कुछ देर तो निम्मा परी यों ही विमूढ़-सी खड़ी रही। फिर आसपास के दृश्यों का नजारा लेते हुए, घूमने निकल पड़ी।
नदी के किनारे लाल-पीले वनफूलों की झाड़ियाँ ही झाड़ियाँ थीं। खिलखिलाकर हँसती, बड़ी शरारती झाड़ियाँ। कुछ दूर आम, अमरूद, जामुन और शिरीष के पेड़ों की कतारें ही कतारें। बीच में एक टेढ़ी-मेढ़ी, पतली सी पगडंडी। हर पंथी को हाथों से इशारा करके पास बुलाती हुई। निम्मा उसी पर चल रही थी। चलती जा रही थी।…नदी के पानी को छूकर आई चंचल हवाएँ उसके मन में मीठी सिहरन पैदा कर रही थीं।
चलते-फिरते वह एक गाँव में पहुँची। वह गाँव तो सुंदर था ही, नाम भी वैसा ही सुंदर, फागुन!
यानी फागुन गाँव। बारहों महीने होली की फगुनाहट से भरा।
निम्मा फागुन गाँव की सुंदरता देखकर मुग्ध थी। बार-बार बिना बात उसके होंठों पर हँसी आ जाती। जैसे अपनी खुशी वह छिपा न पा रही हो।
पास ही एक ऊँचा-सा टीला था। उस पर खड़े होकर एक नजर उसने पूरे फागुन गाँव पर डाली।
“वाह, क्या कहने…!” एकाएक उसके होंठों से निकला।
खेतों में हँसती-गाती सरसों की हुमचती फसलें। चारों ओर हवा में नाचते फूल ही फूल। सरसों के पीले-पीले फूलों के साथ ही, जहाँ-तहाँ उझककर झाँकते गेंदा, गुलाब, कनेर और जाने कौन-कौन से ठठ के ठठ फूल। फूलों की उस घाटी के बीच फागुन गाँव ऐसा लगता था, जैसे पूरा गाँव खुद में ही एक अनोखा फूल हो, जो धरती फोड़कर निकल आया है।
फिर सबसे अनोखी थी फागुन गाँव की सदानीरा नदी, जो बड़ी देर तक उससे सटकर चलती थी।
उसी से फागुन गाँव को हरियाली का वरदान मिला था, उसी से प्राण, उसी से सुंदरता। जैसे नदी ने ही अपने जादू से फागुन गाँव को इतना सुहाना बना दिया हो, कि दूर-दूर तक उसकी कोई मिसाल न थी।
निम्मा को लगा, फागुन गाँव के साथ-साथ बहती, कल-कल गीत गाती नदी पूरे गाँव को दुलार रही है। बिल्कुल माँ की तरह।…नदी किनारे दूर-दूर तक रेत बिखरी हुई थी। वहाँ ईंटों के बड़े-बड़े चट्टे लगे थे।
इतने में निम्मी परी की नजर एक युवक पर गई। विशाल डील-डौल और कसरती बदन वाला एक युवक उन ईंटों को सिर पर ढो-ढोकर पास के खेत में ले जा रहा था।
निम्मा ने देखा कि एक बार में कोई आठ-दस दस ईंटें सिर पर ढोकर ले जा रहे उस मजदूर के सारे शरीर से पसीना चू रहा है। उसके काले शरीर पर पसीने की बूँदें ऐसी लग रही थीं, जैसे मोती झिलमिला रहे हों। शरीर ऐसा सीधा तना हुआ, जैसे पहाड़ की कोई चट्टान हो।
निम्मा ने देखा तो देखती रह गई। ‘अरे, कितना सुंदर है यह युवक!…सच, सुंदरता तो यह होती है।’ उसके मुँह से निकला—धरती का बेटा!
हर बार ईंटें उठाकर ले जाने से पहले वह युवक अपने माथे पर छलक आए पसीने को अँगोछे से पोंछ लेता था, और फिर बड़ी खुशी से ईंटें ढोने के अपने काम में जुट जाता था।
निम्मा परी दूर से देख रही थी। बड़े ध्यान से।
‘जब-जब यह युवक अपने माथे से पसीना पोंछकर मुसकराते हुए फिर अपने काम में जुटता है, तो इसका माथा चमकने लगता है। आहा, उस समय कितनी अनोखी लगती है इसके माथे की चमक।’ निम्मा परी ने मन ही मन कहा, ‘और हाँ, उस समय इसकी आँखों में बिल्कुल छोटे बच्चे जैसी निर्मलता झलकने लगती है।’
निम्मा को लगा, एकदम स्वस्थ और कसरती शरीर वाला यह शख्स बड़ा चुस्त, फुर्तीला है, पर उतना ही सीधा-सरल भी है। इसके भीतर बिल्कुल एक बच्चे जैसा दिल है।
अब तो परी से रहा न गया। वह धीरे-धीरे चलती हुई वहीं जा पहुँची, जहाँ बुधना ईंटें उठा-उठाकर सिर पर रख रहा था। उसने पूछा, “भई, क्या तुम यहीं रहते हो? तुम्हें मैं क्या कहकर बुलाऊँ…? मतलब, नाम…!” फिर कुछ सकुचाकर बोली, “मैं…मैं निम्मा हूँ, निम्मा…!”
