mamata by munshi premchand
mamata by munshi premchand

बाबू रामरक्षादास दिल्ली के एक ऐश्वर्यशाली खत्री थे, बहुत ही ठाठ-बाट से रहने वाले। बड़े-बड़े अमीर उनके यहां नित्य आते-जाते थे। वे आए हुओं का आदर-सत्कार ऐसे अच्छे ढंग से करते थे कि इस बात की धूम सारे मुहल्ले में थी। नित्य उनके दरवाजे पर किसी-न-किसी बहाने से इष्ट-मित्र एकत्र हो जाते। टेनिस खेलते, ताश उड़ाते, हारमोनियम के मधुर स्वरों से जी बहलाते, चाय-पानी से हृदय प्रफुल्लित करते, अधिक और क्या चाहिए? जाति की ऐसी अमूल्य सेवा कोई छोटी बात नहीं है। नीची जातियों के सुधार के लिए दिल्ली में एक सोसाइटी थी। बाबू साहब उसके सेक्रेट्री थे, और इस कार्य को असाधारण उत्साह से पूर्ण करते थे। जब उनका बूढ़ा कहार बीमार हुआ और क्रिश्चियन मिशन के डॉक्टरों ने उसकी शुश्रूषा की, जब उसकी विधवा स्त्री ने निर्वाह की कोई आशा न देखकर क्रिश्चियन-समाज का आश्रय लिया, तब इन दोनों अवसरों पर बाबू साहब ने शोक के रेजल्यूशन्स पास किए। संसार जानता है कि सेक्रेट्री का काम सभाएं करना और रेजल्यूशन्स बनाना है। इससे अधिक वह कुछ नहीं कर सकता।

मिस्टर रामरक्षा का जातीय उत्साह यहां तक सीमाबद्ध न था। वे सामाजिक कुप्रथाओं तथा अंधविश्वास के प्रबल शत्रु थे। होली के दिनों में, जब कि मुहल्ले में चमार और कहार शराब से मतवाले होकर फाग गाते और डफ बजाते हुए निकलते, तो उन्हें बड़ा शोक होता। जाति की इस मूर्खता पर उनकी आंखों में आंसू भर आते और वे प्रायः इस कुरीति का निवारण अपने हंटर से किया करते। उनके हंटर में जाति-हितैषिता की उमंग उनकी वक्तृता से भी अधिक थी। यह उन्हीं के प्रशंसनीय प्रयत्न ये जिन्होंने मुख्य होली के दिन दिल्ली में हलचल मचा दी, फाग गाने के अपराध में हजारों आदमी पुलिस के पंजे में आ गए। सैकड़ों घरों में मुख्य होली के दिन मुहर्रम का-सा शोक फैल गया। इधर उनके दरवाजे पर हजारों पुरुष-स्त्रियां अपना दुखड़ा रो रही थी उधर बाबू साहब के हितैषी मित्रगण अपने उदारतावश मित्र के सद्व्यवहार की प्रशंसा करते। बाबू साहब दिन-भर में इतने रंग बदलते थे कि उस पर ‘पेरिस’ की पारियों को भी ईर्ष्या हो सकती थी। कई बैंकों में उनके हिस्से थे, कई दुकानें थी, किंतु बाबू साहब को इतना अवकाश न था कि उनकी कुछ देख-भाल करते। अतिथि-सत्कार एक पवित्र धर्म है। वे सच्ची देश-हितैषिता की उमंग से कहा करते थे – अतिथि-सत्कार आदिकाल से भारतवर्ष के निवासियों का एक प्रधान और सराहनीय गुण है। अभ्यागतों का आदर-सम्मान करने में हम अद्वितीय हैं। हम इससे संसार में मनुष्य कहलाने योग्य है। हम सब कुछ खो बैठे हैं, किंतु जिस दिन हममें यह गुण शेष न रहेगा, वह दिन हिंदू जाति के लिए लज्जा, अपमान और मृत्यु का दिन होगा।

मिस्टर रामरक्षा जातीय आवश्यकताओं से भी बेपरवाह न थे। वे सामाजिक और राजनीतिक कार्यों में पूर्णरूप से योग देते थे। यहां तक कि प्रतिवर्ष दो बल्कि कभी-कभी तीन वक्तृताएं अवश्य तैयार कर लेते। भाषणों की भाषा अत्यंत उपयुक्त, ओजस्वी और सर्वांग-सुंदर होती थी। उपस्थित जन और इष्ट-मित्र उनके एक-एक शब्द पर प्रशंसासूचक शब्दों की ध्वनि प्रकट करते तालियां बजाते, यहां तक कि बाबू साहब को व्याख्यान का क्रम स्थिर रखना कठिन हो जाता। व्याख्यान समाप्त होने पर उनके मित्र उन्हें गोद में उठा लेते और आश्चर्य-चकित होकर कहते – ‘तेरी भाषा में जादू है!’ सारांश यह कि बाबू साहब का यह जातीय प्रेम और उद्योग केवल बनावटी सहायता शून्य तथा फैशनेबुल था। यदि उन्होंने किसी सदुद्योग में भाग लिया था, तो वह सम्मिलित कुटुम्ब का विरोध था। अपने पिता के पश्चात् वे अपनी विधवा मां से अलग हो गए थे। इस जातीय सेवा में उनकी स्त्री विशेष सहायक थी। विधवा मां अपने बेटे और बहू के साथ नहीं रह सकती थी। इससे बहू की स्वाधीनता में विघ्न पड़ने में मन दुर्बल और मस्तिष्क शक्तिहीन हो जाता है। बहू को जलाना और कुढ़ाना सास की आदत है। इसलिए बाबू रामरक्षा अपनी मां से अलग हो गए थे। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने मात-ऋण का विचार करके दस हजार रुपये अपनी मां के नाम जमा कर दिए थे, कि उसके ब्याज से उनका निर्वाह होता रहे, किंतु अपने बेटे के इस उत्तम आचरण पर मां का दिल ऐसा टूटा कि वह दिल्ली ही छोड़कर अयोध्या जा रहीं। तब से वहीं रहती हैं। बाबू साहब कभी-कभी मिसेज रामरक्षा से छिपकर उनसे मिलने अयोध्या आया करते थे, किन्तु वह दिल्ली आने का कभी नाम न लेती। हां, यदि कुशल-क्षेम की चिट्ठी पहुंचने में कुछ देर हो जाती, तो विवश होकर समाचार पूछ लेती थीं।

