lokamat ka sammaan by munshi premchand
lokamat ka sammaan by munshi premchand

बेचू धोबी को अपने गांव और घर से उतना ही प्रेम था, जितना प्रत्येक मनुष्य को होता है। उसे रूखी-सूखी और आधे पेट खाकर भी अपना गांव समग्र संसार से प्यारा था। यदि उसे वृद्धा किसान स्त्रियों की गालियां खानी पड़ती थी तो बहुओं से बेचू दादा कहकर पुकारे जाने का गौरव भी प्राप्त होता था। आनन्द और शोक के प्रत्येक अवसर पर उसका बुलावा होता था, विशेषतः विवाहों में तो उसकी उपस्थिति वर और वधू से कम आवश्यक न थी। उसकी स्त्री घर में पूजी जाती थी, द्वार पर बेचू का स्वागत होता था! वह पेशवाज़ पहने कमर में घंटियां बांधे साजिंदों को साथ लिए एक हाथ मृदंग और दूसरा अपने कान पर रखकर जब तत्काल रचित विरह और बोल कहने लगता तो आत्म-सम्मान से उसकी आंखें उन्मत्त हो जाती थी। हां, धेले पर कपड़े धोकर वह अपनी दशा से संतुष्ट रह सकता था किंतु जमींदार के नौकरों की क्रूरता और अत्याचार कभी-कभी इतने असह्य हो जाते थे कि उसका जी गांव छोड़कर भाग जाने को चाहने लगता था। गांव में कारिंदा साहब के अतिरिक्त पांच-छह चपरासी थे। उनके सहवासियों की संख्या कम न थी। बेचू को इन सज्जनों के कपड़े मुफ्त धोने पड़ते थे। उसके पास इस्तरी न थी, उनके कपड़ों पर इस्तरी करने के लिए उसे दूसरे-दूसरे गांव के धोबियों की चिरौरी करनी पड़ती थी। अगर कभी बिना इस्तरी किए ही कपड़े ले जाता तो उसकी शामत आ जाती थी। मार पड़ती, घंटों चौपाल के सामने खड़ा रहना पड़ता, गालियों की वह बौछार पड़ती कि सुनने वाले कानों पर हाथ रख लेते, उधर से गुजरने वाली स्त्रियां लज्जा से सिर झुका लेती।

जेठ का महीना था। आस-पास की ताल-तलैया सूख गयी थी। बेचू को पहर रात रहते दूर के ताल पर जाना पड़ता था। यहां भी धोबियों की ओसरी बंधी हुई थी। बेचू की ओसरी पांचवे दिन पड़ती थी। पहर रात रहे, लादी लादकर ले जाता। मगर जेठ की धूप में 9-10 बजे के बाद खड़ा न हो सकता। आधी लादी भी न धुल पाती, बिना धुले कपड़े समेटकर घर चला आता। गांव के सरल यजमान उसकी विपत्ति-कथा सुनकर शांत हो जाते थे, न कोई गालियां देता, न मारने दौड़ता। जेठ की धूप में इन्हें भी पुर चलाना और खेत जोतना पड़ता था। अपने पैरों में बिवाई फटी थी, उसकी पीर जानते थे। परन्तु कारिंदा महाशय को प्रसन्न करना इतना सरल न था। उनके आदमी नित्य बेचू के सिर पर सवार रहते थे। यह बड़ी गम्भीरता से कहते – ‘तू एक एक अठवारे तक कपड़े नहीं लाता, क्या यह भी कोई जाड़े के दिन हैं? आजकल पसीने से दूसरे दिन कपड़े मैले हो जाते हैं, कपड़ों से बू आने लगती है और तुझे कुछ परवाह नहीं रहती।’ बेचू हाथ-पैर जोड़ कर किसी तरह उन्हें मनाता रहता था, यहां तक कि एक बार उसे बातें करते 9 दिन हो गए और कपड़े तैयार न हो सके। धुल तो गए थे, पर इस्तरी न हुई थी। अंत में विवश होकर बेचू दसवें दिन कपड़े लेकर चौपाल पहुंचा। मारे डर के पैर न उठते थे। कारिंदा साहब उसे देखते ही क्रोध से लाल हो गए। बोले – क्यों बे पाजी, तुझे गांव में रहना है कि नहीं?

