grhaneeti by munshi premchand
grhaneeti by munshi premchand

माँ- ‘तुम हर बात में उससे अपनी बराबरी करते हो?’

बेटा- ‘यही तो उसके साथ घोर अन्याय है। क्योंकि जब तक वह इस घर को अपना नहीं समझती, तब तक उसकी हैसियत मेहमान की है, और मेहमान की हम खातिर करते हैं, उसके ऐब नहीं देखते।’

माँ- ‘ईश्वर न करे कि किसी को ऐसी बहू मिले।’

बेटा- ‘तो वह तुम्हारे घर में रह चुकी।’

माँ- ‘क्या संसार में औरतों की कमी है?’

बेटा- ‘औरतों की कमी तो नहीं, मगर देवियों की कमी जरूर है।’

माँ- ‘नौज ऐसी औरत। सोने लगती है, तो बच्चा चाहे रोते-रोते बेदम हो जाए, मिनकती तक नहीं। फूल-सा बच्चा लेकर मैके गयी थी, तीन महीने में लौटी, तो बच्चा आधा भी नहीं है।’

बेटा- ‘तो क्या मैं यह मान लूँ कि तुम्हें उसके लड़के से जितना प्रेम है, उतना उसे नहीं है? यह तो प्रकृति के नियम के विरुद्ध है। और मान लो, वह निरमोहित ही है, तो यह उसका दोष है। तुम क्यों उसकी जिम्मेदारी अपने सिर लेती हो? उसे स्वतन्त्रता है, जैसे चाहे अपने बच्चे को पाले। अगर वह तुमसे कोई सलाह पूछे, तो प्रसन्न-मुख से दे दो, न पूछे तो समझ लो, उसे तुम्हारी मदद की जरूरत नहीं है। सभी माताएँ अपने बच्चे को प्यार करती हैं और वह अपवाद नहीं हो सकती।’

माँ- ‘तो मैं सब कुछ देखूँ पर मुँह न खोलूँ? घर में आग लगते देखूँ और चुपचाप मुँह में कालिख लगाए खड़ी रहूँ?’

बेटा- ‘तुम इस घर को जल्द छोड़ने वाली हो, उसे बहुत दिन रहना है। घर की हानि-लाभ की जितनी चिंता उसे हो सकती है, तुम्हें नहीं हो सकती। फिर मैं कर ही क्या सकता हूँ? ज्यादा-से-ज्यादा उसे डाँट बता सकता हूँ लेकिन वह डाँट की परवाह न करे और तुर्की-बतुर्की जवाब दे, तो मेरे पास ऐसा कौन-सा साधन है, जिससे मैं उसे ताड़ना दे सकूँ?’

माँ- ‘तुम दो दिन न बोलो, तो देवता सीधे हो जाएं, सामने नाक रगड़ें।’

बेटा- ‘मुझे इसका विश्वास नहीं है। मैं उससे न बोलूँगा, वह भी मुझसे न बोलेगी। ज्यादा पीछे पडूंगा तो अपने घर चली जाएगी।’

माँ- ‘ईश्वर वह दिन लाए। मैं तुम्हारे लिए नई बहू लाऊँ।’

बेटा-संभव हो, वह इसकी भी चाची हो।’

(सहसा बहू आकर खड़ी हो जाती है। माँ और बेटा, दोनों स्तम्भित हो जाते हैं, मानो कोई बम का गोला आ गिरा हो। रूपवती, नाजुक-मिजाज़, गर्वीली रमणी है, जो मानो शासन करने के लिए ही बनी है। कपोल तमतमाए हुए हैं, पर अधरों पर विष-भरी मुस्कान है और आंखों में व्यंग्य-मिला परिहास।)

माँ- (अपनी झेंप छिपाकर) ‘तुम्हें कौन बुलाने गया था?’

बहू- ‘क्यों, यहाँ तो तमाशा हो रहा है, उसका आनंद मैं न उठाऊँ?’

