aansuon kee holi by munshi premchand
aansuon kee holi by munshi premchand

नामों को बिगाड़ने की प्रथा-जाने कब चली और कहां शुरू हुई। कोई इस संसार-व्यापी रोग का पता लगाए तो ऐतिहासिक संसार में अवश्य ही अपना नाम छेड़ जाय। पंडित का नाम तो श्रीविलास था पर मित्र लोग सिलबिल कहा करते थे। नामों का असर चरित्र पर कुछ-न-कुछ पड़ जाता है। बेचारे सिलबिल सचमुच ही सिलबिल थे। दफ्तर जा रहे हैं मगर पायजामे का इजारबंद लटक रहा है। सिर पर फ्लैट-कैप है, पर लम्बी-सी चुटिया पीछे झांक रही है, अचकन यों बहुत सुन्दर है। न जाने उन्हें त्यौहारों से क्या चिढ़ थी। दिवाली गुजर जाती, पर वह भलामानुष कौड़ी हाथ में न लेता। और होली का दिन तो उनकी भीषण परीक्षा का दिन था। तीन दिन वह घर के बार न निकलते। घर पर भी काले कपड़े पहने बैठे रहते थे। यार लोग टोह में रहते थे कि कहीं बचा फंस जाये, मगर घर में घुसकर तो फौजदारी नहीं की जाती। एक आधा बार फंसे भी, अगर घिघिया-पुदिया कर बेदाग निकल गए।

लेकिन अबकी समस्या बहुत कठिन हो गई थी। शास्त्रों के अनुसार 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य का पालन करने के बाद उन्होंने विवाह किया था। ब्रह्मचर्य के परिपक्व होने में जो थोड़ी-बहुत कसर रही, वह तीन वर्ष के गौने की मुद्दत ने पूरी कर दी। यद्यपि स्त्री से उन्हें कोई शंका न थी, तथापि वह औरतों को सिर चढ़ाने के हामी न थे। इस मामले में उन्हें अपना वही पुराना-धुराना ढंग पसंद था। बीवी को जब कसकर डांट दिया, तो उसकी मजाल है कि रंग हाथ से छुए। विपत्ति यह थी कि ससुराल के लोग भी होली मनाने आने वाले थे। पुरानी मसल है ‘बहन अंदर, तो भाई सिकंदर’। इन सिकंदरों को कौन रोक सकता है?

स्त्री ने आंखें फाड़कर कहा – ‘अरे भैया! क्या सचमुच रंग न घर लाओगे? यह कैसी होली है, बाबा?’

सिलबिल ने त्यौरियां चढ़ाकर कहा – ‘बस, मैंने एक बार कह दिया और बात दोहराना मुझे पसंद नहीं। घर में रंग नहीं आएगा और न कोई छुएगा। मुझे कपड़ों पर लाल छींटे देखकर मचली आने लगती है। हमारे घर में ऐसी ही होली होती है।’

स्त्री ने सिर झुकाकर कहा – ‘तो न लाना रंग-संग, मुझे रंग लेकर क्या करना है। जब तुम्हीं रंग न लाओगे, तो मैं कैसे छू सकती हूं?’

सिलबिल ने प्रसन्न होकर कहा – ‘निस्संदेह यही साध्वी स्त्री का धर्म है।’

‘लेकिन भैया तो आने वाले हैं। वह क्यों मानेंगे?’

‘उनके लिए भी मैंने एक उपाय सोच लिया है। उसे सफल करना तुम्हारा काम है। मैं बीमार बन जाऊंगा। एक चादर ओढ़कर लेटा रहूंगा। तुम कहना, इन्हें ज्वर आ गया। बस, चलो छुट्टी हुई।’

स्त्री ने आंखें नचाकर कहा – ‘ऐ नौज, कैसी बातें मुंह से निकालते हो। ज्वर जाय मुद्दई के घर, यहां आये तो मुंह झुलस दूं निगोड़े का।’

‘तो फिर दूसरा उपाय ही क्या है?’

‘तुम ऊपर वाली छोटी कोठरी में छिपे रहना, मैं कह दूंगी उन्होंने जुलाब लिया है। बाहर निकलेंगे तो हवा लग जायेगी।’

पंडितजी खिल उठे – ‘बस, बस, यही सबसे अच्छा।’

होली का दिन है। बाहर हाहाकार मचा हुआ है। पुराने जमाने में अबीर और गुलाल के सिवा और कोई रंग न खेला जाता था। अब नीले, हरे, काले, सभी रंगों का मेल हो गया है और इस संगठन से बचना आदमी के लिए तो संभव नहीं। हां, देवता बचें। सिलबिल के दोनों साले मुहल्ले भर के मर्दों, औरतों, बच्चों और बूढ़ों का निशाना बने हुए थे। बाहर के दीवानखाने के फर्श, दीवारें – यहां तक कि तस्वीरें भी रंग उठी थीं। घर में भी यही हाल था। मुहल्ले की ननदें भला कब मानने लगी थी। परनाला तक रंगीन हो गया था।

बड़े साले ने पूछा – ‘क्यों री चम्पा, क्या सचमुच उनकी तबीयत अच्छी नहीं? खाना खाने भी न आये?’

