Mulla Nasruddin
Mulla Nasruddin

Mulla Nasruddin ki kahaniya: अपने वतन में मुल्ला नसरुद्दीन की वापसी का दिन बहुत सारी घटनाओं और बेचैनियों से भरा हुआ सिद्ध हुआ। वह बेहद थका हुआ था। वह किसी ऐसी जगह की तलाश में था, जहाँ एकांत हो और वह आराम कर सके।

एक तालाब के किनारे उसने लोगों की भारी भीड़ देखी और लंबी साँस भरकर कहा, ‘लगता है, आज मुझे आराम नहीं मिलेगा। यहाँ ज़रूर कुछ गड़बड़ है। ‘ तालाब सड़क से थोड़ी दूर था। वह सीधा अपने रास्ते जा सकता था। लेकिन वह उन लोगों में से नहीं था, जो किसी भी लड़ाई-झगड़े में कूदने का मौका हाथ से जाने देते हैं।
इतने वर्षों से साथ रहने के कारण गधा भी अपने मालिक की आदतों से परिचित हो गया था। वह अपने आप तालाब की ओर मुड़ गया।

‘क्या बात है भाइयो? क्या यहाँ किसी का खून हो गया है? कोई लुट गया है?’ भीड़ में गधे को ले जाते हुए वह चिल्लाया, ‘जगह खाली करो, अलग हटो।’

तालाब के किनारे पहुँचकर मुल्ला नसरुद्दीन ने एक विचित्र दृश्य देखा । चिकनी मिट्टी और काई से भरे तालाब में एक आदमी डूब रहा था। वह आदमी बीच-बीच में सतह पर आता लेकिन फिर डूब जाता। कई लोग उसे बाहर खींचने के लिए बार-बार हाथ बढ़ा रहे थे। ‘हाथ बढ़ाओ – इधर – यहाँ अपना हाथ दो।’ वे चिल्ला रहे थे।

लेकिन ऐसा लगता था कि डूबता हुआ आदमी उन लोगों की बातें नहीं सुन रहा है। वह पानी से ऊपर आता और फिर डूब जाता ।

इस दृश्य को देखकर मुल्ला नसरुद्दीन सोचने लगा,’ बड़ी अजीब बात है ! इसका क्या कारण हो सकता है? यह आदमी अपना हाथ क्यों नहीं बढ़ा रहा है? हो सकता है यह कोई चतुर गोताखोर हो, और शर्त लगाकर गोते लगा रहा हो । यदि यह बात है तो वह अपनी खिलअत क्यों पहने हुए है?’

तभी डूबने वाला एक बार फिर से पानी की सतह पर आया और फिर डूब गया। पानी में रहने का समय हर बार पहले से अधिक था ।

‘तू यहीं ठहर, ‘ मुल्ला नसरुद्दीन ने गधे से उतरते हुए कहा, ‘पास जाकर देखूँ, क्या बात है।’
डूबने वाला फिर पानी के भीतर पहुँच चुका था। इस बार वह इतनी देर तक पानी में रहा कि किनारे पर खड़े लोग उसे मरा समझकर उसके लिए दुआ माँगने लगे। अचानक वह फिर दिखाई दिया।

‘यहाँ, इधर – अपना हाथ दो हमें हाथ दो।’ लोग चिल्ला उठे। उन्होंने अपने हाथ बढ़ाए। लेकिन वह उनकी ओर सूनी आँखों से देखता रहा और फिर चुपचाप पानी में समा गया।

‘अरे बेवकूफ़ो, उसके रेशमी साफ़े और क़ीमती खिलअत को देखकर तुम्हें समझ लेना चाहिए कि यह कोई सूदखोर या अफसर है। तुम लोग सूदखोरों और अफसरों के तौर-तरीकों को नहीं जानते कि उन्हें पानी से किस तरह निकालना चाहिए ।’ मुल्ला नसरुद्दीन चिल्लाया।
‘तुम जानते हो तो निकालो उसे बाहर । वह पानी के ऊपर आ गया है। उसे बाहर खींच लो।’ भीड़ से कई आवाज़ें उठीं।

‘क्या तुमने किसी सूदखोर या अफसर को कभी किसी को कुछ देते देखा है ? अरे जाहिलो, याद रखो ये लोग किसी को कुछ देते नहीं हैं, सिर्फ़ लेते हैं।’