उसी मुहल्ले में एक सेठ गिरधारीलाल रहते थे। उनका लाखों का लेन-देन था। वे हीरे और रत्नों का व्यापार करते थे। बाबू रामरक्षा के दूर के नाते में साढू होते थे। पुराने ढंग के आदमी थे – प्रातःकाल यमुना-स्नान करने वाले तथा गाय को अपने हाथों से झाड़ने-पोंछने वाले उनसे मिस्टर रामरक्षा का स्वभाव न मिलता था, परन्तु जब कभी रुपयों की आवश्यकता होती, तो वे सेठ गिरधारीलाल के यहां से बेखटके मंगा लिया करते थे। आपस का मामला था, केवल चार अंगुल के पत्र पर रुपया मिल जाता था, न कोई दस्तावेज, न स्टांप, न साक्षियों की आवश्यकता। मोटरकार के लिए दस हजार की आवश्यकता हुई, वह वहां से आया। घुड़दौड़ के लिए एक आस्ट्रेलियन घोड़ा। डेढ़ हजार में लिया गया। उसके लिए भी रुपया सेठजी के यहां से आया। धीरे-धीरे बीस हजार का मामला हो गया। सेठजी सरल हृदय के आदमी थे। समझते थे कि उसके पास दुकानें हैं, बैंकों में रुपया है। जब जी चाहेगा, रुपया वसूल कर लेंगे, किन्तु जब दो-तीन वर्ष व्यतीत हो गए और सेठी के तकाजे की अपेक्षा मिस्टर रामरक्षा की मांग ही का आधिक्य रहा तो गिरधारीलाल को संदेह हुआ। वह एक दिन रामरक्षा के मकान पर आए और सभ्य-भाव से बोले – ‘भाई साहब, मुझे एक हुंडी का रुपया देना है, यदि आप मेरा हिसाब कर दें तो बहुत अच्छा हो। यह कहकर हिसाब के कागजात और उनके पत्र दिखाए।’

मिस्टर रामरक्षा किसी गार्डन-पार्टी में सम्मिलित होने के लिए तैयार थे। बोले – ‘इस समय क्षमा कीजिए, फिर देख लूंगा, जल्दी क्या है?’

गिरधारीलाल को बाबू साहब की रुखाई पर क्रोध आ गया। वे रुष्ट होकर बोले – ‘आपको जल्दी नहीं है, मुझे तो है। दो सौ रुपये मासिक की मेरी हानि हो रही है?’ मिस्टर रामरक्षा ने असंतोष प्रकट करते हुए घड़ी देखी। पार्टी का समय बहुत करीब था। वे बहुत विनीत भाव से बोले – ‘भाई साहब, मैं बड़ी जल्दी में हूं। इस समय मेरे ऊपर कृपा कीजिए। मैं कल स्वयं उपस्थित होऊंगा।’

सेठजी एक माननीय और धन-सम्पन्न आदमी थे। वे रामरक्षा के इस कुरुचिपूर्ण व्यवहार पर जल गए। मैं इनका महाजन हूं – इनसे धन में, मान में, ऐश्वर्य में बढ़ा हुआ, चाहूं तो ऐसों को नौकर रख लूं। इनके दरवाजे पर आऊं, और आदर-सत्कार की जगह उलटे ऐसा रूखा बर्ताव। वह हाथ बांधे मेरे सामने न खड़ा रहे, किन्तु क्यों मैं पान, इलायची, इत्र आदि से भी सम्मान करने के योग्य नहीं? वे तुनक कर बोले – ‘अच्छा, तो क्या हिसाब साफ हो जाय।’

रामरक्षा ने उत्तर दिया – ‘हो जायेगा।’

