वह भेद अमृत के मन में हमेशा ज्यों का त्यों बना रहा और कभी न खुला । न तो अमृत की नजरों से, न उसकी बातों से और न रंग-ढंग से ही पूर्णिमा को कभी इस बात का नाम को भी भ्रम हुआ कि साधारण पड़ोसियों का जिस तरह बर्ताव होना चाहिए और लड़कपन की दोस्ती का जिस तरह निबाह होना चाहिए उसके सिवा अमृत का मेरे साथ और भी किसी प्रकार सम्बन्ध है या हो सकता है । बेशक जब वह घड़ा लेकर कुएँ पर पानी खींचने के लिए जाती थी तब अमृत भी ईश्वर जाने कहाँ से वहाँ आ पहुँचता था और जबरदस्ती उसके हाथ से घड़ा छीनकर उसका पानी खींच देता था और जब वह अपनी गाय को सानी देने लगती थी तब वह उसके हाथ से भूसे की टोकरी ले लेता था और गाय की नाँद में सानी डाल देता था । जब वह बनिये की दुकान पर कोई चीज लेने जाती थी तब अमृत भी अक्सर उसे रास्ते में मिल जाया करता था और उसका काम कर देता था ।
पूर्णिमा के घर में कोई दूसरा लड़का या आदमी नहीं था । उसके पिता का कई साल पहले परलोकवास हो चुका था और उसकी माँ परदे में रहती थी । जब अमृत पढ़ने जाने लगता तब पूर्णिमा के घर जाकर पूछ लिया करता कि बाजार से कुछ मँगवाना तो नहीं है । उसके दर में खेती-बारी होती थी, गायें-भैंसे थी और बाग-बगीचे भी थे । वह अपने घरवालों की नजर बचाकर फसल की चीजें सौगात के तौर पर पूर्णिमा के घर दे आता था लेकिन पूर्णिमा उसकी खातिरदारियों को उसकी भलमनसाहत और खाने-पीने से सन्तुष्ट होने के सिवा और क्यों समझे? एक गाँव में रहने वाले चाहे किसी प्रकार का रक्त-सम्बन्ध या कोई रिश्तेदारी न रखते हों, लेकिन फिर भी गाँव के रिश्ते से भाई-बहन तो होते ही हैं । इसलिए इन खातिरदारियों में कोई खास बात न थी ।
एक दिन पूर्णिमा ने उससे कहा भी, कि तुम दिन-भर मदरसे में रहते हो, मेरा जी घबराता है ।
अमृत ने सीधी तरह से कह दिया – क्या करूँ, इम्तहान पास आ गया है ।
‘मैं सोचा करती हूँ कि जब मैं चली जाऊँगी, तब तुम्हें कैसे देखूँगी और तुम क्यों मेरे घर आओगे?’
अमृत ने घबराकर पूछा – कहाँ चली जाओगी?
पूर्णिमा लजा गई । फिर बोली – जहाँ तुम्हारी बहनें चली गई, जहाँ सब लड़कियाँ चली जाती है ।
अमृत ने निराश भाव से कहा – अच्छा, वह बात!
इतना कहकर अमृत चुप हो गया । अभी तक यह बात कभी उसके ध्यान में ही नहीं आई थी कि पूर्णिमा कहीं चली भी जायेगी । इतनी दूर तक सोचने की उसे फुरसत ही नहीं थी । प्रसन्नता तो वर्तमान में ही मस्त रहती है । यदि भविष्य की बातें सोचने लगे तो फिर प्रसन्नता ही क्यों रहें?
