सांईंदास से सब लोग प्रसन्न थे, सब लोग उनकी सूझ-बूझ की प्रशंसा करते। यहां तक कि बंगाली बाबू भी धीरे-धीरे उनके कायल होते जाते थे। सांईदास उनसे कहा करते – बाबूजी, विश्वास संसार से न लुप्त हुआ है और न होगा। सत्य पर विश्वास रखना प्रत्येक मनुष्य का धर्म है। जिस मनुष्य के चित्त से विश्वास जाता रहता है, उसे मृतक समझना चाहिए। उसे जान पड़ता है, मैं चारों ओर शत्रुओं से घिरा हुआ हूं। बड़े-से-बड़े सिद्ध महात्मा भी उसे रंगे-सियार जान पड़ते है। सच्चे-से-सच्चे देश-प्रेमी उसकी दृष्टि में अपनी प्रशंसा के भूखे ही ठहरते हैं। संसार उसे धोखे और छल से परिपूर्ण दिखाई देता है। यहां तक कि उसके मन से परमात्मा पर श्रद्धा और भक्ति लुप्त हो जाती है। एक प्रसिद्ध फिलॉसफर का कथन है कि प्रत्येक मनुष्य को जब तक कि उसके विरुद्ध कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न पाओ, भलेमानस समझो। वर्तमान शासन प्रथा इसी महत्त्वपूर्ण सिद्धांत पर गठित है और घृणा तो किसी से करनी ही न चाहिए। हमारी आत्माएं पवित्र हैं। उनसे घृणा करना परमात्मा से घृणा करने के समान है। मैं यह नहीं कहता हूं कि संसार में कपट-स्थल है ही नहीं, है और बहुत अधिकता से है, परन्तु उसका निवारण अविश्वास से नहीं, मानव-चरित्र के ज्ञान से होता है और यह ईश्वरप्रदत्त गुण है। मैं यह दावा तो नहीं करता, परन्तु मुझे विश्वास है कि मैं मनुष्य को देखकर उसके आंतरिक भावों तक पहुंच जाता हूं। कोई कितना ही भेष बदले, रंग-रूप संवारे, परंतु मेरी अंतर्दृष्टि को धोखा नहीं दे सकता। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि विश्वास से विश्वास उत्पन्न होता है और विश्वास से अविश्वास। यह प्राकृतिक विषय है। जिस मनुष्य को आप शुरू से ही धूर्त, कपटी, दुर्जन समझ लेंगे, वह कभी आपसे निष्कपट व्यवहार न करेगा। वह एकाएक आपको नीचा दिखाने का यत्न करेगा। इसके विपरीत आप एक चोर पर भी भरोसा करें, तो वह आपका दास हो जायगा। सारे संसार को लूटे, परन्तु आपको धोखा न देगा। वह कितना ही कुकर्मी, अधर्मी क्यों न हो, पर आप उसके गले में विश्वास की जंजीर डालकर उसे जिस ओर चाहें ले जा सकते है यहां तक कि वह आपके हाथों पुण्यात्मा भी बन सकता है।
बंगाली बाबू के पास इन दार्शनिक तर्कों का कोई उत्तर न था।
चौथे वर्ष की पहली तारीख थी। लाला सांईंदास बैंक के दफ्तर में बैठे डाकिया की राह देख रहे थे। आज बरहल से पैंतालीस हजार रुपये आएंगे। अबकी इनका इरादा था कि कुछ सजावट का समान और मोल ले लें। अब तक बैंक में कोई फोन नहीं था। उसका भी तखमीना मंगा लिया था – आशा की आभा चेहरे से झलक रही थी। बंगाली बाबू से हंसकर कहते थे – इस तारीख को मेरे हाथों में अदबदा के खुजली होने लगती है। आज भी हथेली खुजला रही है। कभी दफ्तरी से कहते – अरे मियां, शराफत, जरा सगुन तो विचारों, सिर्फ सूद-ही-सूद आ रहा है, या दफ्तर वालों के लिए नजराना-शुक्रराना भी। आशा का प्रभाव कदाचित स्थान पर भी होता। बैंक आज खुला हुआ दिखाई पड़ता था।
