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झरिया अपनी मां को आवाज लगाते हुए मां ओ मां जल्दी से मेरे बाल बना दो,स्कूल के लिए लेट हो रही हूं। आ रही हूं थोड़ा सा छुटकी को खाना देती हूं । पुनः आवाज लगाते हुए जल्दी आओ मां । लो आ गई  झरिया का बाल बनाते हुए, अभी ही तो अपनी बात कहने का समय मिलता है बाल बनवाने की बहाने। उसके बाद तुमको तो फुर्सत भी नहीं है घर के सारे काम करते हुए हवेली भी जाना है । हां वो तो है.. झरिया अपनी मां की परेशानी को अच्छे से समझती थी और अपनी गरीबी को भी। मां तुम हवेली क्यों नहीं छोड़ देती हो । कैसे छोडूं बेटा उसी से तो हमारे सब परिवार का खाना पीना चलता है। दो-तीन हवेली कर लेती हूं तो गुजारा चलता है। मैं खूब पढ़ूंगी नौकरी करूंगी और तुम्हारा हवेली जाना छुड़ा दूंगी। नहीं मांजने दूंगी झूठे बर्तन तुम्हें । अच्छा बाबा ठीक है लेकिन कोई भी काम छोटा और बुरा नहीं होता, झरिया को समझाते हुए…….।

अच्छा यह सब बातें छोड़ो यह बताओ कि, कल स्कूल में क्या-क्या हुआ????? कल हम लोग पढ़ाई के साथ-साथ खूब मस्ती भी किए अच्छा! मां ने कहा। जब घर आ रही थी तो रास्ते में एक जगह कुत्ते और बिल्ली बैठे हुए थे एक साथ । इसमें कौन सी हैरानी वाली बात है झरिया,हैरानी वाली बात है। मैं ही नहीं सारे बच्चे देखने लगे, तब तो जरूर कुछ खास बात होगी बताओ बताओ । कुत्ते अपने बच्चों को तो प्यार कर ही रहे थे, साथ ही बिल्ली के बच्चे को भी प्यार कर रहे थे । हम सभी आश्चर्य से देखने लगे, अरे कोई नहीं साथ रहते-रहते दोनों में मित्रता हो गई होगी। यही मित्रता गहरी हो गई तो एक दूसरे की परवाह भी करने लगे। इसलिए एक दूसरे के बच्चे को भी प्यार करते हैं।

झरिया मित्रता किसको कहते हैं???? मित्रता जब हम एक दूसरे से अपने सुख-दुख बताते हैं उसके साथ खेले बिना नहीं रह पाते हैं। जो बात किसी को नहीं बताते वह अपने दोस्त को बतलाते हैं। सुख तो सुख जो हमारे दुख में भी हमारे साथ वैसे ही खड़ा रहता है जैसे सुख में खड़ा रहता है वही दोस्त है, वही मित्रता सच्ची है…….। आजकल मनुष्य से बेहतर तो वो बेजुबान जानवर हो गए हैं जो एक दूसरे के भाषा को समझते हैं। अलग प्रजाति होते हुए मिलकर साथ रह रहे हैं।

आश्चर्य भरी नजरों से अपनी मां को देखते हुए, तब तो मां मैं और तुम्हारी मालकिन की गुड़िया गुलाब भी अच्छे दोस्त हुए। नहीं बेटा वह हमसे बहुत ऊंचे घराने की है ऊंचा रहन-सहन है उनका। उनसे हम कैसे रिश्ता बना सकते हैं।उनका और हमारा कोई मेल नहीं है।लेकिन मां बड़ी मालकिन तो तुम्हें बहुत प्यार करती हैं। वो पुराने जमाने की हैं, वो रिश्ते की परिभाषा को अच्छी तरह से समझती हैं। आजकल के नए जमाने में इसका सबसे ज्यादा अभाव है।पहले वाली बात अब कहां ???जैसे सुदामा और कृष्ण की दोस्ती थी ऐसी बात अब नहीं रही। अब दोस्ती तो दोस्ती हर रिश्ते अपनी बराबरी में ही लोग रखना पसंद करने लगे हैं। लेकिन मां गुलाब तो मेरे साथ खेलना पसंद करती है। जब मैं आपके साथ हवेली जाती हूं तो गुलाब तो मेरे साथ जी भर के खेलती रहती है।मालकिन उसे मोबाइल दे देती है फिर भी गुलाब मेरे पास मोबाइल रखकर भाग आती है…….।