और अमृत जितनी जल्दी इस दुर्घटना के होने की कल्पना कर सकता था, उससे पहले ही यह दुर्घटना एक खबर के रूप में सामने आ गई । पूर्णिमा के ब्याह की एक जगह बातचीत हो गई । अच्छा दौलतमन्द खानदान था और साथ ही इज्जतदार भी । पूर्णिमा की माँ ने उसे बहुत खुशी से मंजूर भी कर लिया । गरीबी की उस हालत में उसकी नजरों में जो चीज सबसे ज्यादा प्यारी थी, वह दौलत थी । और यहाँ पूर्णिमा के लिए सब तरह से सुखी रहकर जिन्दगी बिताने के सामान मौजूद थे मानो उसे मुँह-माँगी मुराद मिल गई हो । इससे पहले वह मारे फिक्र के घुली जाती थी । लड़की के ब्याह का ध्यान आते ही उसका कलेजा धड़कने लगता था । अब मानो परमात्मा ने अपने एक ही कटाक्ष से उसकी सारी चिन्ताओं और विकलताओं का अन्त कर दिया ।
अमृत ने सुना तो उसकी हालत पागलों की-सी हो गई । वह बेतहाशा पूर्णिमा के घर की तरफ दौड़ा, मगर फिर लौट पड़ा । होश ने उसके पैर रोक दिये । वह सोचने लगा कि वहाँ जाने से क्या फायदा? आखिर उसमें उसका कसूर ही क्या है? और किसी का क्या कसूर है? अपने घर आया और मुँह ढंककर लेटा रहा । पूर्णिमा चली जाएगी फिर वह कैसे रहेगा? वह विचलित-सा होने लगा । वह जिन्दा ही क्यों रहे? जिन्दगी में रखा ही क्या है? लेकिन यह भाव भी दूर हो गया और उसका स्थान लिया उस निस्तब्धता ने, जो तूफान के बाद आती है । वह उदासीन हो गया । जब पूर्णिमा जाती ही है, तो वह उसके साथ कोई संबंध क्यों रखे? क्यों मिले-जुले? और अब पूर्णिमा को उसकी परवाह ही क्यों होने लगी? और परवाह थी ही कब? वह आप ही उसके पीछे कुत्तों की तरह दुम हिलाता रहता था । पूर्णिमा ने तो कभी बात भी नहीं पूछी । और अब उसे क्यों न अभिमान हो? एक लखपति की स्त्री बनने जा रही है । शौक से बने । अमृत भी जिन्दा रहेगा । मरेगा नहीं । यही इस जमाने की वफादारी की रस्म है ।
लेकिन यह सारी तेजी दिल के अन्दर ही अन्दर थी और निरर्थक थी । भला उसमें इतनी हिम्मत कहाँ थी कि जाकर पूर्णिमा की माँ से कह दे कि पूर्णिमा मेरी है और मेरी ही रहेगी । गजब हो जायेगा । गाँव में आफत मच जाएगी । ऐसी बातें न गाँव की कहानियों में कभी सुनी है और न देहातों में कभी देखी हैं!
और पूर्णिमा का यह हाल था कि दिन-भर उसका रास्ता देखा करती थी । वह सोचती थी कि क्यों मेरे दरवाजे से होकर निकल जाता है और अन्दर नहीं आता? कभी रास्ते में मुलाकात हो जाती है तो मानो उसकी परछाई से भागता है । वह पानी की कलसी लेकर कुएँ पर खड़ी रहती है और सोचती है कि वह आता होगा । लेकिन वह कहीं दिखाई ही नहीं देता ।
एक दिन वह उसके दर गई और उससे जवाब माँगा । उसने पूछा – तुम आजकल आते क्यों नहीं? बस उसी समय उसका गला भर आया । उसे याद आ गया कि अब वह इस गाँव में थोड़े दिनों की मेहमान है ।
लेकिन अमृत चुपचाप ज्यों का त्यों बैठा रहा । लापरवाही से उसने सिर्फ इतना कहा – इम्तहान पास आ गया है । फुरसत नहीं मिलती ।
फिर कुछ ठहरकर उसने कहा – सोचता हूँ जब तुम जा ही रही हो… । वह कहना ही चाहता था कि – तो फिर अब मुहब्बत क्यों बढ़ाऊँ । मगर उसे ध्यान आ गया कि बहुत मूर्खता की बात है । अगर कोई रोगी मरने जा रहा है, तो क्या इसी विचार से उसका इलाज छोड़ दिया जाता है कि वह मरेगा ही? इसके विपरीत ज्यों-ज्यों उसकी हालत और खराब होती जाती है, त्यों-त्यों लोग भी अधिक तत्परता से उसकी चिकित्सा करते हैं । और जब उसका अन्तिम समय आ जाता है, तब तो दौड़-धूप की हद ही नहीं रहती । उसने बात का रुख बदलकर कहा – सुना है, वह लोग भी बहुत मालदार हैं ।
पूर्णिमा ने उसके ये अन्तिम शब्द सुने ही नहीं या उनका जवाब देने की जरूरत ही नहीं समझी । उसके कानों में तो जवाब का पहला हिस्सा ही गूंज रहा था!
