bank ka divaala by munshi premchand
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अब शिवदास अपने मनोवेग को रोक न सका। उसके नेत्र डबडबा आए। कुंवर के गले से लिपट गया और बोला – भूला तो नहीं, पर आपके सामने आते लज्जा आती है। कुंवर – यहां दूध की दुकान करते हो क्या? मुझे मालूम ही न था, नहीं अठवारों से पानी पीते-पीते जुकाम क्यों होता? आओ, इसी मोटर पर बैठ जाओ, मेरे साथ होटल तक चलो। तुमसे बातें करने को जी चाहता है। तुम्हें बरहल ले चलूंगा और एक बार फिर गुल्ली-डंडे का खेल खेलेंगे।

शिवदास – ऐसा न कीजिए, नहीं तो देखने वाले हंसेगे। मैं होटल में आ जाऊंगा। वहीं हजरतगंज वाले होटल में ठहरे हैं न?

कुंवर – हां, अवश्य आओगे न?

शिवदास – आप बुलाएंगे और मैं न आऊंगा।

कुंवर – यहां कैसे बैठे हो? दुकान तो चल रही है न?

शिवदास – आज सबेरे तक तो चलती थी। आगे का हाल नहीं मालूम।

कुंवर – तुम्हारे रुपये भी बैंक में जमा थे क्या?

शिवदास – जब आऊंगा तो बताऊंगा।

कुंवर साहब मोटर पर आ बैठे और ड्राइवर से बोले – होटल की ओर चलो।

ड्राइवर – हुजूर ने ह्वाइट-वे कम्पनी की दुकान पर चलने की आज्ञा जो दी थी।

कंवर – अब उधर न जाऊंगा।

ड्राइवर – जेकब साहब बैरिस्टर के यहां भी न चलेंगे?

कुंवर – (झुँझलाकर) नहीं, कहीं मत चलो। मुझे सीधे होटल पहुंचाओ।

निराशा और विपत्ति के इन दृश्यों ने जगदीश सिंह के चित्त में यह प्रश्न उपस्थित कर दिया था कि अब मेरा क्या कर्त्तव्य है?

आज से सात वर्ष पूर्व जब बरहल के महाराज ठीक युवावस्था में घोड़े से गिर कर मर गए थे और विरासत का प्रश्न उठा तो महाराजा के कोई सन्तान न होने के कारण, वंश-क्रम मिलाने से उनके सगे चचेरे भाई ठाकुर रामसिंह को विरासत का हक पहुंचा था। उन्होंने दावा किया लेकिन न्यायालय ने राजी को ही हकदार कराया। ठाकुर साहब ने अपील की, प्रिवी काउंसिल तक गये, परन्तु सफलता न हुई। मुकदमेबाजी में लाखों रुपये नष्ट हुए, अपने पास की मलकियत भी हाथ से जाती रही किन्तु हारकर भी वह चुप न बैठे। सदैव विधवा रानी को छेड़ते रहे। कभी आसामियों को भड़काते, कभी आसामियों से रानी की बुराई करते, कभी उन्हें जाली मुकदमें में फंसाने का उपाय करते, परन्तु रानी बड़े जीवट की स्त्री थी। वह भी ठाकुर साहब के प्रत्येक आघात का मुंहतोड़ उत्तर देती। हां, इस खींच-तान में उन्हें बड़ी-बड़ी रकम आवश्यक खर्च करनी पड़ती थी। आसामियों से रुपये न वसूल होते, इसलिए उन्हें बार-बार ऋण लेना पड़ता था, परन्तु कानून के अनुसार उन्हें ऋण लेने का अधिकार न था। इसलिए उन्हें या तो इस व्यवस्था को छिपाना पड़ता था, या सूद की गहरी दर स्वीकार करनी पड़ती थी।