बेटा- ‘माँ-बेटा के बीच में तुम्हें दखल देने का कोई हक नहीं।’

[बहू की मुद्रा सहसा कठोर हो जाती है।]

बहू- ‘अच्छा, आप जुबान बंद रखिए। जो पति अपनी स्त्री की निन्दा सुनता रहे, वह पति बनने के योग्य नहीं। वह पति-धर्म का क-ख-ग भी नहीं जानता। मुझसे अगर कोई तुम्हारी बुराई करता, चाहे वह मेरी प्यारी माँ ही क्यों न होती, तो मैं उसकी जुबान पकड़ लेती। तुम मेरे घर जाते हो, तो वहाँ तो जिसे देखती हूँ तुम्हारी प्रशंसा ही करता है। छोटे-से-बड़े तक गुलामों की तरह दौड़ते फिरते हैं। अगर उनके बस में हो, तो तुम्हारे लिए स्वर्ग के तारे तोड़ लाएं और उसका जवाब मुझे यहाँ यह मिलता है कि बात-बात पर ताने-मेहने, तिरस्कार-बहिष्कार। मेरे घर तो तुमसे कोई नहीं कहता कि तुम देर में क्यों उठे, तुमने अमुक महोदय को सलाम क्यों नहीं किया, अमुक के चरणों पर सिर क्यों नहीं पटका? मेरे बाबूजी कभी गंवारा न करेंगे कि तुम उनकी देह पर मुक्कियाँ लगाओ, या उनकी धोती धोओ, या उन्हें खाना पकाकर खिलाओ। मेरे साथ यहाँ यह बर्ताव क्यों? मैं यहाँ लौंडी बनकर नहीं आयी हूँ। तुम्हारी जीवन-संगिनी बनकर आई हूँ। मगर जीवन- संगिनी का यह अर्थ तो नहीं कि तुम मेरे ऊपर सवार होकर मुझे चलाओ। यह मेरा काम है कि जिस तरह चाहूँ तुम्हारे साथ अपने कर्तव्य का पालन करूँ। उसकी प्रेरणा मेरी आत्मा से होनी चाहिए, ताड़ना या तिरस्कार से नहीं। अगर कोई कुछ सिखाना चाहता है, तो माँ की तरह प्रेम से सिखाए, मैं सीखूंगी, लेकिन जबरदस्ती, मेरी छाती पर चढ़कर अमृत भी मेरे कंठ में ठूसना चाहे, तो मैं होंठ बंद कर लूँगी। मैं अब तक कब की इस घर को अपना समझ चुकी होती, अपनी सेवा और कर्तव्य का निश्चय कर चुकी होती, मगर यहाँ तो हर घड़ी, हर पल, मेरी देह में सुई चुभाकर मुझे याद दिलाया जाता है कि तू इस घर की लौंडी है, तेरा इस घर से कोई नाता नहीं, तू सिर्फ गुलामी करने के लिए यहाँ लायी गई है और मेरा रक्त खौल कर रह जाता है। अगर यही हाल रहा, तो एक दिन तुम दोनों मेरी जान लेकर रहोगे।’

माँ- ‘सुन रहे हो अपनी चहेती रानी की बातें? वह यहाँ लौंडी बनकर नहीं, रानी बनकर आई है। हम दोनों उसकी टहल करने के लिए हैं, उसका काम हमारे ऊपर शासन करना है। उसे कोई कुछ काम करने को न कहे, मैं खुद मरा करूँ। और तुम उसकी बातें कान लगाकर सुनते हो। तुम्हारा मुँह कभी नहीं खुलता कि उसे डांटो या समझाओ। थर-थर काँपते रहते हो।’

बेटा- ‘अच्छा अच्छा, ठण्डे दिल से सोचो। मैं इसकी बातें न सुनू तो कौन सुने? क्या तुम इसके साथ हमदर्दी भी नहीं देखना चाहतीं? आखिर बाबूजी जीवित थे, तब वह तुम्हारी बातें सुनते थे या नहीं? तुम्हें प्यार करते थे या नहीं? फिर मैं अपनी बीवी की बातें सुनता हूँ तो कौन-सी नई बात करता हूँ और इसमें तुम्हारे बुरा मानने की कौन बात है?