उसने बहुत ही दुःखपूर्ण भाव से कहा – तो इसमें मेरा क्या कसूर है? मैं अपनी खुशी से तो जा नहीं रही हूँ । जाना पड़ता है, इसलिए जा रही हूँ ।
यह कहते-कहते मारे लज्जा से उसका चेहरा लाल हो गया । जितना उसे कहना चाहिए था, शायद उसे ज्यादा वह कह गई थी ।
मुहब्बत में भी शतरंज की-सी चालें होती हैं । अमृत ने उसकी तरफ इस तरह देखा कि मानो वह इस बात की जाँच करना चाहता है कि इन शब्दों में कुछ अर्थ भी है या नहीं । क्या अच्छा होता कि उसकी आँखों में आर-पार देखने की शक्ति होती । इस तरह तो सभी लड़कियों निराश भाव से बात करती हैं, मानो ब्याह होते ही उनकी जान पर आ बनेगी । मगर सभी लड़कियाँ एक न एक दिन अच्छे-अच्छे गहने-कपड़े पहनकर और पालकी में बैठकर चली जाती हैं । इन बातों से उसको कोई सन्तोष नहीं हुआ ।
फिर डरते-डरते बोला – तब तुम्हें मेरी याद क्यों आयेगी?
उसके माथे पर पसीना आ गया । उसे ऐसी बेढब शरमिन्दगी हुई कि जी चाहा कि कमरे से बाहर भाग जाऊँ । पूर्णिमा की ओर देखने की हिम्मत भी नहीं हुई । कहीं वह समझ न गई हो ।
पूर्णिमा ने सिर झुकाकर मानों अपने दिल से कहा – तुम मुझे इतना निर्मोही समझते हो! मैं बेकसूर हूँ और तुम मुझसे रूठते हो । तुम्हें इस समय मेरे साथ सहानुभूति होनी चाहिए थी । तुम्हें उचित था कि तुम मुझे ढांढस देते और तुम मुझसे तने बैठे हो । तुम्हीं बतलाओ कि मेरे लिए और कौन-सा दूसरा रास्ता है? जो मेरे अपने हैं, वही मुझे गैर के घर भेज रहे हैं । वहाँ मुझ पर क्या बीतेगी? मेरी क्या हालत होगी? क्या यही गम मेरी जान लेने के लिए काफी नहीं है जो तुम उसमें अपना गुस्सा भी मिलाये देते हो?
उसका गला फिर भर आया । आज पूर्णिमा को इस प्रकार दुःखी और उदास देखकर अमृत को विश्वास हो गया कि उसके अन्दर भी एक छिपी हुई वेदना है । उसका ओछापन और स्वार्थपरता मानो कालिख बनकर उसके चेहरे पर चमकने लगी । पूर्णिमा के इन शब्दों में पूरी सत्यता थी । जो पराए हों उनसे शिकायत ही क्यों करे? अवश्य ही ऐसी अवस्था में उसे पूर्णिमा को ढाढस दिलाना चाहिए था । यह उसका कर्त्तव्य है उसे बहुत प्रसन्नता के साथ पूरा करना चाहिए था । पूर्णिमा ने प्रेम का एक नया आदर्श सामने रख दिया था और उसका विवेक इस आदर्श से बचकर नहीं निकलने देता था । इसमें संदेह नहीं कि प्रेम भी एक स्वार्थ-त्याग है, परन्तु बहुत बड़ा और जिगर को जलाने वाला है ।
उसने लज्जित होकर कहा – माफ करो पूर्णिमा, मेरी भूल थी; बल्कि बेवकूफी थी ।
2
पूर्णिमा का ब्याह हो गया । अमृत जी-जान से उसके ब्याह के प्रबन्ध में लगा रहा । दूल्हा अधेड़ था । तोंदल और भोंडा था और साथ ही बहुत घमंडी, बद-मिज़ाज भी था । लेकिन अमृत ऐसी तत्परता से उसकी खातिरदारी कर रहा था मानो वह कोई देवता हो और उसकी एक ही मुस्कुराहट उसे स्वर्ग में पहुँचा देगी । पूर्णिमा के साथ बातचीत करने का अमृत को अवसर ही नहीं मिला और न अवसर निकालने का कोई प्रयत्न ही किया । वह पूर्णिमा को जब देखता था, तब वह रोती ही रहती थी और अमृत आँखों की जुबान से जहाँ तक हो सकता था, बिना कुछ कहे ही उसे जितना ढांढस और तसल्ली दे सकता था, वह देता था और उसके प्रति सहानुभूति दिखाता था ।
