deeksha by munshi premchand
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नशे की नींद का पूछना ही क्या? उस पर किसकी की आधी बोतल चढ़ा गया था। दिन चढ़े तक सोता रहा। कोई आठ बजे झाडू लगाने वाले मेहतर ने जगाया, तो नींद खुली। शराब की बोतल और गिलास सिरहाने रखकर छतरी से छिपा दिया था। ऊपर से अपना गाउन डाल दिया था। उठते-ही सिरहाने निगाह गई। बोतल और गिलास का पता न था। कलेजा धक हो गया। खानसामा को खोजने लगा कि उसने तो नहीं उठाकर रख दिया। इस विचार से उठा और टहलता हुआ डाक-बँगले के पिछवाड़े गया, जहाँ नौकरों के लिए अलग कमरे बने हुए थे, पर यहाँ का भयंकर दृश्य देखकर आगे कदम बटाने का साहस न हुआ।

साहब खानसामा का कान पकड़े हुए खड़े थे। शराब की बोतलें अलग-अलग रखी हुई थीं। साहब एक, दो, तीन करके गिनते थे और खानसामा से पूछते थे, एक बोतल और कहां गया?-खानसामा कहता था-हुजूर, खुदा मेरा मुँह काला करे, जो मैंने कुछ भी दयाल-फसल की हो।

साहब- हम क्या झूठ बोलता है? 29 बोतल नहीं था?

खानसामा- हुजूर, खुदा की कसम, मुझे नहीं मालूम, कितनी बोतलें थी। इस पर साहब ने खानसामा के कई तमाचे लगाए। फिर कहा-तुम गिने, तुम न बताएगा, तो हम तुमको जान से मार डालेगा। हमारा कुछ नहीं हो सकता। हम हाकिम है, और हाकिम लोग हमारा दोस्त है। हम तुमको अभी-अभी मार डालेगा, नहीं तो बतला दे, एक बोतल कहाँ गया?

मेरे प्राण सूख गए। बहुत दिनों के बाद ईश्वर की याद आयी। मन-ही-मन गोवर्द्धनधारी का स्मरण करने लगा। अब लाज तुम्हारे हाथ है! भगवान! तुम्हीं बचाओ तो नैया बच सकती है, नहीं तो मझधार में डूबी जाती है! अंग्रेज है, न जाने क्या मुसीबत ढा दे। भगवन्! खानसामा का मुँह बंद कर दो, उसकी वाणी हर लो, तुमने बड़े-बड़े द्रोहियों और दुष्टों की रक्षा की है। अजामिल को तुम्हीं ने तारा था। मैं भी द्रोही हूँ, द्रोहियों का द्रोही हूँ। मेरा संकट हरो। अबकी जान बची, तो शराब की ओर आँख न उठाऊंगा।

मार के आगे भूत भागता है!। मुझे प्रति क्षण यह शंका होती थी कि कहीं यह लोकोक्ति चरितार्थ न हो जाये। कहीं खानसामा खुल न पड़े, नहीं तो फिर मेरी खैर नहीं। राजद छिन जाने का, चोरी का मुकदमा चल जाने का अथवा जज साहब से तिरस्कृत किए जाने का इतना भय न था, जितना साहब के पदाघात का लक्ष्य बनने का। जालिम हंटर लेकर दौड़ न पड़े। यों मैं इतना नहीं हूँ हृष्ट-पुष्ट और साहसी मनुष्य हूँ। कॉलेज में खेल-कूद के लिए पारितोषिक पा चुका हूँ। अब भी बरसात में दो महीने मुगदर फेर लेता हूँ लेकिन उस समय भय के मारे मेरा बुरा हाल था। मेरे नैतिक बल का आधार पहले ही नष्ट हो चुका था। चोर में बल कहां? मेरा मान, मेरा भविष्य, मेरा जीवन खानसामा के केवल एक शब्द पर निर्भर था-केवल एक शब्द पर! किसका जीवन-सूत्र इतना क्षीण, इतना जर्जर होगा!