कुंवर जगदीश सिंह का लड़कपन तो लाड़-प्यार से बीता था, परन्तु जब ठाकुर रामसिंह मुकदमेबाजी से बहुत तंग आ गए और यह सन्देह होने लगा कि कहीं रानी की चालों से कुंवर साहब का जीवन संकट में पड़ जाये, तो उन्होंने विवश होकर कुंवर साहब को देहरादून भेज दिया। कुंवर साहब वहां दो वर्ष तक तो आनंद से रहे, किन्तु कॉलेज की प्रथम श्रेणी में पहुंचे कि पिता परलोक वासी हो गए। कुंवर साहब को पढ़ाई छोड़नी पड़ी। बरहल चले आए, सिर पर कुटुम्ब-पालन और रानी से पुरानी शत्रुता के निभाने का बोझ आ पड़ा। उस समय से महारानी के मृत्यु-काल तक उनकी दशा बहुत गिरी रही। ऋण या स्त्रियों के गहनों के सिवा और कोई आधार न था। उस पर कुल-मर्यादा की रक्षा की चिंता भी थी। ये तीन वर्ष उनके लिए कठिन परीक्षा के समय थे। आए दिन साहूकारों से काम पड़ता था। उसके निर्दय-बाणों से कलेजा छिद गया था। हाकिमों के कठोर व्यवहार और अत्याचार भी सहने पड़ते, परन्तु सबसे हृदय-विदारक अपने उन आत्मीयजनों का बर्ताव था जो सामने घात न करके बगली चोटें करते थे मित्रता और ऐक्य की आड़ में कपट-हाथ चलाते थे। इन कठोर यातनाओं ने कुंवर साहब को अधिकार, स्वेच्छाचार और धन-सम्पत्ति का जानी दुश्मन बना दिया था। वह बड़े भावुक पुरुष थे। संबंधियों की अकृपा और देश-बंधुओं की दुनीति उनके रूप पर काला चिह्न बनाती जाती थी। साहित्य-प्रेम ने उन्हें मानव-प्रकृति का तत्त्वान्वेषी बना दिया था और जहां यह ज्ञान उन्हें प्रतिदिन सभ्यता से दूर लिए जाता था, वहां उनके चित्त में जनसत्ता और साम्यवाद के विचार पुष्ट करता जाता था। उन पर प्रकट हो गया कि यदि सद्व्यवहार जीवित है, तो वह झोपड़ों और गरीबों में ही है। उस कठिन समय में जब चारों ओर अंधेरा छाया था, उन्हें कभी-कभी सच्ची सहानुभूति का प्रकाश यही दृष्टिगोचर हो जाता था। धन-सम्पत्ति को वह श्रेष्ठ प्रसाद नहीं, ईश्वर का प्रकोप समझते थे, तो मनुष्य के हृदय से दया और प्रेम के भावों को मिटा देता है, यह वह मेघ है, जो चित्त के प्रकाशित तारों पर छा जाता है।

परन्तु महारानी की मृत्यु के बाद ज्यों ही धन-संपत्ति ने उन पर वार किया, बस दार्शनिक तर्कों की यह ढाल चूर-चूर हो गई। निर्देशन की शक्ति नष्ट हो गई। वे मित्र बन गए, जो शत्रु सरीखे थे और जो सच्चे हितैषी थे, वे विस्मृत हो गए। साम्यवाद के मनोगत विचारों में घोर परिवर्तन आरम्भ हो गया। हृदय में असहिष्णुता का उद्भव हुआ। त्याग ने भोग की ओर सिर झुका दिया, मर्यादा की बेड़ी गले में पड़ी। वे अधिकारी, जिन्हें देखकर उनके तेवर बदल जाते थे, अब उनके सलाहकार बन गए, दीनता और दरिद्रता को, जिनमें उन्हें सच्ची सहानुभूति थी, अधिक अब वह आंखें मूंद लेते थे।

इसमें संदेह नहीं कि कुंवर साहब अब भी साम्यवाद के भक्त थे, किन्तु उन विचारों को प्रकट करने में वह पहले की-सी स्वतंत्रता न थी। विचार अब व्यवहार से डरता था। उन्हें कथा को कार्य-रूप में परिणत करने का अवसर प्राप्त था पर अब कार्य-क्षेत्र कठिनाइयों से घिरा जान पड़ता था। बेगार के वह जानी दुश्मन थे, परन्तु अब बेगार को बंद करना दुष्कर प्रतीत होता था। स्वच्छता और स्वास्थ्य-रक्षा के वह भक्त थे, किन्तु अब धन व्यय न करके भी उन्हें ग्रामवासियों की ही ओर से विरोध की शंका होती थी। असामियों से पोत उगाहने में कठोर बर्ताव को वह पाप समझते थे, अगर अब कायरता के बिना काम चलता न जान पड़ता। सारांश यह कि कितने ही सिद्धांत, जिन पर पहले उनकी श्रद्धा थी, अब असंगत मालूम होते परन्तु आज जो दुःखद दृश्य बैंक के अहाते में नजर आए उन्होंने उनके दयाभाव को जागृत कर दिया। उस मनुष्य की-सी दशा हो गई, जो नौका में बैठा सुरम्य तट की शोभा का आनंद उठाता हुआ किसी -मशाल के सामने आ जाय, चिता पर लाशें जलती देखे, शोक-संतृप्त के करुण-क्रंदन को सुने और नाव से उतरकर उनके दुःख में सम्मिलित हो जाय।