तीसरे दिन पूर्णिमा रो-धोकर ससुराल के लिए विदा हो गई । अमृत ने उसी दिन शिवजी के मन्दिर में जाकर परम निष्ठा तथा भक्ति से भरे हुए दिल से प्रार्थना की कि पूर्णिमा सदा सुखी रहे । जब नया और ताजा गम हो तो फिर इधर-उधर के और फालतू विचारों का भला कहीं प्रवेश हो सकता है । दुःख तो आत्मा के रोगों का नाशक है परन्तु मन में उसे एक तरह की शून्यता का अनुभव हो रहा था, मानो अब उसका जीवन उजाड़ हो गया था । अब उसका कोई उद्देश्य या कोई कामना नहीं रह गई थी ।
3
तीन बरस बाद पूर्णिमा फिर मैके आई । इस बीच में अमृत का भी ब्याह हो गया और जीवन का जुआ गरदन पर रखे हुए लकीर पीटता चला जा रहा था । परन्तु उसके मन में एक ऐसी अस्पष्ट-सी वासना दबी हुई थी, जिसे वह कोई स्पष्ट रूप नहीं दे सकता था । वह वासना थर्मामीटर के पारे की तरह उसके अन्दर सुरक्षित थी । अब पूर्णिमा ने आकर उसमें गरमी पैदा कर दी थी और वह पारा बढ़कर सरसाम की सीमा तक जा पहुँचा था । उसकी गोद में दो बरस का एक प्यारा-सा बच्चा था; अमृत उस बच्चे को दिन-रात मानो गले से बाँधे रहता था । वह सवेरे और सन्ध्या उसे गोद में लेकर टहलने जाया करता था और उसके लिए बाजार से तरह-तरह के खिलौने और मिठाइयाँ लाया करता था । सवेरा होते ही उसके जलपान के लिए हलुआ और दूध लेकर पहुँच जाता था । उसे नहलाता-धुलाता और उसके बाल साफ करता था । उसके फोड़े-फुंसियां धोकर उन पर मलहम लगाता था । ये सभी सेवाएं उसने अपने जिम्मे ले ली थी । बच्चा भी उसके साथ इतना हिल-मिल गया था कि पल-भर के लिए भी उसका गला न छोड़ता था । यहाँ तक कि कभी-कभी उसी के पास सो भी जाता था और पूर्णिमा के आकर बुलाने पर भी उसके साथ नहीं जाता था ।
अमृत पूछता – तुम किसके बेटे हो ।
बच्चा कहता – टुमाले ।
अमृत मारे आनन्द के मतवाला होकर उसे गले से लगा लेता था ।
पूर्णिमा का रूप अब और भी निखर आया था । कली खिलकर फूल हो गई थी । अब उसके स्वभाव में अहमन्यता और अभिमान आ गया था और साथ ही बनाव-सिंगार से प्रेम भी हो गया था । सोने के गहनों से सजकर और रेशमी साड़ी पहनकर अब वह और भी अधिक आकर्षक हो गई थी और ऐसा जान पड़ता था कि मानो वह अमृत से कुछ बचना चाहती है । बिना कोई विशेष आवश्यकता हुए उससे बहुत कम बोलती है और जो कुछ बोलती भी है वह इस ढंग से बोलती कि मानो अमृत पर कोई एहसान कर रही है । अमृत उसके बच्चे के लिए इतनी जान देता है और उसकी फरमाइशों को कितने शौक से पूरा करता है, लेकिन ऊपर से देखने पर यही जान पड़ता था कि पूर्णिमा की निगाहों में उसकी इन सब सेवाओं का कोई मूल्य ही नहीं था । मानो सेवा करना अमृत का कर्त्तव्य ही है और यह कर्त्तव्य उसे पूरा करना चाहिए । इसके लिए वह किसी प्रकार के धन्यवाद या कृतज्ञता का अधिकारी नहीं है ।
