aaga peechha by munshi premchand
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रात को जब भगतराम अपने प्रेम-मंदिर में पहुँचा, तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। एक-एक अंग से निराशा टपक ही थी। श्रद्धा रास्ता देखती हुई घबरा रही थी कि आज इतनी रात तक आये क्यों नहीं। उन्हें क्या मालूम कि मेरे दिल की क्या हालत हो रही है। यार-दोस्तों से छुट्टी मिलेगी, तो भूलकर इधर भी आ जाएँगे।

कोकिला ने कहा- मैं तो तुझसे कह चुकी कि उनका अब वह मिज़ाज नहीं रहा। फिर भी तो तू नहीं मानती। आखिर इस टालमटोल की कोई हद भी है।

श्रद्धा ने दुःखित होकर कहा- अम्मा, मैं आपसे हजार बार विनय कर चुकी हूँ कि चाहे लौकिक रूप में कुमारी ही क्यों न रहूं लेकिन हृदय से उनकी ब्याहता हो चुकी। अगर ऐसा आदमी विश्वास करने के काबिल नहीं है, तो फिर मैं नहीं जानती कि किस पर विश्वास किया जा सकता है।

इसी समय भगतराम निराशा की मूर्ति बने हुए कमरे के भीतर आये। दोनों स्त्रियों ने उनकी ओर देखा। कोकिला की आंखों में शिकायत थी और श्रद्धा की आँखें कह रही थी, इतनी निर्दयता।

भगतराम ने धीमे, वेदना पूर्ण स्वर में कहा- आप लोगों को आज बहुत देर तक मेरी राह देखनी पड़ी, लेकिन मैं मजबूर था। घर से अब अम्मा और दादा आये हुए हैं, उन्हीं से बातें कर रहा था।

कोकिला बोली- घर पर तो सब कुशल है न?

भगतराम ने सिर झुकाए हुए कहा- जी हाँ सब कुशल है। मेरे विवाह का मसला पेश था। पुराने खयाल के आदमी हैं, किसी तरह भी राजी नहीं होते।

कोकिला का मुख तमतमा उठा। बोली- वो क्यों राजी होंगे? हम लोग उनसे भी नीच हैं न, लेकिन जब तुम उनकी इच्छा के दास थे, तो तुम्हें उनसे पूछकर यहाँ आना-जाना चाहिए था। इस तरह हमारा अपमान करके तुम्हें क्या मिला? यदि मुझे मालूम होता कि तुम अपने माँ-बाप के इतने गुलाम हो, तो यह नौबत ही काहे को आती।

श्रद्धा ने देखा कि भगतराम की आंखों से आंसू गिर रहे हैं।

विनीत भाव से बोली- अम्मा जी, माँ-बाप की मरजी का गुलाम होना कोई पाप नहीं है। अगर मैं आपकी उपेक्षा करूंगी, तो क्या आपको दुःख न होगा? यही हाल तो उन लोगों का भी होगा।

श्रद्धा यही कहती हुई अपने कमरे की ओर चली और इशारे से भगतराम को भी बुलाया। कमरे में बैठकर दोनों कई मिनट तक पृथ्वी की ओर ताकते रहे। किसी में भी साहस न था कि उस सन्नाटे को तोड़े।

अंत में भगतराम ने पुरुषोचित वीरता से काम लिया और कहा- श्रद्धा, इस समय मेरे हृदय के भीतर तुमुल युद्ध हो रहा है। मैं शब्दों में अपनी दशा बयान नहीं कर सकता। जी चाहता है कि विष खाकर जान दे दूँ। तुमसे अलग रहकर जीवित नहीं रह सकता, केवल तड़प सकता हूँ। मैंने न-जाने उनकी कितनी खुशामद की, कितना रोया, कितना गिड़गिड़ाया, लेकिन दोनों अपनी बातों पर अड़े रहे। बार-बार यही कहते रहे कि अगर यह ब्याह होगा, तो हम दोनों तुम पर अपनी जान दे देंगे। उन्हें मेरी मौत मंजूर है, लेकिन तुम मेरे हृदय की रानी बनो, यह मंजूर नहीं।

श्रद्धा ये सांत्वना देते हुए कहा- प्यारे, मुझसे उनका घृणा करना उचित है। पढ़े-लिखे आदमियों में ही ऐसे कितने निकालेंगे। इसमें उनका कोई दोष नहीं। मैं सवेरे उनके दर्शन करने जाऊंगी, शायद मुझे देखकर, उनका दिल पिघल जाए। मैं हर तरह से उनकी सेवा करूंगी, उनकी धोतियाँ धोऊंगी, उनके पैर दबाया करूंगी। मैं वह सब करूंगी, जो उनकी मनचाही बहू करती। इसमें लज्जा की कौन-सी बात? उनके तलवे सहलाऊंगी, भजन गाकर सुनाऊंगी- मुझे बहुत से देहाती गीत आते हैं। अम्मा जी के सिर के सफेद बाल चुनूंगी। मैं दया नहीं चाहती, मैं तो प्रेम की चैरी हूँ। तुम्हारे लिए मैं सब कुछ करूंगी- सब कुछ।