माँ- ‘हाय बेटा, तुम अपनी स्त्री के सामने मेरा अपमान कर रहे हो! इसी दिन के लिए मैंने तुम्हें पाल-पोस कर बड़ा किया था? क्यों मेरी छाती नहीं फट जाती?’

(वह आंसू पोछते, आपे से बाहर, कमरे से निकल जाती है। स्त्री-पुरूष दोनों कौतुक-भरी आँखों से उसे देखते हैं, जो बहुत जल्द हमदर्दी में बदल जाती है।)

पति- ‘माँ का हृदय’

स्त्री- ‘माँ का हृदय नहीं, स्त्री का हृदय’

पति- ‘अर्थात?’

स्त्री- ‘जो अंत तक पुरुष का सहारा चाहता है, स्नेह चाहता है और उस पर किसी दूसरी स्त्री का असर देखकर ईर्ष्या से जल उठता है।’

पति- ‘क्या पगली की-सी बातें करती हो?’

स्त्री- ‘यथार्थ कहती हूँ।’

पति- ‘तुम्हारा दृष्टिकोण बिलकुल गलत है और इसका तर्जुबा तुम्हें तब होगा, जब तुम खुद सास होगी।’

स्त्री- ‘मुझे सास बनना ही नहीं हैं। लड़का अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, विवाह करे और अपना घर संभाले। मुझे बहू से क्या सरोकार?’

पति- ‘तुम्हें यह अरमान बिलकुल नहीं है कि तुम्हारा लड़का योग्य हो, तुम्हारी बहू लक्ष्मी हो, और दोनों का जीवन सुख से कटे?’

स्त्री- ‘क्या मैं माँ नहीं हूँ?’

पति- ‘माँ और सास में क्या कोई अन्तर है?’

स्त्री- ‘उतना ही, जितना जमीन और आसमान में है। माँ प्यार करती है, सास शासन करती है। कितनी ही दयालु, सहनशील, सतीगुणी स्त्री हो, सास बनते ही मानो ब्याही हुई गाय हो जाती है जिसे पुत्र से जितना ही ज्यादा प्रेम है, वह बहू पर उतनी ही निर्दयता से शासन करती है। मुझे भी अपने ऊपर विश्वास नहीं है। अधिकार पाकर किसे मद नहीं हो जाता? मैंने तय कर लिया है, सास बनूँगी ही नहीं। औरत की गुलामी सास के बल पर कायम है। जिस दिन सास न रहेंगी औरत की गुलामी का अंत हो जाएगा।’

पति- ‘मेरा खयाल है, तुम जरा भी सहज बुद्धि से काम लो, तो तुम अम्मा पर भी शासन कर सकती हो। तुमने हमारी बातें कुछ सुनी?’

स्त्री- ‘बिना सुने ही समझ लिया कि क्या बात हो रही होगी। वही बहू का रोना।’

पति- ‘नहीं, नहीं। तुमने बिलकुल गलत समझा। अम्मा के मिज़ाज में आज मैंने विस्मयकारी अन्तर देखा, बिलकुल अभूतपूर्व। आज वह जैसे अपनी कटुताओं पर लज्जित हो रही थीं। हां, प्रत्यक्ष रूप से नहीं, संकेत रूप से। अब तक वह तुमसे इसलिए नाराज रहती थीं कि तुम देर से उठती हो। अब शायद उन्हें यह चिंता हो रही है कि कहीं सवेरे उठने से तुम्हें ठण्ड न लग जाए। तुम्हारे लिए पानी गर्म करने को कह रही थीं।’

स्त्री- (प्रसन्न होकर) सच!

पति- हाँ मुझे तो सुनकर आश्चर्य हुआ।

स्त्री- तो अब मैं मुँह-अँधेरे उठूंगी। ऐसी ठण्ड क्या लग जाएगी लेकिन तुम मुझे चकमा तो नहीं दे रहे हो?

पति- अब इस बदगुमानी का क्या इलाज? आदमी को कभी-कभी अपने अन्याय पर खेद तो होता ही है।

स्त्री- तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर। अब मैं गजरदम उठूंगी। वह बेचारी मेरे लिए क्यों पानी गरम करेंगी! मैं खुद गर्म कर लूँगी। आदमी करना चाहे तो क्या नहीं कर सकता?