जब बच्चा रोता है, तब वह उसे धमकाती है कि खबरदार, रोना नहीं । नहीं तो मामाजी तुमसे कभी न बोलेंगे और इतना सुनते ही बच्चा चुप हो जाता है ।
जब उसे किसी चीज की जरूरत होती है । तब वह अमृत को बुलाकर मानो आज्ञा के रूप में उससे कह देती है । और अमृत भी तुरन्त उस आज्ञा का पालन करता है, मानो वह उसका गुलाम हो । वह भी शायद यही समझती है कि मैंने अमृत से गुलामी का पट्टा लिखा लिया है ।
छः महीने मैके रहकर पूर्णिमा फिर ससुराल चली गई । अमृत उसे पहुँचाने कि लिए स्टेशन तक आया था । जब वह गाड़ी में बैठ गई तब अमृत ने बच्चा उसकी गोद में दे दिया । अमृत की आँखों से आँसू की बूँद टपक पड़ी और उसने मुँह फेर लिया और आंखों पर हाथ फेरकर आंसू पोंछ डाला । पूर्णिमा को अपने आँसू कैसे दिखाए? क्योंकि उसकी आँखें तो बिलकुल खुश्क थी । लेकिन फिर भी उसका जी नहीं मानता था । वह सोचता था कि न जाने अब फिर कब मुलाकात हो ।
पूर्णिमा ने कुछ अभिमान के साथ कहा – बच्चा कई दिन तक तुम्हारे लिए बहुत हुड़केगा ।
अमृत ने भरे हुए गले से कहा – मुझे तो उम्र-भर भी इसकी सूरत नहीं भूलेगी ।
‘कभी-कभी एकाध पत्र तो भेज दिया करो ।’
‘भेजूँगा ।’
‘मगर मैं जवाब नहीं दूँगी, यह समझ लो ।’
‘मत देना । मैं माँगता तो नहीं… । मगर याद रखना ।’
गाड़ी चल पड़ी । अमृत उसकी खिड़की की ओर देखता रहा । गाड़ी के कोई एक फलांग निकल जाने पर उसने देखा कि पूर्णिमा ने खिड़की से सिर निकालकर उसकी तरफ देखा और फिर बच्चे को गोद में लेकर उसे जरा-सा दिखला दिया ।
अमृत का हृदय उस समय उड़कर पूर्णिमा के पास पहुँच जाना चाहता था । वह इतना प्रसन्न है, मानो उसका उद्देश्य सिद्ध हो गया हो ।
4
उसी वर्ष पूर्णिमा की माँ का देहान्त हो गया । पूर्णिमा उस समय सफर में थी । वह अपनी माँ को अन्तिम समय में न देख सकी । जहाँ तक हो सकता था, अमृत ने पहले तो उसकी चिकित्सा की और उसके मर जाने पर उसका क्रियाकर्म भी कर दिया । ब्राह्मणों को भी और बिरादरीवालों को भी भोजन कराया, मानो स्वयं उसकी माँ मर गई हो । स्वयं उसके पिता का देहान्त हो ही चुका था, इसलिए वह आप ही अपने घर का मालिक हो गया था । कोई उसका हाथ पकड़नेवाला नहीं था ।
पूर्णिमा अब भला किस नाते से मैके आती? और फिर अब उसे इतनी फुरसत कहाँ थी! अपने घर की मालकिन थी । घर किस पर छोड़कर आती । उसे दो बच्चे और भी हुए । पहला लड़का बड़ा होकर स्कूल में पढ़ने लगा । छोटा देहात के मदरसे में पड़ता था । अमृत साल में एक बार नाई को भेजकर उन सबकी खैर-सल्ला मँगा लिया करता था । पूर्णिमा सब प्रकार से सुखी और निश्चिन्त है, और उसकी तसल्ली के लिए इतना ही काफी था । अमृत के लड़के भी सयाने हो गये थे । वह घर-गृहस्थी की चिन्ताओं में फंसा रहता था । फिर उसकी उम्र भी चालीस से आगे निकल गई थी । परन्तु फिर भी पूर्णिमा की स्मृति अभी तक उसके हृदय के गम्भीरतर भाग में सुरक्षित थी ।
