भारत कथा माला
उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़ साधुओं और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं
इधर कुकर की सिटी बजी और भागते हुए तपस्या आई। माँ ने डांटकर कहा, कुछ काम मुझे भी तो करने दे।
तपस्या ने मुस्कराते हुए कहा- माँ बिलकुल नहीं, जब तक मैं हूँ तब तक कोई काम नहीं, आप बस आराम करो।
माँ (हँसकर)- ये लड़की किसी की नहीं सुनती।
जल्दी से तपस्या ने सब्जी-दाल बनाई और रोटिया बेल ली। अपना टिफिन लेकर जा रही थी उतने में उसके सहकर्मी का फोन आया। वो तुरंत बात करके वापस आई। घड़ी पहनी, मोबाइल लिया, टिफिन का डिब्बा बैग में रखा और अपने मोपेड की चाबी लेकर घर के दरवाजे की ओर जा रही थी कि कुछ याद आया और वापस आई। माँ-बापू ने पूछा, क्या हुआ?
वो बोली- आप दोनों की खाने से पहले लेने वाली गोली मैं निकालना भूल गई, आप भूल जाते तो! डॉक्टर ने बोला था कि गोली समय पर लेना आवश्यक है। माँ मैं निकलती हूँ।
फिर वो रुकी, सोचने लगी मैं कुछ भूल तो नहीं गई।
माँ पीछे से आई और बोली, बिना पानी के पूरा दिन केसे रहेगी मेरी बिटिया रानी और ये डिब्बा तेरे लिए खास है, बैंक पहुँचकर खोलना।
तपस्या पीछे मुड़कर बोली- माँ आप मेरा कितना ख्याल रखती हो।
माँ की आखाँ में आँसू थे।
माँ- ऐसा बोल कर त हमें शर्मिदा क्यों कर रही है बिटिया। इस उम्र में जितना तू ख्याल रख रही है उतना तो कोई बेटा भी नहीं रखता।
बापू ने कहा- बेटा, हमें तुम पर बहुत गर्व है।
तपस्या मुस्कराई और तुरंत बैंक जाने को निकली। बस, यही उसकी रोज की दिनचर्या थी। सुबह जल्दी और शाम को देर से घर का सारा काम करती,बाकी का समय बैंक में और घर आते वक्त जरुरी चीजें ले आती। हफ्ते में 6 दिन तो ऐसे ही जाते सिर्फ रविवार का दिन उसको अपने लिए मिलता, पर उस दिन भी वो पूरा समय अनाथ आश्रम में देती क्यूंकि वहा के बच्चों को तपस्या दीदी की पालना बहुत अच्छी लगती थी।
तपस्या मेहता अपनी माता यामिनी और पिता तपन मेहता की इकलोती पुत्री थी। उसके दादा जी का बहुत बड़ा व्यापार है। शहर में उसके परिवार का बहुत बड़ा नाम है, परन्तु अपनी शादी से पहले ही पिता तपन मेहता ने अपने परिवार को बता दिया था कि वो इस व्यापार का हिस्सा बनना नहीं चाहते और वो अपने दम पर आगे बढ़ना चाहते है। परिवार ने उनके निर्णय का स्वागत किया था। धर्मपत्नी यामिनी ने शादी के बाद पति को पूरा सहयोग दिया। उनको अपने पति पर पूरा भरोसा था। जब लोग पूछते की इतने लाखो-करोड़ो का व्यापर छोड़कर इतनी साधारण नौकरी? तब यामिनी गर्व से कहती- कम धन कमाएंगे, लेकिन संतुष्टता से जियेंगे। यहाँ तक की बाकी परिवारवाले-रिश्तेदार उनके इस निर्णय से गर्वित होते। तपन जी को एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी मिली थी और उनकी तनख्वाह भी बहुत अच्छी थी। खुद के पैसों से उन्होंने नया घर लिया और बिटिया तपस्या के आने के बाद उनकी जिन्दगी काफी आगे बढ़ रह थी। उनकी बिटिया पढने लिखने में होशियार थी, हमेशा अव्वल नंबर लाती। समय मिलने पर वो कहानियाँ, गीत और कविताएँ लिखती थी और माँ-बाप को सुनाती थी।
तपस्या का जैसा नाम वैसा काम। वो सनातन हिन्दू संस्कृति का खूब आदर करती थी। छोटी थी तब तो वो नजदीकी सेवा केंद्र पर जाती और जरूरतमंद लोगों की मदद करती। उसका बचपन से एक सपना था- लेखिका बनने का। वो इसके द्वारा समाज को नई राह दिखाना चाहती थी परन्तु नियति को कुछ और ही मंजूर था। तपस्या 15 साल की थी तब ही उसके पिता की नौकरी चली गई। कितनी कोशिश की पर नौकरी नहीं मिली। 3-4 महीने निकल गए। अब तो बेटी की शाला की फीस भी चुकानी थी।
