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July 2008

 

बात उस समय की है जब मैं बचपन में अपनी शरारती प्रवति के कारण बहुत चंचल थी। खेल-खेल में बातों-बातों में अपनी सहेलियों व घर में आई भाई-बहनों से झगड़ा करना मेरी आदत में शुमार था। अपने उग्र स्वभाव व तानाशाही प्रवति के कारण मैं सब पर अपना वर्चस्व बनाए रखने में कामयाब रहती थी। किंतु इसी पत्थर दिल कठोर प्रवति को मात्र एक छोटे से पत्थर ने ही दिल की अंतरात्मा को झकझोर कर कोमलता का गहना पहना दिया। घटना ऐसी घटी कि हम सभी भाई बहन ब पड़ोसी बच्चे सतोबिया खेल रहे थे जो कि पत्थरों से खेला जाता है। मैं खाने में पत्थर डाल ही रही थी। कि अचानक मेरा छोटा चार वर्षीय नादान भाई दौड़कर खाने के बीच बैठ गया जिससे कि मेरा पत्थर उचित स्थान पर नहीं पहुंच सका। अत: मैं गेम से आउट हो गई, मुझे इतनी जोर से गुस्सा आया कि अपनी हार की खीझ के कारण मैंने अपने भाई को वही पत्थर सिर पर जोर से दे मारा जो कि उसके नाक के ठिक ऊपर बीचों-बीच जा कर लगा। उससे खून का रिसाव होने लगा। डर के मारे मैं भी रोने लगी। घर में खूब डांट पड़ी सो अलग । कुछ दिनों पश्चात घाव तो ठीक हो गया लेकिन इस दर्दनाक घटना ने मेरे दिल को पिघला दिया। आज मुझे अपने बचपन की वह घटना याद आ जाती है व दिल रुआसां हो जाती है।

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