जुगनू ने मातृ-भाव से सिर हिलाकर कहा- ‘यह ठीक है मिस साहब, पर अपना-अपना ही है। दूसरा अपना हो जायेगा तो अपनों के लिए कोई क्यों रोये? सहसा एक सुंदर सजीला युवक रेशमी सूट धारण किये जूते चरमर करता हुआ अन्दर आया। मिस खुर्शीद ने इस तरह दौड़कर प्रेम से उसका अभिवादन किया, मानो जामे में फूली न समाती हों। जुगनू उसे देखकर कोने में दुबक गयी। खुर्शीद ने युवक से गले मिलकर कहा- ‘प्यारे! मैं कब से तुम्हारी राह देख रही हूँ। (जुगनू से) माँ जी, आप जाएँ फिर कभी आना। यह हमारे परम मित्र विलियम किंग हैं। हम और यह, बहुत दिनों तक साथ-साथ पढ़े हैं।
जुगनू चुपके से निकलकर बाहर आयी। खानसामा खड़ा था। पूछा- ‘यह लौंडा कौन है?’
खानसामा ने सिर हिलाया- ‘मैंने इसे आज ही देखा है। शायद अब कुंआरेपन से जी ऊबा! अच्छा तरहदार जवान है।’
जुगनू- ‘दोनों इस तरह टूटकर गले मिले हैं कि मैं तो लाज के मारे गड़ गयी! ऐसी चूमा-चाटी तो जोरू-खसम में भी नहीं होती। दोनों लिपट गये। लौंडा तो मुझे देख कर कुछ झिझकता था, पर तुम्हारी मिस साहब तो जैसे मतवाली हो गयी थीं।’
खानसामा ने मानो अमंगल आभास से कहा- ‘मुझे तो कुछ बेढब मामला नजर आता है।’
जुगनू तो यहाँ से सीधे मिसेज टंडन के घर पहुँची। इधर मिस खुर्शीद और युवक में बातें होने लगीं।
मिस्र खुर्शीद ने कहकहा मारकर कहा- ‘तुमने अपना पार्ट खूब खेला लीला, बुढ़िया सचमुच चौंधिया गयी।’
लीला- ‘मैं तो डर रही थी कि कहीं बुढ़िया भाँप न जाये।’
मिस खुर्शीद- ‘मुझे विश्वास था, वह आज जरूर आयेगी। मैंने दूर ही से उसे बरामदे में देखा और तुम्हें सूचना दी। आज आश्रम में बड़े मजे रहेंगे, जी चाहता है, महिलाओं की कनफुसकियाँ सुनती। देख लेना, सभी उसकी बातों पर विश्वास करेंगी।’
लीला- ‘तुम भी तो जान-बूझकर दलदल में पाँव रख रही हो।’
मिस खुर्शीद- ‘मुझे अभिनय में मजा आता है बहन! दिल्लगी रहेगी। बुढ़िया ने बड़ा जुल्म कर रखा है। जरा उसे सबक देना चाहती हूँ। कल तुम इसी वक्त, इसी ठाट से फिर आ जाना। बुढ़िया कल फिर आयेगी। उसके पेट में पानी न हजम होगा। नहीं, ऐसा क्यों? जिस वक्त वह आयेगी, मैं तुम्हें खबर दूँगी। बस, तुम छैला बनी हुई पहुँच जाना।’
आश्रम में उस दिन जुगनू को दम मारने की फुर्सत न मिली। उसने सारा वृत्तांत मिसेज टंडन से कहा। मिसेज टंडन दौड़ी हुई आश्रम पहुँचीं और अन्य महिलाओं को खबर सुनाई। जुगनू उसकी तसदीक करने के लिए बुलायी गयी। जो महिला आती, वह जुगनू के मुँह से यह कथा सुनती। हर एक रिहर्सल में कुछ-कुछ रंग और चढ़ जाता। यहाँ तक कि दोपहर होते-होते सारे शहर के सभ्य समाज में यह खबर गूंज उठी।
एक देवी ने पूछा- ‘वह युवक है कौन?’