माता यामिनी (पति से)- मैं पड़ोसी मीनाजी के यहाँ रसोई काम के लिए जाउंगी। आप चिंता ना करे। हम कैसे भी करके बिटिया को अच्छा शिक्षण दिलवाएंगे।
तपनजी निराश हो गए। मन ही मन सोचने लगे की 10 साल पहले मैंने अपने पारिवारिक व्यापार को छोड़ कर कोई गलती तो नहीं की? कम से कम उससे मेरा परिवार दुखी तो नहीं होता। ना ही पत्नी को रसोई काम करने के लिए बाहर जाना पड़ता और ना ही बिटिया की पढाई में कोई रूकावट आती। आज तक मैंने जो भी काम किया, पूरी महेनत और ईमानदारी से किया और इसका ये फल मिला! यहाँ बेटी तपस्या भी खूब उदास रहती। अपने माँ-बाप को दिन भर काम करके थका हुआ देखती। अब तो उसने कविताएँ लिखना भी छोड़ दिया था। पूरा समय वो अपनी पढाई में देती थी।
तीन साल बीत गए। अब तपस्या 18 साल की हो चुकी थी। अब उनका घर साधारण था। इन तीन साल में उनकी जिन्दगी पूरी तरह से बदल चुकी थी। बेटी को पढ़ाने हेतु माँ-बाप नौकरी करते। जितना कमाते, सिर्फ तपस्या के भविष्य के लिए। इन तीन साल में किसी ने नए कपडे भी नहीं लिए थे परन्तु आज माँ-बाप बेटी के लिए उसकी मनपसंद दुकान से जरीवाला ड्रेस लेकर आये और तपस्या को बुलाकर तोहफा दिया। वो रोई और बोली की मुझे ये तोहफा नहीं, पहले जैसी जिन्दगी चाहिए, जब आप दोनों खुश थे, हमारे घर में सुकून था और हम महफुज थे। तभी घर के दरवाजे पर खड़े युगल ने आवाज दी।
अरे तपन, कैसा है? पहचाना?
तपन जी- अरे सतीश, अल्का भाभी। आइये आइये।
तपन जी और यामिनी बहन ने आदर से स्वागत किया।
तपस्या मेहमानों के लिए पानी लेकर आई। वो उनके कपड़े और उनका व्यवहार देखने लगी। पिता ने बताया की हम कोलेज में एक साथ पढ़ते थे और अच्छे दोस्त है।
तपन जी (सतीश जी से)-यहाँ अचानक कैसे आना हुआ?
सतीश जी- काम के सिलसिले में। यहाँ नजदीकी बैंक की ब्रांच में मेरा ट्रांसफर हुआ है और मुझे मैनेजर की जगह मिली है।
तपन जी- अरे वाह, बहुत बढ़िया!
माँ-बाप इस युगल से बाते कर रहे थे और यहाँ तपस्या बस ये सोचने लगी की इनका जीवन कितना अच्छा है। इतने अच्छे कपड़े, बैंक की नौकरी और इनकी तनख्वाह भी अच्छी होगी। युगल घर से निकला, बिटिया को तोहफा दिया और बाहर खड़ी गाड़ी में बैठ रवाना हुए।
तपस्या का मन जोर-जोर से उसे कहने लगा, बस यही रास्ता है और यही मंजिल भी। उसने मनोमन तय कर लिया की वो बहुत मेहनत करके एक दिन बैंक में नौकरी करेगी।
जो सोचा था वो करके दिखाया। तपस्या ने अथाह तपस्या करके बैंक में नौकरी पा ही ली। उसकी बैंक के मैनेजर उसके काम करने के तरीके से बहुत प्रभावित थे। एवं सह कर्मचारियों को उसका व्यवहार खूब पसंद आता। बैंक में आने वाले हरेक व्यक्ति को वो मदद करती। दो साल में तो उसने बैंक से होम लोन लेके माँ-बाप के लिए नया घर लिया। छोटे घर से बड़े घर में रहने गए। हफ्ते में 6 दिन वो बैंक में काम करती और रविवार को बच्चों के ट्यूशन लेती। धीरे-धीरे उसकी कार्य करने की लगन को देख बेंक से उसे काफी अवॉडर्स भी मिले। तपस्या की कमाई अच्छी थी। बेंक ने उसे प्रमोशन दिया। वो अपने कार्य में निपुण थी।
तपस्या को आज बैंक की नौकरी करके पाँच साल पुरे हुए थे। आज बैंक आते वक्त माँ ने उसे पानी की बोटल के साथ एक डिब्बा भी दिया था। तपस्या बैंक पहुची और तुरंत काम शुरू कर दिया। उस डिब्बे पर उसका ध्यान ही नहीं गया। मध्याह्न भोजन के वक्त सभी कर्मचारी खाना खाने इकट्ठे हुए। पर ये क्या, जैसे डिब्बा खोला तो उसमे एक चबरखी रखी थी और उसकी मनपसंद मिठाई थी।
लिखा था- बैंक की नौकरी के 5 साल पूरे होने पर आपको मुबारक।
