एक दिन एक संत अपने प्रवचन में कह रहे थे. अनजाने में यदि गलती हुई तो व्यक्ति को आभास नहीं होता। इसलिए अतीत में तुमसे जो पाप हो गए हैं उनका प्रायश्चित करो और भविष्य में पाप न करने का संकल्प लो। प्रवचन समाप्त होने के बाद जब सभी लोग चले गए, एक व्यक्ति थोड़ा सकुचाते हुए संत के पास पहुँचा। उसने संत से पूछा- महाराज, मन में एक जिज्ञासा है।
प्रायश्चित करने से पापों से छुटकारा कैसे पाया जा सकता है? संत ने उसे दूसरे दिन आने को कहा। दूसरे दिन वह उसे एक नदी के किनारे ले गए। नदी तट पर एक गड्ढे में भरा पानी सड़ रहा था, जिसके कारण उससे बदबू आ रही थी और उसमें कीड़े भी चल रहे थे।
संत उस व्यक्ति को सड़ा पानी दिखाकर बोले-भइया, यह पानी देख रहे हो? बताओ यह क्यों सड़ा? व्यक्ति ने पानी को ध्यान से देखा और कहा-स्वामीजी, प्रवाह रुकने के कारण पानी एक जगह ठहर गया है और इस कारण सड़ रहा है। इस पर संत ने कहा- ऐसे ही सड़े हुए पानी की तरह पाप भी इकट्ठे हो जाते हैं और वे कष्ट पहुँचाते रहते हैं। जिस तरह वर्षा का पानी इस सड़े पानी को बहाकर हटा देता है और नदी को पवित्र बना देता है उसी प्रकार प्रायश्चित रूप अमृत वर्षा इन पापों को नष्ट कर मन को पवित्र बना देती है। इससे मन शुभ और सद्कार्यों के लिए तैयार हो जाता है। जब एक बार मन में परिवर्तन होता है तो व्यक्ति आगे कभी गलितयां नहीं दोहराता। इसलिए प्रायश्चित से व्यक्ति का अतीत और भविष्य दोनों ही पवित्र होता है।
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