एक थी निक्की। बड़ी ही प्यारी। मम्मी-पापा की दुलारी। छोटी सी थी। बस, कोई पाँच – साढ़े पाँच साल की, पर ऐसी समझदार कि कुछ न पूछो। इसीलिए तो उसकी दोस्ती हर किसी से हो जाती थी। बच्चों से, बड़ों से, पोपू पिल्ले से, पीलू डॉगी से, टिनटिन चिड़िया से। राम जाने और भी न जाने किस-किस से! स्कूल में भी सब उसे प्यार करते थे और घर में भी। इसलिए निक्की को जब देखो, वह खुशी से चहकती नजर आती थी। इतवार का दिन था। निक्की अपने पिल्ले पोपू से खेल रही थी।
साथ ही उसका प्यारा दोस्त पीलू पूँछ उठाए इधर-उधर घूम रहा था। टिनटिन चिड़िया कभी निक्की के कंधे पर बैठ जाती तो कभी सिर पर। एक बार तो टिनटिन चिड़िया ने उसके बालों में बँधे फीते को अपनी चोंच में दबाकर इस तरह खींचा कि निक्की का फीता झट से खुल गया और उसके बाल पूरे चेहरे पर बिखर गए। टिनटिन चिड़िया की इस शैतानी पर निक्की को बड़े जोरों की हँसी आई। फिर पोपू और भूरा वाला नटखट पिल्ला पीलू भी ऐसे-ऐसे कमाल के खेल दिखा रहे थे कि निक्की बार-बार खिलखिला पड़ती। निक्की अपने इसी खेल में डूबी थी कि जाने कब पड़ोस के जग्गी अंकल आ गए। निक्की को तब पता चला, जब पोपू जोर-जोर से भौंकने लगा और पीलू भी।
टिनटिन चिड़िया हैरानी से कभी पोपू, कभी पीलू तो कभी निक्की को देख रही थी। निक्की ने बुरी तरह मुँह बनाकर पोपू की ओर देखा और बोली, “पोपू, माई स्वीट फ्रेंड…!” तब पोपू अचकचाकर चुप हो गया, जैसे उसने कोई बेवकूफी का काम किया हो। और पोपू के चुप होते ही पीलू भी टाँगों में पूँछ दबाए एक ओर खड़ा हो गया। इतने में निक्की को जग्गी अंकल और उनका डॉगी रॉकी नजर आ गया। अब उसे माजरा समझ में आ गया था कि पोपू और पीलू डॉगी भला किसलिए भौंक रहे थे। नन्ही निक्की बोली, “सॉरी अंकल, पोपू और पीलू को पता नहीं था कि आप मेरे प्यारे जग्गी अंकल हैं। नहीं तो वे कभी ये गुस्ताखी न करते। अब बैठिए, आराम से बैठिए। आपके लिए अंदर से कुर्सी लाऊँ?” तब तक निक्की के मम्मी- पापा भी बाहर निकलकर आ गए थे। बोले, “आइए जग्गी साहब, आइए! बड़े दिनों दिन बाद चक्कर लगा आपका?” जग्गी अंकल हँसकर बोले, “असल में तो आनंद साहब, सच्ची बात तो यह है कि मैं आपसे नहीं, निक्की बिटिया से मिलने आया हूँ आज। आहा – हा, क्या प्यारी बच्ची है आपकी! … अब के होली वाले दिन अपनी सोसाइटी में जो शानदार नाटक हुआ, उसने सारे मोहल्ले को हँसा दिया। और वह गधा, जिसे निक्की ने होली का रंग-बिरंगा मुकुट पहनाया था, इतना सीधा और आज्ञाकारी लग रहा था कि आपकी बेटी के एक-एक इशारे को पहचानता था। यह कहें कि रुक जा तो रुक गया, यह कहे कि चल पड़ तो चल पड़ता।
