aaga peechha by munshi premchand
aaga peechha by munshi premchand

चौधरी और चौधराइन का मत पाकर कोकिला विवाह का आयोजन करने लगी। कपड़े बनवाये जाने लगे। बरतनों की दुकानें छानी जाने लगीं और गहनों के लिए सुनार के पास ‘ऑर्डर’ जाने लगे। लेकिन न मालूम क्यों, भगत के मुख पर प्रसन्नता का चिह्न तक न था। श्रद्धा के यहां नित्य की भांति जाता किन्तु उदास, कुछ भूला हुआ-सा बैठा रहता। घंटों आत्म-विस्मृति की अवस्था में, शून्य-दृष्टि से अथवा पृथ्वी की अरि देखा करता। श्रद्धा उसे अपने कीमती कपड़े और जड़ाऊ गहने दिखलाती। उसके अंग-प्रत्यंग से आशाओं की स्फूर्ति छलकी पड़ती थी। इस नशे में वह भगतराम की आँखों में भरे हुए आंसुओं को न देख पाती थी।

इधर चौधरी भी तैयारियां रहे थे। बार-बार शहर आते और विवाह का सामान मोल ले जाते। भगतराम के स्वतंत्र विचार वाले मित्र उसके भाग्य पर ईर्ष्या करते थे। अप्सरा-जैसी सुन्दर स्त्री, कारूँ के खजाने-जैसी दौलत, दोनों साथ ही कहीं मयस्सर होते हैं? किन्तु वह, जो मित्रों की ईर्ष्या, कोकिला की प्रसन्नता, श्रद्धा की मनोकामना और चौधरी और चौधराइन के आनन्द का कारण था, छिप-छिपाकर रोता था, अपने जीवन से दुःखी था। चिराग-तले अँधेरा छाया हुआ था। इस छिपे तूफान की किसी को भी खबर न थी, जो उसके हृदय में हाहाकार मचा रहा था।

ज्यों-ज्यों विवाह का दिन समीप आता था, भगतराम की बनावटी उमंग भी ठंडी पड़ती जाती थी। जब चार दिन रह गए तो उसे हलका-सा ज्वर आ गया। वह श्रद्धा के घर भी न जा सका। चौधरी और चौधराइन तथा अन्य बिरादरी के लोग भी आ पहुंचे थे, किन्तु सब-के-सब विवाह की धुन में इतने मस्त थे कि किसी का भी ध्यान उसकी ओर न गया।

दूसरे दिन भी वह घर से न निकल सका। श्रद्धा ने समझा कि विवाह की रीतियों से छुट्टी न मिली होगी। तीसरे दिन चौधराइन भगतराम को बुलाने गयी, तो देखा कि वह सहमी हुई विस्फारित आँखों से कमरे के एक कोने की ओर देखता हुआ दोनों हाथ सामने किए पीछे हट रहा है, मानो अपने को किसी के वार से बचा रहा हो। चौधराइन ने घबराकर पूछा- बच्चा, कैसा जी है? पीछे इस तरह क्यों चले जा रहे हो? यहाँ तो कोई नहीं है।

भगतराम के मुख पर पागलों जैसी अचेतना थी। आंखों में भय छाया हुआ था। भीत स्वर में बोला- नहीं अम्मा जी, देखो वह श्रद्धा चली आ रही है। देखो, उसके दोनों हाथों में दो काली नागिनें हैं। वह मुझे उन नागिनों से डसवाना चाहती है। अरे अम्मा देखो, वह नजदीक आ गई। श्रद्धा! श्रद्धा! तुम मेरी जान की क्यों बैरिन हो गई हो? क्या मेरे असीम प्रेम का यही परिणाम है? मैं तो तुम्हारे चरणों पर बलि होने के लिए सदैव तत्पर था। इस जीवन का मूल्य ही क्या है! तुम इन नागिनों को दूर फेंक दो। मैं यहीं तुम्हारे चरणों पर लेटकर यह जान तुम पर न्यौछावर कर दूँगा। हें, हें, तुम न मानोगी?