पति- ‘मुझे उनकी बात सुन-सुनकर ऐसा लगता था, जैसे किसी दैवी आदेश ने उसकी आत्मा को जगा दिया हो। तुम्हारे अल्हड़पन और चपलता पर कितना भन्नाती हैं। चाहती थी कि घर में कोई बड़ी-बूढ़ी आ जाए, तो तुम उसके चरण छुओ, लेकिन शायद अब उन्हें मालूम होने लगा है कि इस उम्र में सभी थोड़े- बहुत अल्हड़ होते हैं। शायद उन्हें अपनी जवानी याद आ रही है। कहती थीं, यही तो शौक-सिंगार, पहनने-ओढ़ने, खाने- खेलने के दिन थे। बुढ़ियों का तो दिन-भर ताँता लगा रहता है कोई कहां तक उनके चरण छुए और क्यों छुए? ऐसी कहां की बड़ी देवियाँ हैं।’

स्त्री- ‘मुझे तो हर्षोत्साह हुआ चाहता है।’

पति- ‘मुझे तो विश्वास ही न आता था। स्वप्न देखने का संदेह हो रहा था।’

स्त्री- ‘अब आई हैं राह पर।’

पति- ‘कोई दैवी प्रेरणा समझो।’

स्त्री- ‘मैं कल से ठेठ बहू बन जाऊंगी। किसी को खबर भी न होगी कि कब अपना मेक-अप करती हूँ। सिनेमा के लिए भी सप्ताह में एक दिन काफी है। बुढ़िया के पाँव छू लेने में ही क्या हर्ज है? वे देवियाँ न सही, चुड़ैल ही सही मुझे आशीर्वाद तो देंगी मेरा गुण तो गायेंगी।’

पति- ‘सिनेमा का तो उन्होंने नाम भी नहीं लिया।’

स्त्री- ‘तुमको तो इसका शौक है। अब तुम्हें भी न जाने दूँगी।’

पति- ‘लेकिन सोचो, तुमने कितनी ऊँची शिक्षा पायी है, किस कुल की हो, इन खूसट बुढ़िया के पाँव पर सिर रखना तुम्हें बिलकुल शोभा न देगा।’

स्त्री- ‘तो क्या ऊँची शिक्षा के यह मानी हैं कि हम दूसरों को नीचा समझें? बुड्ढे कितने ही मूर्ख हों लेकिन दुनिया का तर्जुबा तो रखते हैं। कुल की प्रतिष्ठा भी नम्रता और सद्व्यवहार से होती है, हेकड़ी और बुराई से नहीं।’

पति- ‘मुझे भी यही ताज्जुब होता है कि इतनी जल्द इनकी कायापलट कैसे हो गई। अब इन्हें बहुओं का सास के पाँव दबाना या उनकी साड़ी धोना या उनकी देह में मुक्कियां लगाना बुरा लगने लगा है। कहती थी, बहू कोई लौंडी थोड़े ही है कि बैठी सास का पांव दबाए।’

स्त्री- ‘मेरी कसम?’

पति- ‘हाँ जी, सच कहता हूँ। और तो और, अब वह तुम्हें खाना भी न पकाने देगी। कहती थी, जब बहू के सिर में दर्द होता है, तो क्यों उसे सताया जाए? कोई महाराज रख लो।’

स्त्री- (फूली न समाकर) मैं तो आकाश में उड़ी जा रही हूँ। ऐसी सास के तो चरण धो-धोकर पिए, मगर तुमने पूछा नहीं, अब तक तुम क्यों उसे मार- मारकर हकीम बनाने पर तुली रहती थीं।’

पति- ‘पूछा क्यों नहीं, भला मैं छोड़ने वाला था। बोलीं, मैं अच्छी हो गई थी, मैंने हमेशा खाना पकाया है, फिर वह क्यों न पकाए। लेकिन अब उनकी समझ में आया है कि वह निर्धन बाप की बेटी थीं, तुम सम्पन्न कुल की कन्या हो।’

स्त्री- ‘अम्माजी दिल की साफ हैं।’