डाकिया ठीक समय पर आया। सांईंदास ने लापरवाही से उसकी ओर देखा। उसने अपनी थैली से कई रजिस्ट्री लिफाफे निकाले। सांईंदास ने लिफाफों को उड़ती निगाह से देखा। बरहल का कोई लिफाफा न था। बीमा, न मुहर, न वह लिखावट। कुछ निराशा-सी हुई। जी में आया, डाकिये से पूछें, कोई रजिस्ट्री रह तो नहीं गई, पर रुक गए, दफ्तर के क्लर्कों के सामने इतना अधैर्य अनुचित था। किंतु जब डाकिया चलने लगा। तब उनसे न रहा गया। पूछ ही बैठे – अरे भाई, कोई बीमा लिफाफा रह तो नहीं गया? आज उसे आना चाहिए था। डाकिया ने कहा – सरकार, भला ऐसी बात हो सकती है। और कहीं भूल-चूक हो भी जाय, पर आपके काम में कहीं भूल हो सकती है?
सांईंदास का चेहरा उतर गया, जैसे कच्चे रंग पर पानी पड़ जाये। डाकिया चला गया, तो बंगाली बाबू से बोले – यह देर क्यों हुई? और तो कभी ऐसा न होता था।
बंगाली बाबू ने निष्ठुर भाव से उत्तर दिया – किसी कारण से देरी हो गया होगा। घबराने की कोई बात नहीं।
निराशा असम्भव को सम्भव बना देती है। सांईंदास को इस समय यह ख्याल हुआ कि कदाचित् पार्सल से रुपये आते हों। हो सकता है, तीस हजार अशर्फियों को पार्सल करा दिया हो। यद्यपि इस विचार को औरों पर प्रकट करने का उन्हें साहस न हुआ, पर उन्हें यह आशा उस समय तक बनी रही, जब तक पार्सल वाला डाकिया वापिस नहीं गया। अन्त में संध्या को वह बेचैनी की दशा में उठकर घर चले गये। अब खत का, तार का इन्तजार था। दो-तीन बार झुंझलाकर उठे, डांटकर पत्र लिखूं और साफ-साफ कह दूं कि लेन-देन के मामले में वादा पूरा न करना विश्वासघात है। एक दिन की देर भी बैंक के लिए घातक हो सकती है। इससे यह होगा कि फिर कभी ऐसी शिकायत करने का अवसर न मिलेगा, परन्तु फिर कुछ सोचकर न लिखा।
शाम हो गई थी कई मित्र आ गए। गपशप होने लगी। इतने में पोस्टमैन ने शाम की डाक दी। यों पहले अखबारों को खोला करते, पर आज चिट्ठियां खोली, किंतु बरहल का कोई खत न था। तब बेदम ही एक अंग्रेजी अखबार खोला। पहले ही तार का शीर्षक देखकर उनका खून सर्द हो गया। लिखा था –
‘कल शाम को बरहल की महारानी जी का तीन दिन की बीमारी के बाद देहांत हो गया।’ इसके आगे एक संक्षिप्त नोट में यह लिखा हुआ था – बरहल की महारानी की अकाल मृत्यु केवल इस रियासत के लिए ही नहीं, किन्तु समस्त प्रांत के लिए शोकजनक घटना है। बड़े-बड़े भिषजाचार्य (वैद्यराज) अभी रोग की परख भी न कर पाए थे कि मृत्यु ने काम तमाम कर दिया। रानी जी को सदैव अपनी रियासत की उन्नति का ध्यान रहता था। उनके थोड़े-से राज्यकाल में ही उनसे रियासत को जो लाभ हुए हैं, वे चिरकाल तक स्मरण रहेंगे। यद्यपि यह मानी हुई बात थी कि राज्य उनके बाद दूसरे के हाथ जायेगा, तथापि यह विचार कभी रानी साहब के कर्त्तव्य-पालन में बाधक नहीं बना। शास्त्रानुसार उन्हें रियासत की जमानत पर ऋण लेने का अधिकार न था, परन्तु प्रजा की भलाई के विचार से उन्हें कई बार इस नियम का उल्लंघन करना पड़ा। हमें विश्वास है कि