रात के दस बज गए थे। कुंवर साहब पलंग पर लेटे थे। बैंक के अहाते का दृश्य आंखों के सामने नाच रहा था। वही विलाप-ध्वनि कानों में आ रही थी। चित्त में प्रश्न हो रहा था, क्या इस विडंबना का कारण मैं ही हूं? मैंने तो वही किया, जिसका मुझे कानूनन अधिकार था। यह बैंक के संचालकों की भूल है, जो उन्होंने बिना पूरी जमानत के इतनी बड़ी रकम दे दी, लेनदारों को उन्हीं की गर्दन नापनी चाहिए। मैं कोई खुदाई फौजदार नहीं हूं कि दूसरों की नादानी का फल भोगूं। फिर विचार पलटा, मैं नाहक इस होटल में ठहरा। चालीस रुपए प्रतिदिन देने पड़ेंगे। कोई चार सौ रुपए के मत्थे जायेगी। इतना सामान भी व्यर्थ ही लिया। क्या आवश्यकता थी? मखमली गद्दे की, कुर्सियों या शीशे की सजावट से मेरा गौरव नहीं बढ़ सकता। कोई साधारण मकान पांच रुपए पर ले लेता, तो क्या काम न चलता? मैं और साथ के सब आदमी आराम से रहते। यही न होता कि लोग निंदा करते। इसकी क्या चिंता जिन लोगों के मत्थे पर राज कर रहा हूं वे गरीब तो रोटियों को तरसते हैं। ये ही दस-बारह हजार लगाकर कुंए बनवा देता, तो सहस्रों दीनों का भला होता। अब फिर लोगों के चकमें में न आऊंगा। यह मोटरकार व्यर्थ है। मेरा समय इतना मंहगा नहीं है कि घण्टे-आधा घण्टे की किफायत के लिए दो सौ रुपए महीने का खर्च बढ़ा लूं। फाका करने वाले असामियों के सामने मोटर दौड़ाना उनकी छातियों पर मूंग दलना है। माना कि वे रोब में आ जाएंगे, जिधर से निकल जाऊंगा, सैकड़ों स्त्रियां और बच्चे देखने के लिए खड़े हो जाएंगे, अगर केवल इतने ही दिखावे के लिए इतना खर्च बढ़ाना मूर्खता है। यदि दूसरे रईस ऐसा करते है तो करें, मैं उनकी बराबरी क्यों करूं? अब तक दो हजार रुपये सालाना में मेरा निर्वाह हो जाता था। अब दो के बदले चार हजार बहुत हैं। फिर मुझे दूसरों की कमाई इस प्रकार उड़ाने का अधिकार ही क्या है? मैं कोई उद्योग-धंधा, कोई कारोबार नहीं करता, जिसका यह नफा हो। यदि मेरे पुरखों ने हठधर्मी, जबरदस्ती से इलाका अपने हाथ में रख लिया, तो उनके लूट के धन में शरीक होने का क्या अधिकार है? जो लोग परिश्रम करते हैं, उन्हें अपने परिश्रम का फल मिलना चाहिए। राज्य उन्हें केवल दूसरों के कठोर हाथों से बचाता है, उसे इस सेवा का उचित मुआवजा मिलना चाहिए। बस, मैं तो राज्य की ओर से यह मुआवजा वसूल करने के लिए नियत हूं। इसके सिवा इन गरीबों की कमाई में मेरा और कोई भाग नहीं। बेचारे दीन हैं, मूर्ख, हैं बेजुबान हैं, इस समय हम उन्हें चाहे जितना सता लें। इन्हें अपने स्वत्व का ज्ञान नहीं। ये अपने महत्त्व को नहीं समझते, पर एक समय ऐसा अवश्य आयेगा, जब इनके मुंह में भी जबान होगी, इन्हें भी अपने अधिकारों का ज्ञान होगा। तब हमारी दशा बुरी होगी। ये भोग-विलास मुझे अपने आदमियों से दूर किए देते है। मेरी भलाई इसी में है कि मैं इन्हीं में रहूं, इन्हीं की भांति जीवन-निर्वाह और इनकी सहायता करूं। कोई छोटी-मोटी रकम होती, तो कहता, लाओ, जिस सिर पर बहुत भार है, उसी तरह यह भी सही। मूल के अलावा कई हजार रुपये सूद के अलग हुए, फिर महाजनों के तीन लाख रुपये हैं। रियासत की आमदनी डेढ़-दो लाख रुपये सालाना है, अधिक नहीं। मैं इतना बड़ा साहस करूं भी, तो किस बूते पर? हां, यदि बैरागी हो जाऊं तो सम्भव हैं, मेरे जीवन में – यदि कहीं अचानक मृत्यु न हो जाये तो, यह झगड़ा पाक हो जाये। इस अग्नि में कूदना अपने सम्पूर्ण जीवन, अपनी उमंगों और अपनी आशाओं को भस्म करना है। आह! इन दिनों की प्रतीक्षा में मैंने क्या-क्या कष्ट नहीं भोगे, पिताजी ने इस