धीरे-धीरे कुछ समय और बीता। अब निम्मा फागुन गाँव के चप्पे-चप्पे से परच गई थी और वहाँ की सब रीतियाँ और तौर-तरीके भी उसने सीख लिए।
अब हरियाली तीज हो, कोई तिथि-त्योहार या फिर मुंडन और शादी-ब्याह जैसे खुशी के मौके, गाँव में गीत-संगीत के लिए लोग निम्मा परी को जरूर बुलाते। हर मौके पर वह सबसे आगे नजर आती। इसके साथ ही चाहे खेती का काम हो, घर का काम, या फिर नदी से घड़े भर-भरकर पानी लाना—ये सारे काम वह खुशी-खुशी करती। गाँव की सभी लड़कियाँ उसकी सहेलियाँ बन गई थीं और उनके साथ वह होती तो बिल्कुल चिड़ियों की तरह चहचहाती।
बुधना देखता तो बड़ा खुश होता। उसे यही तो चिंता थी कि कहीं निम्मा परी यहाँ रहते-रहते ऊब न जाए। पर निम्मा परी तो फागुन गाँव में ऐसे रम गई थी, जैसे बरसों से यहीं रह रही हो।
इस बीच निम्मा को बुधना अच्छा लगने लगा और बुधना की माँ को निम्मा खूब पसंद आ गई थी।
एक दिन बुधना की माँ ने निम्मा परी से कहा, “देख निम्मा, तू कहीं छोटे मुँह बड़ी बात न समझना, पर मेरा तो बड़ा मन करता है कि तू इसी घर में रहे।…मेरा बुधना बड़ा भोला है। इसे तू अच्छी तरह सँभाल लेगी।”
“अम्माँ, मैं तो यही कहना चाहती थी।” निम्मा सकुचाकर बोली, “पर…हिम्मत नहीं हो रही थी। सच्ची, बेटा बहुत अच्छा है आपका…!” कहते-कहते निम्मा शरमा गई।
“हाँ, बेटी।” सुरसती बोली, “डील-डौल तो देखो, एकदम पठान जैसा है। पर मन से बिल्कुल बच्चा है। मुझे यकीन है, बस तू ही उसे सँभाल सकती है। उसके दिल में भी तेरे लिए बड़ा प्यार है।…”
कहते-कहते एक पल के लिए रुकी सुरसती। फिर कहा, “वैसे एक बात कहूँ निम्मा। मेरा बुधना भी लाखों में एक है। और दिल का तो बड़ा ही सच्चा है। तू दीया लेकर ढूँढ़ने निकलेगी तो भी ऐसा सच्चा इनसान तुझे धरती पर कहीं देखने को न मिलेगा।”
“जानती हूँ अम्माँ…!” निम्मा धीरे से बोली। शर्म के मारे न जाने कब वह पैर के अँगूठे से जमीन कुरेदने लगी थी।
जो बात निम्मा ने नहीं कहीं, वह भी सुरसती बाई ने समझ ली। और फिर उसी दिन से ब्याह की तैयारियों में लग गई।
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