मैं मन-ही-मन प्रतिज्ञा कर रहा था-शराबियों की तोबा नहीं, सच्ची, दृढ़ प्रतिज्ञा-कि इस संकट से बचा, तो फिर शराब न पीऊंगा । मैंने अपने मन को चारों ओर से बाँध रखने के लिए, उसके कुतर्की का द्वार बंद करने के लिए एक भीषण शपथ खायी।

मगर हाय रे दुर्दैव! कोई सहाय न हुआ। न गोवर्द्धनधारी ने सुध ली, न नरसिंह अटवाल ने। वे सब सतयुग में आया करते थे। न प्रतिज्ञा कुछ काम आयी, न शपथ का कुछ असर हुआ! मेरे भाग्य या दुर्भाग्य में जो कुछ बदा था, वह होकर रहा। विधवा ने मेरी प्रतिज्ञा सुदृढ़ रखने के लिए शपथ को यथेष्ट न समझा।

खानसामा बेचारा अपना बात का धनी था। थप्पड़ खाए, ठोकर आयी, दाढ़ी नुचवायी, पर न खुला । बड़ा सत्यवादी, वीर पुरुष था। मैं शायद ऐसी दशा में इतना अटल न रह सकता शायद पहले ही थप्पड़ में उगल देता। उसकी ओर से मुझे जो घोर शंका हो रहा थी, वह जिल्लत सिद्ध हुई। जब तक जिऊंगाा, उस वीरात्मा का गुणानुवाद करता रहूँगा।

पर मेरे ऊपर दूसरी ही ओर से वज्रपात हुआ।

खानसामा पर जब मार-धाड़ का कुछ असर न हुआ, तो साहब उनके कान पकड़े हुए डाक-बँगले की तरफ चले। मैं उन्हें आते देख, चटपट सामने बरामदे में आ बैठा और ऐसा मुँह बना लिया, मानो कुछ जानता ही नहीं। साहब ने खानसामा को लाकर मेरे सामने खड़ा कर दिया। मैं भी उठकर खड़ा हो गया। उस समय यदि कोई मेरे हृदय को चीरता, तो रक्त की एक बूंद भी न निकलती।

साहब ने मुझसे पूछा- वेल वकील साहब, तुम शराब पीता है?

मैं इनकार न कर सका।

‘तुमने रात शराब पी थीं?’

मैं इनकार न कर सका।

तुमने मेरे इस खानसामा से शराब ली थी?’

मैं इनकार न कर सका।

‘तुमने रात को शराब पीकर बोतल और गिलास अपने सिर के नीचे छिपाकर रखा था?’

मैं इनकार न कर सका। मुझे भय था कि खानसामा न कहीं खुल पड़े, पर उलटे मैं ही खुल पड़ा।

‘तुम जानता है, यह चोरी है?’

मैं इनकार न कर सका।

‘हम तुमको मुअत्तल कर सकता है, तुम्हारा सनद छीन सकता है, तुमको जेल भेज सकता है।’

यथार्थ ही था।

‘हम तुमको ठोकरों से मारकर गिरा सकता है। हमारा कुछ नहीं हो सकता!’ यथार्थ ही था।

‘तुम काला आदमी वकील बनता है, हमारे खानसामा से चोरी का शराब लेता है। तुम सुअर! लेकिन हम तुमको वही सजा देगा, जो तुम पसन्द करो। तुम क्या चाहता है?’

मैंने काँपते हुए कहा -हुजूर, माफी चाहता हूँ।

‘नहीं, हम सजा पूछता है! ‘

‘जो हुजूर मुनासिब समझें।’

‘अच्छा, वही होगा।’

यह कहकर उस निर्दयी, नरपिशाच ने दो सिपाहियों को बुलवाया और उनसे मेरे दोनों हाथ पकड़वा दिये। मैं मौन धारण किए इस तरह सिर झुकाए वहां रहा, जैसे कोई लड़का अध्यापक के सामने बेंत खाने को खड़ा होता है। इसने मुझे क्या दंड देने का विचारा है? कहीं मेरी मुश्कें तो न कसवाएगा या कान पकड़कर उठा-बैठी तो न कराएगा। देवताओं से सहायता मिलने की कोई आशा तो न थी, पर अदृश्य का आवाहन करने के अतिरिक्त और उपाय ही क्या था!

मुझे सिपाहियों के हाथों में छोड़कर साहब दफ्तर में गये और यहाँ से मोहर छापने की स्याही और ब्रश लिए हुए निकले। अब मेरी आँखों से अश्रुपात होने लगा। यह घोर अपमान और थोड़ी-सी शराब के लिए! यह भी दुगुने दाम देने पर!