यह कहकर वह चित्त गिर पड़ा। चौधराइन ने लपक कर चौधरी को बुलाया। दोनों ने भगतराम को उठाकर चारपाई पर लिटा दिया। चौधरी का ध्यान किसी आसेब की ओर गया। वह तुरन्त ही लौंग और राख लेकर आसेब उतारने का आयोजन करने लगे। स्वयं तंत्र-मंत्र में निपुण थे। भगतराम का सारा शरीर ठंडा था, किन्तु सिर तवे की तरह तप रहा था।

रात को भगतराम कई बार चौंक कर उठा। चौधरी ने हर बार मंत्र फूंक कर अपने खयाल से आसेब को भगाया।

चौधराइन ने कहा- कोई डॉक्टर क्यों नहीं बुलाते? शायद दवा से कुछ फायदा हो। कल ब्याह और आज यह हाल।

चौधरी ने निःशंक भाव से कहा- डॉक्टर आकर क्या करेगा, वही पीपल वाले बाबा तो हैं। दवा-दाऊ करना उनसे और रार बढ़ाना है। रात जाने दो। सवेरा होते ही एक बकरा और एक बोतल दाऊ उनकी भेंट होगी। बस, और कुछ करने की जरूरत नहीं है। डॉक्टर बीमारी की दवा करता है कि हवा-ब्यार की? बीमारी उन्हें कोई नहीं है, कुल के बाहर ब्याह करने ही से देवता लोग रूठ गये हैं।

सवेरे चौधरी ने एक बकरा मंगवाया। स्त्रियों गाती-बजाती देवी के चौतरे की ओर चलीं। जब लौटकर आये, तो देखा कि भगतराम की हालत खराब है। उसकी नाड़ी धीरे-धीरे बंद हो रही थी। मुख पर मृत्यु-विभीषिका की छाप थी। उसके दोनों नेत्रों से आंसू ढुलक कर गालों पर गिर रहे थे, मानो अपूर्ण इच्छा का अंतिम संदेश निर्दयी संसार को सुना रहे हों। जीवन का कितना वेदना-पूर्ण दृश्य था- आंसू की दो बूंदें।

अब चौधरी घबराए। तुरंत ही कोकिला को खबर दी। एक आदमी डॉक्टर के पास भेजा। डॉक्टर के आने में देर था। वह भगतराम के मित्रों में से थे, किन्तु कोकिला और श्रद्धा आदमी के साथ आ पहुंची। श्रद्धा भगतराम के सामने आकर खड़ी हो गयी। उसकी आंखों से आँसू बहने लगे।

थोड़ी देर में भगतराम ने आंखें खोलीं और श्रद्धा की ओर देखकर बोले- तुम आ गयी श्रद्धा, मैं तुम्हारी ही राह देख रहा था। यह अन्तिम प्यार लो। आज ही सब आगा-पीछा का अंत हो जाएगा, जो आज से तीन वर्ष पहले आरम्भ हुआ था। इन तीन वर्षों में मुझे जो आत्मिक-यंत्रणा मिली है, हृदय ही जानता है। तुम वफा की देवी हो, लेकिन मुझे रह-रहकर यह भ्रम होता था, क्या तुम खून के असर का नाश कर सकती हो? क्या तुम एक ही बार अपनी परम्परा की रीति छोड़ सकोगी? क्या तुम जन्म के प्राकृतिक नियमों को तोड़ सकोगी? इन भ्रमपूर्ण विचारों के लिए शोक न करना। मैं तुम्हारे योग्य न था। किसी प्रकार भी और – कभी भी तुम्हारे-जैसा महान् हृदय न बन सका। हां, इस भ्रम के वश में पढ़कर संसार से मैं अपनी इच्छाएँ बिना पूर्ण किए ही जा रहा हूँ। तुम्हारे अगाध, निष्कपट, निर्मल प्रेम की स्मृति सदैव ही मेरे साथ रहेगी। किन्तु हाय अफसोस… कहते- कहते भगतराम की आँखें फिर बंद हो गयीं। श्रद्धा के मुख पर गाढ़ी लालिमा दौड़ गयी। उसके आँसू सूख गए। आँखों में आत्म-अभिमान की झलक आ गयी। वह क्षण-भर वहाँ खड़ी-रही और दूसरे ही क्षण नीचे आकर अपनी गाड़ी में बैठ गई। कोकिला उसके पीछे-पीछे दौड़ी हुई आयी और बोली- बेटी, यह क्रोध करने का अवसर नहीं है। लोग अपने दिल में क्या कहेंगे। उसकी दशा बराबर बिगड़ती ही जाती है। तुम्हारे रहने से बुड्ढों को ढाढस बँधा रहेगा।

श्रद्धा ने कुछ उत्तर न दिया। कोचवान से कहा- घर चलो। हारकर कोकिला भी गाड़ी में बैठ गई।

असह्य शीत पड़ रहा था। आकाश में काले बादल छाए हुए थे। शीतल वायु चल रही थी। माघ के अन्तिम दिवस थे। वृक्ष, पेड़-पौधे भी शीत से अकड़े हुए थे।

