यह सब तुम्हारा ही तो है। क्या मैं साथ बाँध ले जाऊंगी?
यह आपकी कृपा है, अम्मा जी। पर इतना निर्लज्ज न बनाइए। मैं तो आपका हो चुका, अब तो आप दुत्कारें भी तो इस द्वार से नहीं टल सकता। मुझ जैसा भाग्यवान संसार में और कौन है। लेकिन देवी के मंदिर में, जाने से पहले कुछ पान-फूल तो पास होना ही चाहिए।
साल भर और गुजर गया। भगतराम ने एम. ए. की उपाधि ली और अपने ही विद्यालय में अर्थशास्त्र का अध्यापक हो गया। उस दिन कोकिला ने खूब दान- पुण्य किया। अब भगतराम ले आकर उसके पैरों पर सिर झुकाया, तो उसने उसे छाती से लगा लिया। उसे विश्वास था कि आज भगतराम विवाह के प्रश्न को जरूर छेड़ेगा। श्रद्धा प्रतीक्षा की मूर्ति बनी हुई थी। उसका एक-एक अंग मानो सौ-सौ तार होकर प्रतिध्वनित हो रहा था। दिल पर एक नशा छाया हुआ था, पाँव जमीन पर न पड़ते थे। भगतराम को देखते ही माँ से बोली- अम्मा अब हमको एक हलका- सा मोटर ले दीजिएगा।
कोकिला ने कहा-हलका-सा क्यों! भारी-सा लेना। पहले कोई अच्छा-सा मकान तो ठीक कर लो।
श्रद्धा भगतराम को अपने कमरे में बुला ले गयी। दोनों बैठकर नए मकान की सजावट के मनसूबे बाँधने लगे। परदे, फर्श, तस्वीरें, सबकी व्यवस्था की गयी। श्रद्धा ने कहा रुपये भी अम्मा जी से ले लेंगे।
भगतराम बोला-उनसे रुपये लेते शर्म आएगी।
श्रद्धा ने मुस्कराकर कहा- आखिर दहेज के रुपये तो देंगी।
दोनों घंटे भर बातें करते रहे। मगर वह मार्मिक शब्द, जिसे सुनने के लिए श्रद्धा का मन आतुर हो रहा था, आज भी भगतराम के मुख से न निकला और वह विदा हो गया।
उसके चले जाने पर कोकिला ने डरते-डरते पूछा- आज क्या बात हुई? श्रद्धा ने उसका आशय समझकर कहा- अगर मैं ऐसी भारी हो रही हूँ तो कुएँ में क्यों नहीं डाल देतीं।
यह कहते-कहते उसके धैर्य की दीवार ढह गयी। वह आवेश और वह वेदना, जो भीतर-ही-भीतर अब तक टीस रही थी, निकल पड़ी। वह फूट-फूट कर रोने लगी।
कोकिला ने झुंझलाकर कहा- जब कुछ बातचीत ही नहीं करना है, तो रोज आते ही क्यों हैं? ऐसा बड़ा घराना भी तो नहीं है, और न ऐसे धन्नासेठ ही हैं।
श्रद्धा ने आँख पोंछकर कहा- अम्मा जी, मेरे सामने उन्हें कुछ न कहिए। उनके दिल में जो कुछ है, वह मैं जानती हूँ। वह मुँह से बहुत कुछ न कहें, मगर दिल से कह चुके हैं और मैं चाहे कानों से कुछ न सुनूं पर दिल से सब कुछ सुन चुकी। कोकिला ने श्रद्धा से कुछ भी न कहा, लेकिन दूसरे दिन भगतराम से बोली- अब किस सोच-विचार में हो, बेटा?
