उस मनुष्य ने संदेह दृष्टि से देखकर कहा – महाशय, और तो कोई बात नहीं हुई। जब से यह बड़ा बैंक टूटा है, बहुत उदास रहते थे। कोई हजार रुपये बैंक में जमा किए थे। घी-दूध-मलाई की बड़ी दुकान थी। बिरादरी में मान था। वह सारी पूंजी डूब गई। हम लोग रोकते रहे कि बैंक में रुपये मत जमा करो किन्तु होनहार यह था। किसी की नहीं सुनी। आज सवेरे पत्नी से गहने मांगते थे कि गिरवी रखकर अहीर के दूध के दाम दे दें। उससे बातों-बातों में झगड़ा हो गया। बस, न जाने क्या खा लिया।
कुंवर साहब का हृदय कांप उठा। तुरन्त ध्यान आया शिवदास तो नहीं है! पूछा- इनका नाम शिवदास तो नहीं था। उस मनुष्य ने विस्मय से देखकर कहा – हां यही नाम था। क्या आपसे उनकी जान-पहचान थी?
कुंवर – हां हम और यह बहुत दिनों तक बरहल में साथ-साथ खेले थे। आज शाम को वह हमसे बैंक में मिले थे। यदि उन्होंने मुझसे तनिक भी चर्चा की होती, तो मैं यथाशक्ति उसकी सहायता करता। शोक!
उस मनुष्य ने तब ध्यानपूर्वक कुंवर साहब को देखा, और जाकर स्त्रियों से कहा – चुप हो जाओ, बरहल के महाराज आए हैं। इतना सुनते ही शिवदास की माता जोर-जोर से सिर पटकती और रोती हुई आकर कुंवर साहब के पैरों पर गिर पड़ी। उसके सुख से केवल ये शब्द निकले – ‘बेटा, बचपन से जिसे तुम भैया कहा करते थे…’ कुंवर महाशय की आंखों से भी अश्रुपात हो रहा था। शिवदास की मूर्ति उनके सामने खड़ी यह कहती दीख पड़ती थी तुमने मित्र होकर मेरे प्राण लिए।
भोर हो आया परन्तु कुंवर साहब को नींद न आयी। जब वह गोमती तीर से लौटे थे, उनके चित्त पर एक वैराग्य-सा खड़ा हुआ था। वह कारुणिक दृश्य उनके स्वार्थ के तर्कों को छिन्न-भिन्न किए देता था। सावित्री के विरोध, लल्ला के निराशा-युक्त हठ और माता के कुशब्दों का उन्हें लेश-मात्र भी भय न था। सावित्री कुढ़ेगी, लल्ला को भी संग्राम के क्षेत्र में कूदना पड़ेगा, कोई चिन्ता नहीं! माता प्राण देने पर तत्पर होगी, क्या हर्ज है। मैं अपने स्त्री-पुत्र तथा हित-मित्रादि के लिए सहस्रों परिवारों की हत्या न करूंगा। हाय! शिवदास को जीवित रखने के लिए मैं ऐसी कितनी रियासतें छोड़ सकता हूं। सावित्री को भूखों रहना पड़े, लल्ला को मजदूरी करनी पड़े। मुझे द्वार-द्वार भीख मांगनी पड़े, तब भी दूसरों का गला न दबाऊंगा। अब विलम्ब का अवसर नहीं। न जाने आगे यह दिवाला और क्या-क्या आपत्तियां खड़ी करे। मुझे इतना आगा-पीछा क्यों हो रहा है? यह केवल आत्म-निर्बलता है, वरना यह कोई ऐसा काम नहीं, जो किसी ने न किया हो। आये दिन लोग लाखों रुपये दान-पुण्य करते है। मुझे अपने कर्त्तव्य का ज्ञान है, उससे क्यों मुंह मोडूं, जो कुछ हो, जो चाहे सिर पड़े, इसकी क्या चिन्ता। कुंवर ने घंटी बजायी। एक क्षण में अरदली आंखें मलता हुआ आया।
कुंवर साहब बोले – अभी जैकब बैरिस्टर के पास जाकर सलाम दो। जाग गए होंगे। कहना, जरूरी काम है। वहीं, यह पत्र लेते जाओ। मोटर तैयार करा लो।