रामरक्षा के गौरवशील हृदय पर सेठजी के इस बर्ताव के प्रभाव का कुछ खेदजनक असर हुआ। इस काठ के कुंदे ने आज मेरी प्रतिष्ठा धूल में मिला दी। वह मेरा अपमान कर गया। अच्छा, तुम भी इसी दिल्ली में रहते हो और हम भी यही हैं। निदान दोनों में गांठ पड़ गई। बाबू साहब की तबीयत ऐसी गिरी और हृदय में ऐसी चिंता उत्पन्न हुई कि पार्टी में जाने का ध्यान जाता रहा। वे देर तक इसी उलझन में पड़े रहे। फिर सूट उतार दिया और सेवक से बोले – ‘जा, मुनीम जी को बुला ला?’ मुनीम जी आये, उनका हिसाब देखा गया, फिर बैंकों का अकाउंट देखा, किन्तु ज्यों-ज्यों इस घाटी में उतरते गए, त्यों-त्यों अंधेरा बढ़ता गया। बहुत कुछ टटोला, कुछ हाथ न आया। अंत में निराश होकर वे आराम-कुर्सी पर बैठ गए और उन्होंने एक ठंडी सांस ले ली। दुकानों का माल बिका, किंतु रुपया बकाया में पड़ा हुआ था। कई ग्राहकों की दुकानें टूट गईं और उन पर जो नकद रुपया बकाया था, वह डूब गया। कलकत्ते के आढ़तियों से जो माल मंगाया था, रुपये चुकाने की तिथि सिर पर आ पहुंची और यहां रुपया वसूल न हुआ। दुकान का यह हाल, बैंकों का इससे भी बुरा। रात भर वे इन्हीं चिन्ताओं में करवटें बदलते रहे। अब क्या करना चाहिए? गिरधारीलाल सज्जन पुरुष हैं। यदि सारा कच्चा हाल उसे सुना दूं तो अवश्य मान जायेगा। किन्तु यह कष्टप्रद कार्य होगा कैसे? ज्यों-ज्यों प्रातःकाल समीप आता था, त्यों-त्यों उनका दिल बैठा जाता था। कच्चे विद्यार्थी की जो दशा परीक्षा के सन्निकट आने पर होती है, वही हाल इस समय रामरक्षा की था। वे पलंग से न उठे। मुंह-हाथ भी न धोया, खाने की कौन कहे। इतना जानते थे कि दुःख पड़ने पर कोई किसी का साथी नहीं होता। इसलिए एक आपत्ति से बचने के लिए कई आपत्तियों का बोझा न उठाना पड़े, इस खयाल से मित्रों को इन मामलों की खबर तक न दी। जब दोपहर हो गई और उनकी दशा ज्यों-की-त्यों रही, तो उनका छोटा लड़का बुलाने आया। उसने बाप का हाथ पकड़कर कहा – ‘लालाजी, आज दाने क्यों नहीं तलते?’

रामरक्षा – ‘भूख नहीं है।’

‘क्या काया है?’

‘मन की मिठाई।’

‘और क्या काया है ?’

‘मार।’

‘किसने मारा?’

‘गिरधारीलाल ने।’

लड़का रोता हुआ घर में गया और इस मार की चोट से देर तक रोता रहा। अंत में तश्तरी में रखी हुई दूध की मलाई ने उसकी इस चोट पर मरहम का काम दिया।

रोगी को जब जीने की आशा नहीं रहती, तो औषधि छोड़ देता है। मिस्टर रामरक्षा जब इस गुत्थी को न सुलझा सके, तो चादर तान ली और मुंह लपेटकर सो रहे। शाम को एकाएक उठकर सेठजी के यहां पहुंचे और कुछ असावधानी से बोले – ‘महाशय, मैं आपका हिसाब नहीं कर सकता।’

सेठजी घबराकर बोले – ‘क्यों?’

रामरक्षा – ‘इसलिए कि मैं इस समय दरिद्र-निहंग हूं। मेरे पास एक कौड़ी भी नहीं है। आप अपना रुपया जैसे चाहें, वसूल कर लें।’

सेठ – ‘यह आप कैसी बातें कहते हैं?’

रामरक्षा – ‘बहुत सच्ची।’

सेठ – ‘दुकानें नहीं हैं?’

रामरक्षा – ‘दुकानें आप मुफ्त ले जाइए।’

सेठ – ‘बैंक के हिस्से?’

रामरक्षा – ‘वह कब के उड़ गए।’

सेठ – ‘जब यह हाल था, तो आपको उचित नहीं था कि मेरे गले पर छुरी फेरते?’

रामरक्षा – (अभिमान से) ‘मैं आपके यहां उपदेश सुनने के लिए नहीं आया हूं।’

यह कहकर मिस्टर रामरक्षा वहां से चल दिए। सेठजी ने तुरन्त नालिश का दी। बीस हजार मूल, पांच हजार ब्याज। डिग्री हो गई। मकान नीलाम पर चढ़ा। पंद्रह हजार की जायदाद पांच हजार में निकल गयी। दस हजार की मोटर चार हजार में बिकी। सारी सम्पत्ति उड़ जाने पर कुल मिलाकर सोलह हजार से अधिक रकम न खड़ी हो सकी। सारी गृहस्थी नष्ट हो गई, तब भी दस हजार के ऋणी रह गए। मान-बड़ाई, धन-दौलत सभी मिट्टी में मिल गए। बहुत तेज दौड़ने वाला मनुष्य प्रायः मुंह के बल गिर पड़ता है।

इस घटना के कुछ दिनों पश्चात् दिल्ली म्युनिसिपैलिटी के मेम्बरों का चुनाव आरम्भ हुआ। इस पद के अभिलाषी वोटरों की पूजा करने लगे। दलालों के भाग्य उदय हुए। सम्मतियां मोतियों की तोल बिकने लगी। उम्मीदवार मेम्बरों के सहायक अपने-अपने मुवक्किल के गुण-गान करने लगे। चारों ओर चहल-पहल मच गई। एक वकील महाशय ने भरी सभा में मुवक्किल साहब के विषय में कहा –