यह कहे तेज चल तो तेज चल पड़ता। और यह कहे नाच, तो नाचने लगता। साहब, हमने तो अपनी जिंदगी में पहली बार यह तमाशा देखा। और पहली बार ऐसा समझदार गधा भी देखा।” कुछ देर बाद जग्गी अंकल बोले,” होली पर नाटक तो एक से एक मजेदार होते हैं अपने यहाँ, पर इस बार का तो जवाब ही नहीं। नाटक देखने के लिए आसपास के बच्चों की भी ऐसी भीड़ जुट गई कि क्या कहूँ? बच्चे मिलकर नाच रहे थे, हँस भी रहे थे। देख-देखकर सारे लोग हँस रहे थे। पर मैं तो साहब, इसी बात पर गौर कर रहा था कि गधा इतना बुरा जानवर तो नहीं कि उस पर हँसा जाए। क्यों मि. आनंद, क्या खयाल है आपका?” निक्की के पापा कुछ जवाब देते, इससे पहले ही निक्की बोली, “नहीं जग्गी अंकल, गधा बेवकूफ हरगिज नहीं है, लोग कहें चाहे जो भी। वह सीधा है, पर है समझदार। इसीलिए तो मैंने सोचा कि इस बार नाटक के एक गधे की कहानी पेश की जाए!” निक्की की बात सुनकर जग्गी अंकल मुसकराए। बोले, “वाह बेटी, मुझे तो कई बार हैरानी होती है कि इस उम्र में तुम इतनी समझदार कैसे हो गईं? जरूर आनंद साहब और तुम्हारी मम्मी ने बचपन से ही तुम्हें ज्ञान की घुट्टी पिलाई होगी।” सुनकर निक्की के मम्मी और पापा मुसकराए। फिर निक्की के पापा बोले, “आइए जग्गी साहब, भीतर आइए। बैठते हैं कुछ देर, थोड़ी गपशप हो जाए।” उसके बाद जग्गी अंकल देर तक निक्की के मम्मी-पापा के पास बैठ, दुनिया – जहान की और बीच-बीच में मोहल्ले की ऊँच-नीच की तमाम बातें करते रहे। उधर जग्गी अंकल का बड़े-बड़े बालों वाला भूरा डॉगी रॉकी निक्की के पास बैठ, उसके खेल में शरीक हो गया था। निक्की ने पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया से उसकी खूब अच्छी दोस्ती करवा दी थी। निक्की अपनी नीली गेंद भी उठा लाई थी। जब वह गेंद दूर फेंकती तो पोपू, पीलू और जग्गी अंकल के भूरे डॉगी रॉकी में बड़ी जबरदस्त होड़ शुरू हो जाती। तीनों एक साथ भागते कि भला कौन निक्की की गेंद को मुँह में पकड़कर पहले वापस आता है और निक्की को सौंपता है। इसमें कभी पोपू बाजी मार ले जाता, कभी पीलू, तो कभी जग्गी अंकल का रॉकी। लेकिन वे खेल का पूरा मजा ले रहे थे। लड़ बिल्कुल नहीं रहे थे। फिर उसके बाद निक्की ने उन्हें पास बैठाकर मजे में कहानी सुनानी शुरू की तो ऐसा लगा कि जैसे सभी कहानी सुन रहे हैं और उसका खूब मजा ले रहे हैं। बीच-बीच में निक्की कोई हुक्म देती तो उसको मानने की होड़ लग जाती कि कौन सबसे पहले वह काम करे। निक्की ने जग्गी अंकल के डॉगी के सिर पर हाथ फेरकर खूब प्यार किया और कहा, “रॉकी – रॉकी, अब तुम हमारे घर जरूर आया करोगे, समझ गए न? नहीं आओगे तो मैं रूठ जाऊँगी।” इस पर रॉकी ने बड़े प्यार से गरदन हिलाई, जैसे निक्की की सारी बात समझ गया हो। * कुछ देर बाद जग्गी अंकल जाने लगे तो उन्होंने रॉकी को पुचकारकर कहा,” चलो रॉकी, देर हो गई। अब घर चलते हैं।” पर रॉकी को तो खेल में इतना आनंद आ रहा था कि वह उठना ही नहीं चाहता था। रॉकी को चुपचाप बैठे देख, जग्गी अंकल ने फिर आदेश देते हुए कहा, “रॉकी…!” इस पर रॉकी ने बड़ी अनिच्छा से जग्गी अंकल की ओर देखा, जैसे उसका उठने का बिल्कुल मन न हो, फिर भी उसे उठाया जा रहा था। “रॉकी!” तीसरी बार जग्गी अंकल ने थोड़े गुस्से में कहा तो रॉकी उठा और जग्गी अंकल के पीछे-पीछे चल दिया। पर वह इतने अनमनेपन से चल रहा था कि उसका एक कदम आगे तो दो कदम पीछे लौट रहे थे। रॉकी की यह