Posted inमुंशी प्रेमचंद की कहानियां, हिंदी कहानियाँ

शिकारी राजकुमार – मुंशी प्रेमचंद

मई का महीना और मध्याह्न का समय था। सूर्य आंखों के सामने से हटकर सिर पर जा पहुंचा था, इसलिए उनमें शील न था। ऐसा विदित होता था मानो पृथ्वी उसके भय से थर-थर कांप रही थी। ठीक ऐसे ही समय एक मनुष्य एक हिरन के पीछे उदात्त भाव से घोड़ा फेंके चला आता था। […]

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सेवा-मार्ग – मुंशी प्रेमचंद

तारा ने बारह वर्ष तक दुर्गा की तपस्या की। न पलंग पर सोयी, न केशों को संवारा और न नेत्रों में सूरमा लगाया। पृथ्वी पर सोती, गेरुआ वस्त्र पहनती और रूखी रोटियां खाती। उसका मुख मुरझायी कली की भांति था, नेत्र ज्योतिहीन और हृदय एक शून्य बीहड़ मैदान। उसे केवल यही लौ लगी थी कि […]

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धर्म-संकट – मुंशी प्रेमचंद

‘पुरुषों और स्त्रियों में बड़ा अंतर है। तुम लोगों का हृदय शीशे की तरह कठोर होता है और हमारा हृदय नरम। वह विरह की आंच नहीं सह सकता।’ ‘शीशा ठेस लगते ही टूट जाता है। नरम वस्तुओं में लचक होती है।’ ‘चलो बातें न बनाओ। दिन भर तुम्हारी राह देखूं, रात भर घड़ी की सुइयां। […]

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बेटी का धन – मुंशी प्रेमचंद

बेतवा नदी दो ऊंचे कगारों के बीच इस तरह मुंह छिपाए हुए थी जैसे निर्मल हृदयों में साहस और उत्साह की मध्यम ज्योति छिपी रहती है। इसके एक कगार पर एक छोटा-सा गांव बसा है जो अपने भग्न जातीय चिह्नों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। जातीय गाथाओं और चिह्नों पर मर मिटने वाले लोग इस […]

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गरीब की हाय – मुंशी प्रेमचंद

मुंशी रामसेवक भौहें चढ़ाये हुए घर से निकले और बोले – इस जीने से तो मरना भला है। मृत्यु को प्रायः इस तरह के जितने निमंत्रण दिये जाते हैं, यदि वह सबको स्वीकार करती तो आज संसार उजाड़ दिखाई देता। मुंशी रामसेवक चांदपुर गांव के एक बड़े रईस थे। रईसों के सभी गुण इनमें भरपूर […]

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खून सफेद – मुंशी प्रेमचंद

चैत का महीना था लेकिन वे खलिहान, जहां अनाज की ढेरियां लगी रहती थी, पशुओं के शरण-स्थल बने हुए थे, जहां घरों से फाग और बसंत का अलाप सुनायी पड़ता, वहां आज भाग्य का रोना था। सारा चौमासा बीत गया, पानी की एक बूंद न गिरी। जेठ में एक बार मूसलाधार वृष्टि हुई थी, किसान […]

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नाग-पूजा – मुंशी प्रेमचंद

प्रातःकाल था। आषाढ़ का पहला दांगड़ा निकल गया था। कीट-पतंग चारों तरफ रेंगते दिखाई देते थे। तिलोत्तमा ने वाटिका की ओर देखा तो वृक्ष और पौधे ऐसे निखर गए थे, जैसे साबुन से मैले कपड़े निखर जाते हैं। उन पर एक विचित्र आध्यात्मिक शोभा छाई हुई थी, मानो योगीवर आनंद में मग्न पड़े हों। चिड़ियों […]

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लोकमत का सम्मान – मुंशी प्रेमचंद

बेचू धोबी को अपने गांव और घर से उतना ही प्रेम था, जितना प्रत्येक मनुष्य को होता है। उसे रूखी-सूखी और आधे पेट खाकर भी अपना गांव समग्र संसार से प्यारा था। यदि उसे वृद्धा किसान स्त्रियों की गालियां खानी पड़ती थी तो बहुओं से बेचू दादा कहकर पुकारे जाने का गौरव भी प्राप्त होता […]

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प्रारब्ध – मुंशी प्रेमचंद

लाला जीवनदास को मृत्युशय्या पर पड़े छह मास हो गए हैं। अवस्था दिनोंदिन शोचनीय होती जाती है। चिकित्सा पर उन्हें अब जरा भी विश्वास नहीं रहा। केवल प्रारब्ध का ही भरोसा है। कोई हितैषी वैद्य या डॉक्टर का नाम लेता है तो मुंह फेर लेते हैं। उन्हें जीवन की अब कोई आशा नहीं है। यहां […]

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विस्मृति – मुंशी प्रेमचंद

चित्रकूट के सन्निकट धनगढ़ नामक एक गांव है। कुछ दिन हुए, वहां शानसिंह और गुमानसिंह दो भाई रहते थे। ये जाति के ठाकुर (क्षत्रिय) थे। युद्ध-स्थल में वीरता के कारण उनके पूर्वजों को भूमि का एक भाग माफी प्राप्त हुआ था। खेती करते थे, भैंसें पाल रखी थी, घी बेचते थे, मट्ठा खाते थे और […]

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