Durasha by Munshi Premchand
Durasha by Munshi Premchand

से.-बहुत अच्छी है। बारे तुम आ तो गये ! मैंने समझा था कि आज आपका दर्शन ही न होगा।

द.-ज्वर है क्या कब से आया है

से.-नहीं ज्वर-स्वर कुछ नहीं चैन से बैठी हूँ।

द.-तुम्हारा पुराना बायगोला तो नहीं उभर आया

से.-(व्यंग्य से) हाँ बायगोला ही तो है। लाओ कोई दवा है

द.-अभी डाक्टर के यहाँ से मँगवाता हूँ।

से.-कुछ मुफ्त की रकम हाथ आ गयी है क्या लाओ मुझे दे दो अच्छी हो जाऊँ।

द.-तुम तो हँसी कर रही हो। साफ-साफ कोई बात नहीं कहती। क्या मेरे देर से आने का यही दंड है मैंने नौ बजे आने का वचन दिया था। शायद दो-चार मिनट अधिक हुए हों। सब चीजें तैयार हैं न

से.-हाँ बहुत ही खस्ता आधो-आध मक्खन डाला था।

द.-आनंदमोहन से मैंने तुम्हारी खूब प्रशंसा की है।

से.-ईश्वर ने चाहा तो वे भी प्रशंसा ही करेंगे। पानी रख आओ हाथ-वाथ तो धोयें।

द.-चटनियाँ भी बनवा ली हैं न आनंदमोहन को चटनियों से बहुत प्रेम है।

से.-खूब चटनी खिलाओ। सेरों बना रखी है।

द.-पानी में केवड़ा डाल दिया है

से.-हाँ ले जा कर पानी रख आओ। पानी आरम्भ करें प्यास लगी होगी।

आ.-(बाहर से) मित्र शीघ्र आओ। अब इन्तजार करने की शक्ति नहीं है।

द.-जल्दी मचा रहा है। लाओ थालियाँ परसो।

से.-पहले चटनी और पानी तो रख आओ।

द.-(रसोई में जा कर) अरे ! यहाँ तो चूल्हा बिलकुल ठंडा पड़ गया है। महरी आज सबेरे ही काम कर गयी क्या

से.-हाँ खाना पकने से पहले ही आ गयी थी।

द.-बर्तन सब मँजे हुए हैं। क्या कुछ पकाया ही नहीं

से.-भूत-प्रेत आ कर खा गये होंगे।

द.-क्या-चूल्हा ही नहीं जलाया गजब कर दिया।

से.-गजब मैंने कर दिया या तुमने

द.-मैंने तो सब सामान ला कर रख दिया था। तुमसे बार-बार पूछ लिया था कि किसी चीज की कमी हो तो बतलाओ। फिर खाना क्यों न पका क्या विचित्र रहस्य है ! भला मैं इन दोनों को क्या मुँह दिखाऊँगा।

आ.-मित्र क्या तुम अकेले ही सब सामग्री चट कर रहे हो इधर भी लोग आशा लगाये बैठे हैं। इन्तजार दम तोड़ रहा है।

से.-यदि सब सामग्री ला कर रख ही देते तो मुझे बनाने में क्या आपत्ति थी

द.-अच्छा यदि दो-एक वस्तुओं की कमी ही रह गयी थी तो इसका क्या अभिप्राय कि चूल्हा ही न जले यह तो किस अपराध का दंड दिया है आज होली का दिन और यहाँ आग ही न जली

से.-जब तक ऐसे चरके न खाओगे तुम्हारी आँखें न खुलेंगी।

द.-तुम तो पहेलियों से बातें कर रही हो। आखिर किस बात पर अप्रसन्न हो मैंने कौन-सा अपराध किया जब मैं यहाँ से जाने लगा था तुम प्रसन्नमुख थीं और इसके पहले भी मैंने तुम्हें दुखी नहीं देखा था। तो मेरी अनुपस्थिति में कौन ऐसी बात हो गयी कि तुम इतनी रूठ गयीं

से.-घर में स्त्रियों को कैद करने का यह दंड है।

द.-अच्छा तो यह इस अपराध का दंड है मगर तुमने मुझसे परदे की निन्दा नहीं की। बल्कि इस विषय पर जब कोई बात छिड़ती थी तो तुम मेरे विचारों से सहमत ही रहती थीं। मुझे आज ही ज्ञात हुआ कि तुम्हें परदे से कितनी घृणा है ! क्या दोनों अथितियों से यह कह दूँ कि परदे की सहायता के दंड में मेरे यहाँ अनशन व्रत है आप लोग ठंडी-ठंडी हवा खायें

से.-जो चीजें तैयार हैं वह जा कर खिलाओ और जो नहीं हैं उसके लिए क्षमा माँगो।

द.-मैं तो कोई चीज तैयार नहीं देखता

से.-हैं क्यों नहीं चटनी बना ही डाली है और पानी भी पहले से तैयार है।

द.-यह दिल्लगी तो हो चुकी। सचमुच बताओ खाना क्यों नहीं पकाया क्या तबीयत खराब हो गयी थी अथवा किसी कुत्ते ने आ कर रसोई अपवित्र कर दी थी

आ.-बाहर क्यों नहीं आते हो भाई भीतर ही भीतर क्या मिसकौट कर रहे हो अब सब चीजें नहीं तैयार हैं नहीं सही जो कुछ तैयार हो वही लाओ। इस समय तो सादी पूरियाँ भी खस्ते से अधिक स्वादिष्ट जान पड़ेंगी। कुछ लाओ भला श्रीगणेश तो हो। मुझसे अधिक उत्सुक मेरे मित्र मुंशी ज्योतिस्वरूप हैं।

से.-भैया ने दावत के इंतजार में आज दोपहर को भी न खाया होगा।

द.-बात क्यों टालती हो मेरी बातों का जवाब क्यों नहीं देतीं

से.-नहीं जवाब देती क्या कुछ आपका कर्ज खाया है या रसोई बनाने के लिए लौंडी हूँ

द.-यदि मैं घर का काम करके अपने को दास नहीं समझता तो तुम घर का काम करके अपने को दासी क्यों समझती हो !

से.-मैं नहीं समझती तुम समझते हो !

द.-क्रोध मुझे आना चाहिए उल्टी तुम बिगड़ रही हो।

से.-तुम्हें क्यों मुझ पर क्रोध आना चाहिए इसलिए कि तुम पुरुष हो