Posted inमुंशी प्रेमचंद की कहानियां, हिंदी कहानियाँ

मेरी पहली रचना – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

उस वक्त मेरी उम्र कोई 13 साल को रही होगी । हिन्दी बिलकुल न जानता था । उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था । मौलाना शरर, पं. रतननाथ सरशार, मिर्जा रुसवा, मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे । इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थीं, स्कूल की याद भूल जाती […]

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बोध – मुंशी प्रेमचंद

पंडित चंद्रधर ने एक अपर प्राइमरी में मुदर्रिसी तो कर ली थी, किन्तु पछताया करते कि कहां से इस जंजाल में आ फंसे। यदि किसी अन्य विभाग में नौकर होते तो अब तक हाथ में चार पैसे होते, आराम से जीवन व्यतीत होता। यहां तो महीने भर प्रतीक्षा करने के पीछे कहीं पंद्रह रुपये देखने […]

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रहस्य – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

विमल प्रकाश ने सेवाश्रम के द्वार पर पहुँचकर जेब से रूमाल निकाला और बालों पर पड़ी हुई गर्द साफ की, फिर उसी रूमाल से जूतों की गर्द झाड़ी और अन्दर दाखिल हुआ । सुबह को वह रोज टहलने जाता है और लौटती बार सेवाश्रम की देख-भाल भी कर लेता है । वह इस आश्रम का […]

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प्रेरणा – मुंशी प्रेमचंद

मेरी कक्षा में सूर्यप्रकाश से ज्यादा ऊधमी कोई लड़का न था। बल्कि यों कहो कि अध्यापन-काल के दस वर्षों में मुझे ऐसी विषम प्रकृति के शिष्य से साबिक़ा न पड़ा था। कपट-क्रीड़ा में उसकी जान बसती थी। अध्यापकों को बनाने और चिढ़ाने, उद्योगी बालकों को छेड़ने और रुलाने में ही उसे आनंद आता था। ऐसे-ऐसे […]

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जुर्माना – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

ऐसा शायद ही कोई महीना जाता कि अलारक्खी के वेतन से कुछ जुर्माना न कट जाता । कभी-कभी तो उसे 6 के 5 ही मिलते, लेकिन वह सब कुछ सहकर भी सफाई के दारोगा मु० खैरात अली खाँ के चुंगल में कभी न आती । खाँ साहब की मातहती में सैकड़ों मेहतरानियाँ थी । किसी […]

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सुहाग की साड़ी – मुंशी प्रेमचंद

यह कहना भूल है कि दांपत्य- सुख के लिए स्त्री-पुरुष के स्वभाव में मेल होना आवश्यक है। श्रीमती गौरा और श्रीमान कुंवर रतनसिंह में कोई बात न मिलती थी। गौरा उदार थी, रतनसिंह कौड़ी-कौड़ी को दांतों से पकड़ते थे। वह हसंमुख थी, रतनसिंह चिन्ताशील थे। वह कुल-मर्यादा पर जान देती थी, रतनसिंह इसे आडम्बर समझते […]

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लेखक – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

प्रातःकाल महाशय प्रवीण ने बीस दफा उबाली हुई चाय का पाला तैयार किया और बिना शक्कर और दूध के पी गये । यही उनका नाश्ता था । महीनों से मीठी, दूधिया चाय न मिली थी । दूध और शक्कर उनके लिए जीवन के आवश्यक पदार्थों में न थे । घर में गये जरूर, कि पत्नी […]

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गुल्ली-डंडा – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

हमारे अंग्रेजीदां दोस्त मानें, या न मानें मैं तो यही कहूंगा कि गुल्ली-डण्डा सब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डण्डा खेलते देखता हूं, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगूं। न लॉन की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से किसी […]

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कफ़न – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

झोंपड़े के द्वार पर बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए थे और अन्दर जवान बेटे की बीवी बुधिया प्रसव-वेदना से पछाड़ खा रही थी । रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज निकलती थी, कि दोनों कलेजा थाम लेते थे । जाड़े की रात थी, […]

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शतरंज के खिलाड़ी – मुंशी प्रेमचंद की कहानी

वाज़िदअली शाह का समय था। लखनऊ विलासिता के रंग में डूबा हुआ था। छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, सभी विलासिता में डूबे हुए थे। कोई नृत्य और गान की मज़लिस सजाता था, तो कोई अफ़ीम की पीनक ही के मजे लेता था। जीवन के प्रत्येक विभाग में आमोद-प्रमोद का प्रावधान था। शासन-विभाग में, साहित्य क्षेत्र में, सामाजिक व्यवस्था […]

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