5
अचानक एक दिन अमृत ने सुना कि पूर्णिमा के पति का देहान्त हो गया । परन्तु आश्चर्य यह था कि उसे कोई दुःख नहीं हुआ । वह यों ही अपने मन में यह निश्चय कर बैठा था कि इस खबीस बुड्ढे के साथ पूर्णिमा का जीवन कभी ईर्ष्या के योग्य नहीं हो सकता । कर्तव्य की विवशता और पतिव्रत धर्म के पालन के विचार से उसने कभी अपना हार्दिक कष्ट प्रकट नहीं किया था । परन्तु यह असम्भव है कि सभी प्रकार के सुख और निश्चिन्तता के रहते हुए भी उस घृणित व्यक्ति के साथ उसे कोई विशेष प्रेम रहा हो । यह तो भारतवर्ष ही है, जहाँ ऐसी अप्सराएं ऐसे अयोग्य कुपात्रों के गले बाँध दी जाती हैं, और नहीं तो यह पूर्णिमा किसी दूसरे देश में होती, तो उस देश के नवयुवक उस पर निछावर हो जाते । उसकी मरी वासनाएँ फिर जीवित हो गई । अब उसमें वह पहले वाली झिझक नहीं है और न उसकी जुबान पर वह पहले वाली मौन की मोहर ही है और फिर पूर्णिमा भी अब स्वतंत्र है । अवस्था के धर्म ने अवश्य ही उसे अधिक दयालु बना दिया होगा । वह शोखी, अल्हड़पन और लापरवाही तो कभी की विदा हो चुकी होगी । उस लड़कपन की जगह अब उसमें अनुभवी स्त्रियों की वे सब बातें हो गई होंगी, जो प्रेम का आदर करती हैं और उसकी इच्छुक होती हैं । वह पूर्णिमा के घर मातमपुरसी करने जाएगा और उसे अपने साथ ले आयेगा । और जहाँ तक हो सकेगा, उसकी सेवा करेगा । अब पूर्णिमा के केवल सामीप्य से ही उसको सन्तोष हो जाएगा । वह केवल उसके मुँह से यह सुनकर ही हार्दिक सन्तोष प्राप्त करेगा कि वह भी उसे याद करती है । अब भी उससे वही बचपन का-सा प्रेम करती है । बीस साल पहले उसने पूर्णिमा की जो सूरत देखी थी, उसका शरीर भरा हुआ था, गालों पर लाली थी, अंगों में कोमलता थी । उसकी खिंची हुई जोड़ी थी जो मानो अमृत के भरे कुण्ड के समान थी । उसकी मुस्कुराहट मादक थी । बस उसका वही रूप अब भी बहुत ही थोड़े परिवर्तन के साथ उसकी अस्त्रों में समाया हुआ था । और वह परिवर्तन उस एकान्त की आँखों में उसे और भी अधिक प्रिय जान पड़ने लगा था । अवश्य ही समय की प्रगति का उस पर कुछ न कुछ प्रभाव होगा । परन्तु पूर्णिमा के शरीर में किसी ऐसे परिवर्तन की वह कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था जिससे उसकी मनोहरता में कोई अन्तर आ जाये । और अब वह केवल ऊपरी रूप का उतना अधिक इच्छुक नहीं रह गया था, जितना उसके मधुर वचनों का भूखा था । वह उसकी प्रेमपूर्ण दृष्टि और उसके विश्वास का ही विशेष इच्छुक था । अपने पुरुषोचित आत्माभिमान के कारण कदाचित् वह यह भी समझता था कि वह पूर्णिमा की अतृप्त प्रेम-भावना को अपनी नाजबरदारियों और प्रेम के आवेश से सुरक्षित रखेगा और अपनी पिछली भूल-चूक का मार्जन कर डालेगा ।
6
संयोग से पूर्णिमा स्वयं ही एक दिन अपने छोटे बच्चे के साथ अपने घर आ गई । उसकी एक विधवा मौसी थी जो उसकी माँ के साथ ही अपने वैधव्य के दिन काट रही थी । वह अभी तक जीती थी । इस प्रकार वह सूना घर फिर से बस गया ।