‘मैं जिस बुजुर्ग का परोपकार हूं, वह कोई मामूली आदमी नहीं है। यह वह शख्स है, जिसने फरजंद अकबर की शादी में पच्चीस हजार रुपया सिर्फ रक्स व सरूर में सर्फ कर दिया था।’ उपस्थित जनों में प्रशंसा की उच्च-ध्वनि हुई।

एक दूसरे महाशय ने अपने मुहाल के वोटरों के सम्मुख मुवक्किल की प्रशंसा यों की –

‘मैं यह नहीं कह सकता कि आप सेठ गिरधारीलाल को अपना मेंबर बनाइए। आप अपना भला-बुरा स्वयं समझते हैं, और यह भी नहीं कि सेठजी मेरे द्वारा अपनी प्रशंसा के भूखे हों। मेरा निवेदन केवल यही है कि आप जिसे मेंबर बनाएं, पहले उसके गुण-दोषों का भली-भांति परिचय ले लें। दिल्ली में केवल एक मनुष्य है, जो गत 10 वर्ष से आपकी सेवा कर रहा है। केवल एक आदमी है, जिसने पानी पहुंचाने और स्वच्छता-प्रबंधों में हार्दिक धर्म-भाव से सहायता दी है। केवल एक पुरुष है, जिसको श्रीमान् वायसराय के दरबार में कुर्सी पर बैठने का अधिकार प्राप्त है, और आप सब महाशय उसे जानते भी हैं।’

उपस्थित जनों ने तालियां बजायी। सेठ गिरधारीलाल के मुहल्ले में उनके एक प्रतिवादी थे। नाम था मुंशी फैजुलरहमान खां। बड़े जमींदार और प्रसिद्ध वकील थे। बाबू रामरक्षा ने अपनी दृढ़ता, साहस, बुद्धिमत्ता और मृदु भाषण से मुंशीजी साहब की सेवा करनी आरम्भ की। सेठजी को परास्त करने का यह अपूर्व अवसर हाथ आया था। वे रात और दिन इसी धुन में लगे रहते। उनकी मीठी और रोचक बातों का प्रभाव उपस्थित जनों पर बहुत पड़ता। एक बार आपने असाधारण श्रद्धा-उमंग में आकर कहा – ‘मैं डंके की चोट पर कहता हूं कि मुंशी फैजुलरहमान से अधिक योग्य आदमी दिल्ली में न मिल सकेगा। यह वह आदमी है, जिसकी गज़लों पर कविजनों में ‘वाह-वाह’ मच जाती है। ऐसे श्रेष्ठ आदमी की सहायता करना मैं अपना जातीय और सामाजिक धर्म समझता हूं। अत्यंत शोक का विषय है कि बहुत-से लोग इस जातीय और पवित्र काम को व्यक्तिगत लाभ का साधन बनाते हैं। धन और वस्तु है, श्रीमान् वायसराय के दरबार में प्रतिष्ठित होना और वस्तु, किंतु सामाजिक सेवा तथा जातीय चाकरी और ही चीज है। यह मनुष्य, जिसका जीवन ब्याज-प्राप्ति, बेईमानी, कठोरता तथा निर्दयता और सुख-विलास में व्यतीत होता हो, इस सेवा के योग्य कदापि नहीं है।’

