Hindi Kahani: वह भरी दोपहर में फटी- फटी आँखों से दीवार घूरे जा रही थी मीरा ने अपने मध्याह्न में ही कितना कुछ देख लिया था। पचास-पचपन की उम्र में जब साथी की सबसे ज्यादा जरूरत होती है तब वह फिर से अकेली थी।
पहले पति का जीवन के बीच मंझधार में ही छोड़ जाना ,फिर एक सहारे की तरह प्रदीप का आना और अनायास ही उनका भी आँखें मूँद लेना और फिर अपने ही कोख से जन्मी,खुद की जायी का घर से विमुख हो जाना,सारे घटनाक्रम चलचित्र की भाँति आँखों में नाच गये। यह तो अच्छा हुआ कि प्रदीप ने जाते जाते एक अच्छा काम कर दिया था,अपने जीते जी बेटे की शादी करा दी और साल लगते ही पोती के रूप में छोटी कनु को वापस पाकर उसके जीवन का खालीपन भरने लगा! बेटी न सही पोती ही सही उसके संग खेलकर थोड़ी आत्मसंतुष्टि होने लगी थी कि अब बेटी का फोन कर यह कहना कि, कल सुबह तक दिल्ली न पहुंची तो मुझसे कभी मुलाकात न होगी। ये सब क्या है? दिल बैठने लगा.. बच्चे भी न… बोलने के पहले कुछ सोचते नहीं.. कहीं कोई ऐसा -वैसा कदम न उठा ले… जाने क्या चल रहा हो दिमाग में.. वैसे भी बचपन से ही अधीर रही है।
जब सोचने समझने की शक्ति न रह गई तो अमन और नेहा को बुलाकर टिकट की व्यवस्था करने के लिये कहा। अमन ने एतराज भी किया।
“अब तुम्हारी उम्र हो गई है माँ! अकेले सफर नहीं करने दूँगा।”
“अकेली कहाँ रहूँगी। सहयात्री तो होंगे ना!”
“क्या माँ तूम भी और ये दीदी को क्या हुआ है?तीस की हो गई,अब भी अक्ल नहीं आई उसे? ऐसे अचानक बुला लिया। अब समझदार ना हुई तो कब होगी?”
“बेटा तू दस का था और वह पंद्रह की,जब तेरे पापा हमें छोड़कर दूसरी दुनियाँ में चले गये थे। पिता की लाडली उनके जाने का गम न सह सकी थी। उसपर से प्रदीप जी का हमारे जीवन में आना उसके बर्दाश्त के बाहर हो गया था।”
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“पर माँ उन्होंने आपकी नौकरी लगवाई थी। हमारे पढ़ाई-लिखाई का पूरा खर्च उठाया। एक पिता की तरह सहारा दिया था।”
“हाँ बेटा! वह तुम्हारे पिता के मित्र थे। स्वयं विधुर थे। उन्हें परिवार चाहिए था और तुम दोनों को पिता। समाज ऐसे रिश्तों की स्वीकृति नहीं देता है तभी तो उन्होंने हमसे विवाह कर लिया था और समझ लो कि उसी दिन मैंने कनु को खो दिया था।”
“पर क्यों माँ! दीदी को तो तुम्हारे लिये खुश होना चाहिए था न!”
“बेटा वह अपने पिता का स्थान किसी और को नहीं दे पा रही थी। वह आपे में नहीं थी। तब मुझे यह अहसास हुआ कि दूसरी शादी ने मेरे औलाद को तीसरी बना दिया है। शायद मेरे नसीब में ही खोकर पाना ही लिखा था। जब भी कुछ पाया तो उसके बदले में बहुत कुछ खोया। मुझे जरा आभास भी होता कि प्रदीप जी के कारण कनु को खो दूंगी तो मैं शादी कभी न करती। मुझे दुल्हन की लिबास में देख लड़-झगड़ कर अपनी सहेली के घर चली गई थी और वहीं से सीधा दिल्ली.. लौटकर इस घर में कदम ही नहीं रखा। तुम्हारे विवाह में भी नहीं आई…… !”
