aaga peechha by munshi premchand
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एक ने पूछा- यह स्त्री कौन थी भाई?

दूसरे ने उत्तर दिया- उसी कोकिला रंडी की लड़की।

तीसरे व्यक्ति ने कहा- तभी यह आवाज और सफाई है। तभी तो जादू है। जादू है जनाब जादू। क्यों न हो, माँ भी तो सितम ढाती थी। जब से उसने अपना पेशा छोड़ा, शहर बे-जान हो गया। अब मालूम होता है कि यह अपनी माँ की जगह लेगी।

इस पर एक खद्दरधारी काला नवयुवक बोला- क्या खूब कदरदानी फरमायी है जनाब ने, वाह।

उसी व्यक्ति ने उत्तर दिया- आपको बुरा क्यों लगा? क्या कुछ सांठ-गांठ तो नहीं है?

काले नवयुवक ने कुछ तेज होकर कहा- आपको ऐसी बातें मुँह से निकालते लज्जा भी नहीं आती।

दूसरे व्यक्ति ने कहा- लज्जा की कौन-सी बात है? जनाब, वेश्या की लड़की अगर वेश्या हो तो आश्चर्य की क्या बात है?

नवयुवक ने घृणा-पूर्ण स्वर में कहा- ठीक होगा, आप जैसे बुद्धिमान व्यक्तियों की समझ में! जिस रमणी के मुख से ऐसे विचार निकल सकते हैं, वह देवी है, रूप को बेचने वाली नहीं।

श्रद्धा उसी समय सभा से जा रही थी। यह अंतिम शब्द उसके कानों में पड़ गए, वह विस्मित और पुलकित होकर वहीं ठिठक गई। काले नवयुवक की ओर कृतज्ञता-पूर्ण दृष्टि से देखा और फिर बड़ी तेजी से आगे बढ़ गयी, लेकिन रास्ते भर उसके कानों में उन्हीं शब्दों की प्रतिध्वनि गूँजती रही।

अब तक श्रद्धा की प्रशंसा करने वाली, उसे उत्साहित करने वाली केवल उसकी माँ कोकिला थी, और चारों ओर वही उपेक्षा थी, वही तिरस्कार। आज से एक अपरिचित, काले किन्तु गोरे हृदय वाले खद्दरधारी नवयुवक व्यक्ति के मुख का चित्र बराबर उसकी आँखों के सामने नाचा करता। मन में प्रश्न उठता- वह कौन है? क्या करता है? क्या फिर कभी उसके दर्शन होंगे?

कॉलेज जाते समय श्रद्धा उस नवयुवक को खोई हुई आँखों से खोजती। घर पर रोज चिक की आड़ से, रास्ते के आते-जाते लोगों को देखती, लेकिन वह नवयुवक नजर न आता।

कुछ दिन बाद महिला-मंडल की दूसरी सभा का विज्ञापन निकला। अभी सभा होने को चार दिन बाकी थे। यह चारों दिन श्रद्धा ने अपना भाषण तैयार करने में बिताए। एक-एक शब्द की खोज में घंटों सिर मारती। एक-एक वाक्य को बार-बार पढ़ती। बड़े-बड़े नेताओं की स्पीचें पढ़ती और उसी तरह लिखने की कोशिश करती। जब सारी स्पीच पूरी हो गई, तो श्रद्धा अपने कमरे में जाकर कुर्सियों और मेजों को सम्बोधित करके जोर-जोर से पढ़ने लगी। भाषण-कला के सभी लक्षण जमा हो गए थे। उपसंहार तो इतना सुंदर था कि उसे अपने ही मुख से सुनकर वह मुग्ध हो गई। इसमें कितना संगीत था, कितना आकर्षण, कितनी क्रांति! सभा का दिन आ पहुँचा। श्रद्धा मन-ही-मन भयभीत होती हुई सभा-मंडप में घुसी। हाल भरा हुआ था और पहले दिन से भी अधिक भीड़ थी। श्रद्धा को देखते ही जनता ने तालियाँ पीटकर उसका स्वागत किया। कोलाहल होने लगा और सभी एक स्वर से चिल्ला उठे- आप अपनी वक्तृता शुरू करें।

श्रद्धा ने मंच पर आकर एक उड़ती हुई निगाह से जनता की ओर देखा। वह काला नवयुवक जगह न मिलने के कारण अंतिम पंक्ति में खड़ा हुआ था। श्रद्धा के दिल में गुदगुदी-सी होने लगी। उसने काँपते हुए स्वर में अपनी वक्ता शुरू की। उसकी नजरों में सारा हाल पुतलियों से भरा हुआ था, अगर कोई जीवित मनुष्य था, तो वही सबसे पीछे खड़ा काला नवयुवक। उसका मुख उसी की ओर था। यह उसी से अपने भाषण की दाद माँग रही थी। हीरे परखने की आशा जौहरी से ही की जाती है।

