुझे रास्ता चलने में भी दुर्बलता मालूम होने लगी । एक बार कई मित्रों के साथ मुझे एक जीने पर बढ़ने का अवसर पड़ा और लोग धड़-धड़ाते हुए चले गये, पर मेरे पाँव ही न उठते थे । बड़ी मुश्किल से हाथों का सहारा लेते हुए ऊपर पहुँचा । उसी दिन मुझे अपनी कमजोरी का यथार्थ ज्ञान हुआ । समझ गया, अब थोड़े दिनों का और मेहमान हूँ जल-चिकित्सा बन्द कर दी ।

एक दिन सभा समय उर्दू बाजार में श्री दशरथप्रसादजी द्विवेदी, सम्पादक, ‘स्वदेश’ से मेरी भेंट हो गई । कभी-कभी उनसे भी साहित्य चर्चा होती रहती थी । उन्होंने मेरी पीली सूरत देखकर खेद के साथ कहा – बाबूजी, आप तो बिलकुल पीले पड़ गये हैं, कोई इलाज कराइए ।

मुझे अपनी बीमारी का जिक्र बुरा लगता था । मैं भूल जाना चाहता था कि मैं बीमार हूँ । जब दो-चार महीने का जिन्दगी से नाता है, तो क्यों न हँसकर मरूँ? मैंने चिढ़कर कहा – मर ही तो जाऊँगा भई, या और कुछ! मैं मौत का स्वागत करने को तैयार हूँ । द्विवेदी बेचारे लज्जित हो गये । मुझे पीछे से अपनी उग्रता पर बड़ा खेद हुआ । यह 1921 की बात है । असहयोग आन्दोलन जोरों पर था । जलियाँवाला बाग का हत्याकांड हो चुका था । उन्हीं दिनों महात्मा गांधी ने गोरखपुर का दौरा किया । गाजीमियाँ के मैदान में ऊँचा प्लेटफार्म तैयार किया गया । दो लाख से कम जमाव न था । क्या शहर, क्या देहात, श्रद्धालु जनता दौड़ी चली आती थी । ऐसा समारोह मैंने अपने जीवन में कभी न देखा । महात्माजी के दर्शनों का यह प्रताप था, कि मुझे जैसा मरा हुआ आदमी भी चेत उठा । उसके दो ही चार दिन बाद मैंने अपनी 20 साल की नौकरी से इस्तीफा दे दिया ।

अब देहात में चलकर कुछ प्रचार करने की इच्छा हुई । पोद्दारजी का देहात में एक मकान था । हम और वह दोनों वहाँ चले गये और चर्खे बनवाने लगे । वहाँ जाने के एक ही सप्ताह बाद मेरी पेचिश कम होने लगी । यहाँ तक कि एक महीने के अन्दर मल के साथ आव का आना बन्द हो गया । फिर मैं काशी चला आया और अपने देहात में बैठकर कुछ प्रचार और कुछ साहित्य-सेवा में जीवन को सार्थक करने लगा । गुलामी से मुक्त होते ही मैं नौ साल के जीर्ण रोग से मुक्त हो गया ।

इस अनुभव ने मुझे कट्टर भाग्यवादी बना दिया है । अब मेरा दृढ़ विश्वास है कि भगवान् की जो इच्छा होती है वही होता है, और मनुष्य का उद्योग भी इच्छा के बिना सफल नहीं होता ।

१. आत्म कहानी

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