सेठ गिरधारीलाल इस अन्योक्ति-पूर्ण भाषण का हाल सुनकर क्रोध से आग हो गए। मैं बेईमान हूं! ब्याज का धन खानेवाला हूं। विषयी हूं? कुशल हुई, जो तुमने मेरा नाम नहीं लिया, किंतु अब भी तुम मेरे हाथ में हो। मैं अब भी तुम्हें जिस तरह चाहूं, नचा सकता हूं। खुशामदियों ने आग पर तेल डाला। इधर रामरक्षा अपने काम में तत्पर रहे। यहां तक कि ‘वोटिंग-डे’ आ पहुंचा। मिस्टर रामरक्षा को उद्योग में बहुत कुछ सफलता प्राप्त हुई थी। आज वे प्रसन्न थे। आज गिरधारीलाल को नीचा दिखाऊंगा, आज उसको जान पड़ेगा कि धन संसार के सभी पदार्थों को इकट्ठा नहीं कर सकता। जिस समय फैजुलरहमान के वोट अधिक निकलेंगे और मैं तालियां बजाऊंगा, उस समय गिरधारीलाल का चेहरा देखने योग्य होगा, मुंह का रंग बदल जायेगा, हवाइयां उड़ने लगेंगी, आंखें न मिला सकेगा। शायद फिर मुझे मुंह न दिखा सके। इन्हीं विचारों में अब रामरक्षा शाम को टाउन हाल में पहुंचे। उपस्थित जजों ने बड़ी उमंग के साथ उनका स्वागत किया। थोड़ी देर बाद ‘वोटिंग’ आरम्भ हुआ। मेम्बरी मिलने की आशा रखनेवाले महानुभाव अपने भाग्य का अंतिम फल सुनने के लिए आतुर हो रहे थे। छह बजे चेयरमैन ने फैसला सुनाया। सेठजी की हार हो गई। फैजुलरहमाज ने मैदान मार लिया। रामरक्षा ने हर्ष के आवेग में टोपी उछाल दी और स्वयं भी कई बार उछल पड़े। मुहल्ले वालों को अचम्भा हुआ। चांदनी-चौक से सेठजी हो हटाना मेरू को स्थान से उखाड़ना था। सेठजी के चेहरे से रामरक्षा को जितनी आशाएं थी, वे सब पूरी हो गई। उनका रंग फीका पड़ गया था। खेद और लज्जा की मूर्ति बने हुए थे। एक वकील साहब ने उनसे सहानुभूति प्रकट करते हुए कहा – ‘सेठजी, मुझे आपकी हार का बहुत बड़ा शोक है। मैं जानता कि खुशी के बदले रंज होगा, तो कभी यहां न आता। मैं तो केवल आपके ख्याल से यहां आया था।’ सेठ जी ने बहुत रोकना चाहा, परंतु आंखों में आंसू डबडबा ही गए। वे निस्पृह बनने का व्यर्थ प्रयत्न करके बोले – ‘वकील साहब, मुझे इसकी कुछ चिंता नहीं, कौन रियासत निकल गई? व्यर्थ उलझन, चिंता तथा झंझट रहती थी। चलो, अच्छा हुआ। गला छूटा। अपने काम में हर्ज होता था। सत्य कहता हूं मुझे तो हृदय से प्रसन्नता ही हुई। यह काम तो बेकाम वालों के लिए है, घर न बैठे रहे, यही बेगार की। मेरी मूर्खता थी कि मैं इतने दिनों तक आंखें बंद किए बैठा रहा।’ परंतु सेठजी की मुखाकृति ने इन विचारों का प्रमाण न दिया। मुखमंडल हृदय का दर्पण है, इसका निश्चय अलबत्ता हो गया।

किंतु बाबू रामरक्षा बहुत देर तक इस आनंद का मजा लूट न पाए और न सेठजी को बदला लेने के लिए बहुत देर तक प्रतीक्षा करनी पड़ी। सभा विसर्जित होते ही जब बाबू रामरक्षा सफलता की उमंग में ऐंठते, मूछों पर ताव देते और चारों ओर गर्व की दृष्टि डालते हुए बाहर आए, तो दीवानी के तीन सिपाहियों ने आगे बढ़कर उन्हें गिरफ्तारी का वारंट दिखा दिया। अबकी बाबू रामरक्षा के चेहरे का रंग उतर जाने की, और सेठजी के इस मनोवांछित दृश्य से आनंद उठाने की बारी थी। गिरधारीलाल ने आनंद की उमंग में तालियां तो न बजायी, परंतु मुस्कराकर मुंह फेर लिया। रंग में भंग पड़ गया।

आज इस विषय के उपलक्ष्य में मुंशी फैजुलरहमान ने पहले ही से एक बड़े समारोह के साथ गार्डन पार्क की तैयारियां की थी। मिस्टर रामरक्षा इसके प्रबंधकर्ता थे। आज की ‘आफ्टर डिनर स्पीच’ उन्होंने बड़े परिश्रम से तैयार की थी, किंतु इस वारंट ने सारी कामनाओं का सत्यानाश कर दिया। यों तो बाबू साहब के मित्रों में ऐसा कोई भी न था, जो दस हजार रुपये जमानत दे देता। अदा कर देने का तो जिक्र ही क्या, किंतु कदाचित् ऐसा होता भी तो सेठजी अपने को भाग्यहीन समझते। दस हजार रुपये और म्युनिसिपैलिटी की प्रतिष्ठित मेंबरी खोकर इन्हें इस समय यह हर्ष प्राप्त हुआ था।

मिस्टर रामरक्षा के घर पर ज्यों ही खबर पहुंची, कुहराम मच गया। उनकी स्त्री पछाड़ खाकर पृथ्वी पर गिर पड़ी। जब कुछ होश में आयी तो रोने लगी और रोने से छुट्टी मिली तो उसने गिरधारीलाल को कोसना आरम्भ किया। देवी-देवता मनाने लगी। उन्हें रिश्वत देने पर तैयार हुई कि ये गिरधारीलाल को किसी प्रकार निगल जाय। इस बड़े भारी काम की खुशामदें कर रही थी कि ये दोनों मिलकर उस गिरधारीलाल को हड़प ले जायें। किंतु गिरधारी का कोई दोष नहीं। दोष तुम्हारा है। बहुत अच्छा हुआ! तुम इसी पूजा के देवता थे। क्या अब दावतें न खिलाओगे? मैंने तुम्हें कितना समझाया, रोयी, रूठी, बिगड़ी किंतु तुमने एक न सुनी। गिरधारीलाल ने बहुत अच्छा किया। तुम्हें शिक्षा तो मिल गई, किंतु तुम्हारा भी दोष नहीं। यह सब आग मैंने ही लगाई है। मखमली स्लीपर के बिना मेरे पांव ही नहीं उठते थे। बिना जड़ाऊ कड़ों के मुझे नींद न आती थी। सेजगाड़ी मेरे ही लिए मंगवाईं थी। अंग्रेजी पढ़ने के लिए मेम साहब को मैंने ही रखा। ये सब कांटे मैंने ही बोए हैं।