मिस्टर जैकब ने कुंवर साहब को बहुत समझाया कि आप इस दलदल में न फंसे, नहीं तो निकलना कठिन होगा। मालूम नहीं, अभी कितनी ऐसी रकम हैं जिनका आपको पता नहीं है, परन्तु चित्त में दृढ़ हो जानेवाला निश्चय ही चूूने का फर्श है, जिसको आपत्ति के थपेड़े और भी पुष्ट कर देते हैं, कुंवर साहब अपने निश्चय पर दृढ़ रहे। दूसरे दिन समाचार-पत्रों में छपता दिया कि मृत महारानी पर जितना कर्ज है, वह हम स्वीकारते है और नियत समय के भीतर चुका देंगे।
इस विज्ञापन के छपते ही लखनऊ में खलबली मच गई, बुद्धिमानों की सम्मति में यह कुंवर महाशय की नितांत भूल थी और जो लोग कानून से अनभिज्ञ थे उन्होंने सोचा कि इसमें अवश्य कोई भेद है। ऐसे बहुत कम मनुष्य थे, जिन्हें कुंवर साहब की नियत की सच्चाई पर विश्वास आया हो, परन्तु कुंवर साहब का बखान चाहे न हुआ हो, आशीर्वाद की कमी न थी। बैंक के हजारों गरीब लेनदार सच्चे मन से उन्हें आशीर्वाद दे रहे थे।
एक सप्ताह तक कुंवर साहब को सिर उठाने का अवसर न मिला। मिस्टर जैकब का विचार सत्य सिद्ध हुआ। देना प्रतिदिन बढ़ता जाता था। कितने ही प्रोनोट ऐसे मिले, जिनका उन्हें कुछ भी पता न था। जौहरियों और अन्य बड़े-बड़े दुकानदारों का लेना भी कम न था। अदांजन तेरह-चौदह लाख का था। मिजान बीस लाख तक पहुंचा। कुंवर साहब घबराए। शंका हुई कहीं ऐसा न हो कि उन्हें भाइयों का गुजारा भी बन्द करना पड़े, जिसका उन्हें कोई अधिकार नहीं था। यहां तक कि सातवें दिन उन्होंने कई साहूकारों को बुरा-भला कहकर सामने से दूर किया। जहां ब्याज की दर अधिक थी, उसे कम कराया और जिन रकमों की मियाद बीत चुकी थी, उनसे इंकार कर दिया।
उन्हें साहूकारों की कठोरता पर क्रोध आता था। उनके विचार से महाजनों को डूबते धन का एक भाग पाकर ही सन्तोष कर लेना चाहिए था। इसी खींच-तान करने पर भी कुल देना उन्नीस लाख से कम न हुआ।
कुंवर साहब इन कामों से अवकाश पाकर एक दिन नेशनल बैंक की ओर जा निकले। बैंक खुला हुआ था। मृतक शरीर में प्राण आ गये थे। लेनदारों की भीड़ लगी हुई थी। लोग प्रसन्नचित्त लौट रहे थे। कुंवर साहब को देखते ही सैकड़ों मनुष्य बड़े प्रेम से उनकी ओर दौड़े। किसी ने रोकर, किसी ने पैरों पर गिरकर और किसी वे सभ्यता-पूर्वक अपनी कृतज्ञता प्रकट की। वह बैंक के कार्यकर्ताओं से भी मिले। लोगों ने कहा – इस विज्ञापन ने बैंक को जीवित कर दिया। बंगाली बाबू ने लाला सांईंदास की आलोचना की – वह समझता था, संसार में सब मनुष्य भलेमानस हैं। हमको उपदेश करता था। अब उसकी आंखें खुल गयी हैं। अकेला घर में बैठा रहता है। किसी को मुंह नहीं दिखाता। हम सुनता है, वहां से भाग जाना चाहता था। परन्तु बड़ा साहब बोला – भागेगा तो तुम्हारा वारंट जारी कर देगा। अब सांईंदास की जगह बंगाली बाबू मैनेजर हो गए थे।
इसके बाद कुंवर साहब बरहल आये। भाइयों ने यह वृत्तांत सुना, तो बिगड़े, अदालत की धमकी दी। माताजी को ऐसा धक्का पहुंचा कि वह उसी दिन बीमार होकर एक ही सप्ताह में इस संसार से विदा हो गयी। सावित्री को भी चोट लगी, पर उसने केवल संतोष ही नहीं किया, पति की उदारता और त्याग की प्रशंसा भी की। रह गये लाल साहब। उन्होंने जब देखा कि अस्तबल से घोड़े निकल जाते हैं, हाथी मकनपुर के मेले में बिकने के लिए भेज दिए गए हैं और कहार विदा किए जा रहे हैं, तो व्याकुल हो पिता से बोले – बाबूजी, यह सब नौकर घोड़े, हाथी कहां जा रहे है?
