kalai ka kasbi
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भारत कथा माला

उन अनाम वैरागी-मिरासी व भांड नाम से जाने जाने वाले लोक गायकों, घुमक्कड़  साधुओं  और हमारे समाज परिवार के अनेक पुरखों को जिनकी बदौलत ये अनमोल कथाएँ पीढ़ी दर पीढ़ी होती हुई हम तक पहुँची हैं

तांबे के जैसी धरती का मालिक वाघेला वंश का वारिस दियोदर की गद्दी पर राज कर रहा था। उस वक्त एक भाई धर्म के पीछे पागल बना था, जबकि दूसरा भाई कलाई का कसबी बनने में बल और कल के जोर से राजा की फरियाद और सुख-दुःख का साथी बन रहा था।

इस धरती पर कभी भी मूसलाधार वर्षा नहीं होती। कौन जाने क्यों, लेकिन यह कहानी की बात है। उस वक्त तो इस विस्तार में मेघराजा की महेर काफी कम ही रहती थी। हालांकि मेघराजा की कृपा कम थी फिर भी हिंदू वाणी के यानी कि दियोदर, थराद, वाव और डीसा तहसील का प्रदेश उस समय अपनी मेहनत-भोलापन और सद्बुद्धि के हिसाब से बाजरा- मूग और ऐसे अन्य माल के लिए गुजरात में प्रख्यात था। ऐसे विस्तार का मालिक ढीला-ढाला हो, निर्बल हो तो भला कैसे चल सकता है? “जिसके हाथ में बल, उसके हाथ में राज” ऐसी एक उक्ति सारे देश में उस समय चलती थी। शायद इस देश के लिए भी नई तो नहीं थी। जो विस्तार बिना पानी का हो, रेगिस्तान की बगल में हो और एक गांव से दूसरे गांव जाने का मार्ग न हो और जहां कुदरत की मेहर के बिना कुछ पकता ना हो, वहां वाघेला वंश के राजा भी अपनी कलाई के जोर से और भायातो को साथ रख कर अपनी रैयत की रखवाली कर रहे थे। अपना मान और कीर्ति अपने सद्गुणों और बल से और धर्मप्रेरित कार्य से राज्य की धुरा संभाल रहे थे और ऐसे विस्तार में अच्छे राजवी की एक छवि बनी थी।

हमारी यह कथा आज से 80 वर्ष पूर्व की है। उस वक्त सरियद के मीरखान का गायकवाड विस्तार में भारी जोर था। उसका काम था लूटपाट करना। गायकवाडी राज्य में भारी पाबंदी थी और कडकाई भी थी फिर भी आहिस्ता-आहिस्ता मीर खान का नाम मेहसाणा के इर्द-गिर्द उत्तर के भाग में गूंजने लगा था और रहते-रहते उस डाकू ने रेगिस्तान की मीठी छांव जैसे इस विस्तार के गांवों पर भी अपनी बुरी नजर डाली।

ऐसे में एक बार अपने साथियों के साथ एक आदमी की हाल के देव दरबार की जगह से मीठा कोतरवाडा के रास्ते में आधी रात को दूसरे आदमी से भेंट हो गई।

  • “क्यों आधी रात को किस ओर?”
  • “तू अपने रास्ते चले जाओ भैया! हवन में हड्डियां मत डालो!”

– “अबे! ऐसा कैसा जगन करने निकला है? ” और मीरखां डाकू की आंख और हाथ एक साथ जिस तरह भय के आने से रोम खड़े हो जाते हैं, उस तरह खड़े हो गए। और जबान में से निकल गया- “बे! कभी मीर खां का नाम सुना है? ”

  • “ऐसे तो कितने मीर खानों को रौंद दिए!”

और मीर खान का हाथ अभी दो नाली पर जाये, इससे पहले उस आदमी का हाथ उसके हाथ पर ऐसा पड़ा कि मीर खां जैसा डाकू भी थोड़ी देर के लिए तो हबक खा गया। और इसमें से अभी अपने को ठीक कर ले उससे पहले उसके हाथ को ऐसे मरोड़ा गया कि मानो अभी क ड ड ड बोल जाएगा और उसने घबराते हुए कहा- “आपकी गईया हूं” और वह उस आदमी के पैर में गिर गया!

और मीर खां ने जब जामगरी जलाई और उस आदमी ने अपनी बुकानी छोड़ी तो देखा कि ये दियोदर के मालिक मगन सिंह बापू हैं! मीर खां दोहरा झुक गया और बोला- “बापू! मुझ से भूल हो गई। अब बनास लांघकर इस और कभी नहीं आऊंगा। आपके विस्तार में आऊं तो मुझे गोली मार देना! लेकिन आज मुझे माफ कर दो।”

और उसके साथ ही उस आदमी ने पीठ फेर ली। फिर कभी उस विस्तार में मीरखां नहीं दिखा। ऐसे थे मगन सिंह बाप। कलाई के कसबी तो ऐसे कि पागल हुए भैंसे या सांड को एक अपने बली हाथ से गिरा दे। नाथ जी में और अपनी कलाई की ताकत में मानने वाले ये राजवी के बड़े भाई गद्दी संभाले और खुद राज्य की प्रजा की रक्षा का दायित्व सम्भालते थे।