मिसेज रामरक्षा बहुत देर तक इन्हीं विचारों में डूबी रही। जब रात भर करवटें बदलने के बाद वह सवेरे उठी-, तो उनके विचार चारों ओर से ठोकरें खाकर केवल एक केन्द्र पर जम गए। गिरधारीलाल बड़ा बदमाश और घमंडी है। मेरा सब कुछ लेकर भी उसे संतोष नहीं हुआ। इतना भी इस निर्दयी कसाई से न देखा गया। भिन्न-भिन्न प्रकार के विचारों ने मिलकर एक रूप धारण किया और किरणें एक होती है, तब अग्नि प्रकट हो जाती है। इसी स्त्री के हृदय में रह-रहकर क्रोध की एक असाधारण लहर उत्पन्न होती थी। बच्चे ने मिठाई के लिए हठ किया, उस पर बरस पड़ी। महरी ने चौका-बरतन करके चूल्हे में आग जला दी, उसके पीछे पड़ गई – मैं तो अपने दुःखों को रो रही हूं इस चुड़ैल को रोटियों की धुन सवार है। निदान, नौ बजे उससे न रहा गया उसने यह पत्र लिखकर अपने हृदय की ज्वाला ठंडी की –

‘सेठजी, तुम्हें अब अपने धन के घमंड ने अंधा कर दिया है, किंतु किसी का घमंड इसी तरह सदा नहीं रह सकता। कभी-न-कभी सिर अवश्य नीचा होता है। अफसोस कि कल शाम को, जब तुमने मेरे प्यारे पति को पकड़वाया है, मैं वहां मौजूद न थी, नहीं तो अपना और तुम्हारा रक्त एक कर देती। तुम धन के मद में भूले हुए हो। मैं उसी दम तुम्हारा नशा उतार देती। एक स्त्री के हाथों अपमानित होकर तुम फिर किसी को मुंह दिखाने लायक न रहते। अच्छा, इसका बदला तुम्हें किसी-न-किसी तरह जरूर मिल जायेगा। मेरा कलेजा उस दिन ठंडा होगा, जब तुम निर्वंश हो जाओगे और तुम्हारे कुल का नाम मिट जायेगा।’

सेठजी पर यह फटकार पड़ी, तो वे क्रोध से आग हो गए। यद्यपि क्षुद्र हृदय के मनुष्य न थे, परंतु क्रोध के आवेग में सौजन्य का चिह्न भी शेष नहीं रहता। यह ध्यान न रहा कि यह एक दुःखी की क्रंदन-ध्वनि है, एक सतायी हुई स्त्री की मानसिक दुर्बलता का विचार है। उसकी धनहीनता और विवशता पर उन्हें तनिक भी दया न आयी। मरे हुए को मारने का उपाय सोचने लगे।

इसके तीसरे दिन सेठ गिरधारीलाल पूजा के आसन पर बैठे हुए थे, महरी ने आकर कहा – ‘सरकार, कोई स्त्री आपसे मिलने आयी है।’ सेठजी ने पूछा – ‘कौन स्त्री है?’ महरी ने कहा – ‘सरकार, मुझे क्या मालूम? लेकिन है कोई भली मानुष रेशमी साड़ी पहने हुए। हाथ में सोने के कड़े हैं। पैरों में टाट के स्लीपर हैं। बड़े घर की स्त्री जान पड़ती हैं।’ यों साधारणतः सेठजी पूजा के समय किसी से नहीं मिलते थे। चाहे कैसा ही आवश्यक काम क्यों न हो, ईश्वरोपासना में सामाजिक बाधाओं को घुसने नहीं देते थे। किंतु ऐसी दशा में, जब कि किसी बड़े घर की स्त्री मिलने के लिए आए, तो थोड़ी देर के लिए पूजा में विलम्ब करना निंदनीय कहीं कहा जा सकता, ऐसा विचार करके वे नौकर से बोले – ‘उन्हें बुला लाओ।’

जब वह स्त्री आयी तो सेठजी स्वागत के लिए उठकर खड़े हो गए। तत्पश्चात् अत्यंत कोमल वचनों से कारुणिक शब्दों में बोले – ‘माता, कहां से आना हुआ?’ और जब यह उत्तर मिला कि वह अयोध्या से आयी हैं, तो आप ने फिर से दंडवत् किया और चीनी तथा मिश्री से भी अधिक मधुर और नवनीत से भी अधिक चिकने शब्दों में कहा – ‘अच्छा, आप श्री अयोध्या जी से आ रही हैं? उस नगरी का क्या कहना। देवताओं की पुरी है। बड़े भाग्य थे कि आपके दर्शन हुए। यहां आपका आगमन कैसे हुआ?’ स्त्री ने उत्तर दिया – ‘घर तो मेरा यहीं है।’ सेठजी का मुख पुनः मधुरम का चित्र बना। वे बोले – ‘अच्छा, तो मकान आपका इसी शहर में है? तो आपने माया-जंजाल को त्याग दिया’। यह तो मैं पहले ही समझ गया था। ऐसी पवित्र आत्माएं संसार में बहुत थोड़ी हैं। ऐसी देवियों के दर्शन दुर्लभ होते हैं। आपने मुझे दर्शन दिया, बड़ी कृपा की। मैं इस योग्य नहीं, जो आप-जैसी विदूषियां की कुछ सेवा कर सकूं, किंतु जो काम मेरे योग्य हो – जो कुछ मेरे किये हो सकता है – उसके करने के लिए मैं सब भांति से तैयार हूं। यहां सेठ-साहूकारों ने मुझे खूब बदनाम कर रखा है, मैं सबकी आंखों में खटकता हूं। उसका कारण सिवा इसके और कुछ नहीं कि जहां वे लोग लाभ का ध्यान रखते है, वहां मैं भलाई पर रखता हूं। यदि कोई बड़ी अवस्था का वृद्ध मनुष्य मुझसे कुछ कहने-सुनने के लिए आता है, तो विश्वास मानो, मुझसे उसका वचन टाला नहीं जाता। कुछ बुढ़ापे का विचार, कुछ उसके दिल टूट जाने का डर, कुछ यह खयाल कि कहीं यह विश्वासघातियों के पंजे में न फंस जाय, मुझे उसकी इच्छाओं की पूर्ति के लिए विवश कर देता है। मेरा यह सिद्धांत है कि अच्छी जायदाद और कम ब्याज। किन्तु इस प्रकार की बातें आपके सामने करना व्यर्थ है। आपसे तो घर का मामला है। मेरे योग्य जो कुछ काम हो, उसके लिए मैं सिर-आंखों से तैयार हूं।’