“निम्मा…! कौन निम्मा…?” वह सीधा सा मजदूर पसोपेश में। चेहरे पर बड़ी हैरानी कि यह कौन स्त्री है? इतनी सुंदर कि चारों ओर उससे उजाला सा फैल रहा है। दूर तक महक सी उड़ रही है। लेकिन…यह आई कहाँ से?
वह हँसकर बोला, “हाँ-हाँ, यहीं रहता हूँ मैं। फागुन है हमारे गाँव का नाम, और मुझे सब बुधना कहते हैं। पर तुम कौन हो जी और क्यों पूछ रही हो? तुम आसपास की तो नहीं लगती हो मुझे। तो फिर हो कौन और आई कहाँ से हो?”
निम्मा परी मुसकराई। बोली, “मैं तो राहगीर हूँ, बुधना। दुनिया घूमने निकली हूँ। यहाँ की सुंदरता देखी तो ठिठककर खड़ी हो गई। सचमुच बड़ा अनोखा है तुम्हारा गाँव।”
बुधना हँसा। बोला, “अच्छा है कि तुमको हमारा गाँव पसंद आया। तुम लगता है, शहर की हो। शहर के नफीस लोगों को गाँव कम ही पसंद आता है। हम तो जी, सीधे-सादे लोग हैं। बस मेहनत करते हैं और ठाट से जीते हैं। ज्यादा लंबी-चौड़ी बातें करना हमें नहीं आता।”
निम्मा परी हँसकर बोली, “अरे वाह, इतनी अच्छी बातें तो कर लेते हो और भला बातें करने में क्या होता है? और जिंदगी की सुंदरता तो इसी में है कि मेहनत करके खाना और जीना। ऐसी सच्ची खुशी तो गाँव में ही मिल सकती है। शहरों में भला कहाँ ऐसी सादगी और सुंदरता?…अब तुम ही देखो, जैसा अच्छे डील-डौल वाला शरीर तुम्हारा है, देखने में जैसे बाँके लगते हो, शहर में कितने नौजवान होंगे ऐसे?”
सुनकर बुधना के चेहरे पर चमक आई, पर वह थोड़ा शरमा भी गया। उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह आगे क्या कहे।
थोड़ी देर बाद निम्मा बोली, “अच्छा, एक बात बताओ। फागुन क्यों पड़ा तुम्हारे गाँव का नाम? कुछ तो बात होगी।”
“हम क्या जानें?” बुधना बोला, “हम तो जी, दादी-नानी से यही सुनते आए हैं कि बड़ा पुराना है फागुन गाँव। दूर-दूर तक इसका कोई सानी नहीं। यहाँ के लोग बड़े सीधे-सादे हैं। खूब मेहनती और ईमानदार। मेहनत से कभी जी नहीं चुराते।…हमारे एक काका हैं, भदरी काका। वो कहा करते हैं कि यहाँ के बाशिंदों के पसीने के मोती धरती पर गिरते हैं, इसलिए धरती अपनी सुंदरता का पूरा खजाना उनके लिए खोल देती है।…
“अब काका की बात कितनी सही है, कितनी नहीं, यह तो हम क्या कहें। पर इतना तो हमने भी देखा कि बाकी जगहों पर महीने-दो महीने के लिए कोई फूल खिलता है तो कोई चार महीने के लिए। पर फागुन गाँव में तो बारहों महीने फूल खिलते हैं। चारों ओर रंग-बिरंगे फूल ही फूल, जैसे धरती पर इंद्रधनुष उतर आया हो। तो फूलों की ऐसी बहार है यहाँ कि इसका नाम शायद खुद-ब-खुद फागुन पड़ गया।”
सुनकर निम्मा परी को अच्छा लगा। उसने पूछा, “अच्छा बुधना, तुम काम क्या करते हो?”
बुधना हँसकर बोला, “नाम तो मेरा बुधना यानी बुद्धू है। पर लगता है, असली बुद्धू तुम हो। देख नहीं रही हो, मैं मजदूर हूँ। ईंटें ढोता हूँ। खेत में रामचरना किसान अपने लिए एक कमरा बनवा रहा है। उसी के लिए ईंटें ले जा रहा हूँ। अच्छा, अब चलूँ। तुम तो इतना भी नहीं देखतीं कि मेरे सिर पर दस ईंटों का बोझ है। खड़े-खड़े गर्दन दुखने लगी।…क्यों, आया समझ में?”