“प्रदीप जी से इतनी नफ़रत थी उसे….?”
“अपने पिता से इतना प्यार था उसे…!”
कहती हुई मीरा हिचक-हिचक कर रोने लगीं..वह तो भला हो नेहा का जो उसने उसकी गोद में छोटी कनु लाकर दिया तो दुःख से किनारा कर वह उसकी किलकारियों के मधुर संगीत में खो गई मगर अतीत से पीछा छुड़ाना आसान कहाँ होता है। जो कुछ देखा था वह आँखों में नाच गया…सचमुच वैधव्य ही उसका नसीब था..इस जीवन में दो-दो बार अर्थियां उठती देख लीं थीं।
प्लेन क्रैश में हुई पति ‘विमानचालक वीरेंद्र’ की मौत की सूचना लाने वाले प्रदीप जी ही जब-तब हालचाल पूछने चले आते थे। उस वक़्त वह बुरी तरह से टूटी हुई थी। उनके सामने आने में भी उसे पूरा एक साल लग गया था। उन दिनों उनके ही स्कूल में छोटे बच्चों को पढ़ाने लगी थी और फिर एक दिन उनके द्वारा विवाह का प्रस्ताव दिये जाने पर मौन स्वीकृति दे दी थी और वह भी बड़ी होती बिटिया कनु की ख़ातिर मगर अफ़सोस कि उसी ने माँ को न समझा। हमेशा के लिये अपने दूसरे पिता का आवास छोड़कर चली गई। वह अपनी पूरी तनख्वाह कनु की सहेली प्रिया के हाथों उस तक तब तक भिजवाती रही,जब तक वह अट्ठारह की नहीं हो गई। एयरलाइंस वालों ने कनुप्रिया को उसके पिता की जगह नौकरी के तौर पर विमान परिचारिका नियुक्त कर दिया। अब उसे जब भी माँ से मिलने की इच्छा होती तब हवाई यात्रा के दौरान वह बनारस होकर आती-जाती। मगर घर के बजाय प्रिया के घर पर बुलाकर मिल लेती।
जब प्रिया शादी कर विदेश चली गई तो बचा – खुचा नाता भी टूट गया। तभी से उसकी कोई खोज-खबर नहीं थी। आखिरी फोन भी तभी किया था जब हृदयाघात से प्रदीप जी के मौत की सूचना मिली थी। उसने फोन पर बस यही कहा कि,
“देखा तुमने। मेरे पिता की जगह लेने का नतीज़ा?”
“मरने वाले से कैसा बैर बेटा?”
” बैर क्यों ना हो? उन्होंने जीते जी मुझे मार दिया। पिता पहले ही छोड़ गये थे। एक माँ थी जो उन्होंने छीन ली।”
मीरा ने चुप्पी ओढ़ लिया तो फोन कट गया। क्या कहती..क्या समझाती…कहा तो तब जाये जब कोई सुने..! अगर सुनना ही ना चाहे….दिमाग के द्वार बंद कर ले तो बोलने वाले के होंठ ही फड़फड़ाते हैं और कुछ नहीं।
मीरा ने भी कुछ अपने भाग्य तो कुछ कर्म के दोष मान कर स्वीकार कर लिया था कि अब बरसों बाद मिले बेटी के इस अप्रत्याशित पैगाम ने उसे बुरी तरह से झकझोर दिया। किसी तरह से खुद को संभाल कर बेटी के पास जाने की तैयारी की। उसके पसंद की मिठाईयों और बनारसी सूट के साथ दिल्ली का उड़ान थाम लिया। कनु एयरपोर्ट पर लेने आ गई थी। माँ तो माँ ही होती है। बेटी का कुम्हलाया मुँह देख कर जी धक़ से रह गया।
“अरे कैसी दिख रही लाडो..चेहरा उड़ा-उड़ा..काम पर नहीं जा रही क्या?” घर पहुंच कर पूछा।
“बताती हूँ माँ! पहले आराम कर लो!”