कुंवर – एक राजा साहब के उत्सव में।
लालजी – कौन से राजा?
कुंवर – उनका नाम राजा दीनसिंह है।
लालजी – कहां रहते है?
कुंवर – दरिद्रपुर।
कुंवर – तुम्हें भी ले चलेंगे, परन्तु इस बारात में पैदल चलने वालों का सम्मान सवारों से अधिक होगा।
लालजी – तो हम भी पैदल चलेंगे।
कुंवर – यहां परिश्रमी मनुष्यों की प्रशंसा होती है।
लालजी – तो हम सबसे ज्यादा परिश्रम करेंगे।
कुंवर साहब के दोनों भाई पांच-पांच हजार रुपया गुजारा लेकर अलग हो गए। कुंवर साहब अपने परिवार के लिए कठिनाई से एक हजार सालाना का प्रबंध कर सके, पर यह आमदनी एक रईस के लिए किसी तरह पर्याप्त नहीं थी। अतिथि-अभ्यागत प्रतिदिन टिके ही रहते थे। उन सबका भी सत्कार करना पड़ता था। बड़ी कठिनाई से निर्वाह होता था। इधर एक वर्ष से शिवदास के कुटुम्ब का भार भी सिर पर पड़ा, परन्तु कुंवर साहब कभी अपने निश्चय पर शोक नहीं करते। उन्हें कभी किसी ने चिन्तित नहीं देखा। उनका मुख-मंडल धैर्य और सच्चे अभिमान से सदैव प्रकाशित रहता है। साहित्य-प्रेम पहले से था। अब बागवानी से प्रेम हो गया है। अपने बाग में प्रातःकाल से शाम तक पौधों की देख-रेख किया करते हैं और लाल साहब तो पक्के कृषक होते दिखाई देते हैं। अभी नौ-दस वर्ष से अधिक अवस्था नहीं है, लेकिन अंधेरे मुंह खेत पहुंच जाते हैं। खाने-पीने को भी सुध नहीं रहती।
उनका घोड़ा मौजूद है, परन्तु महीनों उस पर नहीं चढ़ते। उनकी यह धुन देखकर कुंवर साहब प्रसन्न होते हैं और कहा करते हैं – रियासत के भविष्य की ओर से निश्चित हूं। लाल साहब कभी इस पाठ को न भूलेंगे। घर में सम्पत्ति होती, तो सुख-भोग, शिकार, दुराचार के सिवा और क्या सूझता! सम्पत्ति बेचकर हमने परिश्रम और संतोष खरीदा, और यह सौदा बुरा नहीं। सावित्री इतनी संतोषी नहीं। वह कुंवर साहब के रोकने पर भी असामियों से छोटी-मोटी भेंट ले लिया करती हैं और कुल-प्रथा नहीं तोड़ना चाहती।
