फिर आया वसंत पंचमी का त्योहार, जिसका फागुन गाँव के लोगों को महीनों से इंतजार रहता। आखिर इसी दिन तो फागुन गाँव में बड़ा भारी मेला लगता था। गाँव के तालाब से लेकर बामन रेती और अहीरों के कछार तक। दूर-दूर के गाँवों से हजारों लोग आते और फागुन गाँव में जैसे मस्ती का सैलाब उमड़ पड़ता।
हर तरफ जोश, उत्साह और आनंद से भरे ठठ के ठठ लोग। खूब बने-ठने से। रंगों की झाँकी सजाए, चाव और उमंगों से भरी सजी-धजी स्त्रियाँ, जो मेले में अलग ही रौनक ले आतीं। साथ ही मस्ती में उछलते-कूदते, धाऊ-धप्पा और हा-हा, ही-ही करते बच्चे। मैदान में हर तरफ चकरी, झूलों, गुब्बारों पर निशाना साधती बंदूकों, पहलवानी अखाड़ों और ठेले वालों की आवाजें।
सच ही फागुन गाँव के इस मेले के बहुत रंग थे। उसमें जाने कहाँ-कहाँ से बड़े-बड़े आसमानी चक्करदार झूले और तमाशे वाले आते। काले जादू का खेल दिखाने वाले बंगाले के जादूगर भी। तरह-तरह की मिठाइयों की दुकानें सजतीं, जिनमें कलकत्ते के रसगुल्ले होते तो मक्खनपुर की चाट वाले गुझिए, अराँव के पेड़े और मथुरा की खुरचन भी। ठेलों पर खटमिट्ठी चाट, समोसे, गरम इमरती, जलेबियाँ और न जाने क्या-क्या। साथ ही खूब खेल-कूद होते थे। कुश्ती के दंगल होते थे, और जीतने वाले को गाँव की पंचायत की ओर से इनाम मिलता था। साथ ही गले में खुशबूदार गुलाब और गेंदे के फूलों की माला।
निम्मा परी को पता चला कि मेले में केवल लड़के ही खेल-कूद, दौड़, कुश्ती, कबड्डी सबमें भाग लेते हैं। लड़कियाँ शामिल नहीं होतीं।
जानकर उसे अच्छा नहीं लगा।
“भला क्यों नहीं?” उसने लड़कियों से पूछा, “इसमें क्या हर्ज है…?”
“हमें शरम आती है, दीदी!” सारी लड़कियों का एक ही जवाब।
“वाह, तुम जीतोगी तो इनाम भी तो मिलेगा। इसमें शरम की कौन सी बात?” निम्मा परी ने समझाया, “फिर मैं भी तो रहूँगी तुम्हारे साथ। खेल-कूद, रस्साकशी, कबड्डी, सबमें बराबर हिस्सा लूँगी। भाग-दौड़ और कुश्ती में भी…!”
“परी दीदी, आप…?” सुनकर फागुन गाँव की लड़कियाँ हैरान। सबकी आँखें मारे अचरज के गोल-गोल घूमने लगीं।
“और क्या…! तुम समझती हो कि मैं दौड़ नहीं सकती? खेल नहीं सकती? कुश्ती नहीं लड़ सकती, क्यों?” निम्मा परी ने मुसकराते हुए कहा।
अब लड़कियाँ भला क्या कहतीं? वे चुन्नी होंठों में दबाए खुदर-खुदर हँसने लगीं। बोलीं, “ठीक है परी दीदी, तो इस बार हम भी हिस्सा लेंगी…!”
“पक्की बात…?”
“पक्की, एकदम पक्की!”
बस, बात की बात में तय हो गया कि पहली बार फागुन गाँव की लड़कियाँ भी प्रतियोगिता में भाग लेंगी। उनके लिए अलग से इंतजाम किया गया।
और निम्मा परी ने ठीक ही कहा था। रस्साकशी हो या खेल कबड्डी, भाग-दौड़ या ऊँची कूद, सबमें उसने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और सारी लड़कियों में जोश भर दिया।
गाँव के लोग यह कमाल देख रहे थे और दाँतों में उँगली दबाए, निम्मा परी की जी भरकर तारीफ कर रहे थे, जिसने फागुन गाँव में नई लहर पैदा कर दी।
इस बीच लभउआ, बाँसुली, डिमरी, डेढ़ी, ढेंकी, पिरथुला, फुलकैना और ऊँचगाँव समेत आसपास के दसियों गाँवों की लड़कियों में भी खुस-फुस शुरू हो गई थी, “अगली बार हम भी जरूर हिस्सा लेंगी। हम भी…! देखो, आता तो यह सब हमें भी है। तो फिर काहे की शरम…? हम भी जीतकर दिखा देंगी इनाम।”
उधर निम्मा परी अब नन्हे-मुन्ने बच्चों के बीच बच्ची बनकर उनका जोश बढ़ा रही थी। पूरे मैदान में छोटे बच्चों की किल-किल किलकारियाँ गूँज रही थीं। वाह-वा, उनके मस्ती भरे खेल और जोश भरी प्रतियोगिताएँ।
ओल्लै…आया मजा…!
