Hundred Dates
Hundred Dates

Hindi Love Story: “पीहू को समझाऊँ कैसे?” उसने आते ही पहली लाईन कही। मैं उसका चेहरा देख समझ गया था कि, उसके मन में कुछ चल रहा है।

“क्या हुआ?”

“उसका बॉयफ्रेण्ड बस उसे यूज़ कर रहा है। तुमको बताया था न पहले भी।” उसने लापरवाही से कहा।

“हाँ, पर वह कोई बच्ची तो नहीं है जो उसे समझाओ और वह समझ जाए। वैसे भी इन सब मामलों में समझाने वाला ही विलेन होता है।”

“अब तो हद ही हो गई है। ये बेचारी दिन-दिन भर और रात भर उसके कॉल का वेट करती है। सौ-सौ मैसेज भेजती है, कभी-कभार रिप्लाई आता है। इससे बात भी ऐसे करता है, जैसे यह उसके पैरों की जूती हो।”

“हो सकता है, वन साइडेड लव हो।”

“घंटा का लव…वैसे तो टाइमपास के लिए दो-तीन को और घुमाती है।”

“ठीक है ना यार, वो जैसी है वैसी होने का हक़ है न उसको।” दूसरों की ज़िंदगी में ज़्यादा घुसने की इच्छा कब की मर चुकी।

“अभी क्या हुआ है मालूम, उसका बॉयफ्रेण्ड तो अभी हैदराबाद में जॉब कर रहा है; ये मैडम एकदम ज़िद पकड़ ली है कि ये हैदराबाद जाएगी उससे मिलने, वो भी अकेले।”

“तो क्या दिक्क़त है?”

“दिक्क़त? उससे मना नहीं किया जा रहा कि, वो ख़ुद आ जाए? उसको कुछ करना नहीं ऊपर से इससे पैसे भी माँगता है। बोल रहा है आ जा हिम्मत है तो, यहाँ कुछ प्रॉब्लम नहीं। दो-तीन दिन साथ में रहेंगे।”

“तो रहने दो।”

“पीहू सब से पैसे माँगती रहती है। मुझे लगता है यहाँ लड़के भी शायद इसलिए घुमाती है कि मस्ती की मस्ती हो जाएगी और कुछ पैसे भी मिल जाएँगे। अभी मेरे पीछे पड़ी हुई है कि, उसकी फ्लाइट की टिकट मैं कराऊँ। फ्लाइट से जाएगी तब तो टाइम बचा पाएगी और मोबाइल की टाइमिंग मैनेज कर पाएगी। उसके पैरेन्ट्स डेली कॉल करते हैं, कई बार वीडियो कॉल भी…”

“मुझे पता है, तुम उसकी टिकट भी कराओगी और उसको पैसे भी दोगी।” मैंने उसके मतलब की बात उसे साफ़ कर दी।

“तो क्या करूँ, इतना ज़िद कर रही है।” उसने मेरी समझ को सही ठहराया।

“ठीक है करा दो, लेकिन एक बात का ध्यान रखना; उसके आने-जाने के समय और दो-चार दिन आगे पीछे उससे बहुत कम या नहीं के बराबर बात करना और उसके ट्रिप से रिलेटेड अपने कार्ड से कोई ट्रांज़ैक्शन मत करना। कैश दे देना।” उसे मना करने से ज़्यादा अच्छा है, रास्ता दिखा देना।

“उससे क्या होगा?”

“अपने को क्या पता किस मुसीबत में पड़ती है, किसमें नहीं। इसके साथ कुछ उल्टा-सीधा हुआ तो तुम बेकार में फँसोगी कि तुमने हेल्प की थी।”

“नहीं, वैसे तो इतनी समझदार है।”

“समझदारी तो दिख ही रही है मुझे भरपूर। लेकिन थोड़ी समझदारी तुम भी कर लोगी तो कोई दिक्क़त नहीं होने वाली है।” मैंने इत्मीनान से कहा।

“हाँ ना यार…” वह उसे समझाने की बात भूल चुकी थी।