बेचू ने कपड़े की गठरी तख्त पर रख दी और बोला – क्या करूं सरकार, कहीं भी पानी नहीं है और न मेरे पास इस्तरी है।

कारिंदा – पानी तेरे पास नहीं है और सारी दुनिया में है। अब तेरा इलाज इसके सिवाय और कुछ नहीं है कि गांव से निकाल दूं। शैतान, दाई से पेट छिपाने चला है, कपड़े दूसरों को बारात करने के लिए देता है, उस पर बहाने बताता है, पानी नहीं, इस्तरी नहीं।

बेचू – मालिक, गांव आपका है, चाहे रहने दें, चाहें निकाल दें, लेकिन यह कलंक न लगाएं। इतनी उमिर आप ही लोगों की खिदमत करते हो गई, पर चाहे कितनी ही भूल-चूक हो, कभी नीयत बद नहीं हुई। अगर गांव में कोई कह दे कि मैंने कभी ग्राहकों के साथ ऐसी चाल चली है तो उसकी टांग की राह निकल जाऊं। यह दस्तूर शहर के धोबियों का है। निरंकुशता का तर्क से विरोध है। कारिंदा साहब ने और कुछ अपशब्द कहे। बेचू ने भी न्याय और दया की दुहाई दी। फल यह हुआ कि उसे आठ दिन हल्दी और गुड़ पीना पड़ा। नवें दिन उसने सब ग्राहकों के कपड़े जैसे तैसे धो दिए, अपनी बोरिया-बंधना संभाला और बिना किसी से कुछ कहे सुने रात को पटने की राह ली। अपने पुराने ग्राहकों से विदा होने के लिए जितने धैर्य की जरूरत थी, उससे वह वंचित था।

बेचू शहर में आया तो ऐसा जान पड़ा कि मेरे लिए पहले से ही जगह खाली थी। उसे केवल एक कोठरी किराये पर लेनी पड़ी और काम चल निकला। पहले तो वह किराया सुनकर चकराया। देहात में तो महीने भर में इतनी धुलाई भी न मिलती थी, पर जब धुलाई की दर मालूम हुई तो किराये की अखर मिट गई। एक ही महीने में ग्राहकों की संख्या उसकी गणना-शक्ति से अधिक हो गई। यहां पानी की कमी न थी। वह वादे का पक्का था। अभी नागरिक-जीवन के कुसंस्कारों से मुक्त था। कभी-कभी उसकी एक दिन की मजूरी देहात की वार्षिक आय से बढ़ जाती थी।

लेकिन तीन ही चार महीनों में उसे शहर की हवा लगाने लगी। पहले नारियल पीता था, अब एक गुड़गुड़ी लाया नंगे पांव जूते से वेष्टित हो गए और मोटे अनाज से पाचन क्रिया में विघ्न पड़ने लगा। पहले कभी-कभी तीज त्यौहार के दिन शराब पी लिया करता था, अब थकान मिटाने के लिए नित्य उसका सेवन होने लगा। स्त्री को आभूषणों की चाट पड़ी। लड़के खोंचे पर लट्टू हुए, हलुवा और मूंगफली की आवाज सुनकर अधीर हो जाते। उधर मकान मालिक ने किराया बढ़ा दिया, भूसा और खली भी मोतियों के मोल बिकती थी, लादी के दोनों बैलों पर पेट भरने में एक खासी रकम निकल जाती थी। अतएव पहले के महीने में जो बचत हो जाती थी, वह अब गायब हो गई। कभी-कभी खर्च का पलड़ा भारी हो जाता, लेकिन किफायत करने की कोई विधि समझ में न आती थी। निदान स्त्री ने बेचू की निगाह बचाकर ग्राहकों के कपड़े पछई देने शुरू किए। बेचू को यह बात मालूम हुई तो बिगड़ कर बोला – अगर मैंने फिर यह शिकायत सुनी तो मुझसे बुरा कोई न होगा। इसी इल्जाम पर तो मैंने बाप-दादों का गांव छेड़ दिया। यहां से भी निकालना चाहती है क्या?