हालत जग्गी अंकल से छिपी न रही। उन्होंने हँसते हुए कहा, “अच्छा रॉकी, नहीं चलते हो तो रहने दो। आज तुम यहीं रहो। निक्की के साथ खेलने का मन है न! निक्की है ही इतनी अच्छी लड़की कि उसके साथ खेलने का सबका मन होता है। तो ठीक है, आज तुम यहीं रहो। बाद मैं तुम्हें ले जाऊँगा।” और रॉकी वापस आया निक्की और उसके दोस्तों के पास तो वह इतना खुश था, इतना खुश कि उसकी आँखें एकदम बिजली के लट्टुओं की तरह चमक रही थीं। वह खुशी के मारे बड़ी देर तक उछलता – कूदता और नाचता रहा। निक्की ने पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया के साथ जग्गी अंकल के रॉकी को भी प्यार से खाना खिलाया। शाम के समय जग्गी अंकल रॉकी को लेने के लिए आए, पर रॉकी का अब भी मन नहीं भरा था। बार- बार वह निक्की की ओर देखकर कूँ-कूँ करता और उसके पैरों से लिपट पड़ता। निक्की के मम्मी-पापा ने उससे कहा, “निक्की, यह अच्छी बात नहीं है। तुम कहो न, ताकि जग्गी अंकल का रॉकी उनके साथ जाए।” निक्की ने गरदन हिलाते हुए कहा, “जाओ रॉकी, जाओ अंकल के साथ। फिर आना।” इस पर रॉकी जग्गी अंकल के साथ गया तो इस तरह पीछे देखते हुए जा रहा था, जैसे निक्की से कह रहा हो, “निक्की, मुझे अफसोस है कि मुझे जाना पड़ रहा है। अभी तो मेरा तुमसे और तुम्हारे दोस्तों के साथ खेलने का बड़ा मन था।” यह देखकर निक्की मुसकराई, मानो हँसकर रॉकी को दिलासा दे रही हो, कि यह घर तो तुम्हारा ही है। जब चाहो, तब फिर आ जाना।
और सचमुच निक्की और निक्की के मम्मी- पापा हैरान रह गए जब कोई पंद्रह मिनट के भीतर जग्गी अंकल का डॉगी उछलता – कूदता और सरपट भागता हुआ निक्की के पास आ गया। वह इस तरह कूँ- कूँ- कूँ करता हुआ निक्की के चारों ओर चक्कर काट रहा था और पूँछ हिला रहा था कि निक्की ही नहीं, उनके दोस्तों पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया को भी हैरानी हुई। निक्की के मम्मी-पापा समझ ही नहीं पा रहे थे कि जग्गी अंकल के रॉकी पर निक्की का यह क्या जादू चल गया कि वह अपने घर जाना ही नहीं चाहता। थोड़ी देर बाद जग्गी अंकल का फोन आया। उन्होंने निक्की से कहा, “अरे बिटिया, तुम्हारे पास से आकर रॉकी इतना उदास था, इतना ज्यादा उदास कि मुझसे देखा नहीं गया। तो मैंने ही कहा, निक्की के पास जाना चाहते हो न, तो ठीक है, जाओ। रात को आकर मैं तुम्हें ले जाऊँगा।” और रॉकी फिर से निक्की और निक्की के दोस्तों के साथ खेलकूद में इस कदर लीन हो गया, जैसे उसे यहीं धरती का स्वर्ग मिल गया हो। कुछ देर बाद निक्की पोपू और पीलू को साथ लेकर पार्क में घुमाने गई तो रॉकी भी उछलता – कूदता साथ गया। पार्क में तीनों दोस्तों ने खूब मजे किए। खासकर रॉकी ने वहाँ उछल-कूद के ऐसे-ऐसे करतब और तमाशे दिखाए कि पोपू और पीलू ने ही नहीं, निक्की ने भी उसकी ओर खूब प्रशंसा भरी नजरों से देखा। निक्की ने इतने प्यार से उसकी पीठ को सहलाया कि जग्गी अंकल के डॉगी को लगा, आज पहली बार मेरी कला की किसी ने सच्ची तारीफ की है! * फिर रात को जग्गी अंकल आए और रॉकी उनके साथ गया, तो नक्की ने उसकी आँखों में बड़ी याचना देखी। मानो रॉकी कह रहा हो, ‘जैसे मैं तुम्हारे घर आया हूँ, तुम भी तो मेरे घर आ सकती हो निक्की। वहाँ जग्गी अंकल के साथ बातें करना और मेरे साथ खेलना।’ उसके कुछ रोज बाद निक्की जग्गी अंकल के घर गई तो रॉकी इतना खुश हुआ कि जोर-जोर से निक्की की कई परिक्रमाएँ कर डालीं। वह इस कदर जोर-जोर से उछल रहा था और कूं-कूं-कूँ करके अपना प्यार जता रहा था कि निक्की ने बड़ी देर तक उसके सिर और पीठ पर हाथ फिराया। उसके बाद रॉकी शांत हो गया और इतनी प्यार भरी मासूम नजरों से निक्की को देखने लगा, जैसे कह रहा हो, ‘निक्की मेरे पास जबान नहीं है, तुम्हारी तरह भाषा नहीं है। मैं तुम्हें अपने दिल की बहुत सारी बातें बताना चाहता हूँ। पर कैसे कहूँ? हाँ, समझ सको तो खुद ही समझ लो।’ और छुट्टी के दिन तो यह तय ही था कि रॉकी निक्की के पास ही रहेगा और उसका पूरा दिन पोपू, पीलू और टिनटिन चिड़िया के साथ खेलते ही बीतता। पता नहीं कैसे उसे पता चल जाता कि आज इतवार है, निक्की के स्कूल की छुट्टी है। बस, वह झटपट दौड़ता – कूदता, उछलता और नाचता हुआ निक्की के घर की ओर दौड़ पड़ता था। शाम को जग्गी अंकल अपने डॉगी को लेने आते तो यह कहे बगैर न रहते, “निक्की, अब में जान गया हूँ कि तुम जरूर कोई जादू जानती हो। तभी तो मेरे रॉकी को ऐसे अपना दोस्त बना लिया कि वह अब मेरी बात तो मानता ही नहीं।” इसी तरह हँसकर निक्की के मम्मी-पापा से भी वह कहते, “बड़ी भोली और प्यारी लड़की है आपकी, आनंद साहब। ऐसी प्यारी लड़की का सब पर जादू चल जाता है, आदमी से लेकर जानवरों तक। और तो और, मैं देखता हूँ, टिनटिन चिड़िया भी इसके जादू से ऐसे बँधी है कि जब देखो तब, निक्की केही चारों ओर चक्कर काटती रहती है।” इस पर निक्की खुश होकर तालियाँ बजाने लगती। फिर हँसकर कहती, “जग्गी अंकल, मैं बताऊँ आपको राज की बात? असल में मैं जानवरों की भाषा जानती हूँ। उनकी आँखों में किसी को देखकर जो प्यार उमड़ता है, उसे पढ़ो तो वे बहुत खुश होते हैं। उनके साथ हँसो तो वे हँसते हैं, उनके साथ खेलो तो वे खेलते हैं। उनके साथ झूमो – नाचो तो वे झूमते-नाचते और खुशियाँ मनाते हैं।” निक्की की बात इतनी प्यारी थी कि सुनकर जग्गी अंकल अवाक् रह गए। निक्की के मम्मी-पापा ने मुसकराकर कहा, “अजी साहब, किस सोच में पड़ गए! हमारी यह पागल बेटी तो यों ही कुछ न कुछ कहती रहती है।” पर जग्गी अंकल गंभीरता से सिर हिलाते हुए बोले, “नहीं- नहीं आनंद साहब, आपकी बेटी लाखों में एक है, हीरा है हीरा! मैंने ऐसी मासूम और प्यारी बच्ची कोई और नहीं देखी, जिसकी बातों में इतनी मिठास हो।” इसके बाद जग्गी अंकल ने निक्की के सिर पर बार-बार हाथ फेरा और जाते हुए बोले, “अरी प्यारी बिटिया! आज तो लग रहा है, तुमने जग्गी अंकल के डॉगी पर ही नहीं, खुद जग्गी अंकल पर भी जादू कर दिया।” सुनकर निक्की और उसके मम्मी तो हँसे ही, साथ ही जग्गी अंकल भी अपनी बात पर जोरों से ठहाका लगाकर हँस पड़े।