‘अरे, वह फिर पानी में चला गया। ‘

‘पानी भी इतनी असानी से सूदखोर या अफसर को कबूल नहीं करेगा। वह उससे बचने की पूरी-पूरी कोशिश
करेगा।’
मुल्ला नसरुद्दीन ने कहा और इंतज़ार करने लगा।

कुछ देर बाद डूबता आदमी फिर पानी की सतह पर दिखाई दिया।

‘यहाँ, यह लीजिए – यह लीजिए। ‘ मुल्ला नसरुद्दीन ने चिल्लाते हुए अपना हाथ उसकी ओर बढ़ा दिया ।

उस आदमी ने अकड़ के साथ मुल्ला के हाथ को थाम लिया। उसकी पकड़ के दर्द से मुल्ला कराह उठा ।

वह कुछ देर बिना हिले-डुले किनारे पर पड़ा रहा। वहीं खड़े लुहार ने नसरुद्दीन से कहा – ‘ लेकिन तुमने इसे बचाकर ठीक नहीं किया।’

मुल्ला नसरुद्दीन आश्चर्य से उसे देखता रह गया, ‘मैं तुम्हारी बात समझ नहीं पाया लुहार भाई । क्या किसी इन्सान को यह बात शोभा देती है कि वह डूबते हुए इन्सान के पास से गुज़र जाए और उसकी मदद के लिए हाथ न बढ़ाए ? ‘
‘तो तुम्हारे ख़याल से सभी साँपों, लकड़बग्घों और ज़हरीलें जानवरों को बचा लेना चाहिए?’ लुहार चिल्लाया। फिर अचानक उसके दिमाग में कोई बात कौंध उठी। उसने पूछा, ‘क्या तुम यहीं के रहने वाले हो ?’

‘नहीं। ‘
इसीलिए तुम नहीं जानते कि तुमने जिसे बचाया है वह इन्सानों के साथ बुरा करने वाला और उनका खून चूसने वाला आदमी है। बुखारा में रहने वाला हर तीसरा आदमी उसकी वजह से कराहता और रोता है । ‘
एक भयानक विचार मुल्ला नसरुद्दीन के दिमाग में कौंध उठा, ‘लुहार भाई, मुझे उसका नाम तो बताओ। ‘

‘तुमने सूदखोर जाफ़र को बचाया है। खुदा करे उसकी यह जिंदगी बिगड़े, आकबत बिगड़े। उसकी चौदह पीढ़ियाँ घावों से सड़ें। उनके घावों में कीड़े पड़े । ‘

‘क्या कहा लुहार भाई ? लानत है मुझ पर। मेरे इन हाथों ने उस साँप को डूबने से बचाया है। सचमुच इस गुनाह की तौबा नहीं। लानत है मुझ पर। ‘

लुहार पर उसके दुख का असर पड़ा। वह कुछ नर्म होकर बोला, ‘धीरज से काम लो मुसाफ़िर, अब कुछ नहीं हो सकता। गधे पर सवार होकर तुम उस वक्त उधर से गुज़रे ही क्यों? तुम्हारा गधा सड़क पर अड़ क्यों न गया ! तब सूदखोर को डूबने का पूरा-पूरा मौका मिल जाता । ‘

यह गधा अगर सड़क पर अड़ता है तो इसलिए कि जिससे लगे थैलों से रुपया निकल जाए। जब ये भरे होते हैं तो इसे बहुत भार लगता है। लेकिन यदि सूदखोर को बचाकर अपने ऊपर लानत बुलाने की बात है तो विश्वास करो यह मुझे वक़्त से पहले वहाँ पहुँचा देगा । ‘

‘यह ठीक है। लेकिन जो हो चुका है, उसे अब बदला नहीं जा सकता। उस सूदखोर को कोई फिर से पानी में धकेल नहीं सकता । ‘

मुल्ला नसरुद्दीन को जोश आ गया, ‘लुहार भाई, मैं कसम खाता हूँ, उस सूदखोर जाफ़र को डुबाकर ही दम लूँगा । इसी तालाब में डुबाऊँगा । जब तुम बाज़ार में यह ख़बर सुनो तो समझ लेना कि यहाँ के निवासियों का जो अपराध मैंने किया था, उसका बदला चुका दिया। ‘

ये कहानी ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ किताब से ली गई है, इसकी और कहानी पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Mullah Nasruddin(मुल्ला नसरुद्दीन)