यदि वह कुछ दिन और जीवित रहती, तो रियासत को ऋण से मुक्त कर देती। उन्हें रात-दिन इनका ध्यान रहता था। परन्तु इस असामयिक मृत्यु ने अब यह फैसला दूसरों के अधीन कर दिया। देखना चाहिए, इन ऋणों का क्या परिणाम होता है। हमें विश्वस्त रीति से मालूम हुआ है कि नये महाराज ने, जो आजकल लखनऊ में विराजमान है, अपने वकीलों की सम्मति के अनुसार मृतक महारानी के ऋण-संबंधी हिसाब को चुकाने से इंकार कर दिया है। हमें भय है कि इस निश्चय से महाजनी ठेले में बड़ी हलचल पैदा होगी और लखनऊ के कितने ही धन-सम्पत्ति के स्वामियों को यह शिक्षा मिल जायेगी कि ब्याज का लोभ कितना अनिष्टकारी होता है।’
लाला सांईंदास ने अखबार मेज़ पर रख दिया और आकाश की ओर देखा जो निराशा का अन्तिम आश्रय है। अन्य मित्रों ने भी यह समाचार पढ़ा। इस प्रश्न पर वाद-विवाद होने लगा। सांईंदास पर चारों ओर से बौछार पड़ने लगी। सारा दोष उन्हीं के सिर पर मढ़ा गया और उनकी चिरकाल की कार्य कुशलता और परिणाम-दर्शिता मिट्टी में मिल गयी। बैंक इतना बड़ा घाट सहने में असमर्थ था। अब वह विचार उपस्थित हुआ कि कैसे उसके प्राणों की रक्षा की जाये।
शहर में यह खबर फैलते ही लोग अपने रुपये लेने के लिए आतुर हो गए। सुबह से शाम तक लेनदारों का तांता लगा रहता था। जिन लोगों का धन चालू हिसाब में जमा था, उन्होंने तुरन्त निकाल लिया, कोई उज्र न हुआ। यह उसी पत्र के लेख का फल था कि नेशनल-बैंक की साख उठ गई। धीरज से काम लेते तो बैंक संभल जाता। परंतु आधी और तूफान में कौन नौका स्थिर रह सकती है? अन्त में खजांची ने टाट उलट दिया। बैंक की नसों से इतनी रक्त धाराएं निकली कि वह प्राण-रहित हो गया।
तीन दिन बीत चुके थे। बैंक घर के सामने सहस्रों आदमी एकत्र थे। बैंक के द्वार पर सशस्त्र सिपाहियों का पहरा था। नाना प्रकार की अफवाहें उड़ रही थी। कभी खबर उड़ती, लाला सांईदास ने विषपान कर लिया। कोई उनके पकड़े जाने की सूचना लाता था। कोई कहता था – डायरेक्टर हवालात के अधीन हो गए।
एकाएक सड़क पर से एक मोटर निकली और बैंक के सामने आकर रुक गई। किसी ने कहा – बरहल के महाराज की मोटर है। इतना सुनते ही सैकड़ों मनुष्य मोटर की ओर घबराये हुए दौड़े और उन लोगों ने मोटर को घेर लिया।
कुंवर जगदीश सिंह महारानी की मृत्यु के बाद वकीलों से सलाह लेने लखनऊ आये थे। बहुत सामान भी खरीदना था। वे इच्छाएं जो चिरकाल से ऐसे सुअवसर की प्रतीक्षा में बंधी थी, पानी की भांति राह पाकर उबल पड़ती थी। यह मोटर आज ही ली गई थी। नगर में एक कोठी लेने की बातचीत हो रही थी। बहुमूल्य विलास-वस्तुओं से लदी एक गाड़ी बरहल के लिए चल चुकी थी। यहां इतनी भीड़ देखी, तो सोचा, कोई नवीन नाटक होने वाला हैं, मोटर रोक दी। इतने में सैकड़ों की भीड़ लग गयी।
कुंवर साहब ने पूछा – यहां आप लोग क्यों जमा हैं? कोई तमाशा होने वाला है क्या? एक महाशय, जो देखने में कोई बिगड़े रईस मालूम होते थे, बोले – जी हां, बड़ा मजेदार तमाशा है।
कुंवर – किसका तमाशा है?