आधे घंटे तक श्रद्धा के मुख से फूलों की वर्षा होती रही। लोगों को बहुत कम ऐसी वक्तृता सुनने को मिली।

श्रद्धा जब सभा समाप्त होने पर घर चली तो देखा, वही काला नवयुवक उसके पीछे-पीछे तेजी से चला आ रहा है। श्रद्धा को यह मालूम था कि लोगों ने उसका भाषण बहुत पसंद किया है। लेकिन उस युवक की राय सुनने का अवसर उसे नहीं मिला था। उसने अपनी चाल धीमी कर दी। दूसरे ही क्षण वह नवयुवक उसके पास पहुँच गया। दोनों कई कदम चुपचाप चलते रहे।

अंत में नवयुवक ने झिझकते हुए कहा- आज तो आपने कमाल कर दिया। श्रद्धा ने प्रफुल्लता के स्रोत को दबाते हुए कहा- धन्यवाद! यह आपकी कृपा है।

नवयुवक ने कहा- मैं किस लायक हूँ। मैं ही नहीं, सारी सभा सिर धुन रही थी।

श्रद्धा- क्या आपका शुभ स्थान यही है?

नवयुवक- जी हाँ, यहाँ मैं एम. ए. में पढ़ रहा हूँ। यह ऊंच-नीच का भूत न जाने कब तक हमारे सिर पर सवार रहेगा। अभाग्य से मैं भी उन लोगों में हूँ जिन्हें संसार नीच समझता है। मैं जाति का चमार हूँ। मेरे पिता स्कूलों के इंस्पेक्टर के यहाँ अर्दली थे। अच्छी सिफारिश से स्कूल में भर्ती हो गया। तब से भाग्य से लड़ता-भिड़ता चला आ रहा हूं। पहले तो स्कूल के मास्टर मुझे छूते ही न थे। वह हालत तो अब नहीं रही। किंतु लड़के अब भी मुझसे खिंचे रहते हैं।

श्रद्धा- मैं तो कुलीनता को जन्म से नहीं, धर्म से मानती हूँ।

नवयुवक- यह तो आपकी वक्तृता ही से सिद्ध हो गया है और इसी से आपसे बातें करने का साहस भी हुआ, नहीं तो कहां आप, और कहां मैं – श्रद्धा ने अपनी आँखें नीची करके कहा-शायद आपको मेरा हाल मालूम नहीं।

नवयुवक- बहुत अच्छी तरह मालूम है। यदि आप अपनी माताश्री के दर्शन करवा सकें, तो आपका बहुत आभारी होऊंगा।

वह आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्न होंगी! शुभ-नाम?

मुझे भगतराम कहते हैं।

यह परिचय धीरे-धीरे स्थिर और दृढ़ होता गया, मैत्री प्रगाढ़ होती गई। श्रद्धा की नजरों में भगतराम एक देवता थे, और भगतराम के समक्ष श्रद्धा मानवी रूप में देवी थी।

एक साल बीत गया। भगतराम रोज देवी के दर्शनों को जाता। दोनों घंटों बैठे बातें किया करते। श्रद्धा कुछ भाषण करती, तो भगतराम सब काम छोड़कर सुनने जाता। उनके मनसूबे एक थे, जीवन के आदर्श एक, रुचि एक, विचार एक। भगतराम अब प्रेम और उसके रहस्यों की मार्मिक विवेचना करता। उनकी बातों में ‘रस’ और ‘अलंकार’ का कभी इतना संयोग न हुआ था। भावों को इंगित करने में उसे कमाल हो गया था। लेकिन ठीक उन अवसरों पर, जब श्रद्धा के हृदय में गुदगुदी होने लगती, उसके कपोल उल्लास से रंजित हो जाते, भगतराम विषय पलट देता और जल्दी ही कोई बहाना बनाकर वहाँ से खिसक जाता। उसके चले जाने पर श्रद्धा हसरत के आंसू बहाती और सोचती-क्या इन्हें दिल से मुझसे प्रेम नहीं?

एक दिन कोकिला ने भगतराम को एकांत में बुलाकर कहा- बेटा अब तो मुन्नी से तुम्हारा विवाह हो जाना चाहिए, तो अच्छा। जीवन का क्या भरोसा? कहीं मर जाऊँ, तो यह साध मन ही में रह जाए।

भगतराम ने सिर हिलाकर कहा- अम्मा जरा इस परीक्षा में पास हो जाने दो। जीविका का प्रश्न हल हो जाने के बाद ही विवाह शोभा देता है।