आपने हमें नयी और बेहतरीन जिन्दगी दी है।
आपका धन्यवाद। आप सदा खुश रहें और हम आपके उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।
माता-पिता का प्यार।
तपस्या अपने आप को रोक नहीं पाई और रोने लगी। तपस्या आज उस मुकाम पर पहुंच चुकी थी जहाँ से उसके जीवन में केवल सफलता ही नजर आती थी। माँ-बाप को बस अब एक ही आस थी कि बिटिया को अच्छा घर मिल जाये, अच्छे लोग-अच्छा ससुराल मिले और तपस्या को ये डर था कि मेरे जाने के बाद माँ-बाप का ध्यान कौन रखेगा? उसने बहुत पहले से उसकी व्यवस्था करना भी शुरू कर दिया था जिससे उसकी शादी के बाद, उसके माता-पिता को मदद के लिए किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े। तपस्या अब वो सब कुछ कर लेना चाहती थी जो एक समय पर उसके सपने थे। अब समय मिलने पर वो कविताएँ लिखती थी पर सिर्फ अपने शौक के लिए, किसी को बताती नहीं थी। पिछले दो सालों से हर रविवार को अनाथ आश्रम जाती थी। वैदकिय ट्रस्ट में जाकर जरूरतमंद लोगों की मदद भी करती। अनाथ आश्रम के बच्चे तो जैसे उसकी जान थे और बच्चे भी रविवार का इंतजार करते, तपस्या दीदी के आने की राह देखते। तपस्या के आने से आश्रम का वातावरण बदल चुका था। जितना हो सके वो बच्चों की मदद करती।
इस रविवार को तपस्या जा रही थी तो पिता ने कहा मुझे भी साथ ले चल। तपस्या ने कहा-हां बापू जरूर चलिए।
बाप-बेटी वहा पहुचे तो देखा की आश्रम में नया रंगरोगान किया जा रहा है। तपस्या खुश हुई और पिता को बताया- लगता है श्रोफ अंकल लंडन से आ गए और आते ही मरम्मत शुरू करवा दी।
श्रोफ जी ने उस अनाथ आश्रम की स्थापना की थी। वे बरसों से लंडन में रहते थे, यहाँ बहुत कम आते थे, लेकिन उनका दिल आश्रम में ही बसता था। एक महीने पहले उन्होंने आश्रम के नाम एक खत भेजा था जिसमें लिखा था कि वे तीन महीने के लिए वहाँ आ रहे है। वो भले ही लंडन में रहते थे पर आश्रम की हरेक गतिविधियों पर नजर रखे हुए थे।
उन्होंने तपस्या का नाम सुना था और उससे मिलने की चाह भी बहुत थी। बच्चों के साथ वो भी उसके आने की प्रतीक्षा कर रहे थे। तपस्या मुस्कुराते आई और बहार खड़े श्रोफ अंकल को पहचान लिया, प्रणाम किया।
श्रोफ जी बड़े खुश हुए और कहा- जैसा सोचा था तुम बिलकुल वैसी हो। समझदारी, स्नेह और सादगी की मूर्ति। बच्चे दौड़ कर दीदी के पास आये और खेलने के लिए ले गए। तपस्या के पिता और श्रोफ जी बातें कर रहे थे।
श्रोफ जी (तपस्या के पिता से) -मैं आपका आभारी हूँ। आपकी बेटी ने मेरे मन का भार बहुत कम कर दिया है। मुझे वहाँ रहकर इन बच्चों की परवरिश की चिंता सताती थी लेकिन जब से तपस्या आई है, उसने सब कुछ संभाल लिया है। आपके उच्च संस्करो को मैं नमन करता हूँ।
तपस्या के पिता- नहीं जी, वो बचपन से ऐसी ही है। उसने हमारे लिए बहुत कुछ किया है। अफसोस सिर्फ इस बात का है कि हम उसके सपनों के लिए कुछ नहीं कर सके।
श्रोफ जी- ऐसा नहीं है। आपने बेटी को पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया कि वो आगे बढ़ सके।
तपस्या के पिता- जी हाँ, पर अपने सपनों को भुलाकर पैसे कमाने के लिए उसने अपनी मंजिल बदल दी।
श्रोफ जी कुछ समझे नहीं। शाम के वक्त उन्होंने तपस्या को अकेला देखा और उसके पास गए। श्रोफ जी ये जानना कहते थे कि तपस्या का सपना क्या था और वो क्या बनना चाहती थी। उन्होंने उससे बातें करना शुरू किया पर तपस्या वो ही बताती रही जो वो अभी है, बैंक की कर्मचारी। उतने में एक छोटी-सी लड़की वहाँ आई और बोली, दीदी मैंने भी आप की तरह एक कविता लिखी है, आप मुझे पढ़कर बताना आपको कैसी लगी?
