Jab Haar Gayi by Mannu Bhandari
Jab Haar Gayi by Mannu Bhandari

उसकी तबाही के साथ एक महान नेता के निर्माण करने का मेरा हौसला भी मुझे तबाह होता नजर आया। लेकिन इतनी आसानी से मैं हिम्मत हारनेवाली नहीं थी। बड़े धैर्य के साथ मैं अपनी कहानी का विश्लेषण करने बैठी कि आखिर क्यों, सब गुणों से लैस होकर भी मेरा नेता, नेता न बनकर चोर बन गया? और खोजबीन करते-करते मैं अपनी असफलता की जड़ तक पहुँच ही गई। गरीबी के कारण ही उसके सारे गुण दुर्गुण बन गए और मेरी मनोकामना अधूरी ही रह गई। जब सही कारण सूझ गया, तो उसका निराकरण क्या कठिन था!
एक बार फिर मैंने कलम पकड़ी और नेता बदले हुए रूप और बदली हुई परिस्थितियों में फिर एक बार इस संसार में आ गया। इस बार उसने शहर के करोड़पति सेठ के यहाँ जन्म लिया, जहाँ न उसके सामने पेट भरने का सवाल था, न बीमार बहन के इलाज की समस्या। असीम लाड़-प्यार और धन-वैभव के बीच वह पलने लगा। बढ़िया-से-बढ़िया स्कूल में उसे शिक्षा दी गई। उसकी अलौकिक प्रतिभा देखकर सब चकित रह जाते। वज अत्याचार होते देखकर तिलमिला जाता, जोशीले भाषण देता, गाँव में जाकर वह बच्चों को पढ़ाता। गरीबी के प्रति उसका दिल दया से लबालब भरा रहता। अमीर होकर भी वह सादगी से जीवन बिताता, सारांश यह कि महान नेता बनने के सभी शुभ लक्षण उसमें नज़र आये। कदम-कदम पर वह मेरी सलाह लेता, और मैंने भी उसके भावी जीवन का नक्शा उसके दिमाग में पूरी तरह उतार दिया था, जिससे वह कभी भी पथभ्रष्ट न होने पाये।
मैट्रिक पास करके वह कॉलेज गया। जिस कॉलेज में एक समय में केवल राजाओं के पुत्र ही पढ़ा करते थे और जहाँ रईसी का वातावरण था, उसी कॉलेज में उसके पिता ने उसे भर्ती कराया। लेकिन मेरी सारी सावधानी के बावजूद उन रईसाज़ादों की सोहबत अपना रंग दिखाये बिना न रही। वह अब ज़रा आरामतलब हो गया। मेरे सलाह- मशविरों की अब उसे उतनी चिन्ता न रही। घण्टों अब वह कॉफी-हाऊस में रहने लगा। और एक दिन तो मैंने उसे हाउजी खेलते देखा। मेरा दिल धक्-से कर गया। जुआ! हाय राम! यह क्या हो गया! मैं सँभलकर कुर्सी पर बैठ गई और कलम को कसकर पकड़ लिया। कलम को ज़ोर से पकड़कर ही मुझे लगा, मानो मैंने उसकी नकेल को कसकर पकड़ लिया हो। पर उसके तो जैसे अब पर निकल आये थे। जुआ ही उसके नैतिक पतन की अंतिम सीमा न रही। कुछ दिनों बाद ही मैंने उसे शराब पीते भी देखा। मेरा क्रोध सीमा के बाहर जा चुका था। मैंने उसे अपने पास बुलाया। अपने क्रोध पर जैसे-तैसे काबू रखते हुए मैंने उससे पूछा, ‘जानते हो, मैंने तुम्हें किसलिए बनाया है?’

वह भी मानो मेरा सामना करने के लिए पूरी तरह तैयार होकर आया था। बोला, ‘अपने स्वार्थ की पूर्ति करने के लिए, अपनी इच्छा पूरी करने के लिए तुमने मुझे बनाया पर, यह ज़रूरी नहीं कि मैं तुम्हारी इच्छानुसार ही चलूँ; मेरा अपना अस्तित्व भी है, मेरे अपने विचार भी हैं।