वह – तकदीर का।
कुंवर महाशय को यह उत्तर पाकर आश्चर्य तो हुआ, परन्तु सुनते आये थे कि लखनऊ वाले बात-बात में बात निकाला करते है, अतः उसी ढंग से उतर देना आवश्यक हुआ। बोले – तकदीर का खेल देखने के लिए यहां आना तो आवश्यक नहीं।
लखनवी महाशय ने कहा – आपका कहना सच है लेकिन दूसरी जगह यह मजा कहां? यहां सुबह से शाम तक के बीच भाग्य ने कितनों को धनी से निर्धन और निर्धन से भिखारी बना दिया। सवेरे जो लोग महल में बैठे थे, उन्हें इस समय रोटियों के लाले पड़े हुए हैं। आज एक सप्ताह पहले जो लोग काल-गति, भाग्य के खेल और समय के फेरे को कवियों की उपमा समझते थे, इस समय उनकी आह और करुण-क्रंदन वियोगियों को भी लज्जित करता है। ऐसे तमाशे और कहां देखने में आयेंगे?
कुंवर – जनाब आपने तो पहेली को और गाढ़ा कर दिया। देहाती हूं मुझसे साधारण तौर से बात कीजिए।
इस पर एक सज्जन ने कहा – साहब, यह नेशनल बैंक है। इसका दिवाला निकल गया है। आदाब-अर्ज़, मुझे पहचाना।
कुंवर साहब ने उसकी ओर देखा, तो मोटर से कूद पड़े और हाथ मिलाते हुए बोले – अरे, मिस्टर नसीम! तुम यहां कहां? भाई, तुमसे मिलकर बड़ा आनंद हुआ।
मिस्टर नसीम कुंवर साहब के साथ देहरादून-कालेज में पढ़ते थे। दोनों साथ-साथ देहरादून की पहाड़ियों पर सैर करते थे परंतु जब से कुंवर महाशय ने घर के झंझटों से विवश होकर कॉलेज छेड़ा, तबसे दोनों मित्रों में भेंट न हुई थी। नसीम भी उनके आने के कुछ समय पीछे अपने घर लखनऊ चले आए थे।
नसीम ने उत्तर दिया – शुक्र है, आपने पहचाना तो। कहिए, अब तो पौ-बारह हैं। कुछ दोस्तों की भी सुध है?