दिन के आठ बज गए थे, अभी तक लोग रजाई के भीतर मुंह लपेटे हुए लेटे थे। लेकिन श्रद्धा का शरीर पसीने से भीगा हुआ था। ऐसा मालूम होता था कि सूर्य की सारी उष्णता उसके शरीर की रगों में घुस गयी है। उसके होंठ सूख गए थे, प्यास से नहीं, आंतरिक धधकती हुई अग्नि की लपटों से। उसका एक-एक अंग उस अग्नि की भीषण आंच जला जा रहा था। उसके मुख से बार-बार जलती हुई गर्म साँस निकल रही थी, मानो किसी चूल्हे की लपट हो। घर पहुँचते-पहुँचते उसका फूल-सा मुख मलिन हो गया, होंठ पीले पड़ गए, जैसे किसी काले नाग ने डस लिया हो। कोकिला बार-बार अश्रुपूर्ण नेत्रों से उसी की ओर ताकती थी, पर क्या कहे और क्या कहकर समझाए।

घर पहुँच कर श्रद्धा अपने ऊपर के कमरे की ओर चली, किन्तु उसमें इतनी शक्ति न थी कि सीढ़ियाँ चढ़ सके। रस्सी को मजबूती से पकड़ती हुई किसी तरह अपने कमरे में पहुंची। हाय, आधा घंटे पहले यहाँ की एक-एक वस्तु पर प्रसन्नता, आह्लाद, आशाओं की छाप लगी हुई थी, पर अब सब-की-सब सिर धुनती हुई मालूम होती थीं। बड़े-बड़े संदूक में जोड़े सजाए हुए रखे थे, उन्हें देखकर श्रद्धा के हृदय में हूक सी उठी और वह गिर पड़ी, जैसे विहार करता हुआ और लाचें भरता हुआ हिरन तीर लग जाने से गिर पड़ता है।

अचानक उसकी दृष्टि उस चित्र पर जा पड़ी, जो आज तीन वर्ष से उसके जीवन का आधार हो रहा था। उस चित्र को उसने कितनी बार चूमा था, कितनी बार गले लगाया था, कितनी बार हृदय से चिपका लिया था। ये सारी बातें एक- एक करके याद आ रही थीं, लेकिन उन्हें याद करने का भी अधिकार उसे न था।

हृदय के भीतर एक दर्द उठा, जो पहले से कहीं अधिक प्राणांतकारी था- जो पहले से भी अधिक तूफान के समान भयंकर था। हाय! उस मरने वाले के दिल को उसने कितनी यंत्रणा पहुंचायी। भगतराम के अविश्वास का यह जवाब, यह प्रत्युत्तर कितना रोमांचकारी हृदय-विदारक था। हाय! वह कैसे ऐसी निष्ठुर हो गई! उसका प्यारा उसकी नजरों के सामने दम तोड़ रहा था। उसके लिए- उसकी सांत्वना के लिए एक शब्द भी मुँह से न निकला। यही तो खून का असर है-इसके अतिरिक्त और हो ही क्या सकता था। आज पहली बार श्रद्धा को कोकिला की बेटी होने का पछतावा हुआ, यह इतनी स्वार्थरत, इतनी हृदयहीन है- आज ही उसे मालूम हुआ। वह त्याग, यह सेवा, यह उच्चादर्श, जिस पर उसे घमंड था, ढह कर, श्रद्धा के सामने गिर पड़ा। वह अपनी ही दृष्टि में अपने को हेय समझने लगी। उस स्वर्गीय प्रेम का ऐसा नैराश्य उत्तर वेश्या की पुत्री के अतिरिक्त और कौन दे सकता है।

श्रद्धा उसी समय कमरे से बाहर निकलकर, वायु-वेग से सीढ़ियां उतरती हुई नीचे पहुँची, और भगतराम के मकान की ओर दौड़ी। वह आखिरी बार उससे गले मिलना चाहती थी। अंतिम बार उसके दर्शन करना चाहती थी। वह अनंत प्रेम के कठिन बंधनों को निभाएगी, और अंतिम श्वास तक उसी की होकर रहेगी।