श्रोफ जी अचरज में थे। लड़की के जाने के बाद उन्होंने तपस्या से पूछा, क्या तुम लिखती भी हो?
तपस्या- हाँ अंकल, मैं छोटी थी तब लिखती थी, पर अब कहाँ!
श्रोफ जी समझ गए।
अगले रविवार को जब तपस्या आई तो श्रोफ जी ने कहा कि मैं तुम्हारी कविताएँ-कहानियाँ पढना चाहता हूँ।
तपस्या- अब उसकी क्या जरूरत है अंकल?
श्रोफ जी- मैं बस तुम्हारे विचार जानना चाहता हूँ।
तपस्या ने अपनी लिखी हुई कविताएँ और कहानियाँ श्रोफ जी तक पंहुचा दी। श्रोफ जी ने पढ़ा और वे बहुत खुश हुए।
पर ये क्या! अगले रविवार को जब तपस्या आश्रम गई तो उसे मालूम पड़ा कि जरूरी काम आने पर श्रोफ अंकल को तुरंत लंडन जाना पड़ा। तपस्या हैरान हुई और दुखी भी कि वह अंकल को अलविदा भी न कह सकी। तीन दिन के बाद तपस्या के नाम बैंक में एक खत आया। तपस्या ने वो खत पढ़ा और थोड़ी देर के लिए तो वह सुन्न हो चुकी थी। उसे समझ नहीं आया कि वह क्या बोले! उसकी आँखों से अश्रुधारा बहने लगी। खत में लिखा था :
‘बेटी तपस्या, जिस दिन तुमसे तुम्हारी लिखने की कला के बारे में बात कर रहा था तब एक गजब की चमक मैंने तुम्हारी आँखों में देखी। तुम बेहद खुश थी और तुम्हारी चेहरे की खुशी और अनकही बातों से मैं समझ गया कि तुम्हारे सपने क्या थे और तुम क्या बनना चाहती थी। तुम एक लेखिका बनकर समाज को नई राह दिखाना चाहती थी और अनाथ बच्चों की मदद करना चाहती थीं।
आज मैं आपका अंकल नहीं, पर ‘उड़ान’ पब्लिकेशन हाउस का मालिक शेखर श्रोफ आपसे बात कर रहा हूँ। आपको हमारी कंपनी में नौकरी के लिए मैं आमंत्रित कर रहा हूँ। आप चाहे तो लंडन में अपने परिवार को भी साथ ला सकती है।
हम बेहद खुशी और आदर से आपका स्वागत करते है।
तपस्या की आँखे खुली की खुली रह गई। क्या ये वही शेखर श्रीफ है जिनकी लिखी किताबें उसने बचपन में पढ़ी थी! आज इतनी बड़ी हस्ती ने मुझे ये मौका दिया। ये खत श्रोफ जी ने तपस्या के माता-पिता को भी भेजा, वे इसे पढकर फुले नहीं समा रहे थे।
क्या सच में यही है जिन्दगी, जिसमें सिर्फ कर्म करते जाना है और फल की चिंता बिलकुल नहीं करनी है! अगर पूरी निष्ठा से कार्य करें तो तकदीर भी अपना रुख पलट कर सफलता की ओर आगे बढती है। जरुरी ये है कि हम अपने आप पर भरोसा रखें और अपना हौंसला बुलंद रखें।
तपस्या तैयार है अपने माता-पिता के साथ नई यात्रा पर चलने के लिए, एक नई उड़ान भरने के लिए।
भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’