मैं चिल्ला उठी, ‘जानते हो, तुम किससे बातें कर रहे हो? मैं तुम्हारी स्रष्टा हूँ, तुम्हारी निर्माता! मेरी इच्छा से बाहर तुम्हारा कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं!’
वह हँस पड़ा, ‘अरे! तुमने अपनी कलम से पैदा किया है। मेरे इन दोस्तों को देखा! इनकी अम्माओं ने इन्हें अपने जिस्म से पैदा किया है। फिर भी वे इनके निजी जीवन में इतना हस्तक्षेप नहीं करतीं, जितना तुम करती हो। तुमने तो मेरी नाक में दम कर रखा है। ऐसा करो, वैसा मत करो! मानो मैं आदमी नहीं काठ का उल्लू हूँ। सो बाबा ऐसी नेतागिरी मुझसे निभाये न निभेगी। यह उम्र, दुनिया की रंगीनी और घर की अमीरी! बिना लुत्फ उठाये यों ही जवानी क्यों बर्बाद की जाए? यह सब करके क्या नेता बना जा सकता?’
और मैं कुछ कहूँ, उसके पहले ही वह सीटी बजाता हुआ चला गया। कल्पना तो कीजिए उस जलालत की जो मुझे सहनी पड़ी! इच्छा तो यही हुई कि अपने पहलेवाले नेता की तरह इसका भी सफाया कर दूँ। पर सदमा इतना गहरा था कि जोश भी न रहा। इतना सब हो जाने पर भी जाने क्यों मन में एक क्षीण-सी आशा बनी हुई थी कि शायद वह सीधे रास्ते पर पर आ जाये। गाँधीजी ने भी तो एक बार बचपन में चोरी की थी, बुरे कर्म किये थे, फिर अपने-आप रास्ते पर आ गये। संभव है, इसके हृदय में भी कभी पश्चात्ताप की आग जले और यह अपने आप सुधर जाये। पर प्रतीक्षा करने लगी जब वह पश्चात्ताप की अग्नि में झुलसता हुआ मेरे चरणों में आ गिरेगा और अपने किये के लिए क्षमा माँगेगा!
पर ऐसा शुभ दिन कभी नहीं आया। जो दिन आया, वह कल्पनातीत था। एक बहुत ही सुहावनी साँझ को मैंने देखा कि वह खूब सजधज रहा है। आज का लिबास कुछ अनोखा ही था। शार्कस्किन के सूट की जगह सिल्क की शेरवानी थी। सिगरेट की जगह पान था। सेंट महक रहा था। बाहर हॉर्न बजा और वह गुनगुनाकर अपने मित्र की गाड़ी में जा बैठा। गाड़ी एक बॉर के सामने रुकी। और रात तक वे साहबजादे पेग-पर-पेग डालते रहे, भद्दे मज़ाक करते रहे और ठहाके लगाते रहे। रात को नौ बजे वे उठे, तो पैर लड़खड़ा रहे थे। जैसे-तैसे गाड़ी में बैठे और ड्राइवर से जिस गंदी जगह चलने को कहा, उसका नाम लिखते भी मुझे लज्जा आती है!
अपने को बहुत रोकना चाहती थी, फिर भी वह घोर पाप मैं सहन न कर सकी और तय कर लिया कि आज जैसे भी होगा, मैं फैसला कर ही डालूँगी। मैं गुस्से से काँपती हुई उसके पास पहुँची। इस समय उससे बात करने में भी मुझे घृणा हो रही थी, क्रोध से मेरा रोम-रोम जल रहा था। फिर भी अपने को काबू में रखकर और स्वर को भरसक कोमल बनाकर मैंने उससे कहा, ‘एक बार अंतिम चेतावनी देने के ख़याल से ही मैं इस समय तुम्हारे पास आई हूँ। तुम्हारा यह सर्वनाश देखकर, जानते हो, मुझे कितना दुख होता है? अब भी समय है, सँभल जाओ। सुबह का भूला यदि शाम को घर आ जाये, तो भूला नहीं कहलाता।

पर इस समय वह शायद मुझसे बात करने की मन:स्थिति में ही नहीं था। उसने पान चबाते हुए कहा, ‘अरे जान! यह क्या तुमने हर समय नेतागिरी का पचड़ा लगा रखा है? कहाँ तुम्हारी नेतागिरी और कहाँ छमिया का छमाका! देख लो, तो बस सरूर आ जाये।’
मैंने कान बंद कर लिया। वह कुछ और भी बोला, पर मैंने सुना नहीं। पर जो उसने आँख मारी, वह दिखायी दी और मुझे लगा, जैसे पृथ्वी घूम रही है। मैंने आँखें बंद कर ली और गुस्से से होंठ काट लिए। क्रोध के आवेग में कुछ भी कहते नहीं बना, केवल मुँह से इतना ही निकला, ‘दुराचारी! अशिष्ट! नारकीय कीड़े!’
उसके मित्र ने जो कुछ कहा, उसकी हल्की-सी ध्वनि मेरे कान में पड़ी। वह जाते-जाते कह रहा था, ‘अरे! ऐसी घोर हिंदी में फटकारोगी तो वह समझेगा भी नहीं! ज़रा सरल भाषा बोलो!’
और अधिक सहना मेरे बूते के बाहर की बात थी। मैंने जिस कलम से उसको उत्पन्न किया, उसी कलम से उसका खात्मा भी कर दिया। वह छमिया के यहाँ जाकर बैठनेवाला था कि मैंने उसे रद्दी की टोकरी में डाल दिया। जैसा किया, वैसा पाया!

उसने तो अपने किए का फल पा लिया, पर मैं समस्या का समाधान नहीं पा सकी। इस बार की असफलता ने तो बस मुझे रुला ही दिया। अब तो इतनी हिम्मत भी नहीं रही कि एक बार फिर मध्यम वर्ग में अपना नेता उत्पन्न करके फिर से प्रयास करती। इन दो हत्याओं के भार से ही मेरी गर्दन टूटी जा रही थी, और हत्या का पाप ढोने की न इच्छा थी, न शक्ति ही। और अपने सारे अहं को तिलांजलि देकर बहुत ही ईमानदारी से मैं कहती हूँ कि मेरा रोम-रोम महसूस कर रहा था कि कवि भी भरी सभा में शान के साथ जो नेहला फटकार गया था, उस पर इक्का तो क्या, मैं दुग्गी भी न मार सकी। मैं हार गई, बुरी तरह हार गई।