वो देखो वो, दीदी, हरा दिया, हरा दिया, हरा दिया…!
हम जीत गए, जीत गए, जीत गए…!
अम्माँ, देखो-देखो, हम जीत गए इनाम…! यह गुलाब और गेंदे के फूलों का हार…!!
आ जा, मेरे लाल, मैं वारी जाऊँ…!
नन्हे फरिश्तों की रंगारंग दुनिया।…
निम्मा परी ने उसकी एक सुंदर झाँकी ही सजा दी थी।
लोग देख रहे थे। हँस रहे थे। जोश बढ़ा रहे थे, और मन ही मन मगन हो रहे थे। वे खुश हो रहे थे और तालियाँ बजा रहे थे।
सबको जैसे अपना बचपन याद आ गया हो!
फागुन गाँव के वसंत मेले में इतना आनंद तो पहले कभी नहीं आया था, जैसा इस बार आया। इसलिए सबके होंठों पर बस निम्मा परी का ही नाम था।
कोई उसे कहता, बच्चों की दोस्त परी…!
कोई कहता, लड़कियों की दोस्त परी…!
कोई कहता, बुधना वाली परी…!
कोई कहता, सबका दिल मोहने वाली फागुन गाँव की दोस्त परी…!
हर ओर बस निम्मा परी ही छाई हुई थी।
आखिर में हारमोनियम वाले बजरंगी मास्टर जी के साथ फागुन गाँव की लड़कियों की गीत मंडली आगे आई। उनमें भी निम्मा परी शामिल थी। उसने सबके साथ मिलकर गाया—
स्वागत है, स्वागत है, स्वागत श्रीमान्,
आए आप मेले में, स्वागत श्रीमान्!
बैठिए मगन हो, बैठिए श्रीमान्,
जिंदगी की रौनकें ये देखिए श्रीमान्,
स्वागत है, स्वागत है, स्वागत श्रीमान्…!
निम्मा परी का सुरीला कंठ सबसे अलग जान पड़ता था। एकदम सधा हुआ। बजरंगी मास्टर जी हाथ का इशारा कर-करके उसका जोश बढ़ा रहे थे, ताकि वह और भी खुलकर गाए।
धीरे-धीरे निम्मा परी खुल रही थी।…
इस सहगान के बाद उसने सुनाया खुद अपना बनाया हुआ गाना, जो उसने अभी थोड़ी देर पहले ही बनाया था। और इतनी देर में ही बजरंगी मास्टर जी ने उसकी बड़ी मोहक धुन भी बना ली थी।
परीलोक में रहते हुए निम्मा को धरती कैसी प्यारी लगती थी। और फिर धरती पर आकर वह कैसे बस धरती की ही हो गई, यह पूरा किस्सा निम्मा परी ने एक सुंदर गीत में ढाल दिया था। हारमोनियम पर बजरंगी मास्टर जी की सुरीली धुन के साथ निम्मा परी ने यह गीत पेश किया तो लोगों पर जादू सा छा गया। जो भी सुनता, अश-अश किए बिना न रहता।
निम्मा परी भावमगन होकर गा रही थी। बस, गाए जा रही थी, जैसे गहरी समाधि लग गई हो। और वही हालत हारमोनियम पर साथ देने वाले बजरंगी मास्टर जी की। वे आज नया गुलाबी साफा पहनकर आए थे। ऊपर से निम्मा परी के गीत की मोहक लय-ताल। सो निम्मा परी के गीत के सुंदर बोलों के साथ-साथ वे खुद भी हवा में उड़े जा रहे थे। और उनके साथ-साथ मैदान में झूम रहे थे हजारों लोग।
धीरे-धीरे निम्मा परी का सुर और गहरा होता गया। मानो वह देह की सुधबुध भूल चुकी हो। सब कुछ भूलकर वह गा रही थी, बस, गाती ही जा रही थी—
परीलोक है सुंदर, लेकिन धरती उससे प्यारी है,
सुंदर इसके बाग-बगीचे, सुंदर क्यारी-क्यारी है।