वृद्ध स्त्री – ‘मेरा काम आप ही से हो सकता है।’

सेठजी – (प्रसन्न होकर) ‘बहुत अच्छा, आज्ञा दो।’

स्त्री – ‘मैं आपके सामने भिखारिन बनकर आयी हूं। आपको छोड़कर कोई मेरा सवाल पूरा नहीं कर सकता।’

सेठजी – ‘कहिए, कहिए।’

स्त्री – ‘आप रामरक्षा को छोड़ दीजिए।’

सेठजी के मुख का रंग उतर गया। सारे हवाई किले जो अभी-अभी तैयार हुए थे, गिर पड़े। वे बोले – ‘उसने मेरी बहुत हानि की है। उसका घमंड तोड़ डालूंगा, तब छोडूंगा।’ स्त्री – ‘तो क्या कुछ मेरे बुढ़ापे का, मेरे हाथ फैलाने का, कुछ अपनी बड़ाई का विचार न करोगे बेटा, ममता बुरी होती है। संसार से नाता टूट जाय, धन जाय, धर्म जाय, किंतु लड़के का स्नेह हृदय से नहीं निकल सकता। इस पर हाकिम का, राज का, यहां तक कि ईश्वर का भी बस नहीं है। तुम मुझ पर तरस खाओ। मेरे लड़के की जान छोड़ दो, तुम्हें बड़ा यश मिलेगा। मैं जब तक जिऊंगी, तुम्हें आशीर्वाद देती रहूंगी।’

सेठजी का हृदय कुछ पसीजा। पत्थर की तह में पानी रहता है, किंतु तत्काल ही उन्हें मिसेज रामरक्षा के पत्र का ध्यान आ गया। वे बोले – ‘मुझे रामरक्षा से कोई उतनी शत्रुता नहीं थी, यदि उन्होंने मुझे न छेड़ा होता, तो मैं न बोलता। आपके कहने से मैं अब भी उसका अपराध क्षमा कर सकता हूं। परन्तु उसकी बीवी साहिबा ने जो पत्र मेरे पास भेजा है, उसे देखकर शरीर में आग लग जाती है। दिखाऊं आपको?’ रामरक्षा की मां ने पत्र लेकर पढ़ा तो उसकी आंखों में आंसू भर आए। वे बोली – ‘बेटा, उस स्त्री ने मुझे बहुत दुःख दिया है। उसने मुझे देश से निकाल दिया। उसका मिज़ाज और जबान उसके वश में नहीं, किंतु इस समय उसने जो गर्व दिखाया है, उसका तुम्हें खयाल नहीं करना चाहिए। तुम इसे भुला दो। तुम्हारा देश-देश में नाम है। यह नेकी तुम्हारे नाम को और फैला देगी। मैं तुमसे प्रण करती हूं कि सारा समाचार रामरक्षा से लिखवा कर किसी अच्छे समाचार-पत्र में छपवा दूंगी। रामरक्षा मेरा कहना नहीं टालेगा। तुम्हारे इस उपकार को वह कभी न भूलेगा। जिस समय ये समाचार संवाद पत्रों में छपेंगे, उस समय हजारों मनुष्यों को तुम्हारे दर्शन की अभिलाषा होगी। सरकार में तुम्हारी बड़ाई होगी और मैं सच्चे हृदय से कहती हूं कि शीघ्र ही तुम्हें कोई-न-कोई पदवी मिल जायेगी। रामरक्षा की अंग्रेजों से बहुत मित्रता है, वे उसकी बात कभी न टालेंगे।’ सेठजी के हृदय में गुदगुदी पैदा हो गई। यदि इस व्यवहार से वह पवित्र और माननीय स्थान प्राप्त हो जाय – जिसके लिए हजारों खर्च किए, हजारों डालियां दी, हजारों अनुनय-विनय की, हजारों खानसामों की झिड़कियां सही, बंगलों के चक्कर लगाए – तो इस सफलता के लिए कोई ऐसे कई हजार मैं खर्च कर सकता हूं। निःसंदेह मुझे इस काम में रामरक्षा से बहुत कुछ सहायता मिल सकती है, किन्तु इन विचारों को प्रकट करने से क्या लाभ? उन्होंने कहा – ‘माता मुझे नाम-नमूद की बहुत चाह नहीं है। बड़ों ने कहा है, नेकी कर दरिया में डाल। मुझे तो आपकी बात का खयाल है। पदवी मिले तो लेने से इंकार नहीं, न मिले तो तृष्णा नहीं, परन्तु यह तो बताइए कि मेरे रुपयों का क्या प्रबन्ध होगा? आपको मालूम होगा कि मेरे दस हजार रुपये आते हैं।’