चिंता में प्राण-त्याग किया। यह शुभ मुहूर्त हमारी अंधेरी रात के लिए दूर का दीपक था। हम इसी के आसरे जीवित थे। सोते-जागते सदैव इसी की चर्चा रहती थी। इससे चित्त को कितना संतोष और कितना अभिमान था। भूखे रहने के दिनों में भी हमारे तेवर मैले न होते थे। जब इतने धैर्य और सन्तोष के बाद अच्छे दिन आए तो उससे कैसे विमुख हुआ जाये। फिर अपनी ही चिंता तो नहीं, रियासत की उन्नति की कितनी ही स्कीम सोच चुका हूं। क्या अपनी इच्छाओं के साथ उन विचारों को भी त्याग दूं? इस अभागी रानी ने मुझे बुरी तरह फंसाया, जब तक जीती रही, कभी चैन से न बैठने दिया। मरी तो मेरे सिर पर बला डाल दी। परंतु मैं दीनता से इतना डरता क्यों हूं? दीनता कोई पाप नहीं है। यदि मेरा त्याग हजारों घरानों को कष्ट और दुरावस्था से बचाए तो मुझे उससे मुंह न मोड़ना चाहिए। केवल सुख से जीवन व्यतीत करना ही हमारा ध्येय नहीं है। हमारी मान-प्रतिष्ठा और कीर्ति सुखभोग ही से तो नहीं हुआ करती। राज-मंदिरों में रहने वालों और विलास में रत राणाप्रताप को कौन जानता है? यह उनका आत्मसमर्पण और कठिन व्रत-पालन ही है, जिसने उन्हें हमारी जाति का सूर्य बना दिया है। श्रीरामचंद्र ने यदि अपना जीवन सुख-भोग में बिताया होता, तो हम आज उनका नाम भी न जानते। उनके आत्म-बलिदान ने ही उन्हें अमर बना दिया। हमारी प्रतिष्ठा धन और विलास पर अवलंबित नहीं है। मैं मोटर पर सवार हुआ तो क्या, और टट्टू पर चढ़ा तो क्या, होटल में ठहरा तो क्या, और किसी मामूली घर में ठहरा तो क्या बहुत लोग, ताल्लुकेदार लोग हंसी उड़ायेंगे। इसकी परवाह नहीं। मैं तो हृदय से चाहता हूं कि उन लोगों से अलग-अलग रहूं। यदि इतनी निंदा से सैकड़ों परिवारों का भला हो जाये, तो मैं मनुष्य नहीं, यदि प्रसन्नता से उसे सहन न करूं। यदि अपने घोड़े और फिर, सैर और शिकार, नौकर-चाकर और स्वार्थ-साधक हित मित्रों से रहित होकर मैं सहस्रों अमीर-गरीब कुटुंब का, विधवाओं, अनाथों का भला कर सकूं तो मुझे इसमें कदापि विलम्ब न करना चाहिए। सहस्रों परिवारों के भाग्य इस समय मेरी मुट्ठी में है। मेरा सुख-भोग उनके लिए विष और मेरा आत्म-संयम उनके लिए अमृत है। मैं अमृत बन सकता हूं, विष क्यों बनूं और फिर इसे आत्म-त्याग समझना भी मेरी भूल है। यह एक संयोग है कि मैं आज इस जायदाद का अधिकारी हूं। मैंने उसे कमाया नहीं। उसके लिए रक्त नहीं बहाया। न पसीना बहाया। यदि वह जायदाद मुझे न मिली होती तो मैं सहस्रों दीन भाइयों की भांति आज जीविकोपार्जन में लगा रहता। मैं क्यों न भूल जाऊं कि मैं इस राज्य का स्वामी हूं। ऐसे ही अवसरों पर मनुष्य की परख होती है। मैंने वर्षों पुस्तकावलोकन किया, वर्षों परोपकार के सिद्धांतों का अनुयायी रहा। यदि इस समय उन सिद्धांतों को भूल जाऊं, स्वार्थ को मनुष्यता और सदाचार से बढ़ने दूं तो वस्तुतः यह मेरी अत्यन्त कायरता और स्वार्थपरता होगी। भला स्वार्थ-साधन की शिक्षा के लिए गीता, मिल, एगर्सन और अरस्तु का शिष्य बनने की क्या आवश्यकता थी? यह पाठ तो मुझे अपने दूसरे भाइयों से मिल जाता। प्रचलित प्रथा से बढ़कर और कौन गुरु था? साधारण लोगों की भांति क्या मैं भी स्वार्थ के सामने सिर झुका दूं? तो फिर विशेषता क्या रही? नहीं, कॉनशस (विवेक-बुद्धि) का खून न करूंगा। परमात्मा, तुम मेरी सहायता करो, तुमने मुझे राजपूत-घर में जन्म दिया है। मेरे कर्म से इस महान जाति को लज्जित न करो। नहीं, कदापि नहीं। यह गर्दन स्वार्थ के सम्मुख न झुकेगी। मैं राम, भीष्म और प्रताप का वंशज हूं। शरीर-सेवक न बनूंगा।