जब अमृत ने यह समाचार सुना तब वह बड़े शौक से मानो मदमत्त होकर उसके घर की तरफ दौड़ा । वह अपने लड़कपन और जवानी की मधुर स्मृतियों को अपने मन की झोली में अच्छी तरह सँभालता हुआ ले जा रहा था । उस समय उसकी अवस्था ठीक उस छोटे बच्चे के समान थी जो अपने हमजोली को देखकर उसके साथ चलने के लिए टूटे-फूटे खिलौने लेकर दौड़ पड़ता है ।
लेकिन उसकी सूरत देखते ही उसका सारा शौक और सारी उमंग मानो बुझ-सी गई । वह निःस्तब्ध होकर खड़ा रह गया । पूर्णिमा उसके सामने आकर सिर झुकाकर खड़ी हो गई । सफेद साड़ी के घूंघट से आधा मुँह छिपा हुआ था लेकिन कमर झुक गई थी । बांहें सूत-सी पतली, पैर के पिछले भाग की रगें उभरी हुई, आंसू बह रहे थे और चेहरे का रंग बिलकुल पीला पड़ गया था मानो कफ़न में लपेटी हुई लाश खड़ी हो ।
पूर्णिमा की मौसी ने आकर कहा – बैठो बेटा । देखते हो इसकी हालत, सुखकर काँटा हो गई है । एक क्षण को भी आँसू थमते नहीं । सिर्फ एक समय सूखी रोटियाँ खाती है और किसी चीज से मतलब नहीं । नमक छोड़ दिया है, घी-दूध सब त्याग दिया है । बस रूखी रोटियों से काम । इस पर आए दिन व्रत रखती है । कभी एकादशी, कभी इतवार और कभी मंगल । एक चटाई बिछाकर जमीन पर सोती हैं, मगर किसी की नहीं सुनती । कहती है कि जब भगवान ने सुहाग ही उठा लिया, तो फिर सब कुछ मिथ्या है । जी बहलाने के लिए यहाँ आई थी । मगर यहाँ भी रोने के सिवा दूसरा काम नहीं । कितना समझाती हूँ कि बेटी, भाग्य में जो कुछ लिखा था, वह हुआ । अब सब्र करो । भगवान् ने तुम्हें बाल-बच्चे दिये हैं । उनको पालो । घर में ईश्वर का दिया सब कुछ है । चार को खिलाकर खा सकती हो । मन पवित्र होना चाहिए । शरीर को दुःख देने से क्या लाभ? लेकिन सुनती ही नहीं । अब तुम समझाओं, तो शायद माने ।
अमृत ऊपर से देखने में तो निःस्तब्ध; परन्तु अन्दर हृदय-विदारक वेदना छिपाये हुए खड़ा था, मानो जिस नींव पर उसने जिन्दगी की इमारत खड़ी की थी, वह हिल गई हो । आज उसे मालूम हुआ कि जन्म-भर उसने जिस वस्तु को तथ्य समझ रखा था, वह वास्तव में मृग-तृष्णा थी, अथवा केवल स्वप्न था । पूर्णिमा के इस विकट आत्म-संयम और तपस्विनी के-से आचरण के सामने उसकी समस्त वासनाओं और प्रेम की उमंगों का नाश हो गया था और उसके जीवन का यह नया तथ्य आकर उपस्थित हो गया था कि यदि मन में मिट्टी को देवता बनाने की शक्ति है तो मनुष्य को देवता बनाने की शक्ति भी है । पूर्णिमा उसी घृणित मनुष्य को देवता बनाकर उसकी पूजा कर रही थी ।
उसने शान्त भाव से कहा – तपस्विनी को हम जैसे स्वार्थी लोग कैसे समझा सकते हैं मौसी? हम लोगों का कर्त्तव्य इसके चरणों पर सिर झुकाना है, इसे समझाना नहीं ।
पूर्णिमा ने मुँह पर का घूँघट हटाते हुए कहा – तुम्हारा बच्चा तुम्हें अभी तक पूछा करता है।
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