रास्ते में कोई सवारी न मिली। श्रद्धा थकी जा रही थी। सिर से पाँव तक पसीने से नहाई हुई थी। न मालूम कितनी बार वह ढोकर खाकर गिरी और फिर उठकर दौड़ने लगी। उसके घुटने से रक्त निकल रहा था, साड़ी कई जगह से फट गई थी, मगर उसे उस समय अपने तन-बदन की सुध तक न थी। उसका एक-एक रोया सहस्र कंठ हो-होकर ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था कि उस प्रातःकाल के दीपक की लौ थोड़ी देर और बची रहे। उनके मुँह से एक बार ‘श्रद्धा’ का नाम सुनने के लिए उसकी अन्तरात्मा कितनी व्याकुल हो रही थी। केवल यही एक शब्द सुन फिर उसकी कोई भी इच्छा अपूर्ण न रह जाएगी, उसकी सारी आशाएँ सफल हो जाएँगी, सारी साध पूर्ण हो जाएगी।

श्रद्धा को देखते ही चौधराइन ने दौड़कर उसका हाथ पकड़ लिया और रोती हुई बोली- बेटी, तुम कहां चली गई थी? दो बार तुम्हारा नाम लेकर पुकार चुके हैं।

श्रद्धा को ऐसा मालूम हुआ, मानो उसका कलेजा फटा जा रहा है। उसकी आंखें पथरा गयी हैं। उसे ऐसा मालूम होने लगा कि यह अगाध, अथाह समुद्र की भँवर में पड़ गई है। उसने कमरे में जाते ही भगतराम के ठंडे पैरों पर सिर रख दिया और उसे आंखों के गरम पानी से धोकर गरम करने का उपाय करने लगी। यही उसकी सारी आशाओं और कुछ अरमानों की समाधि थी।

भगतराम ने आंखें खोलकर कहा- क्या तुम हो श्रद्धा! मैं जानता था कि तुम आओगी, इसीलिए अभी तक प्राण अवशेष थे। जरा मेरे हृदय पर अपना सिर रख दो। हाँ, मुझे अब विश्वास हो गया कि तुमने मुझे क्षमा कर दिया। जी डूब रहा है। तुमसे कुछ माँगना चाहता हूं पर किस मुँह से मांगूं जब जीते जी न माँग सका, तो अब क्या- है?

हमारी अंतिम घड़ियां किसी अपूर्ण साध को अपने हिय के भीतर छिपाए होती हैं। मृत्यु पहले हमारी सारी ईर्ष्या, सारा भेद-भाव, सारा द्वेष नष्ट करती है। जिनकी सूरत से हमें घृणा होती है, उनसे फिर वही पुराना सौहार्द्र, पुरानी मैत्री करने के लिए, उनको गले लगाने के लिए हम उत्सुक हो जाते हैं। जो कुछ कर सकते थे और न कर सके- उसी की एक साध रह जाती है। भगतराम ने उखड़े हुए विषादपूर्ण स्वर में अपने प्रेम की पुनरावृत्ति श्रद्धा के सामने की। उस स्वर्गीय निधि को पाकर वह प्रसन्न हो सकता था, उसका उपयोग कर सकता था, किन्तु हाय, आज वह जा रहा है। अपूर्ण साधों की स्मृति लिए हुए! हाय रे, अभागिन साध।

श्रद्धा भगतराम के वक्षस्थल पर झुकी हुई रो रही थी। भगतराम ने सिर उठाकर उसके मुरझाए हुए, आंसुओं से धोए हुए स्वच्छ कपोलों को चूम लिया। मरती हुई साध की वह अंतिम हँसी थी।

भगतराम ने अवरुद्ध कंठ से कहा- यह हमारा और तुम्हारा विवाह है, श्रद्धा। यह मेरी अंतिम भेंट है, यह कहते हुए उसकी आँखें हमेशा के लिए’ बंद हो गईं। साध भी मरकर गिर पड़ी।

श्रद्धा की आंखें रोते-रोते लाल हो रही थीं। उसे ऐसा मालूम हुआ, मानो भगतराम उसके सामने प्रेमालिंगन का संकेत करते हुए मुस्करा रहे हैं। वह अपनी दशा.. काल, स्थान सब भूल गई। जख्मी सिपाही अपनी जीत का समाचार पाकर अपना दर्द, अपनी पीड़ा भूल जाता है। क्षण भर के लिए मौत भी हेय हो जाती है। श्रद्धा का भी यही हाल हुआ। वह भी अपना जीवन प्रेम की निष्ठुर वेदी पर उत्सर्ग करने के लिए तैयार हो गई, जिस पर लैला और मजनू, शीरी और फरहाद- एक नहीं, हजारों ने अपनी बलि चढ़ा दी।

उसने चुम्बन का उत्तर देते हुए कहा- प्यारे, मैं तुम्हारी हूं और सदा तुम्हारी ही रहूंगी।

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