“तो लाओ, कुछ मुझे दे दो।” निम्मा परी बोली, “बातें करते हुए चलेंगे तो तुम्हें इतना बोझा भी नहीं पता चलेगा।”
“तुम…तुम उठाओगी बोझा?” बुधना को इतनी हैरानी हुई कि वह आँखें फाड़े निम्मा परी की ओर देखता रह गया।
“लो जी, इसमें क्या बात है? तुम उठा सकते हो तो मैं क्यों नहीं? मैं भी थोड़ा भार तो उठा ही सकती हूँ।” निम्मा परी बोली।
“अच्छा, तो एक ईंट ले लो।” बुधना हँसकर बोला, “तुम्हारे लिए यही काफी है।…पर हाँ, कहीं हाथ-पैर न तोड़ लेना अपने।”
“नहीं, आधी ईंटें तो मैं उठाऊँगी ही।” निम्मा जिद करती हुई बोली।
“बड़ी जिद्दैल हो जी। लगता है, कभी किसी का कहना नहीं मानती हो। तो लो, तुड़वाओ अपने हाथ-पैर…!” गुस्से में बुधना ने सारी ईंटें नीचे जमीन पर रख दीं।
आखिर निम्मा ने भी सिर पर कपड़े का मुँड़ासा बाँध, चार ईंटें उठा लीं और हँसती, बातें करती हुई बुधना के साथ चल दी।
ईंटों का बड़ा सा चट्टा था वहाँ। हजारों ईंटें, जिन्हें उठा-उठाकर ले जाना था। कुछ ईंटें रामचरना के खेत में पहुँचानी थीं। कुछ इससे भी आगे कच्ची सड़क पर। वहाँ जमीन समतल करके ईंटों का खड़ंजा बिछाया जाना था।
बुधना और निम्मा दोनों ने मिलकर काम किया। पूरे दिन दोनों जुटे रहे। बुधना बीच-बीच में चोरी-चोरी निम्मा को देख लेता। कैसी अजब है यह शहरी छोरी। बिना बात ईंटें उठा-उठाकर हलकान हो रही है। न जाने इसके जी में क्या है?
और निम्मा बार-बार साड़ी का फेंटा कसती। सिर पर ईंटें उठाकर सधे कदमों से बुधना के साथ चलती सोच रही थी, आज धरती पर पहला ही तो दिन है। आज ही गिर-गिरा गई, तो धरती को जी भरकर देखने का सपना कैसे पूरा होगा?
शाम होते-होते दोनों ने मिलकर ईंटों का पूरा चट्टा उठाकर, सारी ईंटें वहाँ पहुँचा दीं, जहाँ उनकी जरूरत थी।
राजमिस्त्री शंकर ने बुधना को इतने उत्साह से काम करते देखा तो बोला, “आज तो बुधना, तुमने कमाल कर दिया। सच्ची, मेरे यार!”
इस पर बुधना ने निम्मा की ओर देखकर इशारा किया। बोला, “ये मैम न होतीं तो इतना काम न हो पाता।…देखने में तो तुम्हें बड़ी नाजुक सी लगेंगी। पर भई, जिगरा बड़ा है। मैं थक गया, पर ये नहीं थकीं। साथ-साथ ईंटें ढोकर लाती रहीं।”
सुनकर राजमिस्त्री शंकर ने सिर उठाकर निम्मा की ओर देखा। चौंककर बोला, “अरे…!” अचरज के मारे उसकी आँखें निकली पड़ रही थीं। “अरे मैमजी, आपने क्यों तकलीफ की?” कहते हुए भी उसे सचमुच यकीन नहीं था कि बुधना के साथ यह सुंदर सी युवती भी इतनी सारी ईंटें ढोकर लाई है।
निम्मा ने मुसकराकर कहा, “मैं देखना चाहती थी, मेहनत करने में कितना सुख मिलता है।”
अब बताओ भला, इसका क्या जवाब? सुनकर राजमिस्त्री शंकर चुप। आसपास के और लोग भी चुप। और बुधना की हालत तो यह कि उसे कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि अरे, राम रे राम, भला उसके साथ यह हो क्या रहा है!
फागुन गाँव के इतिहास में वह एक अनोखा दिन था। हर कोई ठिठककर सोच रहा था कि ऐसा तो पहले कभी हुआ नहीं। तो भला यह हो क्या रहा है, और हो क्यों रहा है?
जितना-जितना लोग सोचते, उतना ही उलझते जाते।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