ऐसे इस राजनीतिक कीर्ति चारों दिशा में फैली थी तब एक दिन दियोदर की बाजार में एक ग्वालन –

  • “मुझे मूंग चाहिए। खरीदने हैं। कितने मिल सकेंगे?” ऐसा पूछ कर इस दुकान से उस दुकान फिर रही थी। और मूंग का भाव पूछा करती थी। व्यापारियों के लिए यह कोई नई बात नहीं थी। मूंग और बाजरी का तो यहां भंडार था। और इसलिए खुशी से पागल व्यापारी उस ग्वालिन को अच्छे से अच्छे मूंग और वह भी दो-चार वर्ष पुराने अपनी कोठार में से लाकर दिखाते थे और वह ग्वालिन अपनी हथेली में आने के साथ ही उसे रौंद डालती और कहती थी-
  • “ऐसे सड़े हुए मूंग मुझे नहीं चाहिए!” और दूसरी दुकान चली जाती थी।

एक दुकान से दूसरी दुकान करते हुए उसने सभी दुकानों के मूंग को देख लिया लेकिन उसे जैसे मूंग चाहिए थे, ऐसे मूंग न मिले। उस वक्त कोई बुद्धिशाली आदमी उसे मिल गया। उसने कहा- “बहनजी! आपको मूंग चाहिए तो ऐसा करें! मगन बापू की कचहरी चली जा। वहां तुझे जैसे चाहिए वैसे मूंग मिल जाएंगे।”

और कुछ खुशी के भाव से और कुछ अभिमान से वह एक व्यापारी को ही साथ लेकर मगन बापू की कचहरी में पहुंच गई।

  • “क्यों सेठ कोई फरियाद, क्यों आना हुआ?”
  • “बापू! बात तो ऐसी है कि इस औरत को मूंग चाहिए थे। इसलिए हमारी दुकान पर आई थी। लेकिन उसे जैसे चाहिए थे वैसे मूंग नहीं थे। इसलिए अगर आपके यहां हो तो” बोलकर व्यापारी रुक गए। आखिर वह बुद्धिशाली बनिया था।

और बापू ने मूंग दिखाने के लिए कारभारी से कहा। कारभारी गोदाम में से मूंग लेकर आया और उस औरत के सामने मूंग रखें।

  • “बापू! यह मूंग भी तो सड़े हुए हैं! देखो!” बोलकर उस औरत ने मूंग को अपनी हथेलियों में मसलकर दिखा दिया।

बापू बात समझ गए। उन्होंने व्यापारी की ओर देखा। फिर उस औरत से कहा- “बहन! तू आई है कच्छ से! थक गई होगी। पानी पी ले। खाना खा ले। अभी दूसरे गोदाम में से दूसरे पुराने मूंग मंगवा देता हूं। लेकिन तू रुपया कितने लाई हो? कच्छ की कोरी हो तो चलेगा! वहां के राजा अभी-अभी सोने और चांदी की कोरी निकाली है ना? कितनी लाई हो?”

और पट देकर कमर में से उस औरत ने एक थैली निकाली और दो-चार कोरिया सोना-रूपा बापू के हाथ में रख दी।

  • “अरे यह तेरे कच्छ का रुपैया?” ऐसा कहकर बापू हंसते जाते थे और अपनी हथेली में कोरी को मसल रहे थे और वह ग्वालिन बाई तो एक के बाद एक दश जितनी कोरी को ऐसे पट्टी की तरह बनती देख कर दंग रह गई और खड़ी होकर प्रसन्नता से बोली- “धन भाग्य मेरे भाई! तू मेरे ध र्म का भाई! तेरी कलाई की ताकत की बातें मैंने कच्छ में सुनी थी। आज रूबरू तेरी कलाई की उस ताकत का माप मैंने ले लिया।”

बापू ने हंसते-हंसते ग्वालिन बाई को मान सहित राजगढ़ी में एक बहन की हैसियत से रखने के लिए कारभारी को हुक्म दिया और जब तक जिये तब तक उस बाई को धर्म की बहन मानते रहे और उसका लालन-पालन किया।

ऐसे कलाई के कसबी, रैयत की रक्षा करने वाले राज्य का प्रहरी हो, तब तक बाहर के किसी की ताकत नहीं थी कि प्रजा को परेशान करें।

वे जब तक जिए तब तक कंवारे ही रहे। अपने बल का जरा भी अभिमान किए बिना रहे।

आज भी कलाई के यह कसबी राजवी का स्मारक दियोदर के बस स्टैंड के नजदीक बाईं ओर है और उनकी मर्दानगी की बातें याद कराता है। और अतीत को बनाता खडा है।

भारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा मालाभारत की आजादी के 75 वर्ष (अमृत महोत्सव) पूर्ण होने पर डायमंड बुक्स द्वारा ‘भारत कथा माला’ का अद्भुत प्रकाशन।’