भगतराम ने सिर खुजलाते हुए कहा- अम्मा जी, मैं तो हाजिर हूं लेकिन घरवाले किसी तरह राजी नहीं होते। जरा फुरसत मिले, तो घर जाकर उन्हें राजी कर लूँ। माँ-बाप को नाराज करना भी तो अच्छा नहीं।
कोकिला कुछ जवाब न दे सकी।
भगतराम के माँ-बाप शहर से दूर रहते थे। उनका यही एक लड़का था। उनकी सारी उमंगें उसी के विवाह पर अवलम्बित थी। उन्होंने कई बार उसकी शादी तय की। पर भगतराम बार-बार यही कहकर निकल जाता कि जब तक नौकर न हो जाऊंगा, विवाह न करूंगा। अब वह नौकर हो गया था, इसलिए दोनों माघ के एक ठंडे प्रातःकाल में लदे-फदे भगतराम के मकान पर आ पहुंचे। भगतराम ने दौड़कर उनकी पद-धूलि ली और कुशल आदि पूछने के बाद कहा- आप लोगों ने इस जाड़े -पाले में क्यों तकलीफ की? मुझे बुला लिया होता।
चौधरी ने अपनी पत्नी की ओर देखकर कहा-सुनती हो बच्चा की अम्मा जब बुलाते हैं, तो कहते हैं कि इम्तहान हैं, यह है, वह है। जब आ गए, तो कहता है, बुलाया क्यों नहीं? तुम्हारा विवाह ठीक हो गया है। अब एक महीने की छुट्टी लेकर हमारे साथ चलना होगा। इसलिए हम दोनों आये हैं।
चौधराइन- हमने कहा कि बिना गये काम नहीं चलेगा। तो आज ही दरखास्त दे दो। लड़की बड़ी सुन्दर, पढ़ी-लिखी, अच्छे कुल की है।
भगतराम ने लजाते हुए कहा- मेरा विवाह तो यहीं एक जगह लगा हुआ है, अगर आप राजी हों तो कर, लूँ।
चौधरी- इस शहर में हमारी बिरादरी का कौन है, क्यों बच्चा की अम्मा? चौधराइन- यहाँ हमारी बिरादरी का तो कोई नहीं है।
भगतराम- मां बेटी हैं, घर में रुपया भी है। लड़की ऐसी है कि तुम लोग देखकर खुश हो जाओगे। मुफ्त में शादी हो जाएगी।
चौधरी- क्या लड़की का बाप मर गया है? उसका क्या नाम था? कहाँ का रहने वाला है? कुल-मरजाद कैसा है- जब तक सारी बातें मालूम न हो जाएं, तब तक ब्याह कैसे हो सकता है क्यों बच्चा की अम्मा?
चौधराइन- हां, बिना इन बातों का पता लगाए, कैसे हो सकता है।
भगतराम- ने कोई जवाब नहीं दिया।
चौधरी-यहाँ किस मोहल्ले में रहती हैं माँ-बेटी? सारा शहर हमारा छाना पड़ा है। हम यहाँ कोई बीस साल रहे होंगे, क्यों बच्चा की अम्मा?
चौधराइन- बीस साल से ज्यादा ही रहे हैं।
भगतराम- उनका घर नखास पर है।
चौधरी- नखास से किस तरफ?
भगतराम- नखास की सामने वाली गली में पहला मकान उन्हीं का है। सड़क से दिखाई देता है।
चौधरी- पहला मकान तो कोकिला रंडी का है। गुलाबी रंग से पुता है न?
भगतराम ने झेंपते हुए कहा- जी हां, वही मकान है!
चौधरी- तो उसमें कोकिला रंडी नहीं रहती क्या?
भगतराम-रहती क्यों नहीं। माँ-बेटी, दोनों ही रहती हैं।
चौधरी- तो क्या कोकिला रंडी की लड़की से शादी करना चाहते हो? नाक कटवाने पर लगे हो क्या? बिरादरी में तो कोई पानी पियेगा नहीं।
चौधराइन- लूका लगा दूंगी, मुंह में रांड के? रूप-रंग देख के लुभा गए क्या?
भगतराम- मैं तो इसे अपने बड़े भाग्य समझता हूं कि वह अपनी लड़की की शादी मेरे साथ करने को राजी है। अगर वह आज चाहे, तो किसी बड़े- से- बड़े रईस के घर में शादी कर सकती है।
चौधरी- रईस उससे ब्याह न करेगा- रख लेगा! तुम्हें भगवान समाई दे, तो एक नहीं चार रखो। मर्दों के लिए कौन रोक है? लेकिन जो ब्याह के लिए कहो तो ब्याह वही है, जो बिरादरी में हो।
चौधराइन- बहुत पढ़ने से आदमी बौरा जाता है।
चौधरी- हम गँवार आदमी हैं, पर समझ में नहीं आता कि तुम्हारी यह नियत कैसे हुई? रंडी की बेटी चाहे इन्नर की परी हो, तो भी रंडी की बेटी है। हम तुम्हारा विवाह वहाँ न होने देंगे। अगर तुमने विवाह किया, तो हम दोनों तुम्हारे ऊपर जान दे देंगे। इतना अच्छी तरह से समझ लेना-क्यों बच्चा की अम्मी
चौधराइन- ब्याह कर लेंगे, जैसे हँसी-ठट्ठा है। झाडू मार के भगा दूंगी राँड को। अपनी बेटी अपने घर में रखे।
भगतराम- अगर आप लोगों की आज्ञा नहीं हैं, तो मैं विवाह नहीं करूंगा, मगर मैं किसी दूसरी औरत से भी विवाह न करूंगा।
चौधराइन- हाँ तुम कुंवारे रहो, यह हमें मंजूर है। पतुरिया के घर में विवाह न करेंगे।
भगतराम ने अबकी झुंझलाकर कहा- आप उसे बार-बार पतुरिया क्यों कहती हैं? किसी जमाने में वह उसका पेशा रहा होगा। आज दिन वह जितने आचार- विचार से रहती है, शायद ही कोई और रहती हो। ऐसा पवित्र आचरण तो मैंने देखा ही नहीं।
भगतराम का सारा यत्न विफल हो गया। चौधराइन ने ऐसी जिद पकड़ी कि जौ भर भी अपनी जगह से न हिली।
