deeksha by munshi premchand
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मैं- अपनी तबीयत, नहीं जी चाहता।

दूसरा- यह तो कोई जवाब नहीं। कोदों देकर वकालत पास की थी क्या?

तीसरा- जवाब दीजिए, जवाब। दीजिए, दीजिए। आपने समझा क्या है, ईश्वर को आपने ऐसा-वैसा समझ लिया है क्या?

दूसरा- आपको कोई धार्मिक आपत्ति है?

मैंने कहा- हो सकता है।

तीसरा- वाह रे धर्मात्मा! क्यों न हो, आप बड़े धर्मात्मा हैं। जरा आपकी दुम देखूँ?

मैं- क्या धर्मात्मा आदमियों के दुम होती है?

चौथा- और क्यों किसी के एक हाथ की, किसी के दो हाथ की। आप हैं किस फेर में? दुमदारों के सिवा आज धर्मात्मा है ही कौन? हम सब पापात्मा हैं। तीसरा-धर्मात्मा वकील, ओ-हो, धर्मात्मा वेश्या, ओ-हो!

दूसरा- धार्मिक आपत्ति तो आपको हो ही नहीं सकती। वकील होना धार्मिक विचारों से शून्य होने का चिह्न है।

मैं- भाई, मुझे सूट नहीं करती।

तीसरा- अब मार लिया, मूजी को मार लिया, आपको सूट नहीं करती। मैं सूट करा दूं।

दूसरा- क्या किसी डॉक्टर ने मना किया है?

मैं- नहीं।

तीसरा- वाह-वाह आप खुद ही डॉक्टर बन गए। अमृत आपको सूट नहीं करता! अरे धर्मात्माजी, एक बार पी के देखिए।

दूसरा- मुझे आपके मुँह से यह सुनकर आश्चर्य हुआ। भाईजी, यह दवा है, महौषधि है यही सोम-रस है। कहीं आपने टेंपरेंस की प्रतिज्ञा तो नहीं ले ली है?

मैं-मान लीजिए, ली हो, तो?

तीसरा-तो आप बुद्ध हैं, सीधे-सीधे कोरे बुद्ध!

चौथा-को-

जाम चलने को है सब, अहले-नजर बैठे हैं,

आंख साकी न चुराना, हम इधर बैठे हैं।

दूसरा-हम सभी टेंपरेंस के प्रतिज्ञाधारी हैं, पर जब वह हम ही नहीं रहे, तो वह प्रतिज्ञा कहाँ रही? हमारे नाम वहीं हैं, पर हम वहां वहीं हैं। जहाँ लड़कपन की बातें गई, वहीं वह प्रतिज्ञा भी गयी।

मैं- आखिर इससे फायदा क्या है?

दूसरा- यह तो पीने ही से मालूम हो सकता है। एक प्याली पीजिए, फायदा न मालूम हो, तो फिर न पीजिएगा।

तीसरा- मारा, मारा, अब मूजी को, पिलाकर छोड़ेंगे!

चौथा-.

ऐसे मय-ख्वार हैं दिन रात पिया करते हैं

हम तो सोते में तेरा नाम लिया करते हैं।

पहला- तुम लोगों से न बनेगा, मैं पिलाना जानता हूँ।

यह महाशय मोटे-ताजे आदमी थे। मेरा टेंटुआ दबाया और प्याली मुँह से लगा दी। मेरी प्रतिज्ञा टूट गई, दीक्षा मिल गई, मुराद पूरी हुई, किन्तु बनावटी क्रोध से बोला-आप लोग अपने साथ मुझे भी ले डूबे।

दूसरा- मुबारक हो, मुबारक!

तीसरा- मुबारक, मुबारक, सौ-सौ-बार मुबारक!

नवदीक्षित मनुष्य बड़ा धर्मपरायण होता है। मैं संध्या समय दिन-भर की वाग्वितंडा से छुटकारा पाकर जब एकान्त में, अथवा दो-चार मित्रों के साथ बैठकर प्याले- पर-प्याले चढ़ाता, तो चित्त उल्लसित हो उठता था। रात को निद्रा खूब आती थी, पर प्रातःकाल अंग-अंग में पीड़ा होती, अंगड़ाई आतीं, मस्तिष्क शिथिल हो जाता, यही जी चाहता कि आराम से पलंग पर लेटा रहूँ। मित्रों ने सलाह दी कि खुमारी उतारने के लिए सवेरे भी एक पैग पी लिया जाये, तो अति उत्तम है। मेरे मन में भी बात बैठ गई। मुँह-हाथ धोकर पहले संध्या किया करता था। अब मुँह- हाथ धोकर चट अपने कमरे के एकान्त में बोतल लेकर बैठ जाता। मैं इतना जानता था कि नशीली चीजों का चस्का बुरा होता है, आदमी धीरे-धीरे उनका दास हो जाता है। यहाँ तक कि वह उसके बगैर कुछ काम ही नहीं कर सकता, परन्तु ये बातें जानते हुए भी मैं उनके वशीभूत होता जाता था। यहाँ तक नौबत पहुँची कि नशे के बगैर मैं कुछ काम ही न कर सकता। जिस आमोद के लिए मुँह लगाया था, वह साल ही भर में मेरे लिए जल और वायु की भांति अत्यन्त आवश्यक हो गई। अगर कभी किसी मुकदमे में बहस करते-करते देर हो जाती, तो ऐसी थकावट चढ़ती थी, मानो मंजिलों चला हूँ। उस दशा में घर आता, तो अनायास ही बात-बात पर झुँझलाता। कहीं नौकर को डाँटता, कहीं बच्चों को पीटता, कहीं स्त्री पर गरम होता। यह सब कुछ था, पर मैं कतिपय अन्य शराबियों की भांति नशा आते ही दून की न लेता था, अनर्गल बातें न करता था, हल्ला न मचाता था, न मेरे स्वास्थ्य पर ही मदिरा-सेवन का कुछ बुरा असर नजर अता था।