चम्पा ने सिर झुकाकर कहा – ‘हां भैया, रात ही से पेट में कुछ दर्द होने लगा। डॉक्टर ने हवा में निकलने को मना कर दिया है।’

जरा देर बाद छोटे साले ने कहा – ‘क्यों जीजी जी, क्या भाई साहब नीचे नहीं आएंगे? ऐसी भी क्या बीमारी है। कहो तो ऊपर जाकर देख आऊं।’

चम्पा ने उसका हाथ पकड़कर कहा – ‘नहीं-नहीं, ऊपर मत जाओ। वह रंग-वंग न खेलेंगे। डॉक्टर ने हवा में निकलने को मना कर दिया है।

दोनों भाई हाथ मलकर रह गए।’

सहसा छोटे भाई को एक बात सूझी – ‘जीजाजी के कपड़ों के साथ क्यों न होली खेलें। वे तो बीमार नहीं है।’

बड़े भाई के मन में भी यह बात बैठ गई। बहन बेचारी अब क्या करती? सिकंदरों ने कुंजियां उसके हाथ से लीं और सिलबिल के सारे कपड़े निकाल-निकालकर रंग मले। रूमाल तक न छोड़ा। जब चम्पा ने उन कपड़ों को आंगन में अलगनी पर सूखने को डाल दिया तो ऐसा जान पड़ा, मानो किसी रंगरेज ने ब्याह के जोड़े रंगे हों। सिलबिल ऊपर बैठे-बैठे यह तमाशा देखे रहे थे, पर जबान न खोलते थे। छाती पर सांप-सा लोट रहा था। सारे कपड़े खराब हो गए, दफ्तर जाने को भी कुछ न बचा। इन दुष्टों को मेरे कपड़ों से न जाने क्या बैर था। घर में नाना प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन बन रहे थे। मुहल्ले की एक ब्राह्मणी के साथ चम्पा जुटी हुई थी। दोनों भाई और कई अन्य सज्जन आंगन में भोजन करने बैठे थे, तो बड़े साले ने चम्पा से पूछा – ‘कुछ उनके लिए भी खिचड़ी-विचड़ी बनाई है। पूरियां तो बेचारे आज खा न सकेंगे।

चम्पा ने कहा – ‘अभी तो नहीं बनाई, अब बना लूंगी।’

वाह री तेरी अक्ल! अभी तक तुझे इतनी फिक्र नहीं कि वह बेचारे खाएंगे क्या। तू तो इतनी लापरवाह कभी न थी। जा, निकाल ला जल्दी से चावल और मूंग की दाल।’ लीजिए, खिचड़ी पकने लगी। इधर मित्रों ने भोजन करना शुरू किया। सिलबिल ऊपर बैठे अपनी किस्मत को रो रहे थे। उन्हें इस सारी विपत्ति का एक ही कारण मालूम होता था – विवाह! चम्पा न आती, तो ये साले क्यों आते, कपड़े क्यों खराब होते, होली के दिन मूंग की खिचड़ी क्यों खाने को मिलती? मगर अब पछताने से क्या होता है? जितनी देर में लोगों ने भोजन किया, उतनी देर में खिचड़ी तैयार हो गई। बड़े साले ने खुद चम्पा को ऊपर भेजा कि खिचड़ी की थाली ऊपर दे आये।

सिलबिल ने थाली की ओर कुपित नेत्रों से देखकर कहा – ‘इसे मेरे सामने से हटा ले जाओ।’

‘क्या आज उपवास ही करोगे?’

‘तुम्हारी यही इच्छा है, तो यही सही।’

‘मैंने क्या किया? सवेरे से जुती हुई हूं। भैया ने खुद खिचड़ी डलवाई और मुझे यहां भेजा।’

‘हां, वह तो मैं देख रहा हूं कि मैं घर का स्वामी नहीं। सिकंदरों ने उस पर कब्जा जमा लिया, मगर में यह नहीं मान सकता कि तुम चाहती, तो और लोगों के पहले ही मेरे पास थाली न पहुंच जाती। मैं इस पतिव्रत धर्म के विरुद्ध हूं और क्या कहूं।

‘तुम तो देख रहे थे, कि दोनों जने मेरे सिर पर सवार थे।’

‘अच्छी दिल्लगी है कि लोग तो समोसे और खस्ते उड़ाये और मुझे मूंग की खिचड़ी दी जाय। वाह रे नसीब!’

‘तुम दो-चार कौर खा लो, मुझे ज्यों ही अवसर मिलेगा, दूसरी थाली लाऊंगी।’

‘सारे कपड़े रंगवा डाले, दफ्तर कैसे जाऊंगा? यह दिल्लगी मुझे जरा भी नहीं भाती। मैं इसे बदमाशी कहता हूं। तुमने संदूक की कुंजी क्यों दे दी? क्या मैं इतना पूछ सकता हूं?’

‘जबरदस्ती छीन ली। तुमने सुना नहीं? करती क्या?’

‘अच्छा, जो हुआ सो हुआ, यह थाली ले जाओ। धर्म समझना तो दूसरी थाली लाना, नहीं तो आज व्रत ही सही।’

एकाएक पैरों की आहट पाकर सिलबिल ने सामने देखा, तो दोनों साले आ रहे हैं। उन्हें देखते ही बेचारे ने मुंह बना लिया, चादर से शरीक ढक लिया और कराहने लगे।

बड़े साले ने कहा, ‘कहिए कैसी तबीयत है? थोड़ी-खिचड़ी खा लीजिए।’ सिलबिल ने मुंह बनाकर कहा – ‘अभी तो कुछ खाने की इच्छा नहीं है।’

‘नहीं, उपवास करना तो हानिकर होगा। खिचड़ी खा लीजिए।’

बेचारे सिलबिल ने मन में इन दोनों शैतानों को खूब कोसा और विष की भांति खिचड़ी कंठ से नीचे उतारी। आज होली के दिन खिचड़ी ही भाग्य में लिखी थी! जब तक सारी खिचड़ी समाप्त न हो गई, दोनों वहां डटे रहे, मानो जेल के अधिकारी किसी अनशन-व्रतधारी कैदी को भोजन करा रहे हों। बेचारे को ठूंस-ठूंसकर खिचड़ी खानी पड़ी। पकवानों के लिए गुंजाइश ही न रही।