मिसेज टंडन- ‘सुना तो, उनके साथ का पढ़ा हुआ है। दोनों में पहले से कुछ बातचीत रही होगी। वही तो मैं कहती थी कि इतनी उम्र हो गयी, यह कुंवारी कैसे बैठी है? अब कलई खुली।’ जुगनू- ‘और कुछ हो या न हो, जवान तो बाँका है।’
मिसेज टंडन- ‘यह हमारी विद्वान बहनों का हाल है।’
जुगनू- ‘मैं तो उसकी सूरत देखते ही ताड़ गयी थी। धूप में बाल नहीं सफेद किये हैं।’
टंडन- ‘कल फिर जाना।’
जुगनू- ‘कल नहीं, मैं आज रात ही को जाऊंगी।’
लेकिन रात को जाने के लिए कोई बहाना जरूरी था। मिसेज टंडन ने आश्रम के लिए एक किताब मँगवा भेजी। रात को नौ बजे जुगनू मिस खुर्शीद के बँगले पर पहुँची। संयोग से लीलावती उस वक्त मौजूद थी। बोली- ‘बुढ़िया तो बेतरह पीछे पड़ गयी।’
मिसेज खुर्शीद- ‘मैंने तुमसे कहा था, उसके पेट में पानी न पचेगा। तुम जाकर रूप भर आओ। तब तक इसे मैं बातों में लगाती हूँ। शराबियों की तरह अंट-संट बकना शुरू करना। मुझे भगा ले जाने का प्रस्ताव भी करना। बस यों बन जाना, जैसे अपने होश में नहीं हो।’
लीला मिशन में डॉक्टर थी। उसका बँगला भी पास ही था। वह चली गयी, तो मिसेज खुर्शीद ने जुगनू को बुलाया।’
जुगनू ने एक पुर्जा देखकर कहा- ‘मिसेज टंडन ने यह किताब माँगी है। मुझे आने में देर हो गयी। मैं इस वक्त आपको कष्ट न देती, पर सवेरे ही वह मुझसे मांगेंगी। हजारों रुपये महीने की आमदनी है मिस साहब, मगर एक-एक कौड़ी दाँत से पकड़ती हैं। इनके द्वार पर भिखारी को भीख तक नहीं मिलती।’
मिसेज खुर्शीद ने पुर्जा देखकर कहा- ‘इस वक्त तो यह किताब नहीं मिल सकती, सुबह ले जाना। तुझसे कुछ बातें करनी हैं। बैठो, मैं अभी आती हूँ।’
वह परदा उठाकर पीछे के कमरे में चली गयी और वहाँ से कोई पन्द्रह मिनट में एक सुंदर रेशमी साड़ी पहने, इत्र में बसी हुई, मुँह पर पाउडर लगाये निकली। जुगनू ने उसे आँखें फाड़कर देखा। ओ हो! यह शृंगार! शायद इस समय वह लौंडा आने वाला होगा। तभी ये तैयारियाँ हैं। नहीं तो सोने के समय कुंवारियों के बनाव-सँवार की क्या जरूरत है? जुगनू की नीति में स्त्रियों के श्रृंगार का केवल एक उद्देश्य था, पति को लुभाना। इसलिए सुहागिनों के सिवा, श्रृंगार और सभी के लिए वर्जित था। अभी खुर्शीद कुर्सी पर बैठने भी न पायी थी कि जूतों का चरमर सुनाई दिया और एक क्षण में विलियम किंग ने कमरे में कदम रखा। उसकी आंखें चढ़ी हुई मालूम होती थी और कपड़ों से शराब की गंध आ रही थी। उसने बेधड़क मिस खुर्शीद को छाती से लगा लिया और बार-बार उसके कपोलों को चूमने लेने लगा।
मिस खुर्शीद ने अपने को उसके बाहु-पाश से छुड़ाने की चेष्टा करके कहा- ‘चलो हटो, शराब पीकर आये हो।’
किंग ने उसे और चिपटाकर कहा- ‘आज तुम्हें भी पिलाऊंगा प्रिय! तुमको पीना होगा। फिर हम दोनों लिपटकर सोएंगे। नशे में प्रेम कितना सजीव हो जाता है इसकी परीक्षा कर लो।’
मिस खुर्शीद ने इस तरह जुगनू की उपस्थिति का उसे संकेत किया कि जुगनू की नजर पड़ जाये, पर किंग नशे में मस्त था। जुगनू की तरफ देखा ही नहीं। मिस खुर्शीद ने रोष के साथ अपने को अलग करके कहा- ‘तुम इस वक्त आपे में नहीं हो। इतने उतावले क्यों हुए जाते हो? क्या मैं कहीं भागी जा रही हूँ।’
किंग- ‘इतने दिनों चोरों की तरह आया हूँ, आज से मैं खुले खजाने आऊंगा?’ खुर्शीद- ‘तुम तो पागल हो रहे हो। देखते नहीं हो, कमरे में कौन बैठा हुआ है।’
किंग ने हकबकाकर जुगनू की तरफ देखा और झिड़क कर बोला- ‘यह बुढ़िया यहाँ कब आयी? तुम यहाँ क्यों आयी बुड्ढी! शैतान की बच्ची! यहाँ भेद लेने आती है! हमको बदनाम करना चाहती है? मैं तेरा गला घोंट दूँगा। ठहर, भागती कहाँ है? मैं तुझे जिंदा न छोडूंगा।’
जुगनू बिल्ली की तरह कमरे से निकली और सिर पर पाँव रखकर भागी। उधर कमरे से कहकहे उठ-उठकर छत को हिलाने लगे।
जुगनू उसी वक्त मिसेज टंडन के घर पहुँची। उसके पेट में बुलबुले उठ रहे थे, पर मिसेज टंडन सो गयी थी। यहाँ से निराश होकर उसने कई दूसरे घरों की कुण्डी खटखटायी, पर कोई द्वार न खुला और दुखिया को सारी रात इसी तरह काटनी पड़ी, मानो कोई रोता हुआ बच्चा गोद में हो। प्रातःकाल वह आश्रम में जा कूदी।
कोई आधे घण्टे में मिसेज टंडन भी आ गयीं। उन्हें देखकर उसने मुँह फेर लिया। मि. टंडन ने पूछा- ‘रात तुम मेरे घर गयी थीं? इस वक्त मुझसे महाराज ने कहा।
जुगनू ने विरक्त भाव से कहा- ‘प्यासा ही तो कुएँ के पास जाता है। कुआँ थोड़े ही प्यासे के पास आता है। मुझे आग में झोंककर आप दूर हट गयी। भगवान ने मेरी रक्षा की, नहीं कल जान ही गयी थी।’