कुंवर जगदीश सिंह को इस समय ऐसा ज्ञात हुआ, मानो वह किसी ऊंचे मीनार पर चढ़ गए हैं। चित्त अभिमान से पूरित हो गया। आंखें प्रकाशमय हो गई। परन्तु एक ही क्षण में इस उमंग का उतार होने लगा, ऊंचे मीनार से नीचे की ओर आंखें गईं। सारा शरीर कांप उठा। उस मनुष्य की-सी दशा हो गई, जो किसी नदी पर बैठा, उसमें कूदने का विचार कर रहा हो।

उन्होंने सोचा, क्या मेरे घर के लोग मुझसे सहमत होंगे? यदि मेरे कारण वे सहमत भी हो जाये, तो क्या मुझे अधिकार है कि अपने साथ उनकी इच्छाओं का भी बलिदान करूं? और तो और, माताजी कभी न मानेंगी, और कदाचित भाई लोग भी अस्वीकार करें। रियासत की हैसियत को देखते हुए वे कम-से-कम दस हजार सालाना के हिस्सेदार है और उनके भाग में किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकता। मैं केवल अपना मालिक हूं परंतु मैं भी अकेला नहीं हूं। सावित्री स्वयं चाहे मेरे आग में कूदने को तैयार हो, किंतु अपने प्यारे पुत्र को इस आंच के समीप न आने देगी।