स्त्री ने उत्तर दिया – तुम्हीं से तो एक दिन भी दारू के बिना नहीं रहा जाता। मैं क्या पैसे लाकर लुटाती हूं। जो खर्च लगे वह देते जाओ। मुझे इससे कुछ मिठाई थोड़े ही मिलती है।

पर शनैः शनैः नैतिक ज्ञान ने आवश्यकता के सामने सिर झुकाना शुरू किया। एक बार उसे कई दिन तक ज्वर आया। स्त्री उसे डोली में बिठाकर वैद्य जी के यहां ले गई। वैद्य जी ने नुस्खा लिख दिया। घर में पैसे न थे। बेचू स्त्री को कातर नेत्रों से देखकर बोला – तो क्या होगा? दवा मंगानी ही है?

स्त्री – जो कहो वह करूं।

बेचू – किसी से उधार न मिलेगा?

स्त्री – सबसे तो उधार ले चुकी। मुहल्ले में राह चलना मुश्किल है। अब किससे लूं? अकेले जितना काम हो सकता है, करती हूं। अब छाती फाड़कर मर थोड़े ही जाऊंगी? कुछ पैसे ऊपर से मिल जाते थे, लेकिन तुमने उसकी मनाही कर दी है। तो मेरा क्या बस है? दो दिन से बैल भूखे खड़े हैं। दो रुपये हों तो इनका पेट भरे।

बेचू – अच्छा, जो तेरे जी में आये कर, किसी तरह काम तो चला। मुझे मालूम हो गया कि शहर में अच्छी नीयत वाले आदमी का निर्वाह नहीं हो सकता।

उस दिन से यहां अन्य धोबियों की नीति का व्यवहार होने लगा।

बेचू के पड़ोस में एक वकील के मुहर्रिर मुंशी दाताराम रहा करते थे। बेचू कभी-कभी अवकाश के दिन उनके पास जा बैठता। पड़ोस की बात थी, धुलाई का कोई हिसाब-किताब न था। मुंशीजी बेचू की खातिर करते, अपनी चिलम उतारकर उसकी तरफ बड़ा देते, कभी घर में अच्छी चीज पकती तो बेचू के लड़कों के लिए भिजवा देते। हां, इसका विचार रखते थे कि इन सत्कारों का मूल्य धुलाई के पैसे से बढ़ने न पाए।