रामरक्षा की मां ने कहा – ‘तुम्हारे रुपये की जमानत मैं करती हूं। यह देखो, बंगाल-बैंक की पास-बुक है। उसमें मेरा दस हजार रुपया जमा है। उस रुपये से तुम रामरक्षा का कोई व्यवसाय करा दो। तुम उस दुकान के मालिक रहोगे, रामरक्षा को उसका मैनेजर बना देना। जब तक वह तुम्हारे कहे पर चले, निभाना, नहीं तो दुकान तुम्हारी है। मुझे उसमें से कुछ नहीं चाहिए। मेरी खोज-खबर लेने वाला ईश्वर है। रामरक्षा अच्छी तरह रहे, इससे अधिक मुझे और न चाहिए।’ यह कहकर पास-बुक सेठजी को दे दी। मां के इस अथाह प्रेम ने सेठजी को विह्वल कर दिया। पानी उबल पड़ा और पत्थर के नीचे ढंक गया। ऐसे पवित्र दृश्य देखने के लिए जीवन में कम अवसर मिलते है। सेठजी के हृदय में परोपकार की एक लहर-सी उठी उनकी आंखें डबडबा आई। जिस प्रकार पानी के बहाव से कभी-कभी बांध टूट जाता है, उसी प्रकार परोपकार की इस उमंग ने स्वार्थ और माया के बांध को तोड़ दिया। वे पास-बुक वृद्धा स्त्री को वापस देकर बोले – ‘माता, यह अपनी किताब लो। मुझे अब अधिक लज्जित न करो। यह देखो, रामरक्षा का नाम बही से उड़ा देता हूं। मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैंने अपना सब कुछ पा लिया। आज तुम्हारा रामरक्षा तुमको मिल जायेगा।’

इस घटना के दो वर्ष उपरांत टाउन हॉल में फिर एक बड़ा जलसा हुआ। बैंड बज रहा था, झड़ियां और ध्वजा वायु-मंडल में लहरा रही थी। नगर के सभी माननीय पुरुष उपस्थित थे। लैंड़ो, फिटन और मोटरों से सारा हाता भरा हुआ था। एकाएक मुश्की घोड़ों की एक फिटन ने अहाते में प्रवेश किया। सेठ गिरधारीलाल बहुमूल्य वस्त्रों से सजे हुए उसमें से उतरे। उनके साथ एक फैशनेबुल नवयुवक अंग्रेजी सूट पहने मुस्कुराता हुआ उतरा। ये मिस्टर रामरक्षा थे। वे सब सेठजी की एक खास दुकान के मैनेजर हैं। केवल मैनेजर ही नहीं, बल्कि उन्हें प्रोप्राइटर समझना चाहिए। दिल्ली-दरबार में सेठजी को रायबहादुर का पद मिला है। आज डिस्ट्रिक मजिस्ट्रेट नियमानुसार इसकी घोषणा करेंगे और सूचित करेंगे कि नगर में मानवीय पुरुषों की ओर से सेठजी को धन्यवाद देने के लिए यह बैठक हुई है। सेठजी की ओर से धन्यवाद का वक्तव्य मिस्टर रामरक्षा करेंगे। जिन लोगों ने उनकी वक्तृताएं सुनी हैं, वे बहुत उत्सुकता से उस अवसर की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

बैठक समाप्त होने पर सेठजी रामरक्षा के साथ अपने भवन पर पहुंचे, तो मालूम हुआ कि आज वही वृद्धा स्त्री उनसे फिर मिलने आयी है। सेठजी दौड़कर रामरक्षा की मां के चरणों से लिपट गए। उनका हृदय इस समय नदी की भांति उमड़ा हुआ था।

‘रामरक्षा ऐंड फ्रेंड्स’ नामक चीनी बनाने का कारखाना बहुत उन्नति पर है। रामरक्षा अब भी उसी ठाट-बाट से जीवन व्यतीत कर रहे हैं, किंतु पार्टियां कम देते हैं और दिन भर में तीन से अधिक सूट नहीं बदलते। वे अब उस पत्र को, जो उनकी स्त्री ने सेठजी को लिखा था, संसार की एक बहुत अमूल्य वस्तु समझते हैं और मिसेज रामरक्षा को भी अब सेठजी के नाम को मिटाने की अधिक चाह नहीं है। क्योंकि अभी हाल में जब लड़का पैदा हुआ था, मिसेज रामरक्षा ने अपना सुवर्ण-कंकण धाय को उपहार दिया था और मनों मिठाई बांटी थी।

यह सब हो गया, किंतु वह बात, जो अब होनी चाहिए थी न हुई। रामरक्षा की मां अब भी अयोध्या में रहती है और अपनी पुत्र-वधू की सूरत नहीं देखना चाहती।