तब तो गुलाब में बहुत अच्छी बात है वह मोबाइल से अपने आप को दूर रखती है । बरना आजकल के नए जमाने के बच्चे का खिलौना मोबाइल ही है। इसमें बच्चों की कोई गलती नहीं है जब मां ही बच्चों को मोबाइल दे खुद फ्री हो जाते हैं।दादू और बड़ी मालकिन तो बिल्कुल भी गुस्सा नहीं करते हैं। छोटी मालकिन भले गुस्सा करती है कि उसके साथ मत खेलो लेकिन मां गुलाब बहुत ही अच्छी है। एक दिन खेलते खेलते पैर में कांटा चुभ गया तो , मेरे पैर से कांटा निकालते निकालते वह भी रोने लगी थी ।इसका मतलब है कि वह हमसे सच्ची वाली दोस्ती करती है। तभी  तो मेरा ख्याल रखती है ,बड़ी-बड़ी चॉकलेट जब मालकिन उसे लाकर देती है तो वह अपने हिस्से से मुझे देती है।आज तक तो नहीं बताया झरिया तूने, खैर छोड़ो इन सब बातों को स्कूल के लिए लेट हो रही हो स्कूल जाओ । और हां मित्रता करना लेकिन अपने बराबरी में ही ,ये मित्रता ज्यादा टिकाऊ होगी। वैसे ये हैरान करने बाली बात है कि, कैसे गुलाब बिटिया तुम्हारे साथ खेलती है । आजकल के बड़े घराने की बच्चियां तो मोबाइल से ही खेलती है मोबाइल तक ही उनकी दुनिया होती है। नहीं मां गुलाब ऐसी नहीं है….।

ठीक है मैं स्कूल जाती हूं और आज शाम में आऊंगी तो गुलाब से अपनी मित्रता पक्की करूंगी। ठीक है सोच समझ के। स्कूल जाकर झरिया के दिमाग में सिर्फ गुलाब का चेहरा ही घूम रहा था ।गुलाब के साथ बिताए वक्त उसके साथ खेलना ,उसके साथ कुछ बातें करना । जितनी बातें मां बोली सब उसके सामने सच लग रहा था । झरिया को अब विश्वास हो रहा था की उसके और गुलाब के बीच की गहराई मित्रता ही है। झरिया भी दिल जान से उसको प्यार करती थी। एक बार गुस्सा में मालकिन ने उसे झरिया के साथ खेलने की वजह से एक चांटा मारा था, तो गुलाब के चेहरे गुलाब जैसे लाल हो गए थे । तो मुझे बहुत तकलीफ लगी थी सच में अब लग रहा है हम दोनों के बीच में दोस्ती का रिश्ता है जो सारे रिश्ते से बढ़कर है ।आज मैं जाऊंगी तो दोस्ती वाली बात गुलाब को बताऊंगी यह जानकर गुलाब भी काफी खुश होगी ।यही सब सोच झरिया के मन मस्तिक पर हावी हो रहा था इसी वजह से पढ़ने में भी मन नहीं लग रहा था……।

उसका जी चाह रहा था स्कूल से जाकर सीधे गुलाब से मिल आए। लेकिन वह भी तो स्कूल गई होगी ,मेरा भी मन कभी-कभी करता है कि मैं गुलाब वाले स्कूल में ही जाऊं उसी के साथ पढ़ूं । मां कहती है कि गुलाब के स्कूल में बहुत पैसे खर्च होते हैं।  मैं गुलाब से बात करूंगी अगर वह मेरी मदद कर दे तो बिना स्कूल गए ही उसकी वाली पढ़ाई मैं भी कर सकती हूं। यही सब सोचते सोचते छुट्टी हो गई और घर न जाकर मैं सीधे हवेली चली गई। छोटी मालकिन ने कहा देखो आज मनहूस शक्ल लेकर इतना जल्दी आ गई। गुलाब की आंखों में मुझे देखते ही चमक आ गई थी, इसी चमक का तो मुझे इंतजार था जल्दी से हम दोनों खेलने निकले। खेलने की बजाय मैं बोली गुलाब आज मुझे तुमसे मित्रता करनी है वह भी पक्की वाली। मित्रता आश्चर्य से! मां वाली सारी बातें मैंने गुलाब को बताई। गुलाब मुझे गले लगाते हुए आज से मित्रता पक्की….।

10 साल बाद…. समय बितता गया गुलाब मेरी पढ़ाई में भी खूब मदद की दोनों पढ़ाई में अपने-अपने जगह पर अव्वल रहे । बचपन तो कब का पिछे छूट गया जवानी के दहलीज पर हमदोनों पहुंच गए । हमदोनों की मित्रता पर किसी चीज का कोई फर्क नहीं पड़ा। आज मित्रता दिवस है और सुबह-सुबह गुलाब अपने हाथों में गुलाब लेते हुए मेरे घर आई उसने मुझे गुलाब देते हुए गले लगाया । मैंने कहा गुलाब तुमसे मेरी मित्रता होना गुलाब जैसे हैं । उसने हंसते हुए कहा गुलाब जैसी नहीं गुलाब से बढ़कर फ्लावर सी मित्रता है हमारी । मैं कुछ समझी नहीं गुलाब तो एक फूल है हमारी मित्रता सारे फ्लावर का रंग, और उसकी खुशबू अपने साथ लिए हुए है।  जिससे हम दोनों ही क्या हमारा पूरा वातावरण ही सुगंधित होगा । दोनों हाथ में गुलाब लेते हुए एक स्वर में एक गुलाब की मोहताज नहीं हमारी मित्रता ढेर सारे सुगंधित फ्लावर सी है मित्रता हमारी…….।