" दर्प "-गृहलक्ष्मी की कहानियां: Hindi Kahani
Darp

Hindi Kahani: “पापा मुझे फाइन आर्ट्स में नाम लिखवा दो।मेरे सारे सहेलियां वही कर रहीं हैं!”
शुभांकर दास जी मंदमंद मुस्कुराए फिर बोले
“हाँ जरूर बिटिया…!,हम तुम्हारा नाम वहीं लिखवा देंगे।तुम निश्चिंत रहो।”
यह सुनकर वर्षा खुशी से खिल उठी। अपने पापा के गले लग कर खिलखिलाकर बोली
“थैंक्यू पापा!”
वर्षा खुशी से फुदकती हुई बाहर चली गई ।
शुभांकर जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें खिंच गई ।
सामने बैठे उनकी बड़ी बहन सुमित्रा देवी से यह छुपी नहीं रही।
वह वहीं से चिल्लाते हुए बोली
“शुभांकर, बहुत चढ़ा लिए हो अपनी बेटी को अपने सिर पर!
सिर्फ अब उसकी शादी के लिए लड़का देखो ।
वैसे भी यह इतनी साधारण है देखने में!
एक तो रंग धीमा, ऊपर से नैन नक्श भी साधारण!

कोई अच्छा लड़का तो मिलने से रहा। तुम्हारे पास लक्ष्मी की भी कमी है तो फिर कोई ऐसा ही लड़का देखो जो तुम्हारे बजट का हो।
दस बार जूते घिसोगे तब जाकर कोई लड़का मिलेगा !”
शुभांकर जी जितने भी चिंतित रहते थे, अपनी बड़ी दीदी की बात सुनकर और चिंता में पड़ गए ।
जब भी कोई उन्हें वर्षा के बारे में कुछ भी कहता था उनके अंदर जितनी घबराहट बढ़ती जाती थी।
कुछ देर तक चुप रहने के बाद उन्होंने अपनी दीदी से कहा
” एक बार जब मैंने ठान लिया दीदी तो मैंने बस ठान लिया!
अभी कोई इसकी उम्र नहीं हुई है कि मैं इसके लिए लड़का देखना शुरू करूँ।
अभी आपकी और मझली दीदी की बेटी बैठी हुई हैं, तो उन सबका छोड़कर मैं इस छोटी सी बच्ची का की शादी तय करूँ!”
सुमित्रा देवी चिढ़कर बोलीं
” मेरी छोटी और मंझली की चिकी की बराबरी मत करो।
यह दोनों रूप की खान हैं।वर्षा को देखो…यह कितनी साधारण है..!
तुम्हें मोह का चश्मा चढ़ गया है इससे दिखाई नहीं दे रहा… एक तो लड़की जात …इतनी छूट नहीं देनी चाहिए !लगाम कस के रखना चाहिए!!”
शुभांकर दास जी कुछ भी नहीं बोले।वह एक आम मध्यमवर्गीय परिवार से थे,वह भी मुंबई जैसे धनवान शहर में !
एक छोटे से फ्लैट में जिंदगी गुजारना उतना ही कठिन है, भीड़से भरी रेल में सफर करना और सही सलामत घर लौट आना!
सुबह से रात तक कितने सपनों को कुचलते हुए वह अपने परिवार को पाल रहे थे ।
उनके तीन बच्चे थे। दो बेटे और एक बेटी। दोनों बेटे इंजीनियरिंग में पढ़ रहे थे और बिटिया वर्षा अभी तुरंत ही ग्रेजुएशन कंप्लीट की थी।
अब उसे फाइन आर्ट्स में डिप्लोमा करने का मन था।
करीब एकडेढ़ लाख रुपये लग रहे थे। इतने पैसे शुभांकर जी के पास नहीं थे पर वह अपनी बिटिया का दिल नहीं तोड़ना चाहते थे।
वह उनकी आंखों की तारा थी। उन्होंने बैंक से लोन ले लिया और वर्षा का नाम फाइन आर्ट्स में लिखवा दिया।
करीब 2 साल की पढ़ाई थी। उन्होंने यह सोचा था कि धीरे-धीरे कर यह कर्जा चुका देंगे।
उनकी पत्नी माला ने दबे स्वर में मना भी किया था कि इतने रुपयों का कर्ज अपने सिर न चढ़ाएं..!
दोनों बेटों की पढ़ाई का खर्चा अलग ही था।
शुभाकर जी के ऊपर सिर्फ बोझ बढ़ने वाला था लेकिन शुभांकर जी ने माला को कुछ भी कहने से मना कर दिया ।
उन्होंने कहा जब मैं दोनों बेटों को पंख दे सकता हूं तो बेटी को भी उड़ने का हक है। मैं किसी का हक नहीं मार सकता।
बेटों के लिए बेटी का अधिकार नहीं छीनूंगा और दूसरी बात आज के जमाने में जब मैं बेटों को छूट दे सकता हूं तो अपनी बेटी को भी छूट दे सकता हूँ।”
मैं किसी की भी बात नहीं सुनुँगा ।जो भी होगा देखा जाएगा।” देखते-देखते 2 साल बीत गए ।4 सेमेस्टर की पढ़ाई थी।
देखते-देखते वर्षा ने चारों सेमेस्टर हंसते-हंसते निकाल लिया।
इन दो वर्षों में जो नहीं बदला था वह था शुभांकर जी की दोनों बहनों की नसीहतें और रहरहकर उसे कोसना।
वर्षा पढ़ाई में बहुत ही अच्छी थी।उसे फाइन आर्ट्स का कांसेप्ट बहुत ही अच्छे से समझ में आ गया था।
उसके टीचर उससे काफी खुश थे। परीक्षा देने के बाद उसने फर्स्ट राउंड में ही कैंपस निकाल लिया।
उसके पेंटिंग्स देखते-देखते बिकने लगे। एक कार्टून बनाने वाले चैनल ने उससे कांटेक्ट कर लिया।
उसे एक अच्छी तनख्वाह में जॉब मिल गई।
आज वर्षा ने अपने पूरे परिवार को होटल में अपनी तरफ से पार्टी दिया क्योंकि उसे आज पहली तनख्वाह मिली थी।
वह बहुत ही खुश थी।उसकी खुशी और चहचहाहट देखकर शुभांकर जी के आंखों में आंसू आ गए।
उन्होंने अपनी पत्नी से कहा
” माला, देखो हर समय छूट देना गलत नहीं होता है। बच्चों को बांधकर उनके सपने कतर देना कोई अच्छी बात नहीं होती।

मैंने वर्षा को सही दिशा में उड़ने दिया तो देखो आज वह कितनी खुश हैं। मैं उसके भविष्य के प्रति आश्वस्त हो गया हूं।”