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grehlakshmi kavita

जब-जब विपदा पड़ी भारी,
नारी ने हार कहां मानी।
चंचल-चपल कुशाग्रबुद्धि,
सब्र धीरज धर भृकुटी तानी।।

ना आंच आने दी परिवार पर
उठ खड़ी हुई बनी मेरूदण्ड।
जब -जब उठी गलत नजर,
फोड़ी आंख बाज बनकर।।

एक ही सपना नेत्रों मे पाला,
जीना बस स्वाभिमान से जीना।
कम से कम मे कर लेंगे गुजारा,
पर ईमान ना कभी अपना बेचना।।

हर हालात पर रखती पैनी नजर,
हिम्मत-हौसले से लेती काम मगर।
ना घबराती आ जाए कैसा भी तूफान?
परिवार खातिर बन जाती सेतु-बांध।।

हंसती-मुस्कुराती घर संभालती,
ना जाने कितनी पीढ़ियां संवारती
बाहर भी खुद्दारी से करती काम,
कुटुंब का करती हरदम सम्मान।।

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