deeksha by munshi premchand
deeksha by munshi premchand

साहब ब्रश से मेरे मुँह में कालिमा पोत रहे थे, वह कालिमा, जिसे धोने के लिए ढेरों साबुन की जरूरत थी और मैं भीगी बिल्ली की भांति खड़ा था। उन दोनों यमदूतों को भी मुझ पर दया न आती थी। दोनों हिन्दुस्तानी थे, पर उन्हीं के हाथों मेरी यह दुर्दशा हो रही थी। इस देश को स्वराज्य मिल चुका!

साहब कालिख पोतते और हँसते जाते थे। यहाँ तक कि आँखों के सिवा तिल-भर भी जगह न बची! थोड़ी-सी शराब के लिए आदमी से वनमानुष बनाया जा रहा था। दिल में सोच रहा था, यहाँ से जाते-ही-जाते बच्चा पर मानहानि की नालिश कर दूँगा, या किसी बदमाश से कह दूँगा, इजलास ही पर बच्चा की जूतों से खबर ले।

मुझे वनमानुष बनाकर साहब ने मेरे हाथ छुड़वा दिये और ताली बजाता हुआ मेरे पीछे दौड़ा। नौ बजे का समय था। कर्मचारी, मुवक्किल, चपरासी सभी आ गए थे। सैकड़ों आदमी जमा थे। मुझे न जाने क्या शामत सूझी कि वहाँ से भागा। यह उस प्रहसन का सबसे करुणाजनक दृश्य था। आगे-आगे मैं दौड़ा जाता था, पीछे-पीछे साहब और अन्य सैकड़ों आदमी तालियाँ बजाते ‘लेना, लेना, जाने न पावे’ का गुल मचाते दौड़े आते थे, -मानो किसी बंदर को भगा रहे हों।

लगभग एक मील तक यह दौड़ रही। वह तो कहो, मैं कसरती आदमी हूँ बचकर निकल आया, नहीं तो मेरी न-जाने और क्या दुर्गति होती। शायद मुझे गधे पर बिठाकर घुमाना चाहता था। जब सब पीछे रह गए, तो मैं एक नाले के किनारे बेदम होकर बैठ रहा। अब मुझे सूझी कि यहाँ कोई आया, तो पत्थरों से मारे बिना न छोडूँगा, चाहे उलटी पड़े या सीधी, किन्तु मैंने नाले में मुँह धोने की चेष्टा नहीं की। जानता था, पानी से यह कालिमा न छूटेगी। यही सोचता रहा कि इस अंग्रेज पर कैसे अभियोग चलाऊँ? यह तो छिपाना ही पड़ेगा कि मैंने इसके खानसामा से चोरी की शराब ली। मगर यह बात साबित हो गई, तो उलटा मैं ही जेल जाऊंगा। क्या हर्ज है, इतना छिपा दूँगा। शत्रुता का कारण कुछ और ही दिखा दूँगा, पर मुकदमा जरूर चलाना चाहिए।

जाऊँ कहीं? यह कालिमा-मंडित मुँह किसे दिखाऊं हाय! बदमाश को कालिख ही लगानी थी, तो क्या तवे में कालिख न थी, लैम्प में कालिख न थी? कम- से-कम छूट तो जाती। जितना अपमान हुआ है, वहीं तक रहता। अब तो मैं माने अपने कुकृत्य का स्वयं ढिंढोरा पीट रहा हूं। दूसरा होता, तो इतनी दुर्गति पर डूब मरता।

गनीमत यही थी कि अभी तक रास्ते में किसी से मुलाकात नहीं हुई थी। नहीं तो उसे कालिमा-संबंधी प्रश्नों का क्या उत्तर देता? जब जरा थकान कम हुई, तो मैंने सोचा, यहाँ कब तक बैठा रहूँगा। लाओ, एक बार यत्न करके देखूँ तो, शायद स्याही छूट जाये। मैंने बालू मुँह पर रगड़ना शुरू किया। देखा, तो स्याही छूट रही थी। उस समय मुझे जितना आनंद हुआ, कौन कल्पना कर सकता है! फिर तो मेरा हौसला बढ़ा। मैंने मुँह को इतना रगड़ा कि कई जगह चमड़ा तक छिल गया, किन्तु वह कालिमा छुड़ाने के लिए मुझे इस समय बड़ी-से-बड़ी पीड़ा भी तुच्छ जान पड़ती थी। यद्यपि मैं नंगे सिर था, केवल कुर्ता और धोती पहने हुए था, पर यह कोई अपमान की बात नहीं। गाऊन, अचकन, पगड़ी, डाक- बँगले ही में रह गई, इसकी मुझे चिन्ता न थी। कालिख तो छूट गई।

लेकिन कालिमा छूट जाती है, पर उसका दाग दिल से कभी नहीं मिटता। इस घटना को हुए आज बहुत दिन हो गए हैं। पूरे पाँच साल हुए, मैंने शराब का नाम नहीं लिया, पीने की कौन कहे। कदाचित् सन्मार्ग पर लाने के लिए वह ईश्वरीय विधान था। कोई युक्ति, कोई तर्क, चुटकी मुझ पर इतना स्थायी प्रभाव न डाल सकती थी। सुफल को देखते हुए तो मैं यही कहूँगा कि जो कुछ हुआ, बहुत अच्छा हुआ। वही होना चाहिए था, पर उस समय दिल पर जो गुजरी थी, उसे याद करके आज भी नींद उचट जाती है।

अब विपत्ति-कथा को क्यों तूल दूँ। पाठक स्वयं अनुमान कर सकते हैं। खबर तो फैल गई, किन्तु मैंने झेंपने और शरमाने के बदले बेहयाई से काम लेना अधिक अनुकूल समझा। अपनी बेवकूफी पर हँसता था और बेधड़क अपनी दुर्दशा की कथा कहता था। हां, चालाकी यह की कि उसमें कुछ थोड़ा-सा अपनी तरफ से बढ़ा दिया, अर्थात् रात को जब मुझे नशा चढ़ा, तो मैं बोतल और गिलास लिये साहब के कमरे में घुस गया था और उसे कुरसी से पटककर खूब मारा था। इस क्षेपक से मेरी दलित, अपमानित, मर्दित आत्मा को थोड़ी-सी तसल्ली होती थी। दिल पर तो जो कुछ गुजरी, वह दिल ही जानता है।

सबसे बड़ा भय मुझे यह था कि कहीं यह बात मेरी पत्नी के कानों तक न पहुँचे, नहीं तो उन्हें बड़ा दुःख होगा। मालूम नहीं, उन्होंने सुना या नहीं, पर कभी मुझसे इसकी चर्चा नहीं की।

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