भगतराम को ऐसा मालूम हुआ, मानो उसकी आँखों की ज्योति बढ़ गयी है, अथवा शरीर में कोई दूसरी ज्योर्तिमय आत्मा आ गई है। उनके हृदय का सारा अनुदान, सारा विश्वास, सारी भक्ति, आँखों से उमड़ कर श्रद्धा के पैरों की ओर जाती हुई मालूम हुई, मानो किसी घर से नन्हें-नन्हें लाल कपोल वाले, रेशमी कपड़े वाले, घुँघराले बालों वाले बच्चे हँसते हुए निकलकर खेलने जा रहे हैं?

चौधरी और चौधराइन को शहर आये हुए दो सप्ताह बीत गए। वे रोज जाने के लिए कमर कसते, लेकिन फिर रह जाते। श्रद्धा उन्हें जाने न देती। सवेरे जब उनकी आंखें खुलती, तो श्रद्धा उनके स्नान के लिए पानी तपाती होती, चौधरी को अपना हुक्का भरा हुआ मिलता। वे लोग ज्यों ही नहाकर उठते श्रद्धा उनकी धोती छाँटने लगती। दोनों उसकी सेवा और अविरल परिश्रम देखकर दंग रह जाते। ऐसी सुंदर, ऐसी मधुरभाषिणी, ऐसी हंसमुख और चतुर रमणी चौधरी ने इंस्पेक्टर साहब के घर में भी नहीं देखी थी। चौधरी के वह देवी मालूम होती और चौधराइन को लक्ष्मी। दोनों श्रद्धा की सेवा और अटल-प्रेम पर आश्चर्य करते थे, किन्तु फिर भी कलंक और बिरादरी का प्रश्न उनके मुँह पर मुहर लगाए हुए था। पन्द्रहवें दिन जब श्रद्धा दस बजे रात को अपने घर चली गई तो चौधरी ने चौधराइन से कहा- लड़की तो साक्षात लक्ष्मी है।

चौधरानी- जब मेरी धोती छाँटने लगती है, तो मैं मारे लाज के कट जाती हूँ। हमारी तरह तो इसकी लौंडी होगी।

चौधरी- फिर क्या सलाह देती हो-अपनी बिरादरी में तो ऐसी मधुर लड़की मिलने की नहीं।

चौधराइन- राम का नाम लेकर ब्याह करो। बहुत होगा, रोटी पड़ जाएगी। पाँच बीसी में तो रोटी होती है, कौन छप्पन टके लगते हैं। पहले हमें शंका होती थी कि पतुरिया की लड़की न जाने कैसी हो, कैसी न हो! पर अब सारी शंका मिट गई।

चौधरी- जब बातें करती है, तो मालूम होता है, मुँह से फूल झड़ते हैं।

चौधराइन- मैं तो उसकी माँ को बखानती हूं जिसकी कोख में ऐसी लक्ष्मी जन्मी।

चौधरी- कल चलो, कोकिला से मिलकर सब ठीक-ठाक कर आवें।

चौधराइन- मुझे तो उसके घर जाते शरम लगती है। वह रानी बनी बैठी होगी, मैं तो उसकी लौंडी मालूम होऊंगी।

चौधरी- तो फिर पाउडर लगा कर मुँह में पोत लो- गोरी हो जाओगी। इंस्पेक्टर साहब की मेम भी तो रोज पाउडर लगाती थी। रंग तो साँवला था पर जब पाउडर लगा लेती, तो मुँह चमकने लगता था।

चौधराइन- हँसी करोगे तो गाली दूंगी। हां, काली कमली पर कोई रंग चढ़ता है, जो पाउडर चढ़ जाएगा? तुम तो सचमुच उसके चौकीदार से लगोगे।

चौधरी- तो कल मुँह-अंधेरे चल दें। अगर कहीं श्रद्धा आ गई, तो फिर गला न छोडेगी। बच्चा से कह देंगे कि पंडित से सायत-मिती सब ठीक कर लो, फिर हँसकर कहा- उन्हें, तो आप ही जल्दी होगी।

चौधराइन भी पुराने दिन याद करके मुस्कराने लगी।