गर्मियों के दिन थे, बारातों की घूम थी। मुंशीजी को एक बारात में शरीक होना था। गुड़गुड़ी के लिए पेचवान बनवाया, रोगनी चिलम लाए, सलेमशाही जूते खरीदे, अपने वकील साहब के घर से एक कालीन मंगनी लाये, अपने मित्र से सोने की अंगूठी और बटन लिए। इन सामग्रियों को एकत्रित करने में ज्यादा कठिनाई न पड़ी, किंतु कपड़े मंगनी लेते हुए शर्म आती थी। बारात के योग्य कपड़े बनवाने की गुंजाइश न थी। तनजेब के कुरते, रेशमी अचकन, नैनसुख का चुन्नटदार पायजामा, बनारसी साफा बनवाना आसान न था। खासी रकम लगती थी। रेशमी किनारे की धोतियां और काशी सिल्क की चादर खरीदनी भी कठिन समस्या थी। कई दिनों तक बेचारे इसी चिंता में पड़े रहे। अंत में बेचू के सिवाय और कोई इस चिंता का निवारण करने वाला न दिखाई दिया। संध्या समय जब बेचू उनके पास आकर बैठ तो बड़ी नम्रता से बोले – बेचू एक बारात में जाना था। और सब सामान तो मैंने जमा कर लिए है, मगर कपड़े बनवाने में झंझट है। रुपयों की तो कोई चिंता नहीं, तुम्हारी दया से कभी हाथ खाली नहीं रहता। पेशा भी ऐसा कि जो कुछ मिल जाये, वह थोड़ा है। एक-न-एक आंख का अंधा, गांठ का पूरा नित्य फंसा ही रहता है, पर जानते हो, आजकल लग्न की तेजी है। दर्जियों को सिर उठाने की फुरसत नहीं, दूनी सिलाई लेते हैं, तिस पर भी महीनों दौड़ाते हैं। अगर तुम्हारे यहां मेरे लायक कपड़े हों तो दो-तीन दिन के लिए दे दो, किसी तरह सिर से यह बला टले। नेवता दे देने में किसी का क्या खर्च होता है, बहुत किया तो पत्र छपवा लिए, लेकिन लोग यह नहीं सोचते कि बारातियों को कितनी तैयारियां करनी पड़ती हैं, क्या-क्या कठिनाइयां पड़ती हैं। अगर बिरादरी में यह रिवाज हो जाता कि जो महाशय निमंत्रण भेजे वही उनके लिए सब सामान जुटाएं तो लोग इतनी बेपरवाही से नेवते न दिया करते। तो बोलो – ‘मेरी मदद करोगे न?’

बेचू ने मुरव्वत में पड़कर कहा – मुंशीजी आपके लिए किसी बात से इंकार थोड़ी ही है। लेकिन बात यह है कि आजकल लगन की तेजी से सभी ग्राहक अपने-अपने कपड़ों की जल्दी मचा रहे हैं, दिन में दो-तीन बार आदमी भेजते हैं। ऐसा न हो, इधर आपको कपड़े दे दूं उधर कोई जल्दी मचाने लगे।

मुंशी – अजी दो-तीन दिन के लिए टालना कौन बड़ा काम है। तुम चाहो तो हफ्तों टाल सकते हो। अभी भट्टी नहीं दी, अभी इस्तरी नहीं हुई, घाट बंद है। तुम्हारे पास बहानों की क्या कमी है। पड़ोस में रहकर मेरी खातिर से इतना भी न करोगे?

बेचू – नहीं मुंशीजी, आपके लिए जान हाजिर है। चलिए, कपड़े पसंद कर लीजिए, तो मैं उन पर और एक बेरी इस्तरी करके ठीक कर दूं। यही न होगा, ग्राहकों की घुड़कियां खानी पड़ेगी। दो-चार ग्राहक टूट भी जायेंगे तो कौन गम है। मुंशी दाताराम ठाठ से बारात में पहुंचे। वहां उनके बनारसी साफे, रेशमी अचकन और रेशमी चादर ने ऐसा रंग जमाया कि लोग समझने लगे, यह कोई बड़े रईस है। बेचू भी उनके साथ हो लिया था। मुंशीजी उसकी बड़ी खातिर कर रहे थे। उसे एक बोतल शराब दिला दी, भोजन करने गए तो एक पत्तल उसके वास्ते भी लेते आये। बेचू के बदले उसे चौधरी कहकर पुकारते थे। यह सारा ठाट-बाट उसी की बदौलत जो था।

आधी रात गुजर चुकी थी। महफिल उठ गयी थी। लोग सोने की तैयारियां कर रहे थे। बेचू मुंशीजी की चारपाई के पास एक चादर ओढ़े पड़ा था। मुंशीजी ने कपड़े उतारे और बड़ी सावधानी से अलगनी पर लटका दिए। हुक्का तैयार था, लेकर पीने लगे कि अकस्मात् साजिंदों में एक अताई आकर सामने खड़ा हो गया और बोला – कहिए, हजरत, यह अचकन और साफा आपने कहां पाया?

मुंशीजी ने उसकी ओर सशंक नेत्रों से देखकर कहा – इसका क्या मतलब।