ऐसी सुंदर कल-कल नदियाँ, सुंदर पर्वत प्यारे हैं,
फूल खिले हैं ऐसे, जैसे उतरे भू पर तारे हैं,
खेतों में हरियाली, आहा, नाच उठा है मेरा मन,
देख-देखकर सच्ची अम्माँ, मन मेरा बलिहारी है।
परीलोक है सुंदर, लेकिन धरती उससे प्यारी है।
लगता मुझको ऐसा, जैसे धरती ने सब वार दिया,
फूल-फूल ने, कली-कली ने, हँसकर अपना प्यार दिया,
आहा बच्चे, ऐसे बच्चे, देख उमड़ता मेरा मन,
ऐसी अम्माँ, प्यारी अम्माँ, मेरा घर, मेरा आँगन।
नाम गाँव का फागुन, हँसती हरियाली की साड़ी है,
परीलोक है सुंदर, लेकिन धरती उससे प्यारी है।
हवा चले तो शीश हिलाकर, स्वागत करते फूल यहाँ,
मेहनत के उजले मोती हैं, चंदन जैसी धूल यहाँ,
कन-कन इसका सोने जैसा, जर्रा-जर्रा चाँदी है,
फूल-फूल, बस फूल बिछे हैं, नहीं कहीं है शूल यहाँ।
देख-देखकर सचमुच ही मेरा मन बलिहारी है,
परीलोक है सुंदर, लेकिन धरती उससे प्यारी है।
गाते-गाते इस कदर भावुक हो गई निम्मा परी कि उसका स्वर भर्रा गया। आँखें भीग गईं।
वह गा रही थी, तो साथ ही आँखों से आँसू ढुरकते जा रहे थे।
बुधना की माँ ने आगे बढ़कर प्यार से उसका माथा थपथपाया, छाती से लगा लिया।
निम्मा परी कुछ देर के लिए रुकी। खुद को सँभाला। फिर अपनी गीली आँखें पोंछकर किसी तरह उसने गीत पूरा किया।
और गीत पूरा होते ही चारों तरफ तालियाँ ही तालियाँ। पूरे मैदान में बस तालियों की गड़गड़ाहट गूँज रही थी।
गूँजती रही देर तलक।
निम्मा परी के भीतर खुशी समा नहीं रही थी। उसने भावुक होकर पास बैठी बुधना की माँ से कहा, “सच्ची कहूँ तो अम्माँ, बहुत सुख है इस धरती पर। बहुत सुख…! शायद दुख भी कम नहीं हैं। पर दुख हैं, तभी तो पता चलता है कि सुख का मोल क्या है। परीलोक में दुख नहीं हैं अम्माँ, तो वहाँ कोई समझ ही नहीं पाता कि सुख कैसी अनमोल चीज है…!”
“अब तू परीलोक का बखेड़ा क्यों ले बैठी, इस हँसी-खुशी के मौके पर? अरे, अब तो तू धरती की बेटी है, मेरी प्यारी लाडली…!” कहते-कहते बुधना की माँ ने प्यार से निम्मा परी के सिर पर हाथ फेरा तो उसके पूरे चेहरे पर मुसकान खिल गई।
निम्मा परी को मुसकराता देख, बच्चों ने भी तालियाँ बजा दीं।
तब तक लड़कियाँ भी जोश में आ गई थीं। उन्होंने निम्मा परी का हाथ पकड़कर खींच लिया। बोलीं, “आओ दीदी, आओ, नाचें…!”
पहले तो निम्मा परी सकुचाई, पर फिर लड़कियों के बीच नाचने का मन हो आया। नाचते-नाचते खूब लय बँध गई। फिर तो वह ऐसी नाची, ऐसी नाची कि फागुन गाँव के वसंत मेले में आए हर किसी की जबान पर बस निम्मा परी का ही नाम था।
ये उपन्यास ‘बच्चों के 7 रोचक उपन्यास’ किताब से ली गई है, इसकी और उपन्यास पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर जाएं – Bachchon Ke Saat Rochak Upanyaas (बच्चों के 7 रोचक उपन्यास)