बिटिया के आवाज का ठहराव अलग ही था। नहीं ये उसकी कनु नहीं! वह तो कभी सीधे मुँह बात तक नहीं करती थी। थोड़ी देर बाद माँ -बेटी खाना खाकर लेटे तो बेटी का माथा चूम उसे सीने से चिपका लिया। बरसों की प्यास तृप्त हो रही थी।
“माँ! तुम्हें सुनकर अजीब लगेगा पर बताना भी जरूरी है। मैं और रोहन पिछले दो साल से साथ रह रहे हैं। हमारे बीच यही तय हुआ था कि हममें से कोई शादी का नाम नहीं लेगा। तुम तो जानती हो कि मुझे संबंधों में बंधने से कितनी चिढ़ थी। अब वह मुझे छोड़कर अपने परिवार के बीच रहने चला गया है।”
“इसमें दिक्कत कैसी बेटी ? मैं आ गई हूँ ना!”
“हाँ माँ! तुम्हारा साथ चाहिए मुझे। तुम्हारे बिना मैं माँ नहीं बनना चाहती।”
“क्या? मैं समझी नहीं?”
“मैं प्रेगनेंट हूँ!”
“रोहन जानता है?”
“हाँ!”
“फिर भी तुम्हें अकेली छोड़कर चला गया?”
“उसने कहा कि वह आधा-आधा नहीं जी सकता। कभी यहाँ तो कभी अपनी माँ के पास जाने से अच्छा है कि सभी एक साथ रहें।”
“सही तो कहता है!”
“परेशानी उसकी माँ हैं। उन्होंने कहा कि जबतक मेरे परिवार से नहीं मिलेंगी शादी नहीं हो सकती। माँ ! तुम मिलोगी न! जानती हूँ मैंने तुम्हें बहुत सताया है मग़र अपने अंदर आने वाले शिशु की आहट मात्र ने मुझे बदल दिया। एक माँ की मजबूरी अब समझ पाई हूँ। मुझे माफ़ कर दो ना माँ!”
बेटी के इस बदले रूप को देख खुशी के आँसु छलक आये। प्यार अच्छे-अच्छे को बदल देता है। अब सब कुछ साफ़ नजर आ रहा था। तो बिटिया ने आपातकालीन अल्टीमेटम देकर इसी कारण उसे दिल्ली बुलाया। इतने में एक हैंडसम नौजवान कमरे में दाखिल हुआ और उसके साथ ही एक संभ्रांत महिला थीं।
“न समधन जी ! आप अन्यथा न लें! ये सब रोहन की चाल है माँ-बेटी को मिलाने की। मैं तो कब से कनुप्रिया को अपनी बहु बनाने के सपने सजाये बैठी हूँ।”
“आंटी! ये कुछ कहती नहीं थी पर अंदर ही अंदर घुटती रहती थी। इसलिए मैंने और माँ ने तय किया कि आपके आने के बाद ही शादी होगी ताकि ये सही मायनों में खुश हो सके। खुद अच्छी बेटी बनेगी तभी तो अच्छी माँ भी बन सकेगी।”
“बड़े भागों वाली हो कनु! सदा सुहागन रहो! इतना अच्छा लड़का,इतनी अच्छी सास मिली हैं तुझे।”
मीरा सचमुच बहुत खुश हो गईं कि उनके बदनसीबी का साया बेटी पर नहीं पड़ा था…शुभ मुहूर्त देखकर धूमधाम से शादी हुई जिसमें पूरा परिवार शामिल हुआ और ठीक सातवें महिने वह भी आ गया जिसके लिये मीरा यहाँ आई थी।
“आहा! देखूँ तो…अरे ये तो नाना की परछाई है! बाप -बेटी का ऐसा प्यार न देखा न सुना। सच्ची! वही तेरी ममता की छाँव में बड़े होने वापस लौट आये हैं।”
और वह टूटा परिवार हमेशा- हमेशा के लिए जुड़ गया। इस बार मीरा ने कुछ खोये बिना ही खुशियाँ पाईं थी। एक पैगाम ने परिवार को मिला दिया।