कुंवर – सच कहता हूं तुम्हारी याद हमेशा आया करती थी। कहो, आराम से तो हो? मैं रॉयल होटल में टिका हूं आज आओ, तो इत्मीनान से बातचीत हो।
नसीम – जवाब, इत्मीनान तो नेशनल बैंक के साथ चला गया। अब तो रोजी की फिक्र सवार है। जो कुछ जमा पूंजी थी, सब आपकी भेंट हुई। इस दिवाला ने फकीर बना दिया है। अब आपके दरवाजे पर आकर धरना दूंगा।
कुंवर – तुम्हारा घर है, बेखटके आओ। मेरे साथ ही क्यों न चलो? क्या बताऊं, मुझे कुछ भी ध्यान न था कि मेरे इंकार करने का यह फल होगा। जान पड़ता है बैंक ने बहुतेरे को तबाह कर दिया।
नसीम – घर-घर मातम छाया हुआ है। मेरे पास तो इन कपड़ों के सिवा और कुछ नहीं रहा।
इतने में एक तिलकधारी पंडितजी आ गए और बोले – साहब, आपके शरीर पर वस्त्र तो है। यहां तो धरती-आकाश, कहीं ठिकाना नहीं। मैं राघोजी पाठशाला का अध्यापक हूं। पाठशाला का सब धन इसी बैंक में जमा था। पचास विद्यार्थी इसी के आसरे संस्कृत पढ़ते और भोजन पाते थे। कल से पाठशाला बन्द हो जायेगी। दूर-दूर के विद्यार्थी हैं। वह अपने घर किस तरह पहुंचेंगे, ईश्वर ही जाने।
एक महाशय, जिनके सिर पर पंजाबी ढंग की पगड़ी थी, गाढ़े का कोट और चमरौधा जूता पहने हुए थे, आगे बढ़ आये और नेतृत्व के भाव से बोले – महाशय, इस बैंक के फेलियर ने कितने ही इन्स्टीट्यूशन को समाप्त कर दिया। लाला दीनानाथ का अनाथालय अब एक दिन भी नहीं चल सकता। उसके एक लाख रुपये डूब गए। अभी पंद्रह दिन हुए, मैं डेपुटेशन से लौटा तो पंद्रह हजार रुपये अनाथालय कोष में जमा किए थे, मगर अब कहीं कौड़ी का ठिकाना नहीं।
एक बूढ़े ने कहा – साहब, मेरी तो जिंदगी भर की कमाई मिट्टी में मिल गई! अब कफ़न का भी भरोसा नहीं।
धीरे-धीरे और लोग एकत्र हो गए और साधारण बातचीत होने लगी। प्रत्येक मनुष्य अपने पास वाले को अपनी दुःख-कथा सुनाने लगा। कुंवर साहब आधे घंटे तक नसीम के साथ खड़े, ये विपत्-कथाएं सुनते रहे। ज्यों ही मोटर पर बैठे और होटल की ओर चलने की आज्ञा दी, त्यों ही उनकी दृष्टि एक मनुष्य पर पड़ी, जो पृथ्वी पर सिर झुकाए बैठ था। यह एक अहीर था। लड़कपन में कुंवर साहब के साथ खेला था। उस समय उनमें ऊंच-नीच का विचार न था, साथ कबड्डी खेले, साथ पेड़ों पर चढ़ें और चिड़ियों के बच्चे चुराए थे। जब कुंवरजी देहरादून पढ़ने गये, तब यह अहीर का लड़का शिवदास अपने बाप के साथ लखनऊ चला आया। उसने यहां एक दूध की दुकान खोल ली थी। कुंवर साहब ने उसे पहचाना और ऊंचे स्वर से पुकारा – अरे शिवदास, इधर देखो।
शिवदास ने बोली सुनी परन्तु सिर ऊपर न उठाया। वह अपने स्थान पर बैठे ही कुंवर साहब को देख रहा था। बचपन के वे दिन याद आ रहे थे, जब वह जगदीश के साथ गुल्ली-डंडा खेलता था, जब दोनों बुड्ढे गफूर मियां को मुंह चिढ़ा कर घर में छिप जाते थे, जब वह इशारों से जगदीश को गुरुजी के पास से बुला लेता था, और दोनों रामलीला देखने चले जाते थे। उसे विश्वास था कि कुंवर जी मुझे भूल गए होंगे, वे लड़कपन की बातें अब कहां? कहां मैं और कहां यह! लेकिन कुंवर साहब ने उसका नाम लेकर बुलाया, तो उसने प्रसन्न होकर मिलने के बदले और भी सिर नीचा कर लिया और वहां से टल जाना चाहा। कुंवर साहब उसे हटते देखकर मोटर से उतरे और उसका हाथ पकड़कर बोले – अरे शिवदास, क्या मुझे भूल गए?