कुंवर महाशय और अधिक न सोच सके। वह एक विकल दशा में पलंग पर से उठ बैठे और कमरे में टहलने लगे। थोड़ी देर बाद उन्होंने जंगले के बाहर की ओर झांका और किवाड़ खोलकर बाहर चले गए। चारों ओर अंधेरा था। उनकी चिंताओं की भांति सामने अपार और भयंकर गोमती नदी बह रही थी। वह धीरे-धीरे नदी के तट पर चले गए और देर तक वहां टहलते रहे। आकुल हृदय को जल-तरंगों से प्रेम होता है। शायद इसलिए कि लहरें बाबुल है। उन्होंने अपने चंचल चित्त को फिर एकाग्र किया। यदि रियासत की आमदनी से ये सब वृत्तियां दी जायेंगी तो ऋण का सूद निकलना भी कठिन होगा। मूल का तो कहना ही क्या! क्या आय में वृद्धि नहीं हो सकती? अभी अस्तबल में बीस घोड़े हैं। मेरे लिए एक काफी है। नौकरों की संख्या सौ से कम न होगी। मेरे लिए दो भी अधिक हैं। यह अनुचित है कि अपने ही भाइयों से नीच सेवाएं कराई जायें। उन मनुष्यों को मैं अपने हिस्से की जमीन दे दूंगा। सुख से खेती करेंगे और मुझे आशीर्वाद देंगे। बगीचों के फल अब तक डालियों की भेंट हो जाते थे। अब उन्हें बेचूंगा, और सबसे बड़ी आमदनी तो बयाई की है। केवल महेशगंज के बाजार के दस हजार रुपये आते हैं। यह सब आमदनी महंत जी उड़ा जाते हैं। उनके लिए एक हजार रुपये साल होना चाहिए। अब की इस बाजार का ठेका दूंगा। आठ हजार से कम न मिलेंगे। इन मदों से पच्चीस हजार रुपये की वार्षिक आय होगी। सावित्री और लल्ला (लड़के) के लिए एक हजार रुपये काफी हैं। मैं सावित्री से स्पष्ट कर दूंगा कि या तो एक हजार मासिक लो और मेरे साथ रहो या रियासत की आधी आमदनी ले लो, और मुझे छेड़ दो। रानी बनने की इच्छा हो, तो खुशी से बनो, परंतु मैं राजा न बनूंगा।

अचानक कुंवर साहब के कानों में आवाज आई – राम नाम सत्य है। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा। कई मनुष्य एक लाश लिए आते थे। उन लोगों ने नदी किनारे चिता बनाई और उसमें आग लगा दी। दो स्त्रियां चिंघाड़ कर रो रही थीं। इस विलाप का कुंवर साहब के चित्त पर कुछ प्रभाव न पड़ा। वह चित्त में लज्जित हो रहे थे कि मैं कितना पाषाण-हृदय हूं! एक दीन मनुष्य की लाश जल रही है, स्त्रियां रो रही है और मेरा हृदय तनिक भी नहीं पसीजता! पत्थर की मूर्ति की भांति खड़ा हूं। एकबारगी एक स्त्री ने रोते हुए कहा – ‘हाय मेरे राजा, तुम्हें विष कैसे मीठा लगा?’ यह हृदय-विदारक विलाप सुनते ही कुंवर साहब के चित्त में एक घाव-सा लगा। करुणा सजल हो गई और नेत्र अश्रुपूर्ण हो गए। कदाचित इसने विष-पान करके प्राण दिये हैं। हाय! उसे विष कैसे मीठा लगा! इसमें कितनी करुणा है, कितना दुःख, कितना आश्चर्य! विष तो कड़वा पदार्थ है। क्यों कर मीठा हो गया! कटु विष के बदले जिसने अपने मधुर प्राण दे दिये, उस पर कोई बड़ी मुसीबत पड़ी होगी। ऐसी ही दशा में विष मधुर हो सकता है। कुंवर साहब तड़प गए। कारुणिक शब्द बार-बार उनके हृदय में गूंजते थे। अब उनसे वहां न खड़ा रहा गया। वह उन आदमियों के पास आये। एक मनुष्य से पूछा – क्या बहुत दिनों से बीमार थे? इस मनुष्य ने कुंवर साहब की ओर अश्रु-भरे नेत्रों से देखकर कहा – नहीं साहब, कहां की बीमारी! अभी आज संध्या तक भली-भांति बातें कर रहे थे। मालूम नहीं संध्या को क्या खा लिया कि खून की कै होने लगी। जब तक वैद्यराज के यहां लाएं, तब तक आंखें उलट गई। नाड़ी छूट गई। वैद्यराज ने आकर देखा, तो कहा – अब क्या हो सकता है? अभी कोई बाईस-तेईस वर्ष की अवस्था थी। ऐसा पट्ठा सारे लखनऊ में नहीं था।

कुंवर – कुछ